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सुखमंगल सिंह जी की रचनाएँ

पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युगपुरुष।

Kmsraj51 की कलम से…..

Pt. Mahamana Madan Mohan Malviya Ji a Man of the Era | पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युगपुरुष।

Madan Mohan Malaviya was an Indian scholar, educational reformer and politician notable for his role in the Indian independence movement. He was president of the Indian National Congress four times and the founder of Akhil Bharat Hindu Mahasabha.भारत विचारवान महापुरूषों की जन्म भूमि है। यहां समय-समय पर महापुरूषों की भूमिका निभाने वालों का जन्म धरती माँ की गोंद में होता रहा हैं जिससे धरती धन्य होती रही है। उन्हीं महापुरूषों में मदन मोहन मालवीय जी का नाम भी प्रमुख रूप में लिया जाता हैं उन्होंने हिन्दू संगठनों का शक्तिशाली आन्दोलन चलाया जबकि इसके लिए उन्हें सहधर्मियों की उलाहना सहन करना पड़ा उलाहना का परवाह किए बिना कलकत्ता, काशी, प्रयाग नासिक आदि प्रमुख जगहों पर उन्होंने भंगियों को उपदेश दिया और मन्त्र दीक्षा भी दिया।

मालवीय जी व्यायाम और त्याग में अद्वितीय पुरूष थे। उन दिनों जब वाइस चांसलर का० हिं० विश्वविद्यालय के थे, तो भी वे सबेरे नियमित रूप से शरीर की मालिश कराया करते थे। वह सत्य ब्रह्मचर्य और देश भक्त उत्तम गुणों वाले महा मानव थें उनके कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता था। जो वे कहते उनको जीवन में पालन भी करते थे।

वह मृदृ भाषा पुरूष थे उनमें रोष तो मानों लेशमास भी छू न सका था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पं0 मदन मोहन मालवीय जी की शताब्दी के अवसर पर दिसम्बर 25, सन 1961 को पन्दह पैसे का डाक टिकट जारी हुआ। वहीं आयरिश महिला एनीवेसेंट जो भारतीय सवतंत्रता आन्दोलन की समर्थक, सेनानी सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षाविद् कोल रूल लीग की संस्थापक सन् 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष के ऊपर अक्टूबर 01, सन् 1963 को डाक विभाग 15 पैसे का टिकट जारी किया। मालवीय जी की 150 वीं जयन्ती पर 05 रू0 का डाक टिकट दिसम्बर 27 सन् 2011 में जारी हुआ।

का० हि० वि० विद्यालय के प्रथम वाइस चांसलर पं० मालवीय जी

का० हि०वि० विद्यालय के प्रथम वाइस चांसलर पं० मालवीय जी बनाए गये। उन्होंने वि० विo के लिए शिक्षाभियान चलाया। जिसमें पं० जी सफल रहे। धर्म संस्कृति की उन्होंने रक्षा की, संस्कृति को संजोया। वह सादा जीवन उच्च विचारवान महामानव पुरूष थे। का० हि०वि० विद्यालय में मिलने देश-विदेश के लोग और मेहमान भी आते रहते थे। मेहमान नवाजी में विद्यालय पीछे नहीं हटता था।

कहा जाता है कि मालवीय जी का आदेश था कि “विश्वविद्यालय के धन का उनके (स्वयं) ऊपर एक पैसा भी व्यय न किया जायं” उनकी यात्रा आदि का खर्च कुछ धनी मित्र अपनी स्वेच्छा से श्रद्धा से करते थे। माना जाता है कि संस्कृत-संस्कृति के संवाहक मालवीय जी पुत्री के रूप में विद्यालय को माना होगा कारण पुत्री का धन खाना हिंदू धर्म शास्त्र में महा पातक कर्म माना गया है। वहीं उन दिनों वि0 वि0 के पास मोटर वाहन नहीं था जबकि रेलवे स्टेशन, बस अड्डा 8–9 किमी0 लगभग पर था। मालवीय जी प्रायः ‘इक्के’ से आते-जाते रहते थे।

एक बार लम्बी यात्रा के बाद …

एक बार लम्बी यात्रा के बाद इक्के की सवारी से आते लत-पथ हालत में देखकर कुंअर सुरेश सिंह एवं सुदरम् जो कि विद्यालय के ही छात्र थे ने वयोबृद्ध तपस्वी वाइसचांसलर की सेवा और वि० विद्यालय के लिए उनके समर्पण भाव को देखकर ‘व्यूक’ गाड़ी भेंट करने की जिज्ञासा संजोकर संकल्प कर होस्टलों में जाकर विद्यार्थियों से चंदा मांगा। मध्यम एवं निम्न मध्यम वर्गी छात्रों द्वारा चंदा सायं काल तक मात्र दो हजार रूपया ही मिल सका।

दोनों संकल्पित छात्र भूखे प्यासे हताशा की हालत में अंत में दानबीर बाबू शिव प्रसाद गुप्त जी के शरण में पहुंचे। उन्होंने इस सर्त पर किसी से मेरे रूपये देने की बात नहीं कहोगे! और वे शेष गाड़ी ‘व्यूक’ खरीदने के लिए पाँच हजार का चेक काट कर दे दिया। उन दिनों व्यूक सात हजार में मिलती थी। दोनों छात्र खुशी – ख़ुशी छात्रावास चले गये। उधर मालवीय जी दोनों विद्यार्थियों को पास आने का बुलावा छात्रावास भेजते रहे, उधर छात्र चंदा इकट्ठा करने में लगे रहे। उन तक सूचना नहीं पहुच सकी।

सायंकाल छात्र सुन्दरम् हास्टल पहुचा तो वह मालवीय जी से जा मिला। जो बातें हुई मोबाइल उन दिनों न होने से कु० सुरेश सिंह से नहीं बता सका। उधर कु० सुरेश सिंह सुबह वाइसचांसलर जी से मिलने पहुँचे। मालवीय जी नित्य की तरह नितकर्मानुसार मालिस करवा रहे थें कुवर सुरेश सिंह को देख कर मालवीय जी बोल- ‘कल-तुम दिन भर मेरे लिए एक मोटर खरीदने को चंदा इकट्ठा करते रहे । विश्वविद्यालय में सारे देश से गरीब लोगों के लड़के पढ़ने आते हैं । वे जब लौट कर अपने-अपने गाँव में जायेंगे और कहेंगे कि वहां तो मेरे सुख सुविधा के लिए उन गरीब विद्यार्थियों से पैसा वसूल किया जाता है। तब देशवासी मेरे बारे में क्या सोचेंगे?

कलंक नहीं लगा रहे …

और आगे सुरेश सिंह से कहा- “तुम तो ताल्लुकेदार के लड़के हो! ताल्लुके दारों को जब मोटर खरीदनी होती है तो वे अपनी रैयत से मोहरवारन वसूल करते हैं। प्रजा इससे कितनी त्रस्त होती होगी। और देश में इस प्रथा से उनकी कितनी भर्त्सना होती है? क्या तुम मेरे लिए भी ‘मोहरवारन’ की प्रथा यहाँ चलाकर मेरे नाम पर भी कलंक नहीं लगा रहे मेरे लिए अपयश से बढ़कर कौन सा दण्ड है? तुमने यह सब क्यों किया?”

हिंदी – अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ का सम्पादन

मालवीय जी ने हिंदी अंग्रेजी दैनिक’ हिन्दुस्तान’ का सम्पादन सन् 1887 में शुरू किया, उन्होंने देश भक्त राजा रामपाल सिंह जी के अनुरोध को आत्मसात कर लगभग तीस माह तक जनता को हिन्दुस्तान के माध्यम से जगाया। महामोपाध्याय पं० आदित्य राम भट्टाचार्य के साथ जो म्यामार कालेज (वर्तमान इलाहाबाद वि०वि०) के मनस्वी गुरू थे, के द्वारा 1880 ई0 में स्थापित ‘हिंदू समाज’ में मालवीय जी भाग ले रहे थे। मदन जी पं० अयाध्यानाथ जो कि कांग्रेस नेता थे उनके भी इंडियन ओपीनियन के सम्पादन में भी कार्य किया। और उन्होंने दैनिक लीडर को निकाल कर महान कार्य किया। वह लीडर सरकार समर्थक ‘पायोनियर’ के समकक्ष का था। जो सन् 1909 ई0 में सम्पादित हो रहा था। हिन्दुस्तान टाइम्स को सन् 1924 ई0 में सुव्यवस्थित किया और लाहौर से ‘विश्वबंध’ काशी से ‘सनातन धर्म’ के प्रचारार्थ प्रकाशित कराया। मालवीय जी खुद एक अच्छे सम्पादक थे।

मैं अन्न-जल न ग्रहण करूंगा

उधर वि० विद्यालय के छात्र सुरेश सिंह मालवीय जी के चंदे को लेकर हुई बात सुनकर हतप्रध हो बोले- “महाराज, लम्बी यात्रा से थके थकाये इक्के पर स्टेशन से आपको इस वृद्धावस्था में आते देख हमें दुःख हुआ। हमने सोचा वि०वि० के वाइस चांसलर के पास भी गाड़ी होनी चाहिए।” सो हमने ऐसा निर्णय किया। सादगी पूर्ण जीवन यापन करने वाले महात्मा जी ने यह सुनकर कहा- “कल तुमने चंदा पूरा होने तक उपवास रखा था अब तुम जाकर जिस-जिस से जितना पैसा लाये हो उसे लौटा दो और जब तक तुम आकर मुझे सूचित नहीं करते हो मैं अन्न-जल न ग्रहण करूंगा।

