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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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नंदिता शर्मा

कार्तिक पूर्णिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कार्तिक पूर्णिमा। ♦

• कार्तिक माह • —

कार्तिक मास अपने आप में विशेषता लिए हुए है। इसकी गणना बहुत पवित्र माह के रूप में की जाती है। इस माह में किया गया पूजा पाठ भगवान् को अत्यंत प्रिय माना जाता है। पूरे माह ब्रह्ममुहर्त में स्नान करने का विशेष महत्व है। लोग कार्तिक महात्म्य पढ़कर अथवा भावानुसार पूजा पाठ कर प्रभु को याद करते हैं।

• कार्तिक माह के मुख्य त्योहार • —

कार्तिक माह विभिन्न त्योहारों जैसे अहोई अष्टमी, करवा चौथ, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, कार्तिक पूर्णिमा जैसे त्योहारों की माला पिरोकर हम सभी को आनंदित करता है। सभी त्योहारों को लेकर विभिन्न कथायें प्रचलित हैं। तुलसी विवाह इस माह में आकर्षण का केंद्र माना जा सकता है, जिसका अपना ही महत्व है। मंदिरों में, घरों में इस दिन सभी तुलसी, शालिग्राम जी का पूजन कर ईश्वरीय कृपा प्राप्त करने हेतु आतुर रहते हैं। इसी प्रकार कार्तिक पूर्णिमा की महिमा भी अदिवित्य होती है, जिसे देख कर हृदय को प्रसन्नता मिलती है।

• कार्तिक पूर्णिमा • —

कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत हो कर सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए, ऐसी मान्यता है कि इस दिन दीपदान आदि करने से भगवान् प्रसन्न होते हैं। लोग अपनी आस्था के अनुरूप इस दिन व्रत करते हैं और दान – पुण्य आदि करते हैं।

• कार्तिक पूर्णिमा के अन्य नाम • —

इसे देव दीपावली, त्रिपुरी पूर्णिमा, गंगा स्नान आदि नामों से भी जाना जाता है। इसी दिन गुरुपर्व भी मनाया जाता है।

• कार्तिक पूर्णिमा से सम्बंधित कथा • —

  • ऐसा कहा जाता है कि इस दिन भगवान् शंकर ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध कर धर्म को उजागर किया था, जिसके कारण उन्हें महादेव त्रिपुरारी भी कहा गया। अतः इस दिन को ‘महापुनित पर्व’ की भी संज्ञा दी गयी। और देव दीपावली मनाई गयी। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सभी देवता धरती पर आकर गंगा स्नान करते हैं। इस दिन गंगा स्नान का इतना महत्व है कि यदि किसी के लिए गंगा स्नान करना संभव नहीं है तो वे अपने घर में स्नान हेतु लिए हुए जल में गंगाजल की कुछ बूंदे डालकर स्नान करने में अपना सौभाग्य मानते हैं।
  • देव दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को पड़ने वाली दीपावली के 15 दिन बाद मनाई जाती है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस तिथि को भगवान् का मत्स्यावतार हुआ था। इसी शुभ दिन गुरुनानक जी का जन्म हुआ था, अतः इस दिन गुरुनानक देव जयंती भी पूरे उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान तथा सामर्थ्य के अनुसार ज़रूरत मंद को अन्न दान आदि करने से भगवान् की कृपा मिलने के साथ-साथ असीम शांति तथा किसी की मुस्कान का कारण बन कर निसंदेह ही हृदय को प्रसन्नता प्राप्त होती है।

♦ नंदिता शर्मा जी। – नोएडा, उत्तर प्रदेश ♦

♦ अध्यापिका – बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, नोएडा, उत्तर प्रदेश ♦

लेखिका नंदिता शर्मा जी अभी अध्यापिका के पद पर कार्यरत है — बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, नोएडा, उत्तर प्रदेश में। नंदिता शर्मा जी KMSRAJ51.COM की सीनियर लेखक टीम पैनल की सदस्य भी है। (Nandita Sharma Ji, is also a member of the Senior Writers Team Panel of KMSRAJ51.COM.)

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हम दिल से आभारी हैं नंदिता शर्मा जी के “कार्तिक पूर्णिमा।” विषय पर हिन्दी में Article साझा करने के लिए।

नंदिता शर्मा जी के लिए मेरे विचार:

♣ “नंदिता शर्मा जी” ने “कार्तिक पूर्णिमा।” विषय पर कितना सुंदर-शिक्षाप्रद व अनुकरणीय वर्णन किया हैं। कार्तिक मास अपने आप में विशेषता लिए हुए है। इसकी गणना बहुत पवित्र माह के रूप में की जाती है। इस माह में किया गया पूजा पाठ भगवान् को अत्यंत प्रिय माना जाता है। पूरे माह ब्रह्ममुहर्त में स्नान करने का विशेष महत्व है। लोग कार्तिक महात्म्य पढ़कर अथवा भावानुसार पूजा पाठ कर प्रभु को याद करते हैं।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: Essay On Kartik Purnima In Hindi, Hindi Essay on Kartik Purnima, kartik purnima in hindi, Nandita Sharma, nandita sharma articles, कार्तिक के महीने में कौन सा त्यौहार मनाया जाता है?, कार्तिक पूर्णिमा का महत्व, कार्तिक पूर्णिमा क्यों मनाया जाता है?, कार्तिक पूर्णिमा पर निबंध, कार्तिक पूर्णिमा पर हिंदी निबंध, कार्तिक मास की हिंदू धर्म में है खास महिमा - जानें जरूरी बातें, कार्तिक मास पर निबंध हिंदी में, कार्तिक माह का महत्व व्रत कथा एवम पूजा विधि, नंदिता शर्मा, नंदिता शर्मा जी की रचनाएँ

वर्तमान शिक्षा और शिक्षार्थी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Current Education and Learners | वर्तमान शिक्षा और शिक्षार्थी।

Today the aim of education has become more related to mechanization rather than national, character building and human resource development.

शिक्षा – शिक्षा वह है जिसके द्वारा मानव के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास होता है। वह पूर्ण रूपेण विनम्र और संसार के लिए स्वयं को उपयोगी बना पाता है। शिक्षा मानवीय गरिमा, स्वाभिमान और बंधुत्व में वृद्धि कर विश्वबंधुत्व में रूपांतरित होती है। वास्तव में शिक्षा का उद्देश्य सत्य की खोज करना है। एक ऐसा सत्य जो अपने आप में उदाहरण बन कर किसी भी व्यक्ति में इंसानियत और सादगी लाकर उसे आगे बढ़ने में सहायता करे। यह एक ऐसी खोज है जिसकी धूरी यदि अध्यापक को माना जाये तो गलत न होगा, क्योंकि यदि वह योग्य हुआ तो इसमें संदेह नहीं किया जा सकता कि वह आज की युवा पीढ़ी को सबल और काबिल बना सकता है। और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु एक उचित शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता सदैव बनी रहती है।

शिक्षा प्रणाली – शिक्षा प्रणाली एक ऐसी व्यवस्था का नाम है जिसके द्वारा विद्यार्थी को उचित ज्ञान प्रदान करते हुए स्वयं तथा समाज के लिए उपयोगी बनाने हेतु मार्गदर्शन किया जाता है। हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो कि विद्यार्थी या शिक्षार्थी के निरंतर खोजी मन और सृजनात्मकता या सृजनशीलता को सबल बनाने के साथ – साथ समाज में रहने हेतु विभिन्न पहलुओं पर आवश्यकता के अनुसार चुनौती प्रस्तुत कर उसका सामना करने योग्य बनाया जा सके।

