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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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कहानी

रिश्तों के महत्व को समझें।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rishton Ke Mahatva Ko Samjhe | रिश्तों के महत्व को समझें।

घर की नई नवेली इकलौती बहू एक प्राइवेट बैंक में बड़े ओहदे पर थी। उसकी सास तकरीबन एक साल पहले ही गुज़र चुकी थी। घर में बुज़ुर्ग ससुर औऱ उसके पति के अलावे कोई न था। पति का अपना कारोबार था।

पिछले कुछ दिनों से बहू के साथ एक विचित्र बात होती। बहू जब जल्दी-जल्दी घर का काम निपटा कर ऑफिस के लिए निकलती ठीक उसी वक़्त ससुर उसे आवाज़ देते औऱ कहते बहू, मेरा चश्मा साफ कर मुझें देती जा। लगातार ऑफिस के लिए निकलते समय बहू के साथ यही होता। काम के दबाव औऱ देर होने के कारण क़भी कभी बहू मन ही मन झल्ला जाती लेकिन फ़िर भी अपने ससुर को कुछ बोल नहीं पाती।

जब बहू अपने ससुर के इस आदत से पूरी तरह ऊब गई तो उसने पूरे माजरे को अपने पति के साथ साझा किया। पति को भी अपने पिता के इस व्यवहार पर बड़ा ताज्जुब हुआ लेकिन उसने अपने पिता से कुछ नहीं कहा। पति ने अपनी पत्नी को सलाह दी कि तुम सुबह उठते के साथ ही पिताजी का चश्मा साफ करके उनके कमरे में रख दिया करो, फिर ये झमेला समाप्त हो जाएगा।

अगले दिन बहू ने ऐसा ही किया औऱ अपने ससुर के चश्मे को सुबह ही अच्छी तरह साफ करके उनके कमरे में रख आई। लेकिन फ़िर भी उस दिन वही घटना पुनः हुई औऱ ऑफिस के लिए निकलने से ठीक पहले ससुर ने अपनी बहू को बुलाकर उसे चश्मा साफ़ करने के लिए कहा। बहू गुस्से में लाल हो गई लेकिन उसके पास कोई चारा नहीं था। बहू के लाख उपायों के बावजूद ससुर ने उसे सुबह ऑफिस जाते समय आवाज़ देना नहीं छोड़ा।

धीरे-धीरे समय बीतता गया औऱ ऐसे ही कुछ वर्ष निकल गए। अब बहू पहले से कुछ बदल चुकी थी। धीरे धीरे उसने अपने ससुर की बातों को नजर अंदाज करना शुरू कर दिया और फ़िर ऐसा भी वक़्त चला आया जब बहू अपने ससुर को बिलकुल अनसुना करने लगी। ससुर के कुछ बोलने पर वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देती औऱ बिलकुल ख़ामोशी से अपने काम में मस्त रहती। गुज़रते वक़्त के साथ ही एक दिन बेचारे बुज़ुर्ग ससुर भी गुज़र गए।

समय का पहिया कहाँ रुकने वाला था, वो घूमता रहा घूमता रहा। छुट्टी का एक दिन था। अचानक बहू के मन में घर की साफ़ सफाई का ख़याल आया। वो अपने घर की सफ़ाई में जुट गई। तभी सफाई के दौरान मृत ससुर की डायरी उसके हाथ लग गई। बहू ने जब अपने ससुर की डायरी को पलटना शुरू किया तो उसके एक पन्ने पर लिखा था -“दिनांक 26.10.2019…. आज के इस भागदौड़ औऱ बेहद तनाव व संघर्ष भरी ज़िंदगी में, घर से निकलते समय, बच्चे अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं जबकि बुजुर्गों का यही आशीर्वाद मुश्किल समय में उनके लिए ढाल का काम करता है। बस इसीलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती थी तो मैं मन ही मन, अपना हाथ तुम्हारे सिर पर रख देता था क्योंकि मरने से पहले तुम्हारी सास ने मुझें कहा था कि बहू को अपनी बेटी की तरह प्यार से रखना औऱ उसे ये कभी भी मत महसूस होने देना कि वो अपने ससुराल में है औऱ हम उसके माँ बाप नहीं हैं। उसकी छोटी मोटी गलतियों को उसकी नादानी समझकर माफ़ कर देना। वैसे मेरा आशीष सदा तुम्हारे साथ है बेटा। डायरी पढ़कर बहू फूटफूटकर रोने लगी। आज उसके ससुर को गुजरे ठीक 2 साल से ज़्यादा समय बीत चुके हैं लेकिन फ़िर भी वो रोज़ घर से बाहर निकलते समय अपने ससुर का चश्मा साफ़ कर, उनके टेबल पर रख दिया करती है, उनके अनदेखे हाथ से मिले आशीष की लालसा में।

जीवन में हम रिश्तों का महत्व महसूस नहीं करते हैं, चाहे वो किसी से भी हो, कैसे भी हो और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं।

रिश्तों के महत्व को समझें और उनको सहेज कर रखें।

♦ संपादकीय ♦

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  • Conclusion — आज के इस भागदौड़ औऱ बेहद तनाव व संघर्ष भरी ज़िंदगी में, घर से निकलते समय, बच्चे अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं जबकि बुजुर्गों का यही आशीर्वाद मुश्किल समय में उनके लिए ढाल का काम करता है। जीवन में हम रिश्तों का महत्व महसूस नहीं करते हैं, चाहे वो किसी से भी हो, कैसे भी हो और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं। रिश्तों के महत्व को समझें और उनको सहेज कर रखें।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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रिश्तों का बोझ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रिश्तों का बोझ। ♦

एक शहर में रवि अपने बेटे अमित और बहू रीमा के साथ रहते थे। अमित का बेटा रितिक अपने दादाजी के बहुत करीब था। अमित की माँ 5 साल पहले गुजर गई थी।

एक दिन रीमा बोली “बाबूजी आप बाजार से सब्जी ले आओ”…
रवि सब्जी लेने जाते है तो वहाँ उनके दोस्त मिल जाते है वो पैसो को लेकर परेशान थे रवि उनको वो पैसे दे आते है जो रीमा ने सब्जी के लिए दिए थे। घर आकर बहु को सब बता देते है। रात को जब अमित घर आता है तो रीमा उसको सब बता देती है। सब खाना खाने बैठते है खाने में सब्जी नहीं होती है अमित कहता है रीमा तुमने सब्जी नहीं बनाई वो बोली बाबूजी लेकर नहीं आये, और सारे पैसे दोस्त को देकर आ गए यह सुनकर अमित गुस्से से बिना खाना खाएं चला जाता है।

दूसरे दिन अमित रितिक से बोलता है “मैं तुम्हे स्कूल छोड़ देता हूँ” रीमा बोली “बाबूजी छोड़ देंगे वैसे पूरे दिन करते क्या है?” वो बाबूजी को आवाज लगाकर बोलती है; “आप इसको स्कूल छोड़ आयो” बाबूजी बोले “पहले मुझे एक कप चाय दे दो” बाबूजी चाय आकर पी लेना “वो स्कूल छोड़कर आते है चाय बनाकर पीते है।” बाबूजी आप घर की साफ सफाई भी कर लिया करो दिन भर आराम ही करते हो, बेचारे बाबू जी से रीमा इस तरह सब काम करवाने लगती है।

कुछ दिन बाद रीमा की सहेली मीना घर आती है बोलती है “कैसी हो रीमा” मैं ठीक हूँ अमित के साथ घूमने जा रही हूँ। तुम अपने ससुर को अकेले छोड़ कर कैसे चली जाती हो हमारे यहाँ तो ससुर की ही चलती है वो जैसा कहते है वही होता है। “रीमा बोली” तुम्हारे ससुर पैसे वाले है हमारे बाबू जी पर पैसे नहीं वो तो हम पर बोझ है। यह बात रवि सुन लेता है, और रोने लगता है। रात को अमित से बोले “बेटा कल मुझे मेरे दोस्त के यहाँ छोड़ आना वो अकेला रहता है, मैं उसके साथ ही रह लूँगा तुम लोगो को मेरी वजह से परेशानी होती है।

“अमित बोला” बाबूजी अगर आपका मन है तो मै सुबह छोड़ दूँगा।” सुबह रवि अपने दोस्त के घर पहुँच जाते है रवि अंदर चला जाता है; तो उनके दोस्त अमित से कहते है “तुम ये बहुत गलत कर रहे हों। मैं तुम्हें आज एक बात बताता हूँ एक बार मैं और रवि बाजार जा रहे थे; एक छोटा बच्चा भीख मांग रहा था रवि उसको अपने घर ले आया उसको पाला, पढ़ाया – लिखाया, अच्छे संस्कार दिए वो बच्चा कोई और नहीं वो तुम थे।

अमित तुम उनकी संतान नहीं हो फिर भी तुम्हें संतान से ज्यादा प्रेम दिया “यह सुनकर अमित के पैरों से जमीन खिसक गयीं वो रोने लगा। “बाबूजी मुझे माफ़ कर दीजिए” बाबूजी ने उसको माफ नहीं किया। घर आकर रीमा को सब बात बताई तो वह रोने लगी। “मैने बाबूजी पर बहुत अत्याचार किये है; मेरी ही वजह से घर छोडकर गए। मैं ही उनको लेकर आऊँगी। “रीमा और अमित दोनों बाबूजी से माफी मांगते है रवि उनको माफ कर देता है, और सब खुशी – खुशी रहने लगते है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

