विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

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विचारों की शक्ति

विचारों की शक्ति – एक ऐसी शक्ति जिसे खुद(स्वयं) अनुभव ना कराें जब तक, तब तक विश्वास ही नहीं हाेता। अपने मन से निगेटिव विचारों काे हटाने का आसान तरिका है, कि नकारात्मक ना हि देखें, ना हीं सुने, ना हि पढ़ें। हमेशा सकारात्मक हि देखें, सकारात्मक हीं सुने, सकारात्मक हि पढ़ें आैर सकारात्मक हि करे। अपने विचारों की शक्ति काे आप तभी समझ सकते हैं, जब आपका मन शांत हाेगा, आैर मन शांत तब हाेगा जब मन के अंदर विचारों की संख्या कम हाेगी। मन के अंदर विचारों की संख्या कम करने का आसान तरिका है, कि अपनी मानसिक शक्तियाें काे याद करें, अथा॔त ध्यान(Meditation) कि मदद से अपने अच्छे(सही) आैर बुरे(गलत) विचारों काे समझना सीखें। मन के अंदर विचारों की संख्या कम आैर सकारात्मक (Positive) विचारों के हाेने से किसी भी मानव की निर्णय शक्ति अपने आप अच्छी हाे जाती हैं। निर्णय शक्ति अच्छी हाेने से मानव सही फैसला(निर्णय) लेने लगता है, जिससे सब काम(कार्य) सरलता पूर्वक पूर्ण हाेने लगते हैं। मानव स्वतः सुखीं और आनंदपूर्ण जीवन जीने लगता हैं।

विचारों की शक्ति से कुछ भी करना संभव है। मन जब शांत हाेगा, कुछ भी स्मरण रखना भी आसान हाेगा। मन शांत रहने से स्मरण शक्ति अतितीव्र हाे जाती हैं।

  1. मन के विचारों की शक्ति,
  2. कैसे मन के विचारों काे नियंत्रण में करें,
  3. मन के अंदर चलने वाले विचारों काे कैसे पढ़ें,

अब बहुत जल्द प्रकाशित हाेने वाला है…..

कृष्ण मोहन सिंह(Krishna Mohan Singh) द्वारा लिखित किताब,, 

“तू ना हो निराश कभी मन से” 

“मन के विचारों और शक्तियाें” पर लिखी गई एक अनमाेल ग्रंथ,, 

मन काे कैसे नियंत्रण में करें।

मन के विचारों काे कैसे नियंत्रित करें॥

विचारों के प्रकार-एक खुशी जीवन के लिए।

अपनी सोच काे हमेशा सकारात्मक कैसे रखें॥

“मन के बहुत सारे सवालाें का जवाब-आैर मन काे कैसे नियंत्रित कर उसे सहीं तरिके से संचालित कर शांतिमय जीवन जियें”

Thoughts: “तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से,,

Note::-

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

खुद को साबित करने के लिए मौका मिलने के आप हकदार हैं। सफलता की नींव आप खुद हैं। 

दूसरे क्या सोच रहे हैं, इस बारे में अनुमान लगाते रहना नकारात्मक सोच की निशानी है।

 

 

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प्यार के एक पल

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प्यार के एक पल (‘रंजना’ रंजू भाटिया)

प्यार के एक पल ने
जन्नत को दिखा दिया
प्यार के उसी पल ने
मुझे ता -उमर रुला दिया
एक नूर की बूँद की तरह पिया
हमने उस पल को
एक उसी पल ने
हमे खुदा के क़रीब ला दिया !!

रुका हुआ वक़्त

इजहार -इनकार

आज ज़िन्दगी की साँझ में
खुद से ही कर रही हूँ सवाल जवाब
कि जब बीते वक़्त में
रुकी हवा से इजहार किया
तो वह बाहों में सिमट आई
जब मुरझाते फूलों से
किया इक्क्रार तो
वह खिल उठे

जाते बादलों को
प्यार से पुचकारा मैंने
तो वह बरस गए
पर जब तुम्हे चाहा शिद्दत से तो
सब तरफ सन्नाटा क्यों गूंज उठा
ज़िन्दगी से पूछती हूँ आज
कि क्या हुआ ..
क्या यह रुका हुआ वक़्त था
जो आकर गुजर गया??

We are grateful to ‘रंजना’ रंजू भाटिया Ji for sharing this very inspirational poetry with KMSRAJ51 readers.