आज की शिक्षा और विद्यार्थी – वास्तव में देखा जाये तो शिक्षा और विद्यार्थी को एक दूसरे का पूरक कहा जा सकता है या फिर यदि इन्हे एक ही सिक्के के दो पहलू कहा जाये तो भी गलत नहीं होगा क्योंकि एक के अभाव में दुसरा निसंदेह अधूरा ही माना जायेगा। अतः वर्तमान शिक्षा का स्वरूप कुछ इस प्रकार निर्धारित किया जाना चाहिए जो विद्यार्थी की ज्ञान प्राप्ति की तीव्र जिज्ञासा को शांत कर पाने की योग्यता अपने अंदर समाहित कर सके। इसी शिक्षा में वर्तमान विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे पाठ्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो विकसित भारत की सामजिक और प्रौद्योगिकी से सम्बंधित आवश्यकताओ के प्रति सदैव संवेदनशील बनी रहे। शिक्षा के केंद्र में गतिविधयों और कार्यकलापों को आवश्यक अथवा अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। न केवल इतना ही बल्कि विद्यार्थियों को अधिक योग्य बनाने के लिए विज्ञान और तर्क पर आधारित बातों को सम्मिलित करना भी आवश्यक होगा। ऐसे में गणित और विज्ञान का संयोग हो तो सोने पर सुहागा वाली कहावत चरितार्थ हो सकती है।

वर्त्तमान विद्यार्थी चाहे विज्ञान, प्रौद्योगिकी,राजनीति,नीतिनिर्माण,धर्मशास्त्र,न्याय आदि किसी भी विषय या क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करे परन्तु उसका मुख्य धर्म और कर्म लोगो की सेवा करना ही हो तो अपने आप में सर्वश्रेष्ठ कहलायेगा।

इसी प्रकार भारत को विज्ञान और अनुसन्धान के क्षेत्र में श्रम की गहरी ज़रूरत होती है। भारत का लक्ष्य है कि सन २०२० तक भारत एक विकसित राष्ट्र के रूप में उभरकर सामने आये। इस महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शिक्षा प्रणाली को चाहिए कि २५ वर्ष से कम उम्र के विद्यार्थियों को (लगभग ५४ करोड़ के आसपास नौजवानों )को सही मार्गदर्शन मिल सके। इन विभिन्न उद्द्श्यों की प्राप्ति के लिए ई शिक्षा का नाम सर्वोपरि आता है। इसका अर्थ मात्र सूचना प्रदान करना ही नहीं अपितु उन सभी चीज़ों और प्रक्रियाओं को अपने अंदर शामिल कर देना है जो कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के अंतर्गत आती हैं। इसका उपयोग करके व्यावसायिक शिक्षा को सुचारू रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है। ई शिक्षा को महत्व प्रदान करके विद्यार्थियों की क्षमता यहां तक कि शिक्षक की क्षमता में भी आवश्कयानुसार सुधार हो सकता है।

यदि कार्य सुचारु रूप से चलता रहे तो ई शिक्षा आवश्यक लक्ष्य को प्राप्त कर पाने में सक्षम होती है। यह शिक्षा पाठ की गुणवत्ता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। यह विद्यार्थी में सीखने और शिक्षक में सिख।ने की रुचि में वृद्धि कर ज्ञान को भी बढाती है। इसके साथ- साथ यह तकनीक के माध्यमों और उनके उपयोग पर ध्यान देते हुए मूल्यांकन तथा प्रतिक्रिया प्रस्तुत करने में कारगर साबित हो सकती है।

शिक्षार्थी के लिए शिक्षा का वर्तमान समय में औचित्य – बच्चे या विद्यार्थी किसी भी समाज या देश का भविष्य होते हैं ,इसी आधार पर इन बच्चों में कल के नेता,डॉक्टर ,इंजीनियर ,अफसर आदि की कल्पना की जाती है जो कि आगे चलकर वास्तविकता में परिवर्तित हो जाती है।

