जीवन में दुःखाे से निराश हाेकर बैठ ना जाना तुम।


Kmsraj51 की कलम से…..

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© जीवन में दुःखाे से निराश हाेकर बैठ ना जाना तुम। ®

बाज लगभग ७० वर्ष जीता है …..

परन्तु अपने जीवन के,
४० वें वर्ष में आते-आते उसे…..
एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है।

उस अवस्था में उसके शरीर के,
3 प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं।

पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है,
व शिकार पर पकड़ बनाने में,
असक्षम होने लगते हैं।

चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है,
और भोजन निगलने में,
व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।

पंख भारी हो जाते हैं….
और सीने से चिपकने के कारण,
पूरे खुल नहीं पाते हैं।
उड़ानें सीमित कर देते हैं।

भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना,
और भोजन खाना … तीनों प्रक्रियायें,
अपनी धार खोने लगती हैं।

उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं…..
या तो देह त्याग दे,
या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह,
त्यक्त(छुटा हुआ) भोजन पर निर्वाह करे।

या फिर “स्वयं को पुनर्स्थापित करे”।
आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में.

जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं,
वहीं तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा।

बाज पीड़ा चुनता है…..
और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।

वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है…..
और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया।

सबसे पहले वह अपनी चोंच,
चट्टान पर मार-मार कर तोड़ देता है,
अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक,
कुछ भी नहीं पक्षीराज के लिये।

तब वह प्रतीक्षा करता है,
चोंच के पुनः उग आने की।

उसके बाद वह,
अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है,
और प्रतीक्षा करता है…..
पंजों के पुनः उग आने की।

नये चोंच और पंजे आने के बाद,
वह अपने भारी पंखों को,
एक-एक कर नोंच कर निकालता है।
और प्रतीक्षा करता है…..
पंखों के पुनः उग आने की।

१५० दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा…..
और तब उसे मिलती है,
वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी नयी।

इस पुनर्स्थापना के बाद,
वह ३० साल और जीता है…..
ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।

इच्छा, सक्रियता और कल्पना,
तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं हममें भी।

हमें भी भूतकाल में जकड़े,
अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर,
कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी।

१५० दिन न सही …..
तो एक माह ही बिताया जाये,
स्वयं को पुनर्स्थापित करने में।

जो शरीर और मन से चिपका हुआ है,
उसे तोड़ने और…..
नोंचने में पीड़ा तो होगी ही।

बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे…..
इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी,
अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी।

हर दिन कुछ चिंतन किया जाए,
और आप ही वो व्यक्ति हे,
जो खुद को दुसरो से बेहतर जानते है।

सिर्फ इतना निवेदन की निष्पक्षता के साथ,
छोटी-छोटी शुरुवात कर परिवर्तन करें।

© कृष्ण मोहन सिंह(KMS) ©

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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