‘रंजना’ रंजू भाटिया

जन्म हरियाणा के रोहतक ज़िले के कलनौर गाँव में १४ अप्रैल,१९६६ को हुआ। आरम्भिक शिक्षा दिल्ली में और कॉलेज जम्मू से किया। बी॰एड॰ तक की शिक्षा ली है। बचपन से ही लिखने में रुचि थी। कई लेख और कविता शुरू में दैनिक जागरण, अमर उजाला और भाटिया प्रकाश [मासिक पत्रिका] आदि में छपे, फिर घर में व्यस्त होने के कारण लिखना सिर्फ़ डायरी तक सीमित रह गया। सैकड़ों कविता लिखी हुई हैं। १२ साल तक स्कूल में अध्यपिका रहीं। पत्रकारिता में ली गई डिप्लोमा की डिग्री बहुत काम आई। लगभग दो वर्षों तक मधुबन पब्लिशर के साथ जुड़ी रहीं जहाँ उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के उपन्यासों की प्रूफ़-रीडिंग और एडीटिंग का अनुभव प्राप्त हुआ। कविता और हिंदी-साहित्य में विशेष रुचि है। बच्चन ,अमृता प्रीतम और दुष्यंत जी को पढ़ना बहुत पसंद है।.घुमक्कडी यात्राये और खाना खाना बंनाने के विषय भी मेरे प्रिय शौक में शामिल हैं ,थोड़ी समझ आई तो “बुक रिव्यूज़” भी लिखे हुए पसंद किये जाने लगे, कुल मिला कर यह ब्लॉग “कुछ मेरी कलम से “नाम को सार्थक करता हुआ अब विभिन्न विषयों का घर बन गया है, यहाँ आइये, बैठिये, कुछ पल बिताएं और अपनी अनमोल राय देना न भूलें!

Blogs:- http://ranjanabhatia.blogspot.in/

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

खुद को साबित करने के लिए मौका मिलने के आप हकदार हैं। सफलता की नींव आप खुद हैं। 

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सर्व श्रेष्ठ सम्पत्तिवान काैन?

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सर्व श्रेष्ठ सम्पत्तिवान काैन?

किसी के पास अगर सिर्फ स्थूल सम्पत्ति है तो भी सदा सन्तुष्ट नहीं रह सकते। स्थूल सम्पत्ति के साथ अगर सर्व गुणों की सम्पत्ति, सर्व शक्तियों की सम्पत्ति और ज्ञान की श्रेष्ठ सम्पत्ति नहीं है तो सन्तुष्टता सदा नहीं रह सकती।  दुनिया वाले सिर्फ स्थूल सम्पत्ति वाले को सम्पत्तिवान समझते हैं।

सर्व श्रेष्ठ सम्पत्तिवान वह हैं जिसके पास स्थूल सम्पत्ति के साथ अगर सर्व गुणों की सम्पत्ति, सर्व शक्तियों की सम्पत्ति और ज्ञान की श्रेष्ठ सम्पत्ति है

वाे ही सर्व श्रेष्ठ सम्पत्तिवान है।

किसी भी मनुष्य की तीन मुख्य-सम्पत्ति (Property)

  1. गुणों की सम्पत्ति,
  2. ज्ञान की श्रेष्ठ सम्पत्ति,
  3. आत्मिक शक्तियों की सम्पत्ति,

ये तीनाे शक्तिया जिस मनुष्य के पास “न” हाे, सिर्फ स्थूल सम्पत्ति है तो भी सदा सन्तुष्ट नहीं रह सकता।

कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को जान विकर्मों से बचना ही ज्ञान हाेने का बाेध कराता है।

साभार-

“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

खुद को साबित करने के लिए मौका मिलने के आप हकदार हैं। सफलता की नींव आप खुद हैं। 

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‘‘सच्चा शिष्य’’

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‘‘सच्चा शिष्य’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बहुत पुरानी बात है। एक विद्वान आचार्य थे। उनका एक गुरूकुल था।

प्राचीन काल में आचार्य विद्यार्थीयाें को निशुल्क शिक्षा दिया करते थे।

एक दिन आचार्य जी ने गुरूकुल के सारे विद्यार्थियों को अपने पास बुलाया और कहा-

‘‘प्रिय विद्यार्थियों मेरी कन्या विवाह योग्य हो गयी है। परन्तु इसका विवाह करने के लिए मेरे पास धन नही है। मेरी समझ में नही आ रहा है कि कैसे इसका विवाह करूँ।’’

