परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।


Kmsraj51 की कलम से…..

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परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

एक दिन मैं किसी काम से कहीं जा रहा था। रास्ते में बहुत से लोग आते-जाते दिखे, लेकिन तभी एक बुजुर्ग महिला मुझे मिलीं। उन्होंने मुझसे कहा, ‘बेटा, मुझे मेट्रो स्टेशन के गेट तक छोड़ दो।’ मैंने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास तक छोड़ दिया। वह प्रेम से सौ रुपये देने लगीं तो मैंने लेने से इनकार कर दिया और कहा, ‘ये रुपये आप उस जरूरतमंद इंसान को दे दीजिए, जिसे इसकी जरूरत हो।’ इस पर वह मुझे बहुत गौर से देखने लगीं और कहने लगीं- ‘बेटा, तुम हमेशा यही कोशिश करना और जरूरतमंदों की मदद करते रहना।’

वह दिन आज तक मुझे याद है। स्वार्थ भावना से रहित दूसरों के कल्याण के लिए मन, वचन और कर्म से किया गया कार्य परोपकार कहलाता है। पारस्परिक विरोध की भावना का नाश करना और प्रेम-भाव को बढ़ाना परोपकार कहलाता है। प्रकृति हमें निरंतर यह संदेश देती रहती है। पवन, प्राण वायु देकर हमारी गति को संचालित करता है। नदियां अपना अनंत जल जगत के लिए अर्पित कर देती हैं। वृक्ष अपनी छाया और फल दूसरों के लिए प्रस्तुत करते हैं।

यदि हम महान लोगों के इतिहास को देखें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और मदर टेरेसा की याद आना स्वाभाविक है। गांधी जी ने देश के हित के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया और मदर ने अनगिनत अनाथों, विकलागों और रोगियों को अपने सीने से लगाया। लेकिन आज का मनुष्य इंसानियत को भूलता जा रहा है। वह परोपकारी लोगों को मूर्ख समझने लगा है। ऐसे लोग उसके लिए हंसी का पात्र बन जाते हैं।

आमतौर पर लोगों के हृदय से दया, करुणा और सहानुभूति जैसी मानवीय प्रवृत्तियां निकल भागी हैं। आज का मनुष्य स्वार्थ की जीती जागती परिभाषा बनकर रह गया है। राह चलते सड़क पर अगर कोई असहाय मिल जाए तो उसे देखते ही लोग अपना मुंह मोड़ लेते हैं। सड़क पर पड़ा कराहता घायल और दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति जैसे उसके लिए ध्यान देने का विषय ही नहीं रह गया है। जबकि सच यह है कि इंसान इस संसार में परोपकार के लिए ही जन्म लेता है।

मानव जीवन की सार्थकता इसी में है कि अपने बारे में सोचने के साथ-साथ हम दूसरों के बारे में भी सोचें। परोपकार करने से खुद को भी खुशी मिलती है। कभी किसी जरूरतमंद की मदद करके देखिए, आप पाएंगे कि अपने जीने की सार्थकता का अहसास होने लगा है। परोपकारी व्यक्ति दुखियों के प्रति उदार, निर्बलों के रक्षक और जन-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होते हैं। परोपकार से जो आनंद हमें मिलता है, वह एकदम अलौकिक होता है। इसीलिए परोपकारी व्यक्ति खुद भी सुखी रहता है और दूसरों में भी सुख बांटता चलता है। वह खुद तो ऐसा करता ही है, दूसरों को भी प्रेरित करता है।

Source: http://navbharattimes.indiatimes.com/

आपका सबका प्रिय दोस्त,

Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor, Founder & CEO
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