सुखी जीवन का स्रोत – संपूर्ण पवित्रता।


Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ सुखी जीवन का स्रोत – संपूर्ण पवित्रता। ϒ

सर्व समस्याओं का केवल एक समाधान – संपूर्ण पवित्रता का पालन।

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प्यारे दोस्तों – पवित्रता एक ऐसी पूंजी है जिससे हम सभी प्रकार के सुख ले सकते हैं। इस शक्ति से लाेगाें ने दुनिया में हर एक चीज़ काे अपने वश किया है। चाहे वाे प्रकृति हाे `या` प्रकृति का आकर्षण हाे। पवित्रता काे ही सुख और शांति की माता का दर्जा प्राप्त है। यदि आज काेई अपवित्र है ताे वह हर तरह से दुःखी हैं। पवित्रता की अग्नि विकाराें काे समूल नाश करने का माद्दा रखती हैं।

¤ पवित्रता ¤

पवित्रता काे शरीर मात्र के साथ नहीं जाेड़ना है, पवित्रता ताे मन की, तन की, धन की, समय की, संकल्पाें की भी है। शब्दों का उपयाेग तथा तथा कार्य आदि करने में भी पवित्रता का अमूल्य याेगदान है।

परमात्मा की श्रीमत के अनुसार पवित्र मनुष्य मन, वचन व कर्म तीनाे से पवित्र हाेगा। यहाँ तक कि स्‍वप्‍न और संकल्प में भी उसके किसी और के लिए बुरे भाव नहीं आएंगे। इसलिए ताे कहते हैं कि पवित्रता की परिभाषा बहुत सूक्ष्म है।

पवित्रता के कुुछ प्रकार ये हैं-

¤ मन की पवित्रता ¤

सदैव ईश्वर के श्रीमत प्रमाण ही संकल्प करना, शुभ भावना, शुभ कामना, दातापन की भावना सदैव स्व, दुसराें और विश्व प्रति श्रेष्ठ संकल्प ही करना।

लाभ – पवित्र मन सदैव श्रेष्ठ और कल्याणकारी ही संकल्प करता है जिससे Pure vibrations सारे विश्व में फैलते है जाे जीव-जन्तुओं और प्रकृति के लिए भी कल्याणकारी हैं।  वहीं विकारी मन, जाे विकाराें के वश हाेता है उससे नकारात्मक और अशुद्ध vibrations विश्व की तमाेप्रधानता काे और भी बढ़ाते हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग के मुख्य कारणों में हमारे मानसिक एनर्जी का दूषित हाेना भी है। हमारे विचारों से ही समाज का निर्माण हाेता है। गैसाे के साथ हमारे मानसिक Wastes के कारण भी पर्यावरण प्रदूषित होता है।

¤ तन की पवित्रता ¤

ब्रह्मचर्य का पालन करने से हमें शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक लाभ हाेता है। जिससे हमारे जीवनद्रव्य की रक्षा हाेती है जाे Brain में निर्मित हाेता है। Brain की बहुत सारी ऊर्जा बच जाती है। फलस्वरूप हमारी आयु लम्बी हाेती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले मानव सदा निराेगी और स्वस्थ्य हाेते हैं। उन्हें हर जगह मान-सम्मान और यश की प्राप्ति हाेती हैं।

¤ पवित्र भोजन ¤

जैसा अन्न वैसा मन। हमारे भाेजन का प्रभाव हमारे मन पर भी पड़ता है। तामसिक भाेजन मन काे विकारी बनाता है, वहीं शुद्ध सात्विक मन एक स्वस्थ शरीर और दाेनाें के निर्माण में सहायक है। सात्विक भाेजन से परमात्मा की शक्ति भी मिलती है, क्योंकि वाे परमात्मा की याद में बनाया जाता है। वहीं मांसाहार का सेवन या जंक फूड खाने से तन और मन दाेनाें काे हानि हाेती है, वहीं हम जीवहत्या के भी दाेषी बन जाते हैं।

¤ कर्माें की पवित्रता ¤

ज्ञान के सागर परमात्मा ने हमे कर्माें की गुहा गति का ज्ञान दिया है। साथ ही साथ हमें मास्टर त्रिकालदर्शी बन कर्म करने की प्रेरणा दी है। ईश्वर हमें सदैव अपने हर कर्म उनकाे समर्पित कर निमित्त भाव से कर्म करने काे बाेलते है, जिससे हम कर्माें के प्रभाव से बच जाते हैं। ईश्वर हमें कर्मयाेगी बनने की शिक्षा देते हैं। हमारे हर कर्म स्व और दूसराें प्रति कल्याणकारी हाें जिससे हमारा भविष्य उज्जवल बनता है। सत्कर्म से हमारे जमा का खाता बढ़ता है और ईश्वर के सहयाेगी बनकर हम अपना भाग्य श्रेष्ठ बना लेते हैं। परमात्मा हमें कर्माें में भी अहिंसा की सेवा देते हैं। न किसी काे दुःख देना न दुःख लेना। सदा दूसराें की सेवा कर दुआ का खाता बढ़ाना और सबकाे परमात्मा के बताये मार्ग पर चलने की शिक्षा देना। अपने Practical जीवन से परमात्मा काे प्रत्यक्ष करना ही हमारे आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य हाे। स्वपरिवर्तन से विश्वपरिवर्तन का लक्ष्य सहज ही हाे जाएगा और फिर से रामराज्य आ जाएगा।

लाभ – दूसराें की बदुआयें लेने से बचेंगे और नए कार्मिक Accounts अच्छे ही बनाएंगे।

¤ धन की पवित्रता ¤

दूसराें की दुआएं लेते हुए सदा मेहनत और ईमानदारी से ही धन अर्जित करेंगे और धन काे ईश्वरीय सेवा में लगाएंगे। कभी भी रहमदिल बन कुपात्र काे धन का दान नहीं करना जिससे बाेझा खुद पर आये। पवित्र धन घर में शांति और खुशहाली लेकर आता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पवित्रता की धारणा से ही आत्मा अन्य गुणाें काे स्वत: ही धारण करने और अपने पावन बनने की राह पर अग्रसर हाे जाती है।

¤ विकाराें का परिवर्तित रूप ¤

काम:- काम विकार शुभ कामना के रूप में आपके पुरूषार्थ में सहयाेगी रूप बन जायेगा। काम के रूप में वार करने वाला शुभकामना के रूप में विश्व-सेवाधारी रूप बन जायेगा। दुश्मन के बजाए दोस्त बन जायेगा।

क्रोध:- क्रोधाग्नि रूप में जाे ईश्वरीय सम्पत्ति काे जला रहा है, जाेश के रूप में सबकाे बेहाेश कर रहा है, यही क्रोध विकार परिवर्तित हाे रूहानी जाेश वा रूहानी खुमारी के रूप में बेहाेश काे हाेश दिलाने वाला बन जायेगा। क्रोध विकार सहन-शक्ति के रूप में परिवर्तित हाे आपका एक शस्र बन जायेगा। जब क्रोध सहन-शक्ति का शस्र बन जाता है ताे शस्र सदैव शस्रधारी की सेवा अर्थ हाेते हैं। यही क्रोध-अग्नि, याेगाग्नि के रूप में परिवर्तित हाे जायेगी, जाे आपकाे नहीं जलायेगी लेकिन पापाें काे जलायेगी।

लोभ:- इसी प्रकार लाेभ विकार ट्रस्टी रूप की अनासक्त वृत्ति के स्वरूप में, उपराम स्थिति के स्वरूप में, बेहद की वैराग्य वृत्ति के रूप में परिवर्तित हाे जायेगी। लाेभ खत्म हाे जायेगा और सदा `चाहिए-चाहिए` के बदले `इच्छा मात्रम अविद्या` स्वरूप हाे जायेंगे। लाेभ काे चाहिए नहीं कहेंगे, लेकिन `जाइये`, `लेना है नहीं`, देना है, देना है` यह परिवर्तन हाे जायेगा। यही लाेभ अनासक्त वृत्ति वा देने वाला दाता के स्वरूप की स्मृति-स्वरूप में परिवर्तन हाे जायेगा।

माेह:- इसी प्रकार माेह विकार वार करने के बजाए स्नेह के स्वरूप में ईश्वर की याद और सेवा में विशेष साथी बन जायेगा। स्नेह `याद और सेवा` में सफलता का विशेष साधन बन जायेगा।

अहंकार:- ऐसे ही अहंकार विकार देह-अभिमान से परिवर्तित हाे स्वाभिमान बन जायेगा। स्व-अभिमान चढ़ती कला का साधन है। देहाभिमान गिरती कला का साधन है। देहाभिमान परिवर्तित हाे स्व-अभिमान के रूप में स्मृति-स्वरूप बनने में साधन बन जायेगा। इसी प्रकार यह विकार अर्थात विकराल रूपधारी आपकी सेवा के सहयाेगी, आपकी श्रेष्ठ शक्तियों के स्वरूप में परिवर्तित हाे जायेंगे। ऐसे परिवर्तन करने की शक्ति अनुभव करते हाे? इन तीन स्मृतियाें के आधार पर पाँचाे का परिवर्तन कर सकते हाे। 

काम के रूप में आये शुभ भावना बन जाए, तब माया-जीत जगत-जीत का टाइटल मिलेगा। विजयी, दुश्मन का रूप परिवर्तन ज़रूर करता है। जाे राजा हाेगा वह साधारण प्रजा बन जायेगा, तब विजयी कहलाया जायेगा। मंत्री हाेगा वह साधारण व्यक्ति बन जायेगा तब विजयी कहलाया जायेगा।

वैसे भी नियम है कि जाे जिस पर विजय प्राप्त करता है उसकाे बन्दी बनाकर रखते हैं, अर्थात गुलाम बनाके रखते हैं। आप भी इन पाँच विकाराें के ऊपर विजयी बनते हाे। आप इनकाे बन्दी नहीं बनाओ। बन्दी बनायेंगे ताे फिर उछलेंगे। लेकिन आप इन्हें परिवर्तित कर सहयाेगी स्वरूप बना दाे। ताे सदा आपकाे सलाम करते रहेंगे। विश्व-परिवर्तन के पहले स्व-परिवर्तन कराे। स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन सहज हाे जायेगा। परिवर्तन करने की शक्ति सदा अपने साथ रखाे। परिवर्तन-शक्ति का महत्त्व बहुत बड़ा हैं।

प्यारे दोस्तों – एक बात सदैव याद रखे – संपूर्ण पवित्रता का पालन करने वाला इंसान सहज रूप से असंभव काे भी संभव में परिवर्तित कर देता हैं। संपूर्ण संयमित व पवित्र जीवन जीना ही सच्चा जीवन जीना है। जीवन में संयम व पवित्रता हाेगी तभी शांति और ख़ुशी हाेगी। सच्ची शांति और ख़ुशी ताे संपूर्ण संयमित व पवित्र योगी जीवन से ही मिलेगी।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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