खुशियां ….. Posted By kmsraj51

खुशियां …..

By kmsraj51

 

मुझे थोड़ी सी खुशियां मिलती हैं

और मैं वापस आ जाता हूं काम पर

जबकि पानी की खुशियों से घास उभरने लगती है

और नदियां भरी हों, तो नाव चल पड़ती है दूर-दूर तक।

 

वहीं सुखद आवाजें तालियों की

प्रेरित करती है नर्तक को मोहक मुद्राओं में थिरकने को

और चांद सबसे खूबसूरत दिखाई देता है

करवां चौथ के दिन चुनरी से सजी सुहागनों को

 

हर शादी पर घोड़े भी दूल्हे बन जाते हैं

और बड़ा भाई बेहद खुश होता है

छोटे को अपनी कमीज पहने नाचते देखकर

 

एक थके हुए आदमी को खुशी देती है उसकी पत्नी

घर के दरवाजे के बाहर इंतजार करती हुई

और वैसी हर चीज हमें खुशी देती है

जिसे स्वीकारते हैं हम प्यार से।

एक कक्षा में जो पढ़ाई होती है उसे हर विद्यार्थी अलग-अलग तरीके से अपने दिमाग में बैठाता है। By ~ kmsraj51

एक कक्षा में जो पढ़ाई होती है उसे हर विद्यार्थी अलग-अलग तरीके से अपने दिमाग में बैठाता है। यानि अगर एक पाठ्यक्रम को पढ़ाने के बाद छात्रों से कहा जाए कि वे पढ़ाए गए पाठ के विषय में लिखे तो हर छात्र के उत्तर अलग-अलग होंगे। किसी में बतायी गयी सारी बातों का उल्लेख होगा तो किसी में आधी तो कई बहुत थोड़ा-सा ही लिख पायेंगे। सिर्फ इस एक तरह की परीक्षा से ही उनके उत्तर देखकर सारे विद्यार्थियों की वर्तमान स्थिति का पता आसानी से लग जाता है और उन सब के लायक लाभकारी सलाहें उन्हें दी जा सकती है। सा‌थ ही शिक्षक अपने पढ़ाने के तरीके में बदलाव कर सकते हैं, ताकि कमजोर छात्र भी उनकी पढ़ाई को अच्छी तरह से समझ सके। 

भाग्य रेखा … By kmsraj51……….

भाग्य रेखा

 

नीले आकाश के बीच

बादलों ने खींची है

मेरी भाग्य रेखा

बादलों से  झॉंकते हैं

टिमटिमाते तारे

जिनमें बसी हैं

मेरी शुभ और अशुभ घडिय़ॉं

तिनका हूं अभी मैं

हवा में उड़ता हुआ

धूल हूं पृथ्वी की

क्या पता कल बन जाऊँ

माथे का तिलक किसी का

फिर भी तो ऐ मिट्टी

तेरी ही अंश हूं

न जाने कब

पॉंव तले रौंद दिया जाऊँ  ।

कुछ बातें … Posted By kmsraj51

कुछ बातें

 

एक कोयल कूंकती होगी सिर्फ अपने लिए

लेकिन उसकी आवाज सबको सुनाई देती है।

रास्तों में चलो तो

अपनी निगाहें पेड़ों पर कर लो

क्योंकि ये सारी धूल अपने मस्तक पर लगा लेते हैं।

पहचान बनाओ इतनी कि

वो हमेशा के लिए मौजूद रहे।

यूं ही कभी किसी भूले को याद कर लो

कि  पक्षी उड़ते हुए आकाश से निकल गए।

अनगिनत हाथों से छुए हुए सिक्के

तुम्हारे हाथों में

फिर घृणा किसी से क्यों

कि रात घोलती है अमृत

जागो या सोये रहो सबको मिलेगा

और मैं तलाशता रहा अंतहीन भूमि

यह ही मेरी सबसे बड़ी आस थी

मनुष्य नहीं हैं वहां फिर भी

धरती का तिनका भी

कितना अपना लगता है यहां

प्रेम से मेरी ओर उडक़र आता हुआ जैसे

और यह प्रेम मेरा कितना है

और तुम तक भी इसकी आवाज जाती हुई।

बच्चे – Man ke Sacche ….. By kmsraj51

बच्चे…

 

बच्चे लाइन में चलना नहीं चाहते

बच्चे नहीं जानते यह सुरक्षा का नियम है

बच्चे लाइनें तोड़ देते हैं

वे खेलना चाहते हैं मनपसंद बच्चों के साथ।

बच्चों के लिए कोई थकान नहीं,

न ही कोई दूरी है

दायरा है दूर-दूर तक देखने का

वे खेलते समय पाठ याद नहीं रखते

भूल जाते हैं पढ़ाई भी कुछ होती है

बच्चे मासूम उगते हुए अंकुर या छोटे से वृक्ष

अभी इतने कच्चे कि हवा से लथ-पथ

इनके चेहरे याद नहीं रहते

जैसे सभी अपने हों और एक जैसे

और उनकी खुशियां समां लेने के लिए

कितना छोटा पड़ जाता है यह भूखंड।