अतः शिक्षा का औचित्य शत प्रतिशत है। ऐसी अवस्था में शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को परिपक्व इंसान बनाना होता है। शिक्षा का औचित्य तब और अधिक माना जा सकता है जब उसके द्वारा कल्पनाशील और वैचारिक रूप से स्वतंत्र देश के भावी कर्णधारों का निर्माण हो सकेगा।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर एक नज़र – उपरोक्त सभी बातों के अतरिक्त बहुत सी बातें हैं जो हमारी शिक्षा प्रणाली में है अथवा होनी चाहिए परन्तु यदि परिक्षण किया जाये तो पता चलता है कि यह शिक्षा पद्यति उपरोक्त सभी उद्द्श्यों को प्राप्त करने में पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त नहीं कर सकी। इसके कारणों पर यदि गौर किया जाये तो मुख्य बात उभर कर सामने आती है कि कम पढ़े लिखे लोग यह निर्णय लेने लगते हैं कि क्या पढ़ाया जाए अथवा क्या पढ़ाना चाहिए। इसके विपरीत जो ज्ञान से भरे शिक्षविद हैं ,वो अपने दायरे और विचारधाराओं से बंधे हुए हैं जो बाहर निकलना ही नहीं चाहते,ऐसी दिशा में वे कुछ नया करने से भी डरते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा पद्यति को राजनीति से दूर रखा जाए तो अपेक्षाकृत अच्छे परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति के लिए सुझाव – शिक्षा को न केवल किताबी ज्ञान न बनाकर व्यवाहरिक शास्त्र के रूप में स्थान मिलना वर्तमान शिक्षा की आववश्यकता है। परीक्षा का प्रारूप और शिक्षा का स्वरूप कुछ इस प्रकार का होना चाहिए कि उसमे आमूल परिवर्तन की गुंजाइश शेष रह पाए। कंप्यूटर के महत्व को ध्यान में रखते हुए कंप्यूटर शिक्षा को अनिवार्य कर दिया जाना बहुत ज़रूरी हो गया है। उनके तार्किक विकास को बल देते हुए व्यावसायिक ज्ञान देना बहुत अच्छा कदम हो सकता है। शिक्षार्थी को नयी नयी खोजे करने के अवसर प्रदान किए जाये और इसके लिए उन्हें उचित मार्गदर्शन और सुविधाएं प्रदान की जाए। उनके आवश्यकता से अधिक तनाव को कम करते हुए शिक्षार्थी की मानसिक उन्नति के लिए प्रयास होने चाहिए।

पहले बच्चे से यदि बड़े होकर क्या बनने का प्रश्न किया जाता था तो वह यह कहता था कि वह बड़ा होकर डॉक्टर या इंजीनीयर बनकर लोगों के सेवा करना चाहता है जबकि आज का बच्चा अक्सर पैसे की और भागता है चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो। इस तरह की सोच को पहले वाली सोच में बदलना होगा क्योंकि इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि पैसा एक आवश्यकता है परन्तु परसेवा व्यक्ति का सबसे बड़ा गुण और धर्म है। इसलिए इस गुण और धर्म को बनाये रखा जाना चाहिए। इसके अत्रिरिक्त वर्तमान शिक्षा प्रणाली को अंगूठा छाप लोगों से दूर रखा जाए और अपरिपक्व सोच को नज़रअंदाज़ करना भी श्रेष्ठ शिक्षा पद्यति के लिए श्रेयस्कर है। शिक्षार्थी को इस प्रकार का ज्ञान देना ज़रूरी है कि उसके अंदर संस्कृति और उसके सम्मान के लिए एक निश्चित स्थान बन जाए। ग्रामीण शिक्षा के स्तर में आवश्यकता के अनुसार समय समय पर सुधार करने की नितांत आवश्यकता है। इन सबके अलावा प्रौढ़ शिक्षा को भी महत्व दिया जाए और इसके लिए स्वयं सेवी संगठनों को प्रोत्साहन एवं सहायता देकर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। और इस प्रकार की शिक्षा हम सभी को सर्श्रेष्ठ इंसान के रूप में बदलती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

शिक्षा प्रणाली की यात्रा-शिक्षा – किसी भी राष्ट्र या समाज में सामजिक नियंत्रण, व्यक्तित्व निर्माण तथा सामाजिक व आर्थिक प्रगति और विकास का मापदंड होती है। भारत में यह शिक्षा किन अवस्थाओं से होकर गुजरी है,यह एक यात्रा के सामान है। देखा जाये तो भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश प्रतिरूप पर आधारित है जिसे १८३५ में लागू किया गया था। सन १८३५ में लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा का उद्देश्य भारत में प्रशासन के लिए बिचौलियों की भूमिका निभाने तथा सरकारी कार्य के लिए भारत के विशिष्ठ लोगों को तैयार करना था। इस समय भारत की साक्षरता का प्रतिशत केवल १३ था। इस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था ने उच्च वर्गों को भारत के शेष समाज में पृथक रखने की भूमिका निभाई। यदि पिछले २०० वर्षों का आंकलन और विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि यह शिक्षा उच्च वर्ग केंद्रित, श्रम तथा बौद्धिक कार्यों से रहित थी। इसकी बुराइयों को गांधी जी ने सन १९१७ में गुजरात एजुकेशन सोसाइटी के सम्मलेन में सबके समक्ष प्रस्तुत किया तथा शिक्षा में मातृभाषा के स्थान और हिंदी के पक्ष को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय स्तर पर बहुत ही अच्छे ढंग से पेश किया।

जबकि सं १९४४ में देश में शिक्षा कानून पारित किया गया। इसके अंतर्गत भारतीय संविधान ने अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए शिक्षण संस्थाओं व विभिन्न सरकारी अनुष्ठानों आदि में आरक्षण की व्यवस्था कर दी। पिछड़ी जातियों को भी इसी प्रकार की अनेक सुविधाएं दी गयी और इस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात साक्षरता तो बढ़ी है परन्तु फिर भी आज लगभग ३५-४० प्रतिशत लोग निरक्षर ही हैं।

आज शिक्षा का लक्ष्य प्रायः राष्ट्रिय, चरित्र निर्माण, मानव संसाधन विकास काम होकर बल्कि मशीनीकरण से जुड़ा अधिक हो गया है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के नए चेहरे, निजीकरण और उदारीकरण की विचारधारा से शिक्षा को भी उत्पाद की नज़रों से देखा जाता है जिसके अंतर्गत बाज़ार में खरीदना और बेचना शामिल है। अतः शिक्षा को राष्ट्र निर्माण और चरित्र निर्माण से जोड़ने की नितांत आवश्यकता है तभी श्रेष्ठतम शिक्षा पद्यति और योग्य विद्यार्थी हमारे समक्ष होंगे।

©- नंदिता शर्मा जी। (नोएडा, उत्तर प्रदेश) ®

Nandita-Kmsraj51
नंदिता शर्मा जी।

हम दिल से आभारी हैं नंदिता शर्मा जी के “वर्तमान शिक्षा और शिक्षार्थी।” विषय पर हिन्दी में Article साझा करने के लिए।

नंदिता शर्मा जी के लिए मेरे विचार: 

♣ “नंदिता शर्मा जी” ने “वर्तमान शिक्षा और शिक्षार्थी।” विषय पर कितना सुंदर-शिक्षाप्रद व अनुकरणीय वर्णन किया हैं। जिसके हर एक शब्दों में शिक्षा के वास्तविक महत्व का सकारात्मक ऊर्जा रूपी अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। हर एक शिक्षक और शिक्षार्थी को इस विषय में गंभीरता से साेचने कि जरुरत हैं।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2017-Kmsraj51 की कलम से….., वर्तमान शिक्षा और शिक्षार्थी Tagged With: Current education and learners, Teachers - Education and Learners, The current situation of education, Today's education and students, नंदिता शर्मा, वर्तमान शिक्षा और शिक्षार्थी, वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर एक नज़र, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक-शिक्षार्थी सम्बन्ध, शिक्षक - शिक्षा और शिक्षार्थी, शिक्षा के वर्तमान परिदृश्य, शिक्षा प्रणाली की यात्रा-शिक्षा, शिक्षार्थी के लिए शिक्षा का वर्तमान समय में औचित्य, श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति के लिए सुझाव

