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लोहड़ी के त्यौहार उद्देश्य।

Kmsraj51 की कलम से…..

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    • ♦ लोहड़ी के त्यौहार उद्देश्य। ♦
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♦ लोहड़ी के त्यौहार उद्देश्य। ♦

सामान्तः त्यौहार प्रकृति में होने वाले परिवर्तन के साथ-साथ मनाये जाते हैं। जैसे लोहड़ी में कहा जाता हैं कि इस दिन वर्ष की सबसे लम्बी अंतिम रात होती हैं इसके अगले दिन से धीरे-धीरे दिन बढ़ने लगता है। लोहड़ी से आठ दिन पहले और आठ दिन बाद तक अत्यधिक ठंड रहती है जिन्हें स्थानीय बोली में मकर भी बोलते हैं साथ ही इस समय किसानों के लिए भी उल्लास का समय माना जाता हैं। खेतों में अनाज लहलहाने लगते हैं और मौसम सुहाना सा लगता हैं, जिसे मिल जुलकर परिवार एवम दोस्तों के साथ मनाया जाता हैं। इस तरह आपसी भाईचारा व एकता बढ़ाना भी इस त्यौहार का उद्देश्य हैं।

नामकरण: इस पावन पर्व का नाम लोई के नाम से पड़ा है और यह नाम महान संत कबीर दास की पत्नी जी का था। यह त्यौहार नए साल की शुरुआत में और सर्दियों के अंत में मनाया जाता है। इस त्यौहार के जरिए सिख समुदाय नए साल का स्वागत करते हैं और पंजाब में इसी कारण इसे और भी उत्साह पूर्ण तरीके से मनाया जाता है।

लोहड़ी का त्यौहार कब मनाया जाता हैं: लोहड़ी पौष माह की अंतिम रात से मकर संक्राति की सुबह तक मनाया जाता हैं। यह पर्व प्रति वर्ष मनाया जाता हैं। इस साल 2023 में यह त्यौहार 13 जनवरी कि रात व 14 जनवरी की सुबह को मनाया जायेगा। प्रत्येक त्यौहार भारत वर्ष की शान हैं। प्रत्येक प्रान्त के अपने कुछ विशेष त्यौहार हैं। इन में से लोहड़ी भी प्रमुख हैं। लोहड़ी पंजाब प्रान्त के मुख्य त्यौहारों में से एक हैं जिन्हें पंजाबी बड़े जोरो शोरो से मनाते हैं। लोहड़ी की धूम कई दिनों पहले से ही शुरू हो जाती हैं। देश के हर हिस्से में अलग-अलग त्यौहार मनाए जाते हैं जैसे मध्य भारत में मकर संक्रांति, दक्षिण भारत में पोंगल का त्यौहार एवम काईट फेस्टिवल भी देश के कई हिस्सों में मनाया जाता हैं। मुख्यतः यह सभी त्यौहार परिवार जनों के साथ मिल जुलकर मनाये जाते हैं, जो आपसी बैर को खत्म करते हैं।

लोहड़ी के त्यौहार की पौराणिक कथा: पुराणों के आधार पर इसे सती के त्याग के रूप में प्रतिवर्ष याद करके मनाया जाता हैं। कथानुसार जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती के पति महादेव शिव का तिरस्कार किया था और अपने जामाता को यज्ञ में शामिल न करने से उनकी पुत्री ने अपने आपको को अग्नि में समर्पित कर दिया था। उसी दिन को एक पश्चाताप के रूप में प्रति वर्ष लोहड़ी पर्व मनाया जाता हैं और इसी कारण घर की विवाहित बेटी को इस दिन तोहफे दिये जाते हैं और भोजन पर आमंत्रित कर उसका मान सम्मान किया जाता हैं। इसी ख़ुशी में श्रृंगार का सामान सभी विवाहित महिलाओ को बाँटा जाता हैं।

लोहड़ी के पीछे एक ऐतिहासिक कथा: इस कथा का इतिहास दुल्ला भट्टी के नाम से जाना जाता हैं। यह कथा अकबर के शासनकाल की हैं उन दिनों दुल्ला भट्टी पंजाब प्रान्त का सरदार था, इसे पंजाब का नायक कहा जाता था। उन दिनों संदलबार नामक एक जगह थी, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा हैं। वहाँ लड़कियों की बाजारी होती थी। तब दुल्ला भट्टी ने इस का विरोध किया और लड़कियों को सम्मानपूर्वक इस दुष्कर्म से बचाया और उनकी शादी करवाकर उन्हें सम्मानित जीवन दिया। इस विजय के दिन को लोहड़ी के गीतों में गाया जाता हैं और दुल्ला भट्टी को याद किया जाता हैं। इन्ही पौराणिक एवम ऐतिहासिक कारणों के चलते पंजाब प्रान्त में लोहड़ी का उत्सव उल्लास के साथ मनाया जाता हैं।