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  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कहानी के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस दुनिया में रिश्तों से बढ़कर कुछ भी नहीं है। अगर रिश्तों में प्यार, सम्मान, विश्वास न हो तो ऐसे रिश्ते बहुत ही दुःख देने वाले होते। दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज अगर कुछ है तो वह प्यार है। प्यार वह एहसास है जो हमें ना सिर्फ जीना, बल्कि सदैव ही मुस्कुराना भी सिखाती है। इस दुनिया में हर कोई किसी ना किसी से जरूर प्यार करता है। क्योंकि बिना प्यार के यह दुनिया चल ही नहीं सकती हैं। रिश्तों में प्यार का होना बहुत जरूरी है, चाहे वो रिश्ता कोई भी हो। जहां रिश्तों में प्यार नहीं होता है वहां अक्सर तकरार होता ही रहता हैं। इसलिए रिश्तों में प्यार, सम्मान और विश्वास को बनाये रखें, सुखमय जीवन जीने के लिए।

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यह कहानी (रिश्तों का बोझ।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें/कहानी सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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दास्तान ए जात पात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दास्तान ए जात पात। ♦

अपनी अरुणिमा को बिखेरते हुए सूर्य देव हिमालय की पावन वादियों में पहाड़ियों के बीचो बीच बसे इस छोटे से सुंदर एवं सुरम्य गांव को ऐसे नहला रहे थे, कि मानो आद्या सुंदरी परा शक्ति प्रकृति का चाकर बन कर अपनी सेवाएं नियमित दे रहे हो।घाटी के इस छोटे से गांव में कितनी आत्मीयता थी और कितना प्रेम और भाईचारा? कहते नहीं बनता। न कोई लड़ाई न कोई झगड़ा। न ही तो शहरों जैसी आपाधापी और लूट – खसोट। चारों ओर थी तो सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता और असीम सकून।

नित्य प्राकट्य की तरह आज भी आदित्य देव अपनी सेवाएं देने धीमे – धीमे तप और विशाल प्रकाश के साथ पहाड़ी की चोटी पर निकल आया था। गांव की जानकी चाची की आवाजे हर रोज की तरह कानों में गूंज उठी।

” राधा, शालू, कमला, मनु उठो भाई उठो। देखो तो सूरज चढ़ आया है। सारा संसार उजाला हो गया है और तुम ……….।” यह बोलते बोलते जानकी चाची उस कमरे में घुंस गई, जहां राधा सोई थी।

“अरे ओ मेरी भोली सी, प्यारी सी, अच्छी सी दादी। क्यों हर रोज सुबह – सुबह अपनी कोयल सी मधुर आवाज़ का प्रचार – प्रसार करती फिरती हो ? आस – पड़ोस को भी अलार्म का काम करती हो।” बिस्तर पर ऊंघते हुए से पलथी मार कर जानकी चाची के झुर्रियों से लबरेज चेहरे को चूमते हुए राधा बोली।

“तुझे अब सुबह इतनी देर तक सोए रहना शोभा नहीं देता राधा। शादी की उम्र हो गई है। मां का हाथ बंटाया कर। कुछ सीख भी जाएगी और मां की मदद भी हो जाएगी।”

जानकी चाची बूढ़ी आंखो की कोरों में पानी भरते हुए से बोली।
“बस भी कर मेरी प्यारी दादी। जब देखो तो तब उपदेश। और हां जो ये बात – बात पर इन झील सी आंखो में लहरे उठाती रहती हो ना, ये मत किया करो जी।” राधा जानकी चाची की झुर्रियों से लबरेज पोपलों को दोनों ओर से पकड़ते हुए और पुचकारते हुए से बोली।

“कैसे चुप रहूं बच्चा? दादी जो हूं तेरी।” जानकी चाची कोरो का पानी पोंछते हुए और राधा का सिर सहलाते हुए बोली।

“उमा। ओ उमा।” बाहर से मोहन भैया ने आवाज लगाई।
“जी आई।” अंदर से रोटियों को बेलते हुए उमा भाभी बोली।

“अरे मैं काम पर जा रहा हूं। देर हो रहा हूं। बाहर कुछ सामान रखा है। देखना उठा लेना। राधा को बोल दे चाहे।” जाते हुए से मोहन भैया बोले।

“जी उठा लूंगी। आपकी लाड़ली तो अभी खरांटे मार रही होगी। बिगाड़ रखा है बुढ़िया ने।” अंदर से उमा भाभी बोली।

“ठीक है। उठा लेना। बाहर गाय भी चुग रही है। कहीं खा न ले सामान।” मोहन भैया सड़क से बोले।

“जी उठा लूंगी। शाम को जल्दी अना।” अंदर से उमा भाभी बोली। पर शायद ये सब मोहन भैया ने नहीं सुना हो। वे निकल पड़े थे।

गाय को हट्टका करते हुए सामानों के थैले लिए हुए राधा और जानकी चाची रसोई में आई।

“क्यों री बुढ़िया की बच्ची? क्या कह रही थी ? बुढ़िया ने बिगाड़ रखा है!” जानकी चाची ने उमा भाभी के कान प्यार से पकड़ते हुए पुचकारते हुए से कहा।

“सॉरी – सॉरी अम्मा जी! अब नहीं बोलूंगी।” अपने कान पकड़ते हुए माफीनामे की तहजीब में उमा भाभी बोली।

“खबरदार जो आगे से किसी ने मेरी लाड़ली पोती को कुछ कहा तो।” फिर से आंखों की कोरें नम करते हुए से जानकी चाची बोली।

“नहीं कहूंगी कुछ अम्मा। पर इसकी मां हूं। चिंता तो होती है न! 24 की हो गई है।सबको आप जैसी सास थोड़े ही न मिलती है।” उमा भाभी रूआंसा चेहरा करके बोली।

“सो तो मैं भी इसे समझाती रहती हूं बेटा। पर यह मानती कहां है?” यह बोलते – बोलते जानकी चाची की आंखे छलक आई थी।

“ओ री ओ सुंदर सास – बहू की जोड़ी। ये रोना धोना छोड़ो और कुछ नाशता – पानी कराओ। भूख लगी है। तुम्हारी राधा जिंदा है अभी। मरी नहीं है।” राधा ने दोनों को छेड़ते हुए से कहा।

“चल ! झल्ली कहीं की? पहले नहा – धोकर आ, फिर खाना कुछ।” जानकी काकी आंसू पोंच्छते हुए बोली।

अपनी अहलड मस्ती में राधा नहाने जाती है। इस बीच चाची और उमा भाभी में यह बात हो रही थी कि परसों राधा को देखने लड़के वाले आ रहे हैं। “उमा के बाबू जी बोल रहे थे कि बेटी जवान हो गई है। हाथ पीले करना हमारा फ़र्ज़ है। फिर बी ए भी इस साल इसकी पूरी हो जाएगी।” उमा भाभी चाची से बोल रही थी।

“सो तो है बच्चा। बेटियां तो है ही पराया धन। कब तक पास रखोगे?” चाची उमा भाभी से बोल रही थी।

” जब देखो तब सब बस मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। किसी न किसी तरह से मुझे जल्दी भगाने की तैयारी में चुपके – चुपके लगे हैं। मैं नहीं करूंगी अभी शादी हां। कह दिया मैंने। जब तक एम ए न कर लूं।” राधा बाल झाड़ते हुए झल्ला कर बोली।

“बस कर री ओ छमक-छलो। कब तक बाप के यहां बैठी रहेगी? 24 की हो ली फिर कब 50 की करेगी शादी क्या? कौन वरे गा तब तुझे। तेरी उम्र की थी न हम। तो दो – दो औलाद जन बैठे थे।” पास मनु को नहला रही चंपा दीदी व्यंग्य करते हुए बोली। वह यहां मायके अपने बच्चों के साथ मेहमान आई थी। शायद राधा का यह रिश्ता भी उसी की सलाह पर उमा भाभी और मोहन भैया करवा रहे थे। पर इसमें राधा को विश्वास में न लिया गया हो शायद।

“वह आप का जमाना था फूफी। अब मॉडर्न जमाना है। समझी !” राधा पुचकारते हुए से बोली।

“हां – हां तोड़ ले अपने बाप की रोटियां और! तुझे कौन समझाएं?” चंपा दीदी बोली।

“बस भी कर चंपा! तू हमेशा इसे छेड़ते हुए क्यों ताने मारती रहती है?” जानकी चाची डांटते हुए से बोली।

“हां – हां मां और चढ़ाओ इसे सर पर। तूने ही तो इसे बिगाड़ रखा है। ठीक कहती है भाभी।” चंपा दीदी बोली।

“हर चीज का एक समय होता है बच्चा। शादी की भी एक उम्र होती है। ठीक कह रहे हैं सब।” राधा की बेनी बनाते हुए चाची बोली। तीसरे दिन लोक रीत के तहत बुलाए गए मेहमान आते हैं और राधा जैसी सुंदर और पढ़ी लिखी लड़की को देख कर रिश्ता तुरंत पक्का कर लेते हैं।

दिन गुजरते गए। यहां राधा ने बुद्धि से तो यह रिश्ता कबूल लिया था पर दिल से नाखुश ही थी। एक दिन पास में एक मेला था। राधा अपनी सहेली रूपा के साथ मेला देखने चली गई। रास्ते में उन्हें पिंकू मिला, जो उन का क्लास मेट था। वह पास के गांव का रहने वाला था और एक अच्छा लड़का था। उसने गाड़ी रोकी।

“अरे राधा और रूपा कहां जा रही हो?” पिंकू ने कहा।
“ओह पिंकू! हम मेले जा रही है और तुम?” रूपा ने चौंकते हुए से कहा।
“मैं भी मेले जा रहा हूं। आओ चलो बैठो।” पिंकू ने कहा।
दोनों गाड़ी में बैठ जाती है। और तीनों बतियाते – बतियाते मेले पहुंचे। बातचीत से माहौल तो पहले ही खुशनुमा हो गया था उस पर मेला भी आ गया। मेले के पास रास्ता कुछ खराब था। सो राधा ने पिंकू को हाथ दे कर मदद करने को कहा।

पिंकू ने जैसे ही ऊपर से नीचे को राधा को ऊपर खेंचाने के लिए हाथ किया, त्यूं ही उसकी नजर राधा के वक्ष स्थल के ऊपर वाले अधखुले भाग पर पड़ी। राधा ने पिंकू को देखते हुए भांप लिया। दोनों के दिलो में एक अजीब सी हलचल हुई, जो शायद इन दोनों ने पहली बार महसूस की थी। वे एक दूसरे को संभालते – संभालते नयन मटके में उस मेले के पास वाली किचन में फिसल गए। दोनों के कपड़े खराब हो गए। रूपा को वहीं बिठा कर वे पास के नल में अपने कपड़े साफ करने गए।

“तुम्हारी सगाई सच में हो गई क्या?” कपड़ों को झाड़ता हुआ पिंकू शरमाते हुए सा बोला।

“क्यों? नहीं हुई होती तो तब क्या तू………….?” राधा ने स्त्री सुलभ मुस्कुराहट बिखेरते हुए नीची नजर कर के तिरछी चितवन निहार कर कपड़े धोते हुए कहा।

” नहीं – नहीं। बस सुना था। सो पूछ लिया।” पिंकू उसी मुद्रा में बोला।

“हां हो गई है। ठीक सुना है तुमने।” राधा ने भी उसी मुद्रा में जबाव दिया। वे दोनों बातों ही बातों में मस्त हो गए थे। बाहरी परिचय तो उनका पहले से ही था, पर आज तो उनका रूहानी परिचय भी हो गया था शायद। ऊपर से धीमे से रूपा की आवाज आई,” ओ री ओ राधा। जल्दी कर बच्ची। तेरा मंगेतर मेले में पहुंच गया है शायद।फोन कर रहा है।”

“उठा ले तू ही।” राधा ने ठिठोली करते हुए कहा।
“अरे ओ लैला! कहीं उसने तुम्हे यूं देख लिया न पानी में आग लग जाएगी आग हां।जल्दी कर।” रूपा ने चठकरी करते हुए कहा।

“अच्छा पिक्की!” हाथ हिलाते हुए राधा ने पिंकू से जाते हुए कहा।

राधा के मुख से अपने लिए पिंक्की सुन कर पिंकू के दिल की आग में घी पड़ गया। शाम को राधा अपने घर पहुंची और सीधा अपने कमरे में चली जाती है।

“राधा। ओ राधा।” जानकी चाची ने आवाज लगाई।
“जी दादी।” राधा अंदर से कपड़े बदलते हुए बोली।
“देख तो तेरा फोन आया है।” चाची बोली।

“किसका है दादी?” राधा बोली।
“किसका होगा ? तुझे नहीं मालूम क्या?” चाची ठिठोली करते हुए बोली।
चाची की बातों से राधा ने अंदाजा लगाया लिया कि उसके मंगेतर का ही होगा। उसने उतना तबजो न दिया। कपड़े बदलती रही। इतने में शालू खिखियाते हुए राधा के कमरे में फोन ले कर आया।

“सुन भी तो लो दीदी। जीजा जी नाराज हो जाएंगे नहीं तो।” वह छुटकू राधा को छेड़ते हुए से बोला।

“होने दे नाराज। पीछा छूटेगा।” राधा अपनी घर वाली कमीज़ पहनते हुए बोली और उसके हाथ से फोन झुंझला कर ले लेती है।

“हेलो ! कौन है? अब बोलो भी चुप क्यों हो। कपड़े बदल रही थी। देर लग गई। इसमें नाराज होने की क्या बात है?
बोलो भी कुछ नहीं तो मैं काट रही हूं।” राधा त्योरियों को चढ़ाते हुए बोली।

“सुन – सुन, मैं पिंक्की बोल रहा हूं। फोन मत काटना प्लीज!” फोन पर पिंकू ने धीरे से कहा।

यह सुन कर राधा घर के पिछवाड़े में फोन सुनने चली गई। घरवालों ने सोचा कि यह हमसे शर्मा कर दामाद से बात करने पिछवाड़े गई है। चाची ने राधा का फोन पहले उठाया था। उस पर किसी मर्द की आवाज सुन कर अंदाजे से दामाद का फोन होने का अनुमान लगाया था।

सब खुश थे कि बेटी को दामाद का फोन आया है। पर किसे मालूम कि राधा ने फोन पर किसी और से कल मुलाकात का प्रोग्राम फिट किया है।

हल्की – हल्की बारिश बाहर हो रही थीं। कस्बे के नुकड़ पर बने रेन शेल्टर में राधा और पिंकू दो के दो बैठे हैं। कोई उन्हें देख नहीं रहा है।

“क्या तुम अपने मंगेतर से खुश नहीं है?” पिंकू ने राधा से कहा।
“किसने कहा?” राधा ने तल्खियों में कहा।

“तुम ही तो कल फोन पर कह रही थी।” पिंकू ने कहा। पिंकू ने राधा को शालू के छेड़ने पर बड़बड़ाते हुए सुन लिया था।

“हां नहीं हूं खुश। तो क्या कर लोगे तुम?” राधा बोली।

“तूने क्या यह फिल्म समझी है? कि हीरो विलन को पीट देगा।” पिंकू बोला।

“हीरो। और वो भी तू?” राधा हंसते हुए से बोली।

“हां – हां मैं। क्यों आपको कोई शक है?” पिंकू बड़े रुआब से बोला।
पिंकू की यह अदा तो राधा को और भी घायल कर गई।

“अच्छा – अच्छा एक बार फिर से करो ऐसा भला।” राधा ने अनुनय किया।
पिंकू ने क्रिया पुनः दोहराई।

उस रोज राधा के ससुराल वाले राधा की शादी की बात करने आए थे।

“देख भाई कुडमा (समधी)। अगले महीने तक जो देना ब्याह करी एबे। से मठा भी आई जाना घरा जो। फेरी कंपनी मंझा छुट्टी नी मिलदी।” राधा का ससुर मोहन भैया से बोल रहा था।
“हां बेटा ब्राह्मणा ते लग्न जोड़ी ले ओ। बाकी फेरी ब्याह रे घरा निकलें कई काम।” चाची ने हामी भरते हुए कहा।

शादी का लग्न शोध लिया गया था और तैयारियां दोनों ओर जोरों से थी। एक दिन दोनों परिवारों के लोग शहर शादी के जेवर – कपड़े खरीदने आए थे। राधा को भी पसंद का सामान खरीदने के लिए साथ लाया गया था। सभी खरीद फरोक्त कर रहे थे।

इस बीच राधा टॉयलेट गई। वहां से वह वापिस नहीं आई। थोड़ी देर बाद सब का ध्यान जब इस ओर गया तो दोनों परिवारों में खलबली मची। फोन लगाया। वह स्विच ऑफ आ रहा था। शहर का कोना – कोना छान डाला पर कोई खबर नहीं मिली। शाम होने वाली थी। तब सब ने निर्णय लिया कि पुलिस में रपट दर्ज की जाए। रपट लिखवाते ही सब अपने – अपने घरों को चले गए।

तीन दिन बाद डाकिया चिट्ठी को चाची के पास दोपहर को छोड़ गया था। चाची को पढ़ना आता नहीं था।
शाम को जब भैया और भाभी आए तो उन्हें दे दी।
“देखना मोहन तेरे नाम डाकिया चिट्ठी दे गया था।” चाची बोली।
मोहन भैया ने जब चिट्ठी पढ़ी तो आग बबूला हो उठा।

“नालायक को यह दिन दिखाने के लिए ही पाला – पोसा था हमने। नाक कटा डाली मूर्ख ने हमारी। मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा कहीं। क्या बोलेंगे समधी जी को। चलो उनसे तो ले दे के निपट भी लेंगे पर समाज को क्या कहेंगे?” मोहन भैया गुस्से से लाल हो कर बोल रहे थे।

“अरे हुआ क्या है? जरा हमें भी तो बता। बस उसे कोसता ही जा रहा है। ऐसा क्या किया है उसने?” चाची ने डांटते हुए से बोली।

“तुम तो चुप ही रहो अम्मा। तुम्हीं ने उसे अपने लाड़ प्यार से बिगाड़ा, जिसका परिणाम आज हम भुगत रहे हैं।” मोहन भैया झल्ला कर बोले।
“अरे मुझे जो भला – बुरा कहना है सो बाद में कहना। पहले बता तो सही हुआ क्या है?” चाची भी कड़की से बोली।

“होना क्या है अम्मा? यह कोर्ट की न्यायिक सूचना है। जिसमें लिखा है कि राधा ने पवन सुपुत्र बृजमोहन से शादी कर ली है और क्या?” मोहन भैया गुस्से से बोले।
उस दिन चंपा दीदी पुनः राधा के गायब होने की खबर सुन कर यहां खबर संभाल करने आई थी। वह चौंक कर बोली,” क्या? उस बृजमोहन के लड़के से, जो पड़ोस के गांव का है?”
“हां वही।” मोहन भैया ने ऊंघते हुए से बोला।

“देखा न। आखिर उसने अपनी करतूत दिखा ही ली आखिर। मैं न कहती थी कि यह लड़की तुमने कुछ ज्यादा ही सिर पर चढ़ा रखी है। बिगाड़ दी ना उसने जात। मेरी सुनता ही कौन था?” चंपा दीदी इठलाते हुए सी बोली।

“इससे तो वह मर ही गई होती तो एक ही दुख तो होता। अब तो वह जिंदगी भर खुद भी मरेगी और हमें भी मारती रहेगी।” छाती पीटते और रोते हुए उमा भाभी बोली।

