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प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण?

Kmsraj51 की कलम से…..

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    • ♦ प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण? ♦
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♦ प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण? ♦

जीत तू जरूर,
छू ऊंचाइयों को।
कर मेहनत जरूर,
सपने कर पूरे,
बस तू कर मेहनत।

आज के आधुनिक दौर में आगे निकलने की दौड़ में सभी अपना वजूद ही खोते जा रहे हैं। जो है उनके पास स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं। मात-पिता प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अपने बच्चे को ही प्रथम लाना चाहते हैं। अच्छी बात है, पर दूसरों के साथ तुलना करके क्यों? सभी बच्चों में कौशल होता। हालांकि ये अलग बात है कि प्रतिभा अलग-अलग है। जैसे कोई चित्रकारी में, कोई नृत्य में, कोई गाने में, कोई पढ़ने में, कोई खेल में, कोई अपने घर के कार्यों में, पर अभिभावक चाहते हैं कि हमारा बच्चा ही हर काम में प्रथम आए। हमें सिर्फ अपने बच्चे की प्रतिभा को देखना है। वह किस क्षेत्र में अच्छा है, उसकी प्रशंसा करना, ना कि उस पर इतना दबाव बनाना कि वह अवसाद में चला जाए।

आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बच्चे भी अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं।पहले जमाने में तो अवसाद क्या होता है किसी को पता ही नहीं था। पर आज इसने अपना विकराल रूप धारण कर लिया है कि हमारे छोटे-छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ रहा है। यही माहौल हर जगह बन गया है सभी एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा रखते हैं। चाहे वह नौकरी हो, एक-दूसरे से आगे निकलना अच्छी बात है पर परंतु उसे अपने पर हावी ना होने दें।

हैसियत को देखकर ही तमाम कार्य करने चाहिए ना कि एक दूसरे की देखा-देखी।लोग दौड़ में लग जाते हैं उससे अच्छा घर, उससे अच्छे कपड़े, उससे अच्छी गाड़ी। क्यों? हमें सिर्फ और सिर्फ अपना देखना है हमारे हालात कैसे हैं। हमारे पास कितना धन है, यह नहीं कि दूसरों से अच्छा कैसे बनना और आगे कैसे निकलना है। क्योंकि सब में प्रतिभा होती है यह अलग बात है कि कोई पहचान लेता। कोई नहीं पहचानता, सिर्फ दौड़ में लग जाता है। यही दौड़ अवसाद का कारण बनती है क्योंकि हम एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में समय, पैसा, सुख-चैन खो देते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कब हम इस प्रतिस्पर्धा की भाग दौड़ में समय, पैसा और सुख-चैन को खो दिया। जब तक बात हमें समझ आती है अवसाद हमें चारों तरफ से घेर लेता है।

दुनिया भर में अवसाद ने अपने पैर पसार रखे हैं। अकेले भारत में लगभग 20 करोड़ लोग अवसाद से ग्रसित है। हमें जो मिला है उसमें खुश क्यों नहीं। ऐसे ही सारी सुख- सुविधाएं होने के बाद भी खुश नहीं है। क्योंकि उन्हें दूसरों से ज्यादा कमाना है, कमाइए जरूर। पर उसे अपने जीवन पर हावी ना होने दें।

और-और की चाहत में,
जो है उससे भी हाथ ना धो बैठे।
और-और की चाहत में,
जो है उसका भी लुत्फ उठा ना पाते।

बहुत लोग दिन-रात मेहनत करते हैं। कई बार तो अपने घर वालों के साथ समय भी नहीं बिताते। ना ही परिवार के साथ बात करने का समय होता। और कई वर्ष लग जाते मंजिल तक पहुंचने में, कई असफल भी हो जाते हैं। और बाद में बोलते हैं कि हमें तो पता ही नहीं चला कब बच्चे बड़े हो गए। हम तो कमाने में व्यस्त थे कि बच्चों का बचपन भी नहीं देख पाए। कोई इस जमाने में खुश ही नहीं है चाहे उसकी तनख्वाह 50,000 है, या लाख-लाख है। कोई भी खुश नहीं है। सभी प्रतिस्पर्धा की दौड़ में जो है, उससे भी जाते है। इसीलिए ज्यादा से ज्यादा सोचते रहते हैं यही सोचना उन्हें अवसाद की तरफ ले जाता है ।

जिंदगी है हसीन,
जी ले इसे।
गंवा देखा कीमती वक्त,
रह जाएगा पछताता।
मिलेंगे ना दुबारा,
ये सुनहरे पल।

♦ सीमा रंगा इन्द्रा जी – हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हमारे पास कितना धन है, यह नहीं कि दूसरों से अच्छा कैसे बनना और आगे कैसे निकलना है। क्योंकि सब में प्रतिभा होती है यह अलग बात है कि कोई पहचान लेता। कोई नहीं पहचानता, सिर्फ दौड़ में लग जाता है। यही दौड़ अवसाद का कारण बनती है क्योंकि हम एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में समय, पैसा, सुख-चैन खो देते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कब हम इस प्रतिस्पर्धा की भाग दौड़ में समय, पैसा और सुख-चैन को खो दिया। जब तक बात हमें समझ आती है अवसाद हमें चारों तरफ से घेर लेता है।

—————

यह लेख (प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण?) “श्रीमती सीमा रंगा इन्द्रा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख, कवितायें व कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं, कहानी और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम सीमा रंगा इंद्रा है। मेरी शिक्षा बी एड, एम. ए. हिंदी। व्यवसाय – लेखिका, प्रेरक वक्ता व कवयित्री। प्रकाशन – सतरंगी कविताएं, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व लेख, दैनिक भास्कर, दैनिक भास्कर बाल पत्रिका, अमर उजाला, संडे रिपोर्टर, दिव्य शक्ति टाइम्स ऑफ़ डेजर्ट, कोल्डफीरर, प्रवासी संदेश, वूमेन एक्सप्रेस, इंदौर समाचार लोकांतर, वूमेन एक्सप्रेस सीमांत रक्षक युगपक्ष, रेड हैंडेड, मालवा हेराल्ड, टीम मंथन, उत्कर्ष मेल काव्य संगम पत्रिका, मातृत्व पत्रिका, कोलकाता से प्रकाशित दैनिक पत्रिका, सुभाषित पत्रिका शब्दों की आत्मा पत्रिका, अकोदिया सम्राट दिव्या पंचायत, खबर वाहिनी, समतावादी मासिक पत्रिका, सर्वण दर्पण पत्रिका, मेरी कलम पूजा पत्रिका, सुवासित पत्रिका, 249 कविता के लेखक कहानियां प्रकाशित देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में समय-समय पर।

सम्मान पत्र -180 ऑनलाइन सम्मान पत्र, चार बार BSF से सम्मानित, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सोसायटी से सम्मानित, नेहरू युवा केंद्र बाड़मेर से सम्मानित, शुभम संस्थान और विश्वास सेवा संस्थान द्वारा सम्मानित, प्रज्ञा क्लासेस बाड़मेर द्वारा, आकाशवाणी से लगातार काव्य पाठ, सम्मानित, बीएसएफ में वेलफेयर के कार्यों को सुचारु रुप से चलाने हेतु सम्मानित। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, प्रेसिडेंट ग्लोबल चेकर अवार्ड।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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