“यह सुनकर गुरू आज्ञा को शिरोधार्य कर दोनों विद्यालय के छात्र लोगों का पैसा लौटाने में लग गये। और जब पैसा लौटा कर दोनों छात्र मालवीय जी से फिर मिले तो कुंअर सुरेश सिंह व सुन्दरम् को वाइसचांसलर जी ने शाबाशी दी तथा अपना किया गया व्रत तोड़ा। लोगों द्वारा प्रायः नरमदल का कार्य कांग्रेस में छोड़ते रहने के वावजूद म० मो० मालवीय जी उसमे डटकर कार्य करते रहे। अतएव कांग्रेस ने उन्हें चार बार सभापति निर्वाचित किया। क्रम से सन् 1909 में लाहौर सन् 1918, 1931 ई0 में दिल्ली एवं सन् 1933 में कलकत्ता में उन्हें सम्मान मिला। दो बार वे सत्याग्रह के कारण गिरफ्तार भी हुए। मालवीय जी आज हमारे बीच न रह कर भी हमेशा-हमेशा अमर रहेंगे उनकी बीरगाथा, देश प्रेम, साहस, शौर्य, धर्मप्रचार एवं बलिदान का संदेश देश को नई ऊर्जा प्रदान करने में सहायक सिद्ध होगी।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — मदन मोहन मालवीय शिक्षा को मानव मात्र का अधिकार मानते थे तथा इसका समुचित प्रबन्ध करना राज्य का कर्त्तव्य मानते थे। वे शिक्षा की एक ऐसी राष्ट्रीय प्रणाली विकसित होते देखना चाहते थे जिसमें प्रारम्भिक और माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा निःशुल्क हो। अध्यापकों एवं छात्रों के कर्तव्य, व्यायाम करके शरीर को बलशाली बनायें। पहले स्वास्थ्य सुधारें फिर विद्या पढ़ें। शाम को खेलें, मैदान में विचरें। पंडित मदन मोहन मालवीय ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर 35 साल तक कांग्रेस की सेवा की। उन्हें सन्‌ 1909, 1918, 1930 और 1932 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। मालवीयजी एक प्रख्यात वकील भी थे। एक वकील के रूप में उनकी सबसे बड़ी सफलता चौरीचौरा कांड के अभियुक्तों को फांसी से बचा लेने की थी। मदन मोहन मालवीय एक भारतीय विद्वान, शिक्षा सुधारक और राजनीतिज्ञ थे जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए उल्लेखनीय थे। वह चार बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष और अखिल भारत हिंदू महासभा के संस्थापक थे।

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यह लेख (पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युगपुरुष।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

Kmsraj51 की कलम से…..

Coordinating Nature Of Kashi | काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।

काशी विश्व की प्राचीन नगरी है। बुद्ध की उपदेश स्थली, जैन तीर्थंकर महावीर की धर्म देशना स्थली तथा सुपार्श्वनाथ और जैन पार्श्वनाथ तीर्थंकरो की जन्मस्थली होने के साथ ही काशी रामानन्द, आदि शंकराचार्य, कबीर, रैदास, तुलसीदास विवेकानन्द जैसे महान धर्माचार्यों एवं चिंतकों की कर्म भूमि भी रही है।

विभिन्न पुराणों से विदित होता है कि काशी पहले विष्णुतीर्थ था जो बाद में शिवतीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह प्रधानतः शिव की नगरी रही है। यहाँ के 17वीं से 20वीं शताब्दी ई० के लगभग सभी मंदिर भोलेनाथ शिव को समर्पित हैं। इन मंदिरों में गर्भगृह में शिवलिंग और चारो ओर की भित्तियों पर शक्ति, विष्णु, सूर्य एवं गणेश मूर्तियाँ हैं जो समन्वयात्मक धार्मिक आस्था की साक्षात साक्षी है। इतना ही नहीं काशी में लोक धर्म से सम्बन्धित पक्ष, नाग, वृक्षपूजन की परम्परा रही है। इसे न केवल शिव वरन् काशी में जन्में सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ के मस्तकों पर दिखाये जाने वाले सर्वफलों के रूप में भी देखे जा सकते हैं।

17वीं से 19वीं शताब्दी ई0 के बीच काशी की धार्मिक एवं सांस्कृति समन्वय की भंगिकी आदि केशव से अस्सी तक फैले हुए घाटों की अनवरत श्रृंखला में देखी जा सकती है। घाटों के मंदिरों, मठों और अन्य अवशेषों में पूरे भारतवर्ष का धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप मूर्तिमान हो उठा है।

यदि कहा जाय कि काशी में सम्पूर्ण विश्व सूक्ष्म रूप से विद्यमान है तो अतिश्योक्ति नहीं। मान्यता के अनुसार देश की सभी नदिया, पवित्र स्थल और देवता काशी में निवास करते हैं। मत्स्यपुराण में काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। इसे महाश्मसान, आनन्दकानन और मोक्षदा अर्थात् मोक्ष देने वाली सप्तपुरियों में एक माना गया है। काशी का महात्म्य कुछ ज्यादा ही है तभी तो जब कभी ग्रहण लगता है तो काशी में बहुत भीड़ उमड़ पड़ती है। यद्यपि सूर्यग्रहण में सबसे बड़ा मेला कुरुक्षेत्र का होता है पर चन्द्रग्रहण में काशी में ही यात्रीगण देश के विभिन्न भागों से आने हैं। भविष्यपुराण में लिखा है :

कुरुक्षेत्रसमा गंगा यत्र कुत्रावगाहिता।
कुरुक्षेत्राहशगुणा यत्र विन्धेन संगता॥

काशी प्रधान तीर्थं स्थान है। यह शुद्ध रूप से तपोभूमि है। देवदर्शनल, मंदिरों की रचना और यहाँ के घाटों की छटा ही मुख्य दर्शनीय हैं। यहाँ गंगास्नान की महिमा अवर्णनीय मानी गई है। सर्वत्र गंगा स्नान पूण्यजनक है। वाराणसी (काशी) में गंगा स्नान बारहो मास नेमी लोग करते हैं। काशी की उत्तरवाहिनी गंगा की महिमा काशी यात्रा में सप्तभाग उल्लिखित है। पंचगंगा और परिसर के घाटों, मर्णिकर्णिका घाट एवं दशाश्वमेघ घाट पर प्रातः 3 बजे से ही स्नानार्थी आने लगते हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी में मरने का कोई डर नहीं होता क्योंकि यहाँ तो सभी मृत्यु को अपने पाहुन (अतिथि) की तरह जोहते ही रहते हैं।

यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है।

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह सत्य है कि काशी वास करने में जो सुख यहाँ पर होता है वह समस्त ब्रह्मांड मंडप में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। काशी में धर्म अपने चारो पैरों पर खड़ा है। अर्थ भी काशी में अनेक प्रकार से वर्तमान है। यही कारण है कि पाप-विनाशिनी देवगणों को भी दुर्लभ सतत गंगा-संगता, संसार पाशच्छेदिनी शिव-पार्वती से अविमुक्त, त्रिभुवन से अतीत मोक्षजननी काशी पुरी को मुक्त पुरुषगण कभी परित्याग नहीं करते। तभी तो जगत प्रसिद्ध जाबालि ऋषि ने कहा है। हे आरुणे ! असी नदी इड़ा नाड़ी और वरुणा नदी पिंगलानाड़ी कही गई है इन्हीं दोनों के मध्य में वह अविमुक्त क्षेत्र काशी है। यही काशी सुषुम्ना नाड़ी है। इन्हीं तीनों नदियों की यह वाराणसी है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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यह लेख (काशी का समन्वयात्मक स्वरूप।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

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Satya Sanjivani Kashi of Truths | सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।

काशी, गंगा और महादेव संपूर्ण भू भाग पर यदि कहीं अवस्थित हैं तो वह मात्र काशी पुण्य परिक्षेत्र में ही, अन्यत्र अविज्ञात है। काशीपुरी में धर्म-अधर्म अक्षुण्ण होता है। यह आनंदकानन अविमुक्त महाक्षेत्र है। काशी का माहात्म्य वैदिक एवं स्मार्त है। अतएव काशी में —

अब पुनि पुनि कलम उठायेंगे।
काशी ! रहि रहि गुन गायेंगे॥
लाख लताड़त शिव आयेंगे।
काशी करवटऽ सुनायेंगे॥

  • हिमालय पुत्री मां गंगा काशी में उत्तराभिमुख अविरल बहती है, जिसे ‘मुदिता’ कहा गया है। गंगा पितृ मुख होने से मुदित रहती है और शिव (पति) का सान्निध्य पाकर आह्लादित होती है शायद यही कारण है कि शिव ब्रह्म को काशी बड़ी प्रिय लगती है। शास्त्रों में वर्णन है कि नारायण की आराधना से प्रसन्न होकर परम शिव द्रवीभूत हो गये। वह ब्रह्माद्रव्य युक्तिकाशी भू पर स्थित होकर भी भू से पृथक है। जहाँ शंकरपूजन और शिव के मधुर गान से शिव ब्रह्म प्रसन्न होकर इच्छित वर प्रदान करते हैं, वहीं शैलपुत्री देवी सौभाग्य सुख प्रदान करती हैं।
  • काशी में भक्तों की मनोरथदात्री भवानी ही स्थिर वास करने देती है और भवानी ही काशीवासियों का सदा योगक्षेम करती हैं। भिक्षुक को काशी में मोक्षा काशी भिक्षा प्रदान करने वाली विश्वेश्वर की कुटुम्बिनी काशीवासियों को मोक्ष की भिक्षा प्रदान करती हैं, ओंकार का उच्चारण कराती है। ऊं शांतिः शान्तिः शान्तिः हृदयस्थ कराती है। अतएव इनकी सेवा करनी चाहिए, सेवा से प्रभु मुदित होते हैं। काशीवासियों को यदि कभी कुछ भी दुर्लभ हो तो पूजा पाठ करने से ही भवानी उसे सुलभ करा देती हैं। मानव को चैत्र की अष्टमी में रात्रिजागरण, गंगा स्नान और भव पूजन वांछित फल प्रदान करता है।

काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

जल, जीवन का प्रमुख रसायन तत्व है। काशी में गंगाजल का स्पर्श होते ही महापातुकावली का तुरंत क्षय हो जाता है। यही नहीं यहां वास करने वाले को पद-पद पर, धर्म की ढेर, मिलती है जिसे करोड़ों यत्न करने से भी वैसी धनराशि एकत्र नहीं की जा सकती, सो काशी की गलियों में घूमने (भ्रमण) से पद पर आपसे आप प्राप्त हो जाती है। धर्मपरायण मनुष्य! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पाने की अभिलाषा जनित त्रैलोक्य पावनी अविमुक्त क्षेत्र काशीपुरी की पदयात्रा करें। भारतीय धार्मिक संप्रदाय चाहे वैदिक हो या स्मार्त उन सबों का आदर विद्वानों महापुरुषों ने किया है।

वृहस्पति देव ने “काशी को मुक्तिपुरी कहा है। इन्द्र से तो यहां तक कह दिया कि काशी सदृश तुम्हारी देवपुरी भी नहीं है। वहीं जाकर मुक्ति हेतु तुम भी विश्वाराध्य विश्वेश्वर की आराधना करो। ऐसे में भला मुक्तिपुरी का दर्शन-वर्णन मेरे जैसे अल्पज्ञ क्यों नहीं करेगा।” यथा—

गंगा में खूब नहायेंगे,
भव भावन गीत सुनायेंगे।
भर भाँग धतूरा खायेंगे,
मेवा संग मिश्री मिलायेंगे।

और आगे का दृश्य-

भाँग धतूरा पीवत साथी,
पथिक पहलुआ पंडित पापी।
अबे तबे अरु चोखा – बाटी,
डंड बैठकी खुला सपाटी।

सौम्य तप जप को समय सीमा में न बांधकर बुद्धिमानजन काशी स्त्रोत की महिमा का वर्णन करता है। गाता-गुनगुनाता है। उसे हृदयस्थ करता है। स्तोता ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ‘काशी’ मंत्र के जप – तप की युक्ति करता है। जप – तप की सामर्थ्य जिस महापुरुष में है, वह मुनि रूप पृथ्वी पर क्रोधी भी हो सकता है अन्यथा असमर्थ पुरुष, प्राणी क्षीणवृत्ति की तरह क्या कर सकता है। जो उद्गीथ है यानी गाने योग्य है वही प्रणव या ऊँकार है। ॐ की उपासना से ही देवता अमृत प्राप्त किये और मृत्यु को जीतकर अमरत्व पाए।

इतना याद रखें — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है।

काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है।

ज्ञान का महान प्रताप कोई विरल ही जानता है। जब आत्मा स्व स्वरूप में स्थित होती है तब उच्चारण करने वाला अन्य कोई नहीं होता अर्थात् वक्ता श्रोता का द्वैत मिट जाता है। मनुष्य में ईश्वरीय प्रेरणा से अचानक ब्रह्म चैतन्य का स्फुरण होता है और वह जिज्ञासु की नई स्थिति में आ जाता है। परंतु संसारी जीव में जिज्ञासा का उदय भी परमात्मा की कृपा से होता है। जब तक मनुष्य में माया से विरक्ति, ईश्वर से अनुरक्ति और सद्गुरु की कृपा नहीं होती, जीव में जिज्ञासा का उदय नहीं होता, गूढ़तत्व चैतन्य शक्ति का उदय नहीं होता। परम सत्य की उपलब्धि के बिना अज्ञान का नशा बार – बार मनुष्य पर छा जाता है।

जो मनुष्य इंद्रियों से विषय वासनाओं का त्याग करके तिमिराच्छन्न रजनी में जागृत अवस्था को प्राप्त कर लेता है काशी में भगवान भोले उसे तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं। तारकेश्वर मंदिर कोलकाता में है। काशी में विश्वनाथ मंदिर के पास स्थापित है। काशी में वर्तमान तारकेश्वर महादेव का जीर्णोद्धार हो रहा है। जिस प्रकार योग में प्रवेश पाने के लिए सद्गुरु कृपा प्रसाद ही सहायक होता है, कर्म से क्षत्रिय विप्र हो जाता है और गीता का सार त्याग है, ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है, उसी प्रकार काशी-काशी जपते-जपते रहने से प्रत्यक्ष मोक्ष है। काशी में मुक्तिमण्डप में मात्र बैठकर भव स्मरण यथा शक्ति धनदान एवं पवित्र कथाओं का श्रवण करने से करोड़ों गोदान का पुण्य प्राप्त होता है।

यहाँ मुनियों ने असंख्य शिवलिंग अनादिकाल से स्थापित किये हैं। जहां पर एक भी शिवलिंग की स्थापना करने से अखिल ब्रह्मांड की प्रतिष्ठा करने का फल प्राप्त होता है, भला उस पुण्य क्षेत्र काशी को कौन मानव जीव छोड़ सकता है। जबकि शास्त्र में कहा गया है काशी की प्राप्ति में पग-पग पर विघ्न आ पड़ते हैं। काशी में वास उन्हीं को मिलता है जो कठोर तपस्या बड़े से बड़े व्रत एवं महादानों के करने वाले होते हैं। काशी गुरु श्रेष्ठ है।

धर्मेश्वर ने मंदराचल पर जगदम्बा से कहा था — काशी की निर्वाण की भूमि है। लोमेश और व्यास जी का भी यही मत रहा। याज्ञवल्क्य मुनिराज ने तो कहा कि — काशी में मरण से परम पद प्राप्त होता है। त्रयमयी काशी समस्त विधाओं की आश्रयस्थली है, महालक्ष्मी की परालय एवं मुक्ति क्षेत्र है। ब्रह्माजी ने कहा — काशी में मरने वालों को मुक्ति मिलती है, यही कारण है कि यहाँ विविध धर्मशाला परिसर मुक्ति क्षेत्र में ठहरने हेतु आज कलिकाल में भी उपलब्ध है काशी ? काशन प्रकाशन करने वाली आत्मज्ञानवती बुद्धि का नाम काशी है।

आठवीं सदी में शंकराचार्य जी को भी बनारस (काशी) आकर अपने मत की विद्वानों द्वारा पुष्टि करानी पड़ी और संभवतः ब्रह्मसूत्र की रचना बनारस में गंगातट पर ही की थी। भागवत में – नदियों में गंगाजी, देवताओं में विष्णु भगवान, वैष्णवों में शंकरजी सर्वश्रेष्ठ है, पुराणों में- श्रीमद्भागवत, ऋषियों में शौनकादि उसी प्रकार श्रेष्ठ हैं जैसे- तीर्थों में काशी सर्वश्रेष्ठ है। इस लोक में बुद्धिमान सज्जनों की ही वह बुद्धि सब कुछ निश्चय करती है जिस नगरी में पुण्यजला स्वयं स्वर्गतरंगिणी गंगा बह रही हैं। वे ही चरण इस भू लोक पर विचरण करना जानते हैं यानी धन्य हैं जिन पुण्य प्राणियों के चरण विश्वनाथ जी के नगर ‘काशी’ में भूमि पर विचरण करते हैं। यद्यपि माघ – मास में सभी तीर्थ, तीर्थराज प्रयाग चले जाते हैं परन्तु अविमुक्त क्षेत्र के तीर्थ काशी में ही रहते हैं। लेखक की कलम से —

कैसा चरित रच्यों मेरो भाई।
बूझत अनबुझ मन जन खिसियाई॥
हलाहल गंगाजल अमरित साँईं।
अगणित कला को मंगल री गाई॥

पुण्य क्षेत्र में संन्यास लेकर रहने, भ्रमण करने वालों की जीवमुक्त और रुद्र स्वरूप मानना चाहिए। इस पुण्य अक्षुण्ण क्षेत्र में यदि प्राण संकट में पड़ा हो तो भी असत्य (मिथ्या) भाषण नहीं करना चाहिए। हां, किसी जीव के प्राण रक्षार्थ झूठ मजबूरी में बोला जा सकता है। काशी शिव को अति प्रिय है। शिव जी के मुख से- मैं ममता रहित हूँ। योगिनियाँ ब्रह्मा और रुद्रगण इसी कारण यहां बसे, काशी के ही हो गये। वे सब वाराणसी के प्रति शिव का प्रेम जानते थे।

जहां जय द्वारा ज्ञानी बटुक ब्रह्मवाद का निनाद करते हों, गुरुचरण विश्वनाथ साक्षात् विराजमान वर्तमानरूप से हों, महर्षि व्यास सदृश पुण्यात्मा वास करते हों, वैद्यराज, दान, ध्यान, तप, ज्ञान कलिकाल में भी हों साथ ही सर्वधर्म की मर्यादा मर्यादित पूर्वक अधिधार्मिक लोगों द्वारा पालन किया जा रहा हो उस मुक्तिदायिनी धर्मपरायण, विराटरूपा काशी को सत् सत् नमन, धरती पर कौन नहीं करेगा।

मुक्ति जन्म महि जानि, ज्ञान खानि, अध हानिकरि।
जहँ बसिं शंभु भवानि, सो काशी, सेइय कस न॥

हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — अधम का भोग भोगने के उपरांत ही धर्म का फल प्राणी प्राप्त (भोगता) करता है। पुण्यशाली लोग इस लौकिक जगत में सदैव एकरूपता को नहीं छोड़ते यानी हर्ष और विषाद दोनों ही निष्फल है। आनंद कानन अविमुक्त महाक्षेत्र में सद्विचारयुक्त धर्म परायण धर्म, कर्म पालक और ध्यान ज्ञान युक्त तपी जपी मनुष्य तत्व अन्वेषण करता है और वेदशास्त्रों के स्वाध्याय, उसके अभ्यास से चित्त शुद्धि इंद्रियों पर विजय दम, दान और दया से परिपूर्ण घोर तपस्या की मदद से ही परमविज्ञ वर पा जाता है। काशी में क्रोध से बचना चाहिए। काशी क्षेत्र ही क्या कहीं भी कभी भी क्रोधयुक्त होने से बड़े-बड़े कष्ट संचय, संचित तपस्या का वैसे ही क्षय हो जाता है – जैसे मानो बादल के आच्छादन से चंद्रमा और सूर्य का तेजपुंज प्रकाश प्रायः विलुप्त हो जाता है। मुनि, ज्ञानी अपने विवेकरूपी बांध से क्रोधरूपी नदी के वेग को स्वेच्छानुसार स्वयं प्रवाहित करता रहता है। काशी सनातन सत्य एवं समस्त सत्यों की भी सत्य है, सनातन चिंतन धारा में – काशी को तीनों लोकों से परे न्यारी काशी कहा गया है। संसार-सागर में जो मनुष्य सदैव कलिकाल में भी डूबे पड़े हों और निरंतर आवागमन के कारण खेदित हो रहे हों, जिनके कण्ठ कर्मपाश में जकड़े हों, उन जीवों की मुक्ति का भी एक मात्र साधन काशी धाम ही है। काशी ममता ‘माँ’ है यद्यपि माता महान है। गर्भ में जन्मधारण करने की निमित्त बनकर गर्भ धारण का दुःख उठाती है। जो दुःख मात्र कुछ दिन का होता है जबकि काशी सदा सर्वदा के लिये गर्भ दुख से छुड़ा देती है। यह आवागमन की मुक्तिदात्री है।

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यह लेख (सत्यों की सत्य संजीवनी काशी।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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भक्तिकालीन साहित्य – कवि आंदोलन।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भक्तिकालीन साहित्य – कवि आंदोलन। ♦

भक्त कवियों ने राम के नाम को आराम से बढ़कर माना है। इस संबंध में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि —

राम सो बड़ों है कौन,
मोसों कौन छोटा?
राम सो खरो है कौन,
मोसों कौन खोटो?
तुलसीदास ने मानस में,
गुरु वंदना करते हुए कहा है कि-
‘बंदउ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नर रूप हरि ‘!

तुलसीदास जी को सगुण भक्ति काव्य धारा में इसीलिए शामिल किया गया कि वह सगुण उपासकों में से प्रतिष्ठित कवि हैं। सगुण विचारधारा का कवि ईश्वर को सगुण यानी सभी गुणों से युक्त परम उससे भी परे साकार यानी कि वह ईश्वर जगत में रूप धारण करके अवतरित होता है।

तुलसीदास जी ने ईश्वर के प्रति उत्कृष्ट प्रेम की भावना से ओतप्रोत उनका साहित्य मिलता है। यथा …

एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।
एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास॥

कबीर दास जी ने अपने भक्ति साहित्य में भाव व्यक्त करते हुए कहा है कि —

आंखडिया झांई पड़ी, पंथ निहारि – निहारि।
जीभड़ियां छाला पड़यो, राम पुकारि – पुकारि॥

भक्तों की पहचान ईश्वर के प्रति प्रेम से होता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भक्ति आंदोलन पर विचार करते हुए सामान्य विशेषताओं का उल्लेख किया है…

  • भक्ति के बिना शास्त्र ज्ञान और पांडित्य को व्यर्थ कहा।
  • प्रेम ही परम पुरुषार्थ और मोक्ष है उन्होंने बताया।
  • द्विवेदी जी ने भक्तों को भगवान से बड़ा माना।
  • भगवान के प्रति प्रेम प्रतिज्ञा से बड़ी चीज कहा।
  • ईश्वर का नाम रूप से बढ़कर है।
  • भक्ति का अर्थ होता है सेवा करना।

भक्ति की उत्पत्ति भाग्य धातु से हुई माना जाता है। भक्ति का तात्पर्य ईश्वर के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति से ही है। जिसमें भगवान का भजन, प्रीति, अर्पण – समर्पण उसमें शामिल है।

भक्ति काल पर विचार करने पर ज्ञात होता है कि भक्त कवियों का काव्य भक्ति भावना से पूर्ण रूप से प्रेरित है। भक्ति के स्वरूप का विस्तृत चर्चा पुराण ग्रंथों में भी की गई है। भक्ति के सूत्र और मंत्र वेदों में भी मिलते हैं। विद्वान मानते हैं कि भक्ति का उद्गम वेदों से ही हुआ है। उपनिषदों में भी भक्ति के तत्व को पाया जाता है।

भागवत गीता में इसका विशेष विकास और विस्तार मिलता है। महाकाव्य महाभारत में तो कहा गया है कि —

‘भागवत गीता में ईश्वर के प्रति गहरी निष्ठा को जीवन का लक्ष्य बताया गया है’!
गीता कहती है कि ईश्वर को जिस रूप में भजते हो ईश्वर उसी रूप में प्राप्त होता है।

ईश्वर के प्रति भक्त की गहरी निष्ठा और उसकी भावना का प्रतिफल भक्ति का साहित्य है। भारत में भक्ति वह केंद्रीय तत्व है जो काव्य में अंतः धारा की भांति सर्वत्र प्रभाव प्रवाहित होता रहता है। ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सुगम साधन यदि कुछ है तो वह है भक्ति भाव जो उत्तम मार्ग है।

भक्ति के अनेक मार्ग में…

  • स्मरण, ईश्वर के नाम रूप का।
  • कीर्तन, ईश्वर के नाम रूप और गुण का।
  • वंदना, ईश्वर के नाम रूप का।
  • श्रवण, ईश्वर के रूप में और लीला का।
  • पाद सेवन, ईश्वर के चरणों की सेवा का।
  • दास्य, ईश्वर को स्वामी मानकर सेवा अर्चना करना।
  • सख्य, ईश्वर को सखा मित्र और बंधु मानना।
  • आत्म निवेदन, ईश्वर के चरणों में सर्वस्व अर्पित करना।
  • अर्चना, ईश्वर की पूजा करते रहना।

ईश्वर प्राप्ति के अनेकों साधन बताए गए हैं जैसे—

  • कठोर तप और साधना।
  • ईश्वर के प्रति उत्कृष्ट आत्मीय प्रेम।
  • ईश्वर संबंधी तत्व चिंतन।
  • विधिक निषेध का पालन।
  • जीवन में योग, योग में ईश्वर का ध्यान।
  • प्राणायाम में ईश्वर की साधना।

आचार्य शुक्ल ने श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति कहा है। उन्होंने प्रेम के साथ श्रद्धा का संयोजन किया है। कहा है कि ईश्वर के प्रति की गई श्रद्धा अभिव्यक्ति है। श्रद्धा करने वाला व्यक्ति ईश्वर को पालन कर मार्गदर्शक और उद्धारक समझता है।

मनुष्य के जीवन में दिव्यता प्राप्त करने के लिए ईश्वर भक्ति की आवश्यकता इस संसार सागर में है।

भक्ति आंदोलन के कवि कृष्ण प्रेमी भक्त सूरदास ने अपने भक्ति साहित्य में सगुण भक्ति मार्ग को चुना। उन्होंने अपने काव्य में जीवन जीने की नई चाह पैदा की। लोक – चित्त से निराशा को उखाड़ फेंकने का कार्य अपने भारतीय भक्ति साहित्य से की। उन्होंने भक्ति मार्ग से विशाल सरस और सरल साहित्य प्रस्तुत किया।

सूरदास जी ने भगवान के भाषण के जीवन का वर्णन प्रिय विजन मानकर उत्कृष्ट तरीके से प्रस्तुत किया। उन्होंने निर्गुण को तिनका परंतु सगुण को सुमेरू की प्रधानता दी। यथा —

सुनि है कथा कौन निर्गुण की,
रचि – रचि बात बनावट।
सगुण सुमेरू प्रकट देखियत,
तुम तृण की ओर दुरावत॥

लीला कीर्तन में सूरदास जी ने लिखा —

जो यह लीला सुने सुनावै,
सो हरि भक्ति पाय सुख पावे।

श्रवण, कीर्तन और स्मरण में उनका मत है कि —

को को न तरयो हरिनाम लिये।

वंदन, अर्चन और पाद सेवन में अपना मत व्यक्त किया है —

जो सुख हो तो गोपालहिं गाएं,
वह सुख बैकुंठ में भी नहीं।
यह धरती बैकुंठ से भी श्रेष्ठ है।
यथा –
‘चरण कमल बंदों हरि राइ।’

इसी धरा पर हरिया अवतार धारण करके लीला करते हैं। इसी दृष्टि से यह धरा श्रेष्ठ हैं। भगवान के प्रेम में रूप लीला का वर्णन गीतिकाव्य में सूरदास ने हृदय से गाई है।

