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पृथु का पृथ्वी पर क्रोध।

Kmsraj51 की कलम से…..

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    • ♦ पृथु का पृथ्वी पर क्रोध। ♦
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♦ पृथु का पृथ्वी पर क्रोध। ♦

अन्न – औषधि छिपा के पृथ्वी,
सृष्टि में, रूप बदल कर डाले।
प्रजा भूख से हो रही व्याकुल,
श्री मैत्रेय, विदुर से बोले।

जीवन सभी का अटका – अटका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

प्रजा करुण – क्रंदन सुन पृथु ने,
शस्त्र उठा लिया हाथ में।
पृथ्वी, गौ का रूप धारण कर,
थर-थर – थर-थर लगी कांपने।

पृथ्वी ने सर, पांव पर पटका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

गौ रूपी पृथ्वी ने आकर,
विनीत भाव से नमन किया।
आप जगत – उत्पत्ति – संहारक,
विश्व – रचना का मन बना।

मेरा हाल तो नटनी – नट का,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

मेरी अन्न – औषधि सब,
राक्षस मिलकर खा जाते थे।
सही ढंग से जिन्हें था मिलना,
अन्न – औषधि नहीं पाते थे।

यह सब देख के माथा ठनका,
कवि हूं मैं सरयू – तट का।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, कविता के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस कविता में कवि ने बताया है कि महाराजा पृथु ने पृथ्वी पर क्यों क्रोध, किया। महाराजा पृथु सदैव ही अपनी प्रजा को सुखमय जीवन देने के लिए तत्पर रहते थे, चाहे कैसी भी विकट समय क्यों न हो। हर विकट समस्या से बाहर निकलने की पूर्ण क्षमता थी उनमे।

—————

sukhmangal-singh-ji-kmsraj51.png

यह कविता (पृथु का पृथ्वी पर क्रोध।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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