कुछ विद्यार्थी जिनके माता-पिता धनवान थे।

उनसे बोले- ‘‘गुरू जी! हम लोग अपने माता‘पिता से कह कर आपको धन दिलवा देंगे।’’

आचार्य जी बोले- ‘‘शिष्यों! मुझे संकोच होता है, मैं लालची आचार्य नही कहाना चाहता।’’ फिर बोले कि मैं अपनी पुत्री का विवाह अपने शिष्यों के धन से ही करना चाहता हूँ। परन्तु ध्यान रहे कि तुममे से कोई भी धन माँग कर नही लायेगा। जो विद्यार्थी धनी परिवारों के नही थे उनसे आचार्य जी ने कहा कि तुम लोग भी अपने घरों से कुछ न कुछ ले आना परन्तु किसी को पता नही लगना चाहिए और उस वस्तु पर किसी की दृष्टि भी नही पड़नी चाहिए।”

कुछ ही दिनों में आचार्य जी के पास पर्याप्त धन व वस्तुएँ एकत्रित हो गयी।

तभी आचार्य जी के पास एक अत्यन्त धनी परिवार का शिष्य आकर बोला-

‘‘आचार्य जी मेरे घर में किसी प्रकार की कमी नही है, परन्तु मैं आपके लिए कुछ भी नही ला पाया हूँ।’’

आचार्य जी बोले- ‘‘ क्यों ? क्या तुम गुरू की सेवा नही करना चाहते हो?’’

शिष्य ने उत्तर दिया- ‘‘नही गुरू जी! ऐसी बात नही है। आपने ही तो कहा था कि कोई वस्तु या धन लाते हुए किसी को पता नही लगना चाहिए और उस वस्तु पर किसी की दृष्टि भी नही पड़नी चाहिए। मुझे वह स्थान नही मिला, जहाँ कोई देख न रहा हो।’’

आचार्य जी बोले- ‘‘तुम झूठ बोलते हो। कहीं तो कोई ऐसा समय व स्थान रहा होगा जब तुम्हें कोई देख नही रहा होगा।’’

शिष्य आँखों में आँसू भर कर बोला- ‘‘गुरू जी! ऐसा समय व स्थान तो अवश्य मिला परन्तु मैं भी तो उस समय अपने इस कृत्य को देख रहा था।’’

आचार्य जी ने उस शिष्य को गले से लगा लिया और बोले-

‘‘तू ही मेरा सच्चा शिष्य है। मुझे अपनी कन्या के लिए विवाह के लिए धन की आवश्यकता नही थी। मैं तो उसके वर के रूप में तेरे जैसा ही सदाचारी वर खोज रहा था।’’

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

We are grateful to DR. Rupcndra Shastri ‘Mayank Ji for sharing this very inspirational Hindi story with KMSRAJ51 readers.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

DR. Rupcndra Shastri ‘Mayank` Blog:- http://powerofhydro.blogspot.in/

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“सपने देखना बेहद जरुरी है, लेकिन केवल सपने देखकर ही मंजिल को हासिल नहीं किया जा सकता,
सबसे ज्यादा जरुरी है जिंदगी में खुद के लिए कोई लक्ष्य तय करना|”

-Kmsraj51

 

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मेरी याँदे

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मेरी याँदे

शाम सवेरे तेरे बांहों के घेरे ,
बन गए हैं दोनों जहाँ अब मेरे
क्या मांगू ईश्वर से पा कर तुझे मैं
क्या सबको मिलता है ऐसा दीवाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

चले जाते ऑफिस, कैसी ये मुश्किल
तुम बिन कुछ में भी नहीं लगता दिल
मेरे पास बैठो, छुट्टी आज ले लो
हो रही बारिश,है मौसम कितना सुहाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

वो घर से निकला, हजार कपडे बदलना
लबों पे लाली लगाना मिटाना
इतरा के पूछना कैसी लग मैं रही हूँ
आज फिर भूल गई नेल पालिश लगाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

बेसब्री से करती इतंजार, जल्दी आये शुक्रवार
कुछ अच्छा बनाती ,ज्यादा ही आता प्यार
धीमी रौशनी में फ़िल्म देखते देखते
कभी नींबू पानी पीना कभी आइसक्रीम खाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

फूले गालों को खींचना , थपकियों से जगाना
शनिवार इतवार कितना मुश्किल उठाना
पांच मिनट बोल फिर से सो जाते
भला कब तुम छोड़ोगे मुझको सताना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

बांतों ही बांतो में कभी जो बढ़ जातीं बातें
रूठे रहते ,दिनों तक नहीं नज़र मिलाते
मुझे रोता छोड़,मुँह फेर सो जाते
क्या इतना मुश्किल था गले से लगाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

डरते डरते तुम्हे सोते हुए प्यार करते
तुम से झगड़ के जीते न मरते
घंटो कंधे पे तुम्हारे सर रख के रोते रहते
तुम बिन आंसुओं का नहीं अब ठिकाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

जब पहली बार साथ रहने आई
कितना में खुश थी हाँ थोड़ी घबड़ाई
कितनी मस्ती की हमने, थोड़ी लड़ाई
बहुत याद आता अपना प्यारा आशियाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

Post share by:- Mr. निशिकांत तिवारी,,

Nishikant Blog – http://nishikantworld.blogspot.in/

We are grateful to Nishikant Tiwari Ji for sharing this very romantic poetry with Kmsraj51 readers.

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क्या बनेंगे ये ?

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Kya Banenge Ye क्या बनेंगे ये

क्या बनेंगे ये ?

यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर ने अपने विद्यार्थियों को एक एसाइनमेंट दिया।  विषय था मुंबई की धारावी झोपड़पट्टी में रहते 10 से 13 साल की उम्र के लड़कों के बारे में अध्यन करना और उनके घर की तथा सामाजिक परिस्थितियों की समीक्षा करके भविष्य में वे क्या बनेंगे, इसका अनुमान निकालना।

कॉलेज विद्यार्थी काम में लग गए।  झोपड़पट्टी के 200 बच्चो के घर की पृष्ठभूमिका, मा-बाप की परिस्थिति, वहाँ के लोगों की जीवनशैली और शैक्षणिक स्तर, शराब तथा नशीले पदार्थो के सेवन , ऐसे कई सारे पॉइंट्स पर विचार किया गया ।  तदुपरांत हर एक  लडके के विचार भी गंभीरतापूर्वक सुने तथा ‘नोट’ किये गए।

करीब करीब 1 साल लगा एसाइनमेंट पूरा होने में।  इसका निष्कर्ष ये  निकला कि उन लड़कों में से 95% बच्चे गुनाह के रास्ते पर चले जायेंगे और 90% बच्चे बड़े होकर किसी न किसी कारण से जेल जायेंगे।  केवल 5% बच्चे ही अच्छा जीवन जी पाएंगे।

बस, उस समय यह एसाइनमेंट तो पूरा हो गया , और बाद में यह बात का विस्मरण हो गया। 25 साल के बाद एक दुसरे प्रोफ़ेसर की नज़र इस अध्यन पर पड़ी , उसने अनुमान कितना सही निकला यह जानने के लिए 3-3 विद्यार्थियो की 5 टीम बनाई और उन्हें धारावी भेज दिया ।  200 में से कुछ का तो देहांत हो चुका था तो कुछ  दूसरी जगह चले गए थे।  फिर भी 180 लोगों से मिलना हुवा।  कॉलेज विद्यार्थियो ने जब 180 लोगों की जिंदगी की सही-सही जानकारी प्राप्त की तब वे आश्चर्यचकित हो गए।   पहले की गयी स्टडी के  विपरीत ही परिणाम दिखे।

उन में से केवल 4-5 ही सामान्य मारामारी में थोड़े समय के लिए जेल गए थे ! और बाकी सभी इज़्ज़त के साथ एक सामान्य ज़िन्दगी जी रहे थे। कुछ तो आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छी स्थिति में थे।

अध्यन कर रहे विद्यार्थियो तथा उनके प्रोफ़ेसर साहब को बहुत अचरज हुआ कि जहाँ का माहौल गुनाह की और ले जाने के लिए उपयुक्त था वहां लोग महेनत तथा ईमानदारी की जिंदगी पसंद करे, ऐसा कैसे संभव हुवा ?

सोच-विचार कर के विद्यार्थी पुनः उन 180 लोगों से मिले और उनसे ही ये जानें की कोशिश की।  तब उन लोगों में से हर एक ने कहा कि “शायद हम भी ग़लत रास्ते पर चले जाते, परन्तु हमारी एक टीचर के कारण हम सही रास्ते पर जीने लगे।  यदि बचपन में उन्होंने हमें सही-गलत का ज्ञान नहीं दिया होता तो शायद आज हम भी अपराध में लिप्त होते…. !”

विद्यार्थियो ने उस टीचर से मिलना तय किया।  वे स्कूल गए तो मालूम हुवा कि वे  तो सेवानिवृत हो चुकी हैं ।  फिर तलाश करते-करते वे उनके घर पहुंचे ।  उनसे सब बातें बताई और फिर पूछा कि “आपने उन लड़कों पर ऐसा कौन सा चमत्कार किया कि वे एक सभ्य नागरिक बन गए ?”

शिक्षिकाबहन ने सरलता और स्वाभाविक रीति से कहा : “चमत्कार ? अरे ! मुझे कोई चमत्कार-वमत्कार तो आता नहीं।  मैंने तो मेरे विद्यार्थियो को मेरी संतानों जैसा ही प्रेम किया।  बस ! इतना ही !” और वह ठहाका देकर जोर से हँस पड़ी।

मित्रों , प्रेम व स्नेह से पशु भी वश हो जाते है।  मधुर संगीत सुनाने से गौ भी अधिक दूध देने लगती है।  मधुर वाणी-व्यवहार से पराये भी अपने हो जाते है।  जो भी काम हम करे थोड़ा स्नेह-प्रेम और मधुरता की मात्रा उसमे मिला के करने लगे तो हमारी दुनिया जरुर सुन्दर होगी।  आपका दिन मंगलमय हो, ऐसी शुभभावना।  

Note:- Post inspired by- http://www.achhikhabar.com/

We are grateful to My dear Friend Mr. Gopal Mishra & AKC for sharing this very inspirational incident with Kmsraj51 readers. 

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

प्रश्न :- दोस्त क्या है?\मित्र क्या है?

उत्तर :- “एक आत्मा जाे दाे शरीराें में निवास करती है”

सफलता कठोर मेहनत और खुद पर भरोसा करने से मिलती है।”

 

 

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माँ तू मुझे क्यू याद आती है..

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माँ तू मुझे क्यू याद आती है..

maa

माँ तू मुझे क्यू याद आती है..

माँ तू मुझे क्यू याद आती है…..

पौष की सर्द रातों को सीने से लगाकर सुलाती थी जो,

पकड़कर दोनों बाजूओं को जमीं पर चलना सिखाती थी जो,

जब चलते चलते गिरता था, गिरे हुए को उठाती थी जो,

गोद में बिठाकर अपने हाथों से खाना खिलाती थी जो,

अपनी बांहों में उठाकर झूला झुलाती थी जो,

रातों को सुलाने के लिए लोरियां सुनाती थी जो,

आज वो मां बहुत याद आती है,

मुश्किल में उसकी कमी बहुत सताती है,

उसकी बातें करते ही आँख भर आती है,

नहीं इस दुनिया में वो, मगर राहुल को

आज भी कहीं से देकर आवाज मुझे बुलाती है वो…….

Rahul Sir

Note:- Post share by My dear Friend Mr. Rahul  Sharma.

श्रीमान- राहुल शर्मा मेरे बहुत पुराने दोस्त और एक कवि हृदय है।

मैं हृदय से श्री- राहुल शर्मा का बहुत आभारी हूँ. दिल काे छुने वाली हिंदी कविता शेयर करने लिए।

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ज्ञान का अर्थ है समझ। समझदार उसे कहा जाता है जो समय प्रमाण समझदारी से कार्य करते हुए सफलता को प्राप्त करे।समझदार की निशानी है वह कभी धोखा नहीं खा सकते। और योगी की निशानी है क्लीन और क्लीयर बुद्धि। जिसकी बुद्धिक्लीन और क्लीयर है वह कभी नहीं कहेगा कि पता नहीं ऐसा क्यों हो गया! यह शब्द ज्ञानी और योगी आत्मायें नहीं बोल सकती, वे ज्ञान और योग को हर कर्म में लाती हैं।

ब्रह्म कुमारी आध्यात्मिक विश्वविद्यालय

 

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