सूरदास का मन मुरली की मोहनी ता, जमुना ब्रज- कुंज, आनंद बधाई बाल क्रीड़ा प्रेम के रंग रहस्य और वियोग के भाव दशा में रमता है। वे अपने हृदय तल से संगीत को रचते हैं। भक्ति साहित्य काव्य में विविध रूप ढंग से सूर अपनी बात को कहते हैं। मुक्तक परंपरा का प्रतिपादन कला की कलात्मकता के लिए करते हैं।

तुलसीदास जी राम काव्य परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। राम काव्य परंपरा में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान पर माना जाता है। भक्ति आंदोलन की क्रांतिकारी भूमिका का निर्वहन गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया।

तुलसी ने भक्ति की निर्गुण – सगुण परंपरा को वैचारिक स्तर पर एकता के सूत्र में बांधने का पूरा प्रयास किया। भावनात्मक रूप से जनता को एक करने का प्रयास किया। रामानंद ने लोक भाषाओं में काव्य रचने की प्रेरणा देकर हिंदी भक्ति काल को दिशा – दृष्टि देने का कार्य किया।

वेदों उपनिषदों से भक्ति की धारा जो उमड़ी, वह तीसरी से 9वीं शताब्दी तक भक्ति आंदोलन को तमिल से तीव्रता मिली। भक्ति आंदोलन तमिल ने तीव्र हुआ। संपूर्ण देश की कवियों में कश्मीर में लल देद, तमिल में आंडाल, बंगाल में चंडीदास, चैतन्य, पंजाब में नानक, गुजरात में नरसी मेहता आदि ने भक्त कवियों को पैदा किया। इन कवियों ने सांस्कृतिक – सामाजिक एकता के सूत्र पैदा किए।

निर्गुण भक्ति आंदोलन को उत्तर भारत में शोषित जनता का भरपूर सहयोग मिला। जिसमें कबीर, दादू रज्जब, पीपा, रैदास और सूरदास की कहानियों का संदेश जनता के लिए सुधारवादी और क्रांतिकारी सिद्ध हुआ।

सगुण भक्ति का मत निम्न वर्ग के साथ ही उच्च वर्ग को भी प्रभावित किया। इस विचारधारा का रामानुजाचार्य, रामानंद, वल्लभाचार्य से लेकर मध्या आचार्य तक का चिंतन और समर्थन प्राप्त हुआ।

इसी प्रभाव चिंतन में उत्तरी भारत में कृष्ण भक्ति और राम भक्ति धाराओं के प्रचार-प्रसार विकास में चार चांद लगा दिया। कृष्ण भक्ति की धारा में मीरा ने चैतन्य महाप्रभु के साथ अन्य आचार्यों के विचारों का प्रेम रस भक्ति काव्य के माध्यम से प्रभावित किया।

भारतीय भाषाओं के साहित्य में व्यापक स्तर पर राम काव्य की रचना का मूल आधार बना वाल्मीकि रामायण। हिंदी में 1286 ई. के आसपास कवि भूपति रचित ‘रामचरित रामायण’ का संकेत मिलता है परंतु यह कृति उपलब्ध नहीं है।

अतः तुलसीदास राम काव्य परंपरा में हिंदी के प्रतिनिधि के रूप में माने जाते हैं।

राम काव्य परंपरा का मंथन करने के उपरांत ही जिसे तुलसीदास जी ने पढ़ा होगा उसी से प्रभावित होकर राम चरित्र मानस के प्रारंभ में यह लिखकर अपना मनन चिंतन व्यक्त किया। कि …

‘नाना पुराण निगमा गम रघुनाथ गाथा’!

रामानंद द्वारा सन 1943 ईस्वी के आसपास उनके द्वारा रचित ‘राम रक्षा स्तोत्र’ को तुलसीदास जी ने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया जिसे रामानंद जी ने लोक शक्ति से जुड़ा था।

तुलसीदास जी का बचपन कष्ट में बीता इसके बारे में देखें —

बारे ते लाल बिललात द्वार – द्वार दीन।
जैसे रचना से संकेत मिलता है॥

गोस्वामी तुलसीदास जी पर हनुमान जी का विशेष प्रभाव पड़ा। हनुमान पूजा मध्य युग की शगुन राम उपासना का अनिवार्य अंग है। कहा जाता है कि राम को प्राप्त करने के लिए हनुमान की उपासना अति आवशक है।

तुलसीदास जी ने अनेकों जगह हनुमान की मूर्ति की स्थापना की जिसमें काशी (बनारस) मैं उन्होंने रामलीला के साथ-साथ लगभग एक दर्जन हनुमान जी की मूर्तियों की स्थापना की उन मूर्तियों में विशेष रूप से संकट मोचन मंदिर में और हनुमान फाटक पर बड़ी मूर्तियां स्थापित की बाकी हनुमान जी की, काशी में स्थापित मूर्तियां इन दो मूर्तियों से छोटी मूर्ति की स्थापना की।

उन्होंने काशी अयोध्या जगन्नाथपुरी रामेश्वरम द्वारिका होते हुए बद्रीनाथ की भी यात्रा की। वहीं से वे कैलाश और मानसरोवर जाने के उनके प्रमाण मिलते हैं। तुलसीदास चित्रकूट में अंत में जाकर बस गए वहीं उन्होंने सत्संग किया और वहीं रह गए। इसके उपरांत अयोध्या जाकर संवत् 1631 में मानस की रचना करने से जीवनकाल में ही गोस्वामी ने प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली।

तुलसीदास का 20 – 25 वर्ष काशी में कष्टप्रद बीता। कहा जाता है कि वह बिंदु माधव मंदिर के बगल संकट्ठा मंदिर के पास हनुमान जी की एक मूर्ति की स्थापना की थी परंतु काशी वासियों ने उन्हें शांति से लेखन का कार्य करने नहीं दिया। बाधा पहुंचाई जिसकी वजह से वह बिंदु माधव मंदिर में एक रूम में काशी के लोगों से छिपकर रचना की। नामा दास में ‘भक्त काल’ में कहा गया है कि—

‘जीव निस्तार हित वाल्मीकि तुलसी भयो’!

वर्तमान समय में कलिकाल का समय चल रहा है इसलिए हनुमान जी की पूजा का विशेष प्रभाव मानव पर पड़ सकता है। शास्त्रों का अध्ययन करने के उपरांत हमने अपना महत्व, मत व्यक्त करते हुए लिखा है कि हनुमान की गदा का प्रयोग प्रतीकात्मक हर हिंदू, हिंदुस्तानी को भी करना चाहिए। गुरु नानक देव जी ने लिखा है कि —

जानो रे जिन जागना,
अब जागिन की बारी।
फेरि कि जागो नानका,
जब सोबाऊ पांव पसारी॥

रहीम ने संप्रदाय से उठकर, संप्रदाय में बंध कर रचना नहीं किया, अपितु उन्होंने भी अपने काव्य में निर्गुण भक्ति, सगुण भक्ति, सूफी भक्ति के साथ ही सख्य, दास्य, शांत, श्रृंगार भक्ति के दर्शन लिखे हैं जो उनके साहित्य में मिलता है।

रहीम ने लिखा कि —

ते रहिमन मन आपनों,
कीन्हें चारु चकोर।
निसि बासर रहे,
कृष्ण चंद्र की ओर॥

वंदना में रहीम लिखते हैं कि —

पुनि – पुनि बंदो गुरु के पद जलजात।
जीहि प्रताप ते मन के तिमिर बिलात॥

ध्यान में रहीम लिखते हैं कि —

ध्यावहुं सोत विमोचन गिरजा ईश।
नागर भरण त्रिलोचन सुरसरी सीस॥

आगे भी रहीम कहते हैं कि —

जे गरीब पर हित करें,
ते रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो,
कृष्ण मिताई जोग॥

भक्ति काल के आंदोलनकारी रचनाकारों पर ध्यान केंद्रित करने से ज्ञात होता है कि वास्तव में भक्तिकाल हिंदी साहित्य के इतिहास का सर्वोत्तम काल रहा है। माना जाता है कि भक्ति साहित्य का उदय पहले पहल दक्षिण भारत से हुआ। इसके बारे ईशा की दूसरी तीसरी शताब्दी के लिए लिखे गए साहित्य को पढ़ने से क्या होता है।

वहां पूर्व में बौद्ध और जैन धर्म का विशेष प्रभाव रहा हिंदी दोनों धर्म का प्रचार प्रसार और विकास परिलक्षित होता है। इन दोनों धर्मों का उन लोगों पर प्रभाव बढ़ने और सहने को लेकर इन्हीं प्रभाव के कारण भक्ति साहित्य को समृद्ध करने और यह जन तक उसे समझाने का प्रयत्न किया और विकसित करने का कार्य किया।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — यह मनुष्य जन्म मिला हैं भगवन भजन करने के लिए न की भोग विलाष के लिए। हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्ति काल महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आदिकाल के बाद आये इस युग को ‘पूर्व मध्यकाल’ भी कहा जाता है। इसकी समयावधि 1375 वि.सं से 1700 वि.सं तक की मानी जाती है। यह हिंदी साहित्य का श्रेष्ठ युग है जिसको जॉर्ज ग्रियर्सन ने स्वर्णकाल, श्यामसुन्दर दास ने स्वर्णयुग, आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने भक्ति काल एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लोक जागरण कहा। सम्पूर्ण साहित्य के श्रेष्ठ कवि और उत्तम रचनाएं इसी में प्राप्त होती हैं।

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यह लेख (भक्तिकालीन साहित्य – कवि आंदोलन।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी की काशी को सौगात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी की काशी को सौगात। ♦

दिनांक 23 दिसंबर 2021

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 23 दिसंबर को कारखाने कि जनसभा को संबोधित करते हुए बहुत सारे परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण करेंगे।

परियोजना का शिलान्यास

  • आयुष मिशन के तहत राजकीय होमियो मेडिकल कॉलेज — लागत 49. 99 करोड़।
  • वाराणसी – भदोही – गोपीगंज मार्ग एस एच 87 फोर लेन 8.6 किलोमीटर, चौड़ी करण आदि लागत 269.10 करोड़।
  • मोहन सराय दीनदयाल नगर चकिया मार्ग 11km, लागत 412.53 करोड़, सर्विस लेन के साथ सिक्स लेन की।

सड़क और चौराहा का सुधार

  • फेज – 1 …
  • मैदागिन से गोदौलिया तक।
  • गोदौलिया से सोनारपुरा तक।
  • सोनारपुरा से अस्सी तक।
  • सोनारपुरा से भेलूपुर तक और गोदौलिया से गिरिजा घर तक। लागत 25 करोड़।
  • बनारस काशी संकुल – करखियांव लागत 475 करोड़।
  • दुग्ध उत्पादन सहकारी संघ लिमिटेड संयंत्र, रामनगर बायोगैस पावर उत्पादन केंद्र लागत 19 करोड़।

परियोजना का लोकार्पण

  • एकीकृत आयुष चिकित्सालय ग्राम मद्रासी विकासखंड आराजिलाइना 50 वेड युक्त लागत 6.41 करोड़।
  • दशाश्वमेध वार्ड का निर्माण का स्मार्ट सिटी 16.22 करोड़।
  • राज मंदिर का पुनर्निर्माण कार्य लागत 13.53 करोड़।
  • काल भैरव वार्ड का पुनर विकास लागत 16.22 करोड़।
  • क्षेत्रीय निदेशक मानक प्रयोगशाला का निर्माण पिंडरा लागत 9.03 करोड़।
  • तहसील पिंडरा में दो मंजिला अधिवक्ता भवन का निर्माण लागत 1.64 करोड़।

पुनर्विकास

  • जंगम बाड़ी वार्ड का पुनर विकास कार्य लागत 12.65 करोड़।
  • गढ़वासी टोला का पुनर विकास कार्य लागत 7.90 करोड़।
  • नदेसर तालाब का विकास और सुंदरीकरण लागत 3.02 करोड़।
  • सोनभद्र तालाब का विकास और सुंदरीकरण लागत 1.38 करोड़।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कार्य

  • डॉ हास्टल, नर्स हॉस्टल और धर्मशाला का निर्माण लागत 130 करोड़।
  • अंतर विश्वविद्यालयी शिक्षक शिक्षा केंद्र का निर्माण लागत 107.36 करोड़।
  • आवासीय फ्लैट अदद 80 पैकेज -1, जोधपुर कॉलोनी में निर्मित लागत 60.63 करोड़।
  • आवासीय फ्लैट 80 पैकेज -2, जोधपुर कालोनी में निर्मित लागत 60.63 करोड़।

राजकीय आईटीआई में निर्माण

  • राजकीय आईटीआई करौंदी में 13 आवासों का निर्माण लागत 2.75 करोड़।

रविदास की जन्म स्थली

  • सीर गोवर्धन में पर्यटन विकास फेज – 1 के तहत सामुदायिक हाल और शौचालय का निर्माण लागत 5.35 करोड़। अंतर्गत राजगीर निर्माण निगम लिमिटेड भदोही इकाई।

अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान केंद्र

  • अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान केंद्र ईरी में स्पीड बिल्डिंग फैसिलिटी का निर्माण लागत 3.55 करोड़ अंतर्गत ईरी के सबीर बायोटेक लिमिटेड।

तिब्बती अध्ययन शिक्षा संस्थान

  • केंद्रीय उच्च कि तिब्बती शिक्षण संस्थान सारनाथ में शिक्षक प्रशिक्षण भवन का निर्माण लागत 7.10 करोड़, अंतर्गत नेशनल बिल्डिंग का स्टेशन कारपोरेशन।

सर्विलांस कैमरा

  • शहर में 720 स्थलों पर उन्नत सर्विलांस कैमरा – लागत 128.04 करोड़।

पार्किंग

  • बनिया बाग पार्क में भूमिगत पार्क, इंडोर पार्क का विकास कार्य लागत 90.42 करोड़।

एस टी पी का निर्माण

  • 50 एम एल डी क्षमता की एस टी पी रमना का निर्माण कार्य लागत 161.31 करोड़, अंतर्गत गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई।

काशी बहुत पुराना शहर है। बनारस को काशी भी कहा जाता है। बनारस का पुराना नाम आनंद वन भी है। बनारस का विस्तार लगातार गंगा के किनारे दक्षिण दिशा की तरफ होता रहा। ले. योगेंद्र नारायण, वा0 के अनुसार सन 1982 में बनाए गए जेम्स प्रिंसेप की मानचित्र की अनुसार उस समय तक बनारस का विस्तार हसीना लेके पास तक हो चुका था। अस्सी के पास का अंतिम निर्माण अमृत राव का बाड़ा था। उसके दक्षिण दिशा में खाली जमीन अथवा खेत थे। पश्चिम की तरफ कुरुक्षेत्र तालाब था। जिसका पानी गोदौलिया नाला से होता हुआ दशासुमेध घाट पर गिरता था।

लकड़ी का पुल

विशेश्वर खंड और केदार खंड को जोड़ने के लिए बाद में लकड़ी का एक पुल बनाया गया जिसे डेडसी का पुल कहा जाता था।

उन दिनों विश्वनाथ गली को विशेश्वर खंड, और भूतेश्वर गली को केदार खंड कहा जाता था। नगर के पश्चिम में औरंगाबाद सराय बनाती थी। उसी से सटा हुआ विशाल चक्र तालाब था।
ओमकारेश्वर खंड सी विश्वेश्वर खंड में तेजी से बस्तियों का विस्तार हो रहा था। गुजराती बस्तियां बस चुकी थी। मंदिरों और घाटो का निर्माण तेजी से होने लगा था। वाराणसी में कोलकाता दिल्ली लाहौर तक की व्यापारी खींचे पांव आ रहे थे। डॉ मोती चंद में काशी के इतिहास में मिलता है कि बनारस में बाजीराव पेशवा के कार भारी सदाशिव नामक जोशी के पेशवा को हर 88 -1735 उलझे पत्र का उल्लेख किया है, इसमें कहा गया है कि जरासंध घाट पर मीर घाट के नाम से पुष्पा बनवा रहे थे। बनवाने के लिए से इमारती सामान खरीद लिया था और इससे दूसरे लोग भी ईमारती काम अपने हाथों में नहीं ले सकते थे। बाजीराव पेशवा ने उस समय शायद ब्रहमपुरी बनवाने के लिए नाईक को लिखा था पर उसके लिए बड़ी जमीन नहीं मिल रही थी। आज के समय में मीर घाट के किले का अस्तित्व स्थित तो नहीं है। काशी नगरी को भी अयोध्या नगर की तरह आक्रांताओं का दंश झेलना पड़ा।

परंपरा गीत की रचना प्रस्तुत है……

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा।

जिस प्रकार सभ्यता और संस्कृति को अक्षुण्ण रखने सजाने संवारने का काम
प्राचीन काल में गुजरात से आए हुए अच्छों ने किया था उसी तर्ज़ बाबा सम्मान प्रधानमंत्री काशी को संवारने अद्भुत अविस्मरणीय कार्य किया है। नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर डॉ शंभू नाथ सिंह की रचना यहां नई तरंगे दे रहा है —

देश हैं हम,
महज राजधानी नहीं।
हम बदलते हुए भी,
न बदले कभी।
लड़खड़ाये कभी,
और संभले कभी,
हम हजारों बरस से,
जी से जी रहे।

काशी के सभी घाट का अपना अपना बहुमूल्य इतिहास है।

दशाश्वमेध घाट – यह घाट शहर के घाटों के मध्य में काशी के पांच अति प्राचीन पवित्र घाटों में से एक है। इस घाट पर गंगा के जल में रूद्र सरोवर तीर्थ है। माघ के महीने में यहां स्नान करने वालों की तादाद अधिक लगी रहती है। इस घाट पर पीतल की मूर्ति में शीतला जी की मूर्ति विराजमान है। जहां शहर में शीतला माता की महामारी फैलने पर लोग पूजा अर्चना करते है। शीतला देवी के बगल में बंधी देवी का एक गुप्त स्थान है। शिवपुरा के अनुसार शिव जी ने राजा दियो दास को काशी से भी रक्त करने के लिए ब्रह्मा को काशी में भेजा। ब्रह्मा कासी में जाकर दियो दास की मदद से दश अश्वमेध यज्ञ किए। उसी स्थान को दशाश्वमेध के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मा जी भी रामेश्वर शिवलिंग स्थापित करके वही रह गए। पुस्तकों का अध्यन करने पर पता चलता है कि प्राचीन काल में राजा जब किसी राज्य को जीतकर आते थे तो वह भी इसी स्थान पर यज्ञ कराया करते थे। इस स्थान पर 10 दिन स्नान करने से जो शुक्ल पक्ष की दशमी पर्यंत स्नान करता है। उसका जन्मों का पाप कट जाता है। यहां स्नान करने से सब फल की प्राप्ति होती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने मधु स्रोत के आशा और उद्योग में वर्णित

कर्मों के फल के मिलने में यद्यपि हो जाती है देर,
तो भी उस जगदीश्वर के घर, होता नहीं कभी अंधेर।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 15 साल का कार्यकाल अथवा प्रधानमंत्री के रुप में भारत का नेतृत्व करने की कला कौशल को दुनिया में भारत की सराहना की जा रही है। प्रधानमंत्री जी का मानना है कि उनके लिए उपरोक्त रचनाकार की रचना प्रासंगिक है—

जब तक मेरे इस शरीर में, कुछ भी शेष रहेंगे प्राण,
तब तक का प्रयत्न मेटूंगा, अत्याचारी का अभिमान।
धर्म न्याय का पक्ष ग्रहण कर, कभी न दूंगा पीछे पैर,
वीर जनों की रीति यही है, नहीं प्रतिज्ञा लेते फेर।
देश दुख अपमान जाति का, बदला मैं अवश्य लूंगा।
अन्याय के घोर पाप का, दंड उसे अवश्य दूंगा।।(लक्ष्मी,नव.१९१२)

रचनाकार किसी भी व्यक्ति की संबंध में अध्ययन करते करते और उनकी बस्ती स्थिति को देखकर कुछ कहने को मजबूर हो जाता है। एक रचना प्रस्तुत है…

मैं धरा हूं!
आकाश पाताल के बीच खड़ा,
समाज के कल्याण के लिए खड़ा,
ज्ञानियों के सिर पर चढ़ा,
ज्ञानियों में जान से भरा,
मैं घरा,
मैं धरा हूं!

भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने वैज्ञानिकों को मिसाइल की सफलता के लिए जिसे चांदीपुर बालासोर, निशा से हो देसी गुरुजी मिसाइल का सफल परीक्षण १८/१०/२०१४ को १० बजे सुबह हुआ जो परमाणु आयु ले जाने में सक्षम है। वैज्ञानिकों को सफलता के लिए बधाई दी।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कनाडा से आए अतिथि के वक्तव्य

बीएचयू वाराणसी में 18 अक्टूबर 2014 शनिवार की गोष्ठी के दूसरे दिन कनाडा से पधारे डॉ मैक्को नाकी ने कहा कि भले ही भारत – कनाडा मैं हाथ विषमता यें है परंतु चिट्टी सीमा मनु में हम किसी भी दिक्षित देश से कम नहीं है। डॉ भवानी शंकर कोडाली गर्भवती महिलाओं की ऑपरेशन के दौरान एनेस्थीसिया के प्रयोग और वैचारिक विषयों को रेखांकित किया।

भारत ने 2014 से 2021 तक अनेकों मिसाइल बनाकर दुनिया को दिखा दिया कि भारत किसी भी मामले में कभी पीछे नहीं रहेगा। किसी भी खतरे से निपटने के लिए भारत मुकम्मल तैयारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में घर का चला रहा। दुस्साहस और दादागिरी की 2014 से खा लिया घटनाओं के बीच पहली बार देश के सिर सन्नी नेतृत्व से सीधे संबाद में pm ने कहा कि पारंपरिक जिंदगी संभावनाएं भले ना हूं, लेकिन किसी की व्यवहार को नियंत्रित करने और निवारक शक्ति के तौर पर ताकत का इस्तेमाल हम औजार बना रहेगा। मोदी जी ने जवानों से लेकर जनरल तक नई तकनीकी इस्तेमाल पर जोर दिया और पहली बार प्रधानमंत्री पद से तीनों सेनाओं के शीर्ष कमांडर को संबोधित किया। किसी भी खतरे से निपटने के लिए सेना को मुकम्मल इंतजाम करने को कहा। भारत की जनता प्रधानमंत्री जी के विचार सुझाव विकास विजन, मिशन को जनता अच्छी भावना से समझ रही है। मोदी जी ने कहा था कि वह गांव के बारे में महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित है। आदर्श गांव का अर्थ यह है कि वह स्वास्थ्य स्वच्छता शिक्षा विकास के साथ-साथ वापसी सौहार्द का केंद्र बने। सभी सांसदो को अपने कार्यकाल में आदर्श गांव बनाने की अपील की। उन्होंने खुद भी अपने समस्ती क्षेत्र वाराणसी में एक आदर्श गांव बनाने का फैसला लिया।

भारत के प्रधानमंत्री जी के विचारों से मेल खाती हुई चंद्रभान सुकुमार जी की रचना प्रस्तुत —

गांधी के सपनों का भारत,
गांधी के अपनों का भारत!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा था कि मेरा क्या मैं झोला लेकर चल दूंगा।

मेरा मत है कि शंभू नाथ सिंह की रचना प्रासंगिक होगी —

जंग जल्द पैर बढ़ाओ आओ, आओ!
आज अमीरों की हवेली,
किसानों की होगी पाठशाला,
धोबी, पासी, चमार, तेली
खोलेंगे अंधेरे का ताला
एक बात पढ़ेंगे, टाट बिछाओ!
गरीबों को आशाओं को निराश शर्तों को
तरह – तरह से लाभ पहुंचा कर सिद्ध कर
दिया है कि इनका भी हमें सम्मान करना चाहिए।
तू कहां जा सकता है जी कि –
बहुत दिनों बाद खुला आसमान,
निकली है धूप हुआ खुश जहान।

धरातल से उठा हुआ व्यक्ति हमेशा धरातल को अपने आप में अंदर देखता है। वह जानता है समझता है आगे बढ़ने के लिए प्रयत्न करता है प्रयासों से देश को आगे बढ़ा समाज के उत्थान के लिए तरह – तरह की योजना लाता है। सहदेवी संत हृदय का व्यक्ति की पहचान जानिए —

मेरी चाह नहीं इसकी
बड़ा व्यक्ति कहा जाऊं!
चौबीस घंटे की धूल में
पाथर बन पूजा जाऊं!
सर्दी गर्मी बरसात में भी,
छतरी एक ना पाऊं।
प्रभुता की भले नहीं,
लघुता के गीत सुनाऊं॥
प्रधानमंत्री जी का प्रयास गरीबों,
असहाय के लिए एक रचना –
निश्चिंत रहें, जो करे भरोसा मेरा,
बस, मिले प्रेम का मुझे परोसा मेरा।
आनंद हमारे ही अधीन रहता है,
तब भी विषाद नरलोक व्यर्थ सकता है॥
करके अपना कर्तव्य रहो संतोषी,
फिर सफल हो कि तुम विफल, न होगे दोषी॥

उत्तर प्रदेश के मुखिया आदरणीय योगी आदित्यनाथ जी अपने कुशल प्रशासन शासन के द्वारा भ्रष्टाचार अनाचार, दुराचार में लिप्त होने वाले लोगों को समझा दिया है रचना प्रस्तुत है मधु स्रोत से —

लालसा अज्ञात की बताके ढोंग रचते जो,
शब्दों का झूठ मूठ, अब होंवे सावधान।
आवें लोक लोचन समक्ष, देखें एक बार,
अपनी यह कला हीन, कोरी शब्द की उड़ान।
बोलें तो हृदय पर हाथ रख सत्य – सत्य,
इसका वहां के किसी भाव से भी है मिलान।

वाराणसी के पांडेपुर सेविंग रोड तक फोन सड़क के लिए टेंडर

वाराणसी को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए पुरजोर प्रयास चल रहा है। किसी क्रम में पांडेपुर मार्ग और पांडेपुर चौराहे से रिंग रोड तक खाना बनाने के लिए 4200000 रुपए की निंजा जारी कर दी गई। पांडेपुर रिंग रोड तक 6.5 किलोमीटर, कचहरी से संदहां तक 9 किलोमीटर की निमिदा लोग निर्माण विभाग। कचहरी से आशापुर होते हुए संदहां तक 9.2, 35 किलोमीटर लंबी सड़क को बनाने के लिए लोक निर्माण विभाग 115 करोड़ रुपए का टेंडर जारी किया है।

बनारस में एक और आधार सेवा केंद्र

डिजिटल इंडिया का डिजिटल उत्तर प्रदेश बनाने के लिए गोंडा मुरादाबाद सहारनपुर के साथ-साथ वाराणसी के महमूरगंज में एक और सेवा केंद्र आज शुभारंभ हुआ।

नारी शक्ति के लिए २१ दिसंबर २०२१ को प्रयागराज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 21 दिसंबर तो संगम तट पर परेड मैदान में मातृ शक्तियों से मुलाकात की। कहा कि up की महिलाओं ने ठान लिया है कि यहां पहले की सरकारों वाला दौर नहीं लौटने देंगी नारी गरिमा को योगीराज मे महत्ता दिए जाने की बात कह कर मोदी ने महिलाओं में सुरक्षा का विश्वास दिलाया। उन्होंने गांव के स्यं सहायता समूह से जुड़ी सखियों के काम की तारीफ की। महिला स्व सहायता समूह की सहायता के लिए 1.60 लाख महिलाओं को इसके लिए 100 करोड़ का ऑनलाइन हस्तांतरण किया।

मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना

मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के अंतर्गत छ: श्रेणियों में ₹15000 देने का प्रावधान है। जिसमें …

  • जन्म के समय 2000/
  • प्रथम वर्ष का टीका पूर्ण करने पर 1000/
  • कक्षा एक में प्रवेश के समय 2000/
  • कक्षा 6 में प्रवेश करने पर 2000/
  • कक्षा 9 में प्रवेश करने पर 3000/
  • दसवीं/12वी परीक्षा उत्तीर्ण डिग्री/ दो वर्षीय डिप्लोमा में प्रवेश पर 5000/

उपरोक्त सभी रकम एक मुश्त खाते में ऑनलाइन दिया जाना है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — जब इरादे हो नेक, तो चहुँ ओर विकास होता है। इसी का प्रमाण है प्रगतिशील उत्तर प्रदेश नई ऊंचाइयों को छूने के लिए आगे बढ़ रहा है। धरातल से उठा हुआ व्यक्ति हमेशा धरातल को अपने आप में अंदर देखता है। वह जानता है समझता है आगे बढ़ने के लिए प्रयत्न करता है प्रयासों से देश को आगे बढ़ा समाज के उत्थान के लिए तरह – तरह की योजना लाता है। सहदेवी संत हृदय का व्यक्ति की पहचान जानिए।

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आधुनिक हिंदी के दिशा नायक निराला।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आधुनिक हिंदी के दिशा नायक निराला। ♦

निराला जी के संबंध में कोई स्वतंत्र समीक्षा पुस्तक नहीं लिखी मिली।
समीक्षात्मक मूल्यांकन करने वाले प्रमुख आलोचक पंडित राम चंद्र शुक्ल और नंद दुलारे वाजपेयी जी ही रहे।

निराला जी के काव्य वैशिष्ट्य और उपलब्धियों पर समीक्षा विचार छायावादी की भांति की गई।

नंद दुलारे वाजपेयी जी सुमित्रानंदन पंत को पसंद करते थे, पंडित शुक्ल या अन्य कवि उन्हें काव्य की कृतियों में वैसा नहीं भाते हैं।
फिर भी कवि की अभिव्यंजन पद्धति से समीक्षा प्रारंभ किया, निराला जी के नाद सौंदर्य पर और अधिक ध्यान दिया।

उनकी प्रगीत मुक्तको में संगीतात्मकाता पाया,
उन्होंने संगीत को काव्य के निकट लाने का प्रयास किया।
उनकी पद्य योजना पहुंच में जटिल दिखाई देती है,
समस्त पद विन्यास कवि की कार्यशैली की विशेषता है॥

काव्य में विषम चरण छंदों का प्रयोग,
काव्य की तीसरी विशेषता रही है।
काव्य दृष्टि से शुक्ला नहीं यह स्वीकारा,
बहु स्पर्श नी प्रतिभा निराला मौजूद है।
शैली और सामाजिक मूल्यों के क्षेत्र में,
निराला आदर्श मान्यता बंधन नहीं स्वीकार किया॥

उनके भाषा में व्यवस्था की कमी और पद योजना का अर्थ व्यंजन दुर्बल माना।
फिर भी उनकी विद्रोही भावना और जगत के विविध प्रस्तुत रूपों आदि को लेकर चलने वाली काव्य प्रतिभा के महत्व को, उदासीन भाव से ही सही स्वीकार किया।

निराला जी के काव्य वैशिष्ट्य और काव्य प्रतिभा की तरफ वाजपेयी ने जगत का ध्यान आकृष्ट किया।
विश्लेषण और मूल्यांकन में आलोचक की कठिनाई को वाजपेयी जी ने शुरुआत में ही कह दिया।

कवि के व्यक्तित्व और उसके निर्माण में ऐसी सूक्ष्म शब्दों का प्रयोग मिलता है,
जिसका विश्लेषण हिंदी की वर्तमान धारणा ने विशेष कठिन क्रिया वाजपेयी जी ने बताया।

पंडित नंद दुलारे जी की समीक्षा अनुसार निराला जी, हिंदी काव्य की प्रथम दार्शनिक कभी और सचेत कलाकार हैं।

निराला जी के विकास के मूल में भावना की अपेक्षा बुद्धि तत्व की प्रधानता है।
जो उनके स्वछंद छंदो, से दिखाई पड़ता है।
उनके काव्य में परंपरा के प्रति, गहरा विद्रोह झलकता है।

छंदोबद्ध संगीतात्मक रचनाओं के द्वारा, निराला जी के काव्य का दूसरा चरण शुरू होता है। बौद्धिकता पर नियंत्रण, भावना युक्त रचना, कला सृष्टि का स्वरुप देने में समर्थ हैं।

निराला जी के काव्य के विकास का तीसरा चरण, गीतिका काव्यों में परिलक्षित होता है। काव्य में विराट बौद्धिक चित्रों के स्थान पर रम्मय आकृतियां अधिक मिलती है।

ऐसा परिवर्तन, निराला के काव्य में, बुद्धि तत्व के कलात्मक परिपक्वता की दिशा में आगे ले जाना है।

शुक्ल जी की मत का खंडन करते हुए, पंडित नंद दुलारे वाजपेयी जी ने कहा।

सार्थक शब्द सृष्टि, प्राढ़ सशक्त पद विन्यास और संगीतात्मकता, निराला जी की हिंदी कविता को प्रमुख देन बताया। शब्द संगीत परखने और व्यवहार में लाने,
में निराला जी आधुनिक हिंदी के दिशा नायक हैं बताया।
— ( साभार हिं. सा. का बृहद इतिहास )

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article में समझाने की कोशिश की है की, “पंडित नंद दुलारे वाजपेयी जी ने कहा — सार्थक शब्द सृष्टि, प्राढ़ सशक्त पद विन्यास और संगीतात्मकता, निराला जी की हिंदी कविता को प्रमुख देन बताया। शब्द संगीत परखने और व्यवहार में लाने में निराला जी आधुनिक हिंदी के दिशा नायक हैं बताया।”

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यह लेख (आधुनिक हिंदी के दिशा नायक निराला।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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ज़रूर पढ़ें: पृथु का प्रादुर्भाव।

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जीवंत भाषा में ग्राही शक्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ जीवंत भाषा में ग्राही शक्ति। ♦

जीवंत भाषा का उत्तम लक्षण,
उसकी ग्राही का शक्ति होती है।
विशेषता के अनुरूप औरों से,
जितना अधिक ग्रहण कर लेते।

दूरगामी प्रभाव उसका प्रांजल।
हिंदी ने ग्रहण करने की दिशा में,
उदासीनता कभी नहीं दिखाई।
जब भी जैसे जरूरत पड़ी उसने,
अपनी भाषा शक्ति समृद्धि बढ़ाई।

विभिन्न भाषाओं की शब्द शैली,
यात्रा लंबी चलकर कदम बढाई।
ज्यों ज्ञान – विज्ञान विस्तृत होता,
हिंदी की शक्ति यदि और बढ़ती।

ग्रहण शीलता से संपन्नता आती,
हिंदी साहित्य के और काम बाकी।
चिंतन मनन में कमी न हो उदासी,
ज्ञान दर्पण के क्षेत्र में बढ़े देश वासी।

हिंदी साहित्य का बढ़ाया ज्ञान,
संस्कृत का अधिकांश ही दान।
शब्द शैली पद रचना व व्याकरण,
हिंदी अलंकार से अलंकृत होती।

भाषा संस्कृत संकुचित सीमा से पार,
जनता के विशाल क्षेत्र में जब आई!
भाषा की सहजता का प्रयोग प्रश्न,
जनता के अनरूप करने की पाई।

माना कि शासन प्रशासन शिक्षा का,
हिंदी करण तेजी से आगे बढ़ रहा है।
विस्तार के अनुकूल शब्द भंडार भरे
अनिवार्यता का अभाव भी खल रहा।

दुनियां ने ज्ञान विज्ञान की दौड़ में,
तेजी से विस्तार की रफ्तार बढ़ाया।
हिंदी शब्द भंडार में बहुलता मूल्य,
विरासत में पैतृक सम्पत्ति से पाया।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में — हिंदी भाषा के गुणों और महत्व को बताते हुए अन्य भाषाओं में इसकी उपयोगिता को बताया है, चाहे वो संस्कृत की भाषा को निखारने की बात हो या अन्य भाषा की। हिंदी भाषा में जो अपनापन है वो दुनिया के किसी भी अन्य भाषा में नही है।

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यह कविता (जीवंत भाषा में ग्राही शक्ति।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु। ♦

कलयुग में साक्षात शिव रूप में अवतरित हुए,
गुरु आदि शंकराचार्य।
दूर किया मानव के भाती – भाती कलशों को,
आदि शंकराचार्य की तरह आंख मूंदकर,
हठ और तर्क नहीं करते॥

वे शास्त्रीय ढंग से शास्त्र प्रमाण युक्त बातें करते,
सत्य रूप अनुभव और अनुभूतियों से संदेश लोक में देते।
शिव के वैभव और शिष्टता को संसार में,
मुक्त कंठ से बदला आने वाले॥

कलयुग में अवतार लेने वाले सिद्ध गुरुओं में से एक,
आचार्यों में अद्वितीय है आदि शंकराचार्य।
सर्वज्ञान संपन्न महा पंडित जी आदि शंकराचार्य,
ब्रह्मा अनुभूति में रमण करने वाले ब्रह्म ज्ञानी॥

विभिन्न शक्तियों सिद्धियों से युक्त सिद्ध पुरुष शंकराचार्य,
आचार्यों की तरह साधारण पुरुष नहीं थे आदि शंकराचार्य।
असत्य बाद से दूर सत्यवादी थे आदि शंकराचार्य,
बुद्धि वाद या भ्रांति वाद से अलग अनुभूति वादी आदि शंकराचार्य॥

यथार्थवादी गुणों से भरपूर संपन्न आदि शंकराचार्य,
आचार्यों की भांत संकुचित होकर,
देवताओं की निंदा कभी नहीं किया है शंकराचार्य॥

शिव की जितनी उपासना किया उन्होंने,
उतनी ही जगदंबा, विष्णु, नरसिंह स्वामी आदि देवताओं की।
शिवानंद लहरी नामक ग्रंथ की अद्भुत ढंग से लिखा,
अद्वितीