Kmsraj51 की कलम से…..
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ϒ प्रथम गुरु माता। ϒ
प्रथम गुरु माता – Pratham Guru Mata
महर्षि वेदव्यास जी के अनुसार …..
निर्माण यानी “सृजन”। सृजन की शक्ति प्रकृति ने केवल नारी जाति को ही प्रदान की है। (हालांकि बीज तत्व की महिमा को नकारा नहीं जा सकता।) नारी वह है जो निर्माण करती है, सृष्टि का पोषण करती है, संरक्षण करती है, पुष्पित-पल्लवित करती है। नारी जाति के बिना पुरुष का, इस विश्व का अस्तित्व संभव नहीं है। नारी हर रूप में पूजनीय है। जब एक मां बनती है तो उसके ऊपर बहुत अधिक जिम्मेदारी आ जाती है। मां वह है जो अपने बच्चे को हर तरह से, हर हर दृष्टि से सुरक्षित, संरक्षित करती है। और गर्भ (गर्भाधान) से लेकर जब तक बच्चे माँ की बात सुने, तब तक वह केवल उचित संस्कार और उचित शिक्षा ही प्रदान करती है। मां के द्वारा प्रदान संस्कार व्यक्ति के मानस पटल पर आजीवन रहते हैं। हमारा इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है जिसमें बचपन में जिन महापुरुषों ने अपनी मां से वीर रस की कविताएं, कहानी सुनी और देश के लिए अपनी जान गवा दी। एक मां अपने बच्चे को हर प्रकार से समाज उपयोगी, मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण इंसान बनाना चाहती है। इसलिए अपने पूरे तन, मन, धन से इस बात का प्रयास करती है कि उसका बच्चा एक अच्छा सभ्य नागरिक बन सके एवं मानवता के लिए, समाज के लिए, देश के लिए वह कुछ भी करने के लिए सदैव तत्पर रहे। इस संदर्भ में मैं अपनी स्वरचित कविता की पंक्तियां कहना चाहूंगी जिसमें एक माँ की महिमा का वर्णन है __माँ है तो श्री है, आधार है क्योंकि,
प्रकृति, धरती एक माँ का ही तो प्रकार है।
माँ है तो आसक्ति है क्योंकि,
माँ में ही तो असीम शक्ति है।
माँ है तो त्याग है, बलिदान हैं क्योंकि,
माँ में सिमटा एक बच्चे का पूरा जहान है।
माँ वो है जो खुद मिटकर एक बच्चे को बनाती है
क्योंकि – पत्थर पर पिसकर ही हिना रंग लाती है।
माँ है तो परिवार है, संस्कार है, क्योंकि,
केवल माँ में ही तो ममता है, प्यार है, दुलार है।
माँ है तो जन्म है, बचपन है, लोरी है क्योंकि,
माँ की ममता एक रेशम की डोरी है।
माँ है तो कृष्ण है, राम है, बलराम भी है क्योंकि,
माँ के बिना असम्भव इन्सान तो क्या भगवान भी है।
माँ है तो दादी है, नानी है और,
एक बालक के बिना, माँ भी एक अधूरी कहानी है।
हम दिल से आभारी हैं डॉ• विदुषी शर्मा जी के प्रेरणादायक लेख (प्रथम गुरु माता) हिन्दी में Share करने के लिए।विदुषी शर्मा जी के लिए मेरे विचार:
♣ 🙂 “विदुषी शर्मा जी” ने बहुत ही सरल शब्दों में माँ के गुणों और प्यार का मनोरम वर्णन किया है। हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। माँ के गुण और प्यार सागर के गहराई से भी ज्यादा हैं। सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान गहराई से हर शब्दाे का सार समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।
जरूर पढ़े: दिल से कागज में उतर ही जाती है।
जरूर पढ़े: हम दोनों की दो-दो आंखें।
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अति उत्तम।
Thanks Didi Ji,
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thanks for your comments.