प्यार ही सर्वोपरि है।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ प्यार ही सर्वोपरि है। ϒ

Love is paramount-kmsraj51

 

प्यार ही सर्वोपरि है – एक बार गोपाल बहुत परेशान था। उसके घर में शांति नहीं थी। सभी एक दूसरे से लड़ते झगड़ते रहते थे। एक दूसरे को  दोषी ठहराते थे और अंत में भगवान् पर भी दोषारोपण करते -“कि भगवान् तूने हमे क्यों जन्म दिया ? या फिर तुम सबकुछ देखते रहते हो और आनंद उठाते हो।”

एक दिन गोपाल ने कहा – “आज शाम को छः  बजे  सभी घर के आँगन में जमा होंगे, लड़ाई झगड़ा करते हुए तो हमने काफी समय बिताया है पर आज हम कहीं घूमने जाएंगे।”

घूमने की बात सुनकर सभी राजी हो गए। शाम के छः बजे तो सभी आँगन में इकट्ठे हो गए। सभी जानने के लिए उत्सुक थे कि आखिर घूमने कहाँ चलेंगे?

गोपाल ने कहा – “मैंने गाडी बुलाई है, उसी में बैठ कर चलेंगे।” तभी दो तीन रिक्शा आ गयी। फिर से झगड़ा शुरू हो गया। खैर समझाने पर वो सब रिक्शा में बैठ गए। लेकिन रिक्शा में बैठते ही मुंह सुकोड़ने लगे और भगवान् को ताने देना शुरू -“हे भगवान् ! कहाँ फंसा दिया? कहाँ घूमने जाएंगे ? “मंदिर घूमने आये हैं क्या हम ?

“हाँ क्यों नहीं ? अभी सभी तो भगवान् को याद  कर रहे थे। चलो इन्ही से पूछ लेते हैं—- ” – गोपाल ने कहा।

मुंह बनाकर सभी मंदिर में गए – गोपाल ने कहा “देखो – हम सब भगवान् से बहुत कुछ मांगते हैं, अपना दुःख दर्द इन्हें बताते हैं। कभी कभी गुस्से में इन्हें बहुत कुछ कह भी देते हैं पर कभी सोचा है कि ये तो भगवान् हैं परंतु वो जीव भी जो इनके संपर्क में है कितनी सादगी, प्रेम, सहनशीलता और शान्ति के साथ रहते हैं जो आवश्यक रूप से एक दूसरे के शत्रु होते हैं, यहाँ उनमें भी मित्रता है फिर तुम लोग तो भाई बहिन हो।”

बच्चों  की समझ में कुछ न आया तब गोपाल ने कहा -“शिवजी का वाहन – नंदी बैल, माता जी का वाहन – शेर, अर्थात – शेर बैल का शत्रु  होता है। शिवजी के गले का अलंकार / गहना -सांप, कार्तिकेय का वाहन – मोर, अर्थात मोर सांप का शत्रु होता है लेकिन कभी सुना है इन्हें आपस में झगड़ते हुए ?”

बच्चों ने कहा – “नहीं ये सब एक दूसरे के शत्रु नहीं बल्कि ये तो भगवान् का परिवार है।”

सीख:- गोपाल ने कहा – “ठीक कहा तुमने कि ये भगवान् का परिवार है पर हम भी तो उन्ही की संतान हैं और फिर तुम सब भी तो भाई बहन हो शत्रु नहीं। जब प्रकृति अनुरूप शत्रुता होने के बाद भी कुछ प्राणी प्रेम करना नहीं भूलते तो फिर मित्रता भाव प्रकृति होने पर हम एक दूसरे के शत्रु क्यों बन जाते हैं?”

सभी को गोपाल की बात अच्छी लगी, सभी ने मिलकर कहा – “प्यार ही सर्वोपरि है।” तभी से वो सभी लोग घर में शांतिपूर्वक और प्रेम से रहने लगे।

©- नंदिता शर्मा जी। (नोएडा, उत्तर प्रदेश)®

Nandita-Kmsraj51
नंदिता शर्मा जी।

हम दिल से आभारी हैं नंदिता शर्मा जी के “प्रेरणादायक कहानी – प्यार ही सर्वोपरि है।” हिन्दी में साझा करने के लिए।

नंदिता शर्मा जी के लिए मेरे विचार: 

♣ “नंदिता शर्मा जी” ने Love is paramount (“♥ प्यार ही सर्वोपरि है। ♥“) का कितना सुंदर-रमणीय वर्णन कहानी के माध्यम से किया हैं। जिसके हर एक शब्दों में सकारात्मक ऊर्जा रूपी अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कहानियों काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

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Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor, Founder & CEO
of,,  http://kmsraj51.com/

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

* क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

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असली दोस्ती।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ असली दोस्ती। ϒ

♦ मित्रता ♦

अभिनव और अशोक मित्र थे। उन दोनों में बहुत प्रेम था। एक बार विद्यालय में स्वनिर्मित वस्तुओं की प्रतियोगिता होनी थी जिसमें भाग लेने के लिए अभिनव ने नाम लिखवाया। इसके लिए उसने बहुत परिश्रम भी किया। अभिनव ने बहुत सुन्दर पेंटिंग बनायीं जबकि अशोक ने शौक के तौर पर कागज़ की लुगदी से घर पर एक टोकरी बनायीं।

आज अभिनव ने पूरी पेंटिंग तैयार कर ली थी। उसे ढक कर वह खुश होकर घर चला गया।

दूसरी तरफ अजय जो अभिनव से ईर्ष्या करता था, मौका पाकर उसकी पेंटिंग को बिगाड़ देता है। यह सब अशोक ने देख लिया। उसे लगा कि यदि अभिनव को पता लगेगा तो उसे दुःख होगा। अगले ही दिन प्रतियोगिता होनी थी, उसने चुपचाप अपनी टोकरी ढक कर अभिनव के नाम से प्रतियोगिता में रखवा दी।

प्रतियोगिता शुरू हुई तो अभिनव ने देखा कि उसकी पेंटिंग के स्थान पर अशोक की वस्तु है।

परिणाम घोषित हुआ तो यद्यपि अभिनव ही प्रथम स्थान पर था परन्तु कार्य अशोक का था। उसे बुरा लगा और वह अशोक पर बरस पड़ा परन्तु प्रधानाचार्य जी इस घटना को पहले ही जान चुके थे, उन्होंने अजय को इसके लिए दण्डित भी किया।

लेकिन अभी अभिनव को बताना उचित न समझा। जैसे ही अभिनव को इस बारे में पता चला, वह अशोक के पास भागा, कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि मित्रता का ऐसा भाव ही सबकुछ कह रहा था। अजय भी अपने किये पर शर्मिंदा था।

©- नंदिता शर्मा जी। (नोएडा, उत्तर प्रदेश)®

Nandita-Kmsraj51
नंदिता शर्मा जी।

हम दिल से आभारी हैं नंदिता शर्मा जी के प्रेरणादायक “हिंदी कहानी – असली दोस्ती।” हिन्दी में साझा करने के लिए।

नंदिता शर्मा जी के लिए मेरे विचार: 

♣ “नंदिता शर्मा जी” की कविताओं और कहानियों के हर एक शब्दों में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं और कहानियाँ छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं और कहानियों काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

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* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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