लोहड़ी बहन बेटियों का त्यौहार: इस दिन बड़े प्रेम से घर से बिदा हुई बहन और बेटियों को घर बुलाया जाता हैं और उनका आदर सत्कार किया जाता हैं। पुराणिक कथा के अनुसार इसे दक्ष की गलती के प्रयाश्चित के तौर पर मनाया जाता हैं और बहन बेटियों का सत्कार कर गलती की क्षमा मांगी जाती हैं। इस दिन नव विवाहित जोड़े को भी पहली लोहड़ी की बधाई दी जाती हैं और शिशु के जन्म पर भी पहली लोहड़ी के तोहफे दिए जाते हैं।

लोहड़ी के साथ मनाते हैं नव वर्ष: किसान इन दिनों बहुत उत्साह से अपनी फसल घर लाते हैं और उत्सव मनाते हैं। लोहड़ी को पंजाब प्रान्त में किसान नव वर्ष के रूप में मनाते हैं। यह पर्व पंजाबी और हरियाणवी लोग ज्यादा मनाते हैं और यही इस दिन को नव वर्ष के रूप में भी मनाते हैं।

लोहड़ी का आधुनिक रूप: आज भी लोहड़ी की धूम वैसी ही होती हैं बस आज जश्न ने पार्टी का रूप ले लिया हैं। और गले मिलने के बजाय लोग मोबाइल और इन्टरनेट के जरिये एक दुसरे को बधाई देते हैं। बधाई सन्देश भी व्हाट्स एप और मेल किये जाते हैं।

लोहड़ी की विशेषता: लोहड़ी का त्यौहार सिख समूह का पावन त्यौहार है और इसे सर्दियों के मौसम में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। पंजाब प्रांत को छोड़कर भारत के अन्य राज्यों समेत विदेशों में भी सिख समुदाय इस त्यौहार को बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं।

सुकेत में लोहड़ी के गीठे का महत्व: गाँव व मोहल्ले में लोहड़ी के कई दिनों पहले से कई प्रकार की लकड़ियाँ इक्कट्ठी की जाती हैं। जिन्हें गांव या मोहल्ले के बीच के एक अच्छे स्थान पर जहा सभी एकत्र हो सके वहाँ सही तरह से जलाई जाती हैं और लोहडी की रात को सभी अपनों के साथ मिलकर इस गीठे के आस-पास बैठते हैं। कई गीत गाते हैं, खेल-खेलते हैं, आपसी गिले-शिक्वे भूलकर एक दुसरे को गले लगते हैं और लोहड़ी की बधाई देते हैं। इस लकड़ी के ढेर पर अग्नि देकर इसके चारों तरफ परिक्रमा करते हैं और अपने लिए और अपनों के लिये दुआयें मांगते हैं। विवाहित लोग अपने साथी के साथ परिक्रमा लगाते हैं। इस अलाव के चारों तरफ बैठ कर रेवड़ी, तिल के लड्डू, गजक आदि का सेवन किया जाता हैं।

सुकेत में आयोजन: सुकेत के गाँव-गाँव हर घर-घर में लोहड़ी का पर्व श्रद्धालुओं के अंदर नई ऊर्जा का विकास करता है और साथ ही में खुशियों की भावना का भी संचार होता है अर्थात-: यह त्यौहार सुकेत के प्रमुख त्योहारों में से भी एक है। लोहड़ी की रात और मकर संक्रांति की सुबह ब्रह्ममुहूर्त में करसोग क्षेत्र सहित प्रत्येक गांव में लोग अपने चूल्हे की पूजा करते हैं। हवन सामग्री, पाजा की लकड़ी, गाय का घी, तिल, गुड़ से चूल्हा सभी सदस्यों के द्वारा पूजा जाता है। इस दिन भल्ले, बाबरू, पकवान, तिल के लड्डू बनाए जाते हैं। आस-पड़ोस रिश्तेदारों को पकवान मूंगफली गुड़ रेवड़ी बांधकर बड़ों का आशीर्वाद लेकर यह त्यौहार मनाया जाता है।

♦ आचार्य रोशन शास्त्री जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “आचार्य रोशन शास्त्री जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — लोहड़ी का पर्व हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है क्योंकि हर साल मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है इस प्रकार 13 जनवरी को लोहड़ी मनायी जाती है। ऐसा माना जाता है की उस समय से दिन छोटे और राते लम्बी होने लगती है। लोहड़ी के दिन सभी लोग नए-नए कपडे पहनते है और खुशी मनाते है। इस दिन सभी लोग नाचते व गाते है। लोहड़ी की संध्या को आग जलाई जाती है । लोग अग्नि के चारो ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं व आग मे रेवड़ी, मूंगफली, खीर, मक्की के दानों की आहुति देते हैं । आग के चारो ओर बैठकर लोग आग सेंकते हैं। लोहड़ी भारत के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक त्यौहार है। यह पंजाब का सबसे लोकप्रिय त्यौहार है जिसे पंजाबी धर्म के लोगो द्वारा प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है।

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यह लेख (लोहड़ी के त्यौहार उद्देश्य।) “आचार्य रोशन शास्त्री जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आचार्य रोशन शास्त्री जी– राजकीय माध्यमिक पाठशाला, नौलखा, सुंदर नगर, जिला मंडी – हिमाचल प्रदेश।

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