“वह जिए अब अपने हाल में। मैं उसे अपने घर में घुसने नहीं दूंगा। मेरे लिए वह मर गई समझो।” मोहन भैया ने झुंझलाते हुए से कहा और अंदर चला गया।

कुछ दिन बाद राधा ने घर पर फोन किया। उमा भाभी ने उठाया। रोते – रोते बोली,” बेटा क्या कसर रखी थी हमने तुझे पालने में? तूने तो हमें कहीं का न छोड़ा! भागना भी था तो किसी अपनी जाति वाले के साथ भागती। क्या जरूरत पड़ी थी पिंकू के साथ भागने की? रिश्ता मंजूर न था तो मुझसे कहती, अपनी दादी से कहती। पर तूने तो हमारी नाक कटवा दी।,” रोते – रोते उमा भाभी ने फोन काट दिया।

राधा अभी अपनी बात कह ही नहीं पाई थी। वह कैसे बताती कि इश्क जात – पात को नहीं देखता। वह तो बस हो जाता है। और जब होता है तो सब नियम तोड़ कर अपनी मंजिल को लक्ष्य कर निशाना साधता है। पर वह जानती थी कि अभी मां का ही गुस्सा नहीं ठंडा है तो पिता जी का तो सातवें आसमान पर होगा।

कई दिन बीते पीछे बृजमोहन जी मोहन भैया के घर सुलह की बात करने आए। वह अपनी बिरादरी का गांव में ही नहीं इलाके में रसूखदार आदमी था। ऊंची जाति के लोग भी उसके ओहदे की तासीर के चलते ऊंची जुबान में उन से बात नहीं करते थे। पर वे दिल और व्यवहार के बहुत अच्छे थे। उन्होंने ही उस दिन कोर्ट में राधा और पिंकू की शादी करवाई थी। पिंकू को फोन पर जब राधा ने अपनी शादी की बात बताई थी तो उन्होंने इन दोनों की बाते सुन ली थी। सारी सेटिंग फोन पर इन्हीं की छत्र छाया में संपन्न हुई थी।

“अब क्या लेने आए हो बृजमोहन साहब? बेटी को तो ले गए हो बहला – फुसलाकर । उससे पेट नहीं भरा क्या? और क्या हमारी किरकिरी करने में अपनी ऊंची समझते हो?” मोहन भैया ने अनमने मन से कहा।

“नहीं मोहन बाबू। हम किसी को नीचा दिखाने नहीं आए हैं।बस सुलह करने आए हैं।” बृजमोहन शांति से बोले।

“काहे की सुलह ? कोई सुलह नहीं होगी। जाओ, चले जाओ यहां से। हमारे लिए वह मर गई और उसके लिए हम।” मोहन भैया झल्ला कर बोले। यहां गांव वालों ने मोहन भैया की बात की दात दी। उससे वे और शेर बन बैठे। उन्हें लगा कि अब गांव वाले मेरा आदर फिर से वैसे ही करेंगे, जैसे पहले करते थे।

“देखो मोहन बाबू! अब छोड़ो भी सारा गुस्सा। बच्चों ने प्यार किया कोई पाप नहीं किया। अब दोनों की कानूनी शादी भी हो चुकी है। अब तो उन्हें माफ कर लो और अपना लो। बच्चो को जितनी ही जरूरत हमारी है, उतनी ही आपकी भी है।” बृजमोहन पुनः शांति से बोले।

“क्या बात करते हो बृजमोहन साहब? अपने ओहदे और पैसों की धौंस मत जमाना।किस कानून की बात करते हो तुम? वही कानून तो तुम्हे जाति – पाती के प्रमाण पत्र बांटता है। फिर हम कैसे तुम्हारे साथ उठना – बैठना मंजूर करें?” मोहन भैया त्योरियां चढ़ाते हुए बोले।

“देखो मोहन भैया। इस संसार में कुदरत ने दो ही जातियां बनाई है। एक स्त्री और दूसरी पुरुष। वही सृष्टि के घटना चक्र को चलाने में सदा से कुदरत का साथ दे रही हैं। बाकी तो सब मनुष्य मन की खुरापात है। इसलिए इस जात – पात के विवाद में न पड़ कर बच्चों के बारे में सोचो।” बृजमोहन ने शांति से समझाते हुए से बोला।

“अपना यह ज्ञान कहीं और सुनाना, यहां नहीं। बड़े आए उपदेश देने। जब तुम एस. सी. का प्रमाण पत्र ले कर आरक्षण लेने के लिए अपनी जाति बड़े फखर से बताते हो, तब यह उपदेश नहीं देते? तब नहीं कहते कि हमें जाति प्रमाण पत्र नहीं चाहिए। हमें मानव होने का प्रमाण पत्र दो। अब अपनी जाति स्वीकारने में हेठी समझ रहे हो।” मोहन भैया ने अपने मन की सारी भड़ास उतार दी।

“अरे भाई क्यों बात उलझा रहे हो? मैं मानता हूं कि आरक्षण होना ही नहीं चाहिए।हो भी तो जातियों के आधार पर न हो। आर्थिक आधार पर हो। यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। ऐसा अगर समय पर हो गया होता तो इन आजादी के सत्तर साल में हमारे बच्चों ने आपसी रिश्ते कायम कर जात – पात का रोग ही मिटा दिया होता।पर यह तो राजनीतिक मसला है। इसमें हम क्या कर सकते हैं? और फिर इन बच्चों का तो कोई दोष ही नहीं।” बृजमोहन ने पुनः समझाते हुए से कहा।

“अच्छा! तुम कुछ नहीं कर सकते हो या कि जानबूझ कर कुछ करना ही नहीं चाहते? बृजमोहन साहब तुम जैसे रसूखदार जब इस बुराई का विरोध करें ना, सरकारों को रातों रात सब बदलना पड़ेगा। हम तुम्हारी चालाकियों को खूब समझते हैं। उससे पहले कि गांव वाले तुम्हारे साथ कुछ बुरा कर डालें, अपने रास्ते चलते बनो।” मोहन भैया विलक्षण मुद्रा में बोले।

बृजमोहन समझ गए कि इन तिलों से तेल नहीं निकले गा।अपने छोटे को इशारा कर घर को चले गए।

वर्षों बीत गए। वहां राधा और पिंकू के एक बेटी हुई। वह चार – पांच साल की हो गई थी। अब सुंदर बहू का मोह धीरे – धीरे राधा की सास से उतर रहा था। हररोज दोनों में घर के किसी न किसी कामकाज पर नोक – झोक होती ही रहती थी। उस दिन सास ने राधा को बहुत खरी – खोटी सुनाई थी,” तेरे मां – बाप ने तुझे रखा कहां था? खाना भी बनाना नहीं सिखाया। किसी भी काम की नहीं है डायन। मेरे बेटे को डोरे डाल कर अपना उल्लू सीधा कर गई बेईमान।” और भी न जाने क्या कुछ?

राधा अपनी बच्ची को उठा कर दुखी हो कर अपने पिता के यहां चली आई। सोचा मां – बाप माफ कर लेंगे। शाम के समय में जब वह अपने मायके पहुंची तो उसके पिता आंगन में बैठे थे। उससे पहले कि वह अपना दुख कहती। मोहन भैया ने आते ही उसे डांटना शुरू किया,
” क्यों आईं है यहां अब नालायक ? रह गई है कुछ कसर क्या?”
राधा रो रही थी। उसकी नन्ही सी मुन्नी उसके आंसू पोंछ रही थी और तोतली आवाज में बोल रही थी,” तुप तरो मम्मा! तुम तियुं डो डही हो? यह तुम्हे डांट रहे हैं। ये कौन है?”

मोहन भैया की ऊंची आवाज सुन कर घर के सब बाहर आ गए। पड़ोस के लोग भी बाहर निकल आए। राधा अपराधिनी की तरह नजरे झुकाए खड़ी थी।

“चुप भी कर अब मोहन। बस बोले ही जा रहा है। देखता नहीं कि कितने दिनों बाद बेटी आईं है?” चाची ने डांटते हुए कहा। और राधा को गले से लगा कर हालचाल पूछा।

दोनों को बतियते और रोते हुए उमा भाभी की आंखे भी भर आई। लोगों को बाहर देख कर राधा को दोनों मियां बीबी ने पुनः डांटना शुरू किया। डांटते – डांटते अंदर चले गए। सब लोग बाहर दात दे रहे थे। मोहन बिल्कुल ठीक बोल रहा है। इस कुलटा ने तो सारे गांव की नाक काट ली। उधर चाची ने सब को डांटा और भगा दिया।

अंदर भैया और भाभी आपस में मशविरा कर रहे हैं कि इसे रात को रखना कहां है? लोक लाज से बचने के लिए उसे बेटी के साथ नीचे वाले कमरे में रखने का निर्णय हुआ। सोचा धीरे -धीरे लोग भूल जाते हैं, तब सब ठीक होगा।

उस रात राधा को निचले कमरे में रखा गया। सुबह जब राधा की नन्ही बच्ची ममी – ममी चिलाने लगी तो सब निचले कमरे की ओर दौड़े। देखा वहां राधा थी ही नहीं।बच्ची को पूछा गया कि ममी कहां गई? पर उसे कुछ भी मालूम नहीं था। वह तो बस रो रही थी।

शालू रोता – रोता आया,” अरे पापा, पापा दीदी वहां चटान के पास पड़ी है। उसके मुंह से खून निकल रहा है।”
सब वहां भागे – भागे जाते हैं। पर राधा अब चली गई थी।

बच्ची ममी से चपटना चाह रही थी। उसे दूर ले जाया गया। सब रो रहे हैं। मोहन भैया भी फुट – फुट कर रो रहे हैं। शायद राधा ने रात को बच्ची को सुला कर उस पास वाली चटान से कूद कर अपनी जान दे दी थी। वह कुछ सहन नहीं कर पाई थी शायद। उसकी सहन शक्ति जबाव दे गई होगी। वहां सास की खींच – खींच और यहां उसे निचले कमरे में रखा जाना शायद रास नहीं आया। वह अंदर ही अंदर कुढ़ कर अपनी जान दे देती है।

उधर शहर से राधा के पति व ससुर घर पहुंचते हैं। उनसे राधा की सास ने कहानी उल्टी बता दी थी। पोस्ट मार्टम हुआ और लाश जाला दी गई। पुलिस केस दोहरा हो गया था। राधा के घर वालो ने मोहन भैया का केस किया और मोहन भैया ने घरेलू हिंसा का केस किया। दोनों परिवारों में आग लगी है। यहां पिंकू भी बहुत दुखी है।वह तो शायद दूसरी शादी करके संभल जाएगा पर बेचारी उस नन्ही सी बेटी की मां को कौन वापिस लाएगा? वह हर रोज मायूस होकर उस रास्ते को देखती रहती है, जहां से उसकी मां को जलाने के लिए ले जाया गया था।

घोषणा :- यह मेरी मौलिक और स्वरचित कहानी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — यह एक प्रेम कहानी है। इस कहानी में हेमराज ठाकुर जी ने भारतीय समाज की जात पात की रूढ़ भावना के चंगुल में जकड़े होने के उन कारणों पर भी प्रकाश डाला है, जिन के कारण आज की युवा पढ़ी लिखी पीढ़ी भी उसी छुआ छूत के जंजाल में फंसी पड़ी है। लेखक ने यह सिद्ध करने की कोशिश भी की है शायद कि आज़ादी के 74 सालों बाद भी भारतीय समाज जात पात की निकृष्ठ विचारणा से बाहर नहीं आ पाया है। इतना ही नहीं प्रेम के पाश में बंधे जोड़ो में यदि विजातीय प्रेम विवाह बच्चों के द्वारा किया जाता है तो उच्च वर्गीय समाज के अभिभावक अपनी सन्तान से नाता ही तोड़ देते हैं पर इस सामाजिक बुराई का विरोध नहीं कर पाते। चाहे उन्हे अपनी संतानों की जान ही क्यों न खोनी पड़े। सामाजिक नियमों और प्रतिष्ठाओं का इस सम्बन्ध में इतना प्रभाव है कि देश का कानून भी इसके आगे कुछ नहीं कर पाता। लेखक ने पात्रों के माध्यम से यह भी सिद्ध करने की कोशिश की है कि इस समस्या का मुख्य कारण वर्तमान पढ़े लिखे समाज के सामने जातिगत आरक्षण भी है शायद। संविधान में तो इस भेद भाव को मिटाने की बात की गई है और निम्न समझा जाने वाला समाज संविधान की इस दलील को पूर्ण रूप से लागू करने की मांग भी समाज से करता है। परन्तु आरक्षण छोड़ने को तैयार नहीं है। जबकि संविधान में आरक्षण का प्रावधान मात्र 10 साल तक प्रभावी रखने के निर्देश संविधान निर्माताओं ने दिए थे। इधर उच्च वर्गीय समाज को इस प्रथा से बाहर आने को कहा जाता है तो वह इसी जातिगत आरक्षण की बात डंके की चोट देकर करता है। एक छोड़ने को तैयार नहीं और दूसरा मानने को तैयार नहीं। इसी कारण नई और पढ़ी लिखी पीढ़ी में भी यह भावना सब कुछ जानते और समझते हुए भी निरंत बढ़ती ही जा रही है। लेखक का मानना है कि संसार में मात्र दो ही जातियां हैं, एक स्त्री और दूसरी पुरुष। जो प्रकृति ने सृष्टि संचालन के उद्देश्य से अपना सहयोग करने के लिए बनाई है। बाकी सब मानव मस्तिष्क की खुराफत है। अतः इस कहानी से हमे यह संदेश मिलता है कि भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए हमे भारत से जात पात के भेद भाव को जड़ से मिटाना होगा। पुनः वैदिक दर्प को स्थापित करना होगा।

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यह कहानी (दास्तान ए जात पात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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दोषी कौन है?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दोषी कौन है? ♦

स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियां थी। नरपत काका के चारों बेटे खेतों में जी जान से जोर लगा रहे थे। उम्मीदें सब की ये थी कि इस बार खूब फसल होनी चाहिए। फसल से जो कमाई होगी, बाबा वह जरूर हमारी शिक्षा पर खर्च करेंगे।

नरपत काका अपना पेट मसोस मसोसकर बच्चों की अच्छी तालीम के हर संभव प्रयास करते रहते थे। प्राथमिक से लेकर कॉलेज तक की पढ़ाई। चार – चार बेटों का लाखों का खर्च। काका की दो चार बीघा जमीन से कैसे तैयार हो पाता ये तो वही जाने। काका का कोई सरकारी रोजगार भी तो नहीं है ना।

अबकी चारों कॉलेज से अच्छी डिग्रियां लेकर प्रशिक्षण की जिद पर अड़े हुए हैं। काका भी दिल से प्रशिक्षण कराने की सोचता है। जानता है प्रशिक्षण के बिना सरकारी नौकरियां नहीं मिलने वाली पर माली हालत इजाजत नहीं देती है।

बैंक में गिरवी

दो चार बीघा जमीन है, उसे बैंक में गिरवी रखकर बड़े वाले को शहर डिग्री के बाद प्रशिक्षण हेतु भेज देते हैं। कुछ फसल का जुगाड़ था और कुछ बैंक से ले लिया। बाकी के तीनों को ढाढस बंधाता है। “बच्चों तुम अभी छोटे हो। भैया जब प्रशिक्षण पूरा कर लेगा ना तब तुम्हें भी बारी – बारी से मौका दूंगा।”

बाबा की आंखों की कोरों पर आते आंसुओं को देखकर सब सहमत हो जाते हैं। बड़े वाला साल भर का प्रशिक्षण लाखों का डोनेशन देकर जब घर लौटता है तब तक तीनों बेटों और बाप ने एड़ी चोटी का दम लगा कर बैंक का हिसाब-किताब चुकता कर दिया था।

वह तो कृषि कार्ड की लिमिट थी। उसी लिमिट से पैसा निकाल कर दूसरे को उसकी डिग्री के हिसाब से प्रशिक्षण को भेज दिया। उसका भी कुछ यूं ही निभा। इस बार दिक्कत कुछ ज्यादा रही। सूखे की मार फसलों से इतनी कमाई नहीं करवा पाई, जितना कि पिछली बार हुई थी। पर फिर भी आस पड़ोस में मेहनत मजदूरी करके सब लोगों ने मिलकर इस बार का खाता भी क्लियर कर लिया था। इसी कदर तीसरे का भी कुछ यूं ही बीता।

अब छुटकू की बारी थी।

अब छुटकू की बारी थी। उसकी जिद डॉक्टरी करने की थी। तीनों बड़े भाइयों ने भी नरपत काका को यह कह कर मना लिया “बाबा छुटकू ठीक कहता है। हमारे पूरे इलाके में कोई डॉक्टर नहीं है। छुटकू है भी तेज। कर लेने दो उसे डॉक्टरी। परिवार के साथ साथ सबका भला हो जाएगा।”

“तुम्हारी मत मारी गई है। लाखों का खर्चा होता है उस पर। कहां से आएगा इतना पैसा। कर लेने दो इसे भी कोई छोटा – मोटा डिप्लोमा। फिर ढूंढो कहीं नौकरियां? मेरे पास इतना पैसा नहीं है। “नरपत काका कुछ रूखे से बोले।

छुटकू आंगन की पीपल के नीचे बैठकर सुबकियां भर रहा है। तीनों बड़ों ने मान मनौती करके बाबा को मना लिया और छुटकू को डॉक्टरी के लिए भेज दिया। पर इस बार सौदा कुछ महंगा था। ऐसे में नरपत काका को अपनी दो चार बीघा जमीन से एक आध बीघा को जड़ से बेच देना पड़ा।

छुटकू के जाने के बाद नरपत काका और उनकी पत्नी उस दिन शाम को उसी पीपल के नीचे बैठे – बैठे बतिया रहे थे। “पगली आज मैंने अपनी मां को बेचा है। और करता भी क्या? बच्चों ने मजबूर कर दिया।” यह कहते – कहते नरपत काका की आंखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी। उनके साथ काकी की आंखों से भी अश्रुपात होने लगा। पर बच्चों को देखकर दोनों हड़बड़ाहट में आंसू पोंछ लेते हैं।

छुटकू डॉक्टर

चारों बाप बेटों ने दिन रात मेहनत की। एक दिन छुटकू डॉक्टर बनकर के लौट आता है। घर में खुशी का माहौल है। नरपत काका और काकी बहुत खुश है। आस पड़ोस के लोग भी उन्हें बधाइयां देने लगे हैं।

“ओ यारा नरपत्या, हुन ता तू फ्री हुई गया भाई।” रामलू काका नरपत काका से कह रहे थे।

“क्येथी ओ यारा रमालू भाई? हजा ता इन्हा रे ब्याह रही गए।” नरपत काका माथे पर हाथ फेरते हुए कहते हैं।

सरकारी नौकरी का इंतजार

चारों बेटों ने सरकारी नौकरियां पाने के लिए लंबे समय तक इंतजार किया। पर कोई सरकारी नौकरी की अधिसूचना ही जारी नहीं हो पा रही है। एक दिन डॉक्टरी की पोस्टें भरने की अधिसूचना निकली भी थी। वह भी किसी कोर्ट केस के चलते रद्द कर दी गई।

बड़े वाले तीनों निजी कंपनियों में बहुत कम वेतनमान पर नौकरियां करने लगे हैं। हालत यह है कि शहरी जीवन में रहते – रहते उस वेतन से महीने भर के लिए अपने पेट का ही गुजारा नहीं होता। क्वार्टर का किराया, राशन – पानी, बिजली का भाड़ा और एक आध घर का चक्कर। बस सब उसी में खत्म। काका की हालत आज भी ज्यों की त्यों है।

बड़े वाले की शादी तय कर दी गई है। जेब में खर्चने को दमड़ी भी नहीं है। फिर से एक आध बीघा जमीन बेच दी जाती है। आज काका फिर से दुखी है।

एक दिन चारों भाई शाम को आंगन में बैठकर बतिया रहे हैं। “अरे भाई न जाने यह कैसी शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था है? इतनी महंगी पढ़ाई हासिल कर भी ढंग की नौकरी ना ही तो सरकारी क्षेत्र में नसीब हो पाती है और ना ही निजी क्षेत्र में। सरकारें वादे तो बड़ी-बड़ी करती है, पर तोड़ती डक्का नहीं।” छुटकू बड़े तैश से बोल रहा था।

“हाथी के दांत खाने के और तथा दिखाने के और वाली कहावत है यह छुटकू। आखिर दोषी कौन?” सबसे बड़े वाले ने विलक्षण स्वरों से जवाब दिया।

इतने में अंदर से आवाज आती है, “अजी सुनते हो। खाना तैयार है।”
सब खाना खाने चले जाते हैं।

घोषणा: यह मेरी मौलिक, स्वरचित रचना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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ज़रूर पढ़ें — शिक्षक की महानता।

Conclusion — निष्कर्ष

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस छोटी कहानी के माध्यम से मिडिल क्लास के परिवारों के मजबूरी और समझ को बताने की बखूबी कोशिश की है। मिडिल क्लास परिवार किस कदर मेहनत कर बमुश्किल उच्च डिग्री हासिल करता है। उसके बाद भी उसे अच्छी नौकरी नही मिल पाती।

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यह छोटी कहानी (दोषी कौन है?) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कहानी/कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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बदलता दौर।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बदलता दौर। ♦

इतवार की सुबह सवेरे तड़के ही कोई रविन्द्र के आंगन से आवाजे लगा रहा था,” भाई साहब! ओ भाई साहब! चलो चलना है क्या?”

” कौन बिरजू है क्या?” अंदर से रविन्द्र चाय पीते हुए बोला।
” जी हां भाई साहब। मैं बोल रहा हूं।” बिरजू ने झट से उत्तर दिया।
रविन्द्र ने अपनी पत्नी को जल्दी तैयार होने को कहा और स्वयं भी कपड़े पहनते हुए बिरजू से बतियाता रहा।

” क्या बताएं बिरजू? हर चेले – घोपे के पास गए। हर डॉक्टर – हकीम के पास गए।लाखों का खर्च कर लिया है, और तो और अम्मा जी के कहने पर हवन – पाठ भी करवा लिए। पर शादी के दस साल बाद भी कोई औलाद नहीं हो रही है। कल जब तुम्हे दफ्तर से आते वक्त, मन्दिर जाने के बारे में शांता से बतियाते हुए सुना तो सोचा हम भी एक बार तुम दोनों के साथ मन्दिर चल आते हैं। शायद अबकी भगवान हमारी सुन ही लें।”

“भाग्य का क्या पता भाई साहब? कब खुल जाए? मैं भी इन्हें बड़ी मुश्किल से मन्दिर में लिए जा रही हूं। वे भी आपके जाने के लिए राजी होने के बाद ही जाने को तैयार हुए हैं। वरना कहां ….? ” शांता ने अदब से कहा।

पुत्र रत्न पैदा हुआ।

इस बार सचमुच भगवान ने रविन्द्र और तारा की सुन ली। दोनों की किस्मत खुली और उनके एक पुत्र रत्न पैदा हुआ। वह बच्चा बचपन में इतना बीमार रहा कि न जाने तारा ने उसको बड़ा करने के लिए क्या – क्या नहीं किया?

बेचारे रविन्द्र की आधी तनख्वाह हर महीने उसी के इलाज में लग जाती थी। बड़ी मुद्दत से जो हुआ था लाल। दोनों ने लालन पालन में कोई कोर कसर न छोड़ी। तारा तो उसके बी ए करने तक उसे अपनी थाली से ही खिलाती रहती थी। बेचारी खुद भूखी रह जाती पर कुन्दन पर आंच न आने देती।

कुंदन और ईशा की शादी।

भगवान की कृपा से कुन्दन की नौकरी भी लग गई। नौकरी की खबर सुनकर उसकी एक सहपाठी ने उसे रिश्ता भेज दिया। यूं तो कुन्दन भी उसके प्यार में कालेज से ही लट्टू हुआ पड़ा था पर वह बड़ा भाव खा रही थी। वह थोड़े बड़े घराने की थी। पर नौकरी लगने के बाद वह कुन्दन से शादी करने को मान गई। रिश्ता तय हुआ और शादी भी हुई। साल भर सब ठीक से रहा। मां बाप ने भी न पूछा दोनों को। सोचा बच्चे हैं। करने दो मस्ती।

साल बाद रविन्द्र की गाड़ी की एक दुर्घटना हुई। इसमें रविन्द्र ने तो अपनी जान ही गवाई और तारा की टांग टूट गई। अब घर का सारा काम कुन्दन और कुन्दन की पत्नी को करना पड़ रहा था।

साल भर के इलाज के बाद तारा भी ठीक तो हो गई थी पर बूढ़े शरीर में दर्द तो बढ़ता ही जा रहा था। ईशा कुछ दिन तो इधर उधर टल कर खुद को घर के कामकाज से बचाती रही और पति से ही खाना भी बनवाती रही और कपड़े भी धुलाती रही।

कुन्दन ने भी मां को बीमार देख चुपके से सब काम किया। परन्तु साल भर बाद एक दिन उसने साफ साफ कह दिया, _ ” बुढ़िया ज्यादा नाटक करने की कोई जरूरत नहीं है। अब तू ठीक हो गई है। पेट भरना है तो खाना खुद बनाया कर और अपने कपड़े खुद धोया कर। वरना चली जा वृद्धाश्रम। पति के मरने के बाद पेंशन मिलती है। आश्रम वाले पाल लेंगे उन्ही पैसों से। हमें न पैसों की जरूरत है और न ही मुझसे ये सब होता।”

कुन्दन ने ईशा को थोड़ा फटकारा। ईशा घर छोड़ कर माइके चली गई। उधर ईशा की मां ने तो और भी आग में घी डालने का काम किया। कुन्दन ईशा के बेगैर रह ही नहीं सकता था। मनाते – मनाते बात यहां तक आ पहुंची कि अब हमारी ईशा उस घर में तभी जाएगी, जब आप अपनी मां को अलग रखोगे या वृद्धा-आश्रम में छोड़ आएंगे।

कुन्दन ने डरते हुए से ईशा से कहा, ” ईशा तुम समझती क्यों नहीं? अभी हम मां को न अकेला रख सकते हैं और न ही तो आश्रम को भेज सकते हैं। अभी पापा को मरे हुए मात्र एक साल ही हुआ है। पति मरा है उसका, और फिर समाज क्या कहेगा?”

ईशा ने सर्पणी की तरह फुंकारते हुए उत्तर दिया, ” पति क्या सिर्फ तेरी मां का ही अनोखा मरा है? संसार में कईयों के पति मरे हैं। मैं कुछ नहीं सुनना चाहती। मैं समाज समूज कुछ नहीं जानती। फैसला तुम्हे करना है। तुम्हे मां चाहिए या फिर मैं? नहीं तो तलाक के पेपर तैयार करो पापा।”

“नहीं बेटी। कुछ दिन का समय इसे और देते हैं।” ईशा के पापा ने शराब का पैग लेते हुए कहा।
कुन्दन शाम को मां से सब सच सच कहता है।

तारा ने कुन्दन से कहा, ” बेटे तेरे पापा ने तो तुझे तभी कहा था कि यह लड़की कुछ ठीक नहीं है बेटा। कोई और लड़की देखते हैं। पर तेरी जिद्द के आगे हमारी एक न चली। अभी भी वक्त है बेटा। वे अगर तलाक मांग रहे हैं तो दे – दे तलाक। वह लड़की तुझे बर्बाद कर डालेगी।”

तारा के इतना कहते ही कुन्दन आग बबूला हो उठा, ” ठीक कहती है ईशा और उसके मम्मा-पापा। तेरे साथ रहना सचमुच ठीक नहीं है। पड़ी रह घर में अकेली। हम रह लेंगे क्वार्टर में। बड़ी आई तलाक दे – दे।”

दोनो पति – पत्नी क्वार्टर में रहने लगे। जितना कुन्दन महीने का कमाता, उससे तीन गुना खर्चे मैडम के थे। घर के काम काज को रखी नौकरानी पैसे न मिलने के कारण नौकरी छोड़ गई। सब काम कुन्दन को खुद करने पड़ते थे।

मैडम जी तो दिन रात व्यस्त ही रहती थी और नशे में चूर। बेटे की हालत देख कर नौकरानी को पैसे देना तारा ने चुपके से शुरू किए, ताकि बेटे पर बोझ न पड़े। कुन्दन पर बैंक का कर्ज भी बहुत हो गया था।

अब वह भी परेशान हो कर और ससुराल की संगत से शराब पीने लग गया था। एक दिन उसने दफ्तर से लौट कर मैडम को किसी गैर मर्द की बाहों में लिपटे देखा तो उससे रहा नहीं गया। उसने सासू मां और ससुर साहब से ईशा की करतूतों की शिकायत की।

उन्होंने उसे जबाव दिया,” तो क्या हुआ? यह तो आजकल आम बात है। हमारी बेटी है ही बहुत सुंदर दामाद जी। आ गया होगा किसी का दिल उस पर। तुम्हारा भी किसी और पर आ जाए तो उसमें क्या गलत है? इस बात पर ज्यादा बबाल करने की कोई जरूरत नहीं है।”

उधर बैक वालों की चिट्ठियों से कुन्दन अलग से परेशान था। कुन्दन को एक दिन दिमागी दौरा पड़ा। वह हस्पताल में कराह रहा था। तारा को नौकरानी ने खबर दी।तारा उसे घर ले आई और उस अपाहिज बुद्धि का इलाज भी करती रही और उसका कर्जा भी भरती गई।

उन बूढ़ी बाहों में अब और इतनी शेष ताकत नहीं थी कि वे इस बुढ़ापे में भी अपने बेटे को अपना पेट काट कर पालती। पर क्या करती? उसे यह सब मजबूरी में करना पड़ रहा था।

मैडम ईशा ने अपने माइके में उसी गैर मर्द के साथ डेरा जमा लिया था। एक दिन तारा उसे घर बुलाने गई तो उसने बेहूदा जवाब दिया, “क्या करूंगी तेरे अपाहिज बेटे के साथ रह कर?”
तारा रोते – रोते घर लौट आई।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

Conclusion:

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – माता-पिता सदैव ही अपने बच्चे/बच्चियों का भला ही चाहते हैं, उनका कहना जरूर माने, उनके अनुभव का कभी भी मजाक ना बनाये। जो आपके माता-पिता का सम्मान और सेवा नहीं कर सकती/सकता वो आपका सम्मान और सेवा भला क्या करेगी। इसलिए सदैव ही माता-पिता का सम्मान और सेवा करें, उनका कहना माने। कभी भी उनका साथ ना छोड़े, चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थिति क्यों ना आ जाये।

—————

यह लेख/लघु कथा (बदलता दौर।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख / लघु कथा सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

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शांत मन से सब कुछ संभव।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ शांत मन से सब कुछ संभव। ϒ

एक बार की बात है, एक किसान था, जिसने अपनी “घड़ी” चारे से भरे हुए बाड़े में खाे दी थी। वह “घड़ी” बहुत कीमती थी, इसलिए किसान ने उसकी बहुत खाेजबीन की पर वह “घड़ी” नहीं मिली। बाड़े के बाहर कुछ बच्चे खेल रहे थे और किसान काे दूसरा काम भी था, उसने सोचा क्यों न मैं इन बच्चाें से “घड़ी” काे खाेजने के लिए कहूँ।

उसने बच्चाें से कहा जाे भी बच्चा उसे “घड़ी” खाेजकर देगा उसे वह अच्छा पुरस्कार देगा। यह सुनकर बच्चें पुरस्कार के लालच में बाड़े के अंदर दाैड़ गए और यहाँ-वहाँ “घड़ी” ढ़ूंढ़ने लगे। लेकिन किसी भी बच्चें काे “घड़ी” नहीं मिली। तब एक बच्चें ने किसान के पास जाकर कहा कि वह “घड़ी” खाेजकर ला सकता है, पर सारे बच्चाें काे बाड़े से बाहर जाना हाेगा। किसान ने उसकी बात मान ली और किसान तथा बाकी सभी बच्चें बाड़े के बाहर चले गए। कुछ देर बाद बच्चा लाैट आया और वह कीमती “घड़ी” उसके हाथ में थी। किसान अपनी “घड़ी” देखकर बहुत खुश व आश्चर्यचकित हाे गया।

उसने बच्चे से पूछा, तुमने “घड़ी” किस तरह खाेजी। जबकि बाकी बच्चे और खुद मैं इस काम में नाकाम हाे चुका था। बच्चे ने जवाब दिया मैंने कुछ नही किया, बस शांत मन से ज़मीन पर बैठ गया और “घड़ी” की आवाज़ सुनने की किेशिश करने लगा। क्योंकि बाड़े में शांति थी, इसलिए मैंने उसकी आवाज सुन ली, और उसी दिशा में देखा।

♥ याद रखें ♥

प्यारे दोस्तों – एक शांत दिमाग बेहतर साेच सकता है, एक थके हुए दिमाग की तुलना में। दिन में कुछ समय के लिए आँखें बंद करके शांति से बैठिये। अपने मस्तिक को शांत होने दीजिए, फिर देखिये वह आपकी ज़िंदगी काे किस तरह से व्यवस्थित कर देता हैं। आत्मा हमेशा अपने आपकाे ठिक करना जानती है, बस मन काे शांत करना ही चुनाैती हैं। इसलिए मन काे शांत करने का अभ्यास करते रहें। अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा भी आ जाएगा – जब आपका मन बिल्कुल शांत हो जायेगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought to life by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation, and encourage good solar radiation to become themselves.

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

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सबसे बड़ा पुण्य।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ सबसे बड़ा पुण्य। ϒ

मानव सेवा ही प्रभु (GOD) सेवा हैं। “जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं। जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है।” प्यारे दोस्तों … मुझे एक सच्ची कहानी याद आ रही है, कहानी कुछ इस तरह से हैं। बहुत समय पहले कि बात है…..

the-biggest-virtue-kmsraj51

एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था। हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था। वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो – आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था। यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था।

एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए। राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा…..

“महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”

देव बोले –  “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं।”

राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा – “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”

देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया।

राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा –  “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है।”

उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए।

कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी। इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी।

राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा – “महाराज! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”

देव ने कहा –  “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं!”

राजा ने कहा –  “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है?”

देव महाराज ने बहीखाता खोला, और ये क्या, पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।

राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा – “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ?

देव ने कहा – “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं। जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है। ऐ राजन! … तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है।

परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं।

देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा – “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे।”

अर्थात – “कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे। राजन! भगवान दीनदयालु हैं। उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है… सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो। दीन-दुखियों का हित-साधन करो। अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है।”

राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं।

प्यारे दोस्तों – जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है। हमारे पूर्वजों ने कहा भी है – “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप … ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे।

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

* क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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बहन का स्नेह मिलना खुशनसीबी है।

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ϒ बहन का स्नेह मिलना खुशनसीबी है। ϒ

एक छोटा-सा पहाड़ी गांव था। वहां एक किसान, उसकी पत्नी, एक बेटा और एक बेटी रहते थे। एक दिन बेटी की इच्छा स्कार्फ खरीदने की हुई और उसने पिताजी की जेब से 10 रुपए चुरा लिए।

पिताजी को पता चला तो उन्होंने सख्ती से दोनों बच्चों से पूछा – पैसे किसने चुराए ?
अगर तुम लोगों ने सच नहीं बताया तो सजा दोनों को मिलेगी। बेटी डर गई, बेटे को लगा कि दोनों को सजा मिलेगी तो सही नहीं होगा।

वह बोला – पिताजी, मैंने चुराए, पिताजी ने उसकी पिटाई की और आगे से चोरी न करने की हिदायत भी दी। भाई ने बहन के लिए चुपचाप मार खा ली। वक्त बीतता गया। दोनों बच्चे बड़े हो गए।

एक दिन मां ने खुश होकर कहा – दोनों बच्चों के रिजल्ट अच्छे आए हैं। पिताजी (दुखी होकर) – पर मैं तो किसी एक की पढ़ाई का ही खर्च उठा सकता हूं।

बेटे ने फौरन कहा – पिताजी, मैं आगे पढ़ना नहीं चाहता।
बेटी बोली – लड़कों को आगे जाकर घर की जिम्मेदारी उठानी होती है, इसलिए तुम पढ़ाई जारी रखो। मैं कॉलेज छोड़ दूंगी। अगले दिन सुबह जब किसान की आंख खुली तो घर में एक चिट्ठी मिली।

उसमें लिखा था – मैं घर छोड़कर जा रहा हूं। कुछ काम कर लूंगा और आपको पैसे भेजता रहूंगा। मेरी बहन की पढ़ाई जारी रहनी चाहिए। एक दिन बहन हॉस्टल के कमरे में पढ़ाई कर रही थी।

तभी गेटकीपर ने आकर कहा – आपके गांव से कोई मिलने आया है। बहन नीचे आई तो फटे-पुराने और मैले कपड़ों में भी अपने भाई को फौरन पहचान लिया और उससे लिपट गई।

बहन – तुमने बताया क्यों नहीं कि मेरे भाई हो – भाई।

मेरे – ऐसे कपड़े देखकर तुम्हारे सहेलियाें में बेइज्जती होगी। मैं तो तुम्हें बस एक नजर देखने आया हूं।
भाई चला गया – बहन देखती रही।

बहन की शादी शहर में एक पढ़े – लिखे लड़के से हो गई। बहन का पति कंपनी में डायरेक्टर बन गया। उसने भाई को मैनेजर का काम ऑफर किया, पर उसने इनकार कर दिया।

बहन ने नाराज होकर वजह पूछी तो भाई बोला – मैं कम पढ़ा-लिखा होकर भी मैनेजर बनता तो तुम्हारे पति के बारे में कैसी-कैसी बातें उड़तीं, मुझे अच्छा नहीं लगता।

भाई की शादी गांव की एक लड़की से हो गई। इस मौके पर किसी ने पूछा कि उसे सबसे ज्यादा प्यार किससे है ?

वह बोला – अपनी बहन से, क्योंकि जब हम प्राइमरी स्कूल में थे तो हमें पढ़ने दो किमी दूर पैदल जाना पड़ता था। एक बार ठंड के दिनों में मेरा एक दस्ताना खो गया।

बहन ने अपना दे दिया – जब वह घर पहुंची तो उसका हाथ सुन्न पड़ चुका था और वह ठंड से बुरी तरह कांप रही थी। यहां तक कि उसे हाथ से खाना खाने में भी दिक्कत हो रही थी। उस दिन से मैंने ठान लिया कि अब जिंदगी भर मैं इसका ध्यान रखूंगा। बहन ने हमारी हर गलती का बचाव किया था बचपन से वो हमे मां-बाप से ज्यादा स्नेह करती है।

जीवन में कुछ मिले या ना मीले पर बहन का स्नेह मिलना खुशनसीबी है।

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∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

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∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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नहीं करती कभी शिकायत।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ नहीं करती कभी शिकायत। ϒ

कल मैं दुकान से जल्दी घर चला आया। आम तौर पर रात में 10 बजे के बाद आता हूं, कल 8 बजे ही चला आया।

सोचा था घर जाकर थोड़ी देर पत्नी से बातें करूंगा, फिर कहूंगा कि कहीं बाहर खाना खाने चलते हैं। बहुत साल पहले, हम ऐसा करते थे।

घर आया तो पत्नी टीवी देख रही थी। मुझे लगा कि जब तक वो ये वाला सीरियल देख रही है, मैं कम्यूटर पर कुछ मेल चेक कर लूं। मैं मेल चेक करने लगा, कुछ देर बाद पत्नी चाय लेकर आई, तो मैं चाय पीता हुआ दुकान के काम करने लगा।

अब मन में था कि पत्नी के साथ बैठ कर बातें करूंगा, फिर खाना खाने बाहर जाऊंगा, पर कब 8 से 11 बज गए, पता ही नहीं चला।

पत्नी ने वहीं टेबल पर खाना लगा दिया, मैं चुपचाप खाना खाने लगा। खाना खाते हुए मैंने कहा कि खा कर हम लोग नीचे टहलने चलेंगे, गप करेंगे। पत्नी खुश हो गई।

हम खाना खाते रहे, इस बीच मेरी पसंद का सीरियल आने लगा और मैं खाते-खाते सीरियल में डूब गया। सीरियल देखते हुए सोफा पर ही मैं सो गया था।

जब नींद खुली तब आधी रात हो चुकी थी। बहुत अफसोस हुआ। मन में सोच कर घर आया था कि जल्दी आने का फायदा उठाते हुए आज कुछ समय पत्नी के साथ बिताऊंगा। पर यहां तो शाम क्या आधी रात भी निकल गई।

ऐसा ही होता है, ज़िंदगी में। हम सोचते कुछ हैं, होता कुछ है। हम सोचते हैं कि एक दिन हम जी लेंगे, पर हम कभी नहीं जीते। हम सोचते हैं कि एक दिन ये कर लेंगे, पर नहीं कर पाते।

आधी रात को सोफे से उठा, हाथ मुंह धो कर बिस्तर पर आया तो पत्नी सारा दिन के काम से थकी हुई सो गई थी। मैं चुपचाप बेडरूम में कुर्सी पर बैठ कर कुछ सोच रहा था।

पच्चीस साल पहले इस लड़की से मैं पहली बार मिला था। पीले रंग के शूट में मुझे मिली थी। फिर मैने इससे शादी की थी। मैंने वादा किया था कि सुख में, दुख में ज़िंदगी के हर मोड़ पर मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।

पर ये कैसा साथ? मैं सुबह जागता हूं अपने काम में व्यस्त हो जाता हूं। वो सुबह जागती है मेरे लिए चाय बनाती है। चाय पीकर मैं कम्यूटर पर संसार से जुड़ जाता हूं, वो नाश्ते की तैयारी करती है। फिर हम दोनों दुकान के काम में लग जाते हैं, मैं दुकान के लिए तैयार होता हूं, वो साथ में मेरे लंच का इंतज़ाम करती है। फिर हम दोनों भविष्य के काम में लग जाते हैं।

मैं एकबार दुकान चला गया, तो इसी बात में अपनी शान समझता हूं कि मेरे बिना मेरा दुकान का काम नहीं चलता, वो अपना काम करके डिनर की तैयारी करती है।

देर रात मैं घर आता हूं और खाना खाते हुए ही निढाल हो जाता हूं। एक पूरा दिन खर्च हो जाता है, जीने की तैयारी में।

वो पंजाबी शूट वाली लड़की मुझ से कभी शिकायत नहीं करती। क्यों नहीं करती मैं नहीं जानता। पर मुझे खुद से शिकायत है। आदमी जिससे सबसे ज्यादा प्यार करता है, सबसे कम उसी की परवाह करता है। क्यों?

कई दफा लगता है कि हम खुद के लिए अब काम नहीं करते। हम किसी अज्ञात भय से लड़ने के लिए काम करते हैं। हम जीने के पीछे ज़िंदगी बर्बाद करते हैं।

कल से मैं सोच रहा हूं, वो कौन सा दिन होगा जब हम जीना शुरू करेंगे। क्या हम गाड़ी, टीवी, फोन, कम्यूटर, कपड़े खरीदने के लिए जी रहे हैं?

मैं तो सोच ही रहा हूं, आप भी सोचिए कि ज़िंदगी बहुत छोटी होती है। उसे यूं जाया मत कीजिए। अपने प्यार को पहचानिए। उसके साथ समय बिताइए। जो अपने माँ बाप भाई बहन सगे संबंधी सब को छोड़ आप से रिश्ता जोड़ आपके सुख-दुख में शामिल होने का वादा किया उसके सुख-दुख को पूछिए तो सही।

एक दिन अफसोस करने से बेहतर है, सच को आज ही समझ लेना कि ज़िंदगी मुट्ठी में रेत की तरह होती है। कब मुट्ठी से वो निकल जाएगी, पता भी नहीं चलेगा।

Note : Source – http://awgpskj.blogspot.in/

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-KMS

ϒ शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। ϒ

प्रिय मित्रों,

यह Story महाकवि कालिदास जी के जीवन से संबधित हैं।

Kalidas-kmsraj51
महाकवि कालिदास जी।

महाकवि कालिदास जी के कंठ में साक्षात सरस्वती जी का वास था। शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था। अपार यश, प्रतिष्ठा और मान सम्मान पाकर एक बार कालिदास जी को अपनी विद्वत्ता का बहुत घमंड हो गया।

उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ भी बाकी नहीं बचा। उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं। एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास जी विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए।

गर्मी का मौसम था, धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास जी को प्यास लग आई। थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी-फूटी झोपड़ी दिखाई दी। पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले। झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था।

कालिदास जी ने सोचा कि अगर कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए। उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली। बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी।

तभी कालिदास जी उसके पास जाकर बोले – बालिके बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे ….. बच्ची ने पूछा – आप कौन हैं? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए। कालिदास जी को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता?

फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले – बालिके अभी तुम छोटी हो, इसलिए मुझे नहीं जानती। घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो। वह मुझे देखते ही पहचान लेगा। मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर – दूर तक। मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूँ।

कालिदास जी के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली – आप असत्य कह रहे हैं। संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं। अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं?

थोङा सोचकर कालिदास जी बोले – मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो। मेरा गला सूख रहा है। बालिका बोली – दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’। भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें। देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है।

कलिदास जी चकित रह गए। लड़की का तर्क अकाट्य था। बड़े – बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास जी एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे। बालिका ने पुन: पूछा – सत्य बताएं, कौन हैं आप? वह चलने की तैयारी में थी।

कालिदास जी थोड़ा नम्र होकर बोले – बालिके, मैं बटोही हूँ….. मुस्कुराते हुए बच्ची बोली – आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं। संसार में दो ही बटोही हैं। उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं? तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास जी की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी।

बच्ची बोली – आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं जी और ये भी नहीं जानते? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है। बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं। आप तो थक गए हैं। भूख प्यास से बेदम हैं। आप कैसे बटोही हो सकते हैं?

इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई। अब तो कालिदास जी और भी दुखी हो गए। इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए। प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी। दिमाग़ चकरा रहा था। उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा…. तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली…..

उसके हाथ में खाली मटका था। वह कुएं से पानी भरने लगी। अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास जी बोले – माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा।

वृद्ध स्त्री बोली – बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं। अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी। कालिदास जी ने कहा – मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें माते। स्त्री बोली – तुम मेहमान कैसे हो सकते हो? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम?

अब तक के सारे तर्क से पराजित और हताश कालिदास जी बोले – मैं सहनशील हूँ। अब आप पानी पिला दें। स्त्री ने कहा – नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी – पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है।

दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी ओ मीठे फल ही देते हैं। तुम सहनशील नहीं हाे, सच बताओ तुम कौन हो? कालिदास जी लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क – वितर्क से झल्लाकर बोले – मैं हठी हूँ।

वृद्ध स्त्री बोली – फिर असत्य, हठी तो दो ही हैं – पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार – बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप? पूरी तरह से अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास जी ने कहा ….. फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ।

नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो, मूर्ख दो ही हैं। पहला अयोग्य राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास जी ….. वृद्ध स्त्री के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे। वृद्ध स्त्री ने कहा – उठो वत्स… आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती जी वहां खड़ी थी। कालिदास जी पुन: नतमस्तक हो गए।

माता ने कहा – शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग(लीळा) करना पड़ा।

कालिदास जी को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

दोस्तों,

ज़िन्दगी में कभी भी किसी भी बात का अहंकार न करें। सदैव विनम्रता व धैर्य के साथ हर कार्य करें।

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