कभी-कभी रात लगती है कुछ पलाे की…..


Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ कभी-कभी रात लगती है कुछ पलाे की…..ϒ

कभी-कभी मंज़िल सामने खड़ी रहती है।
ताे कभी-कभी मंज़िल ढूँढने मे ज़माने बीत जाते है॥

किसी ने आँख खाेली साेने की नगरी में।
ताे किसी काे घर बनाने में ज़माने बीत जाते है॥

कभी-कभी रात लगती है कुछ पलाे की, ताे…..
कभी सारी रात कटती है जाग-जाग कर॥

कभी रिश्ते बनाने मे ज़माने लग जाते है, ताे…..
कभी रिश्ते बन कर टूट जाते है कुछ ही पलाे में॥

क़ुदरत का करिश्मा देखाे कि काेई किसी से नज़रें…..
मिलाता है, ताे काेई किसी से हर समय नज़रें चुराता है॥

हाेता वही है इस संसार मे जाे विधाता ने रचा है।
क़िस्मत अपनी – अपनी है, एक जैसी नही॥

∅- विमल गांधी ∇
Vimal Gandhi-kmsraj51

विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी कविता साझा करने के लिए।

पढ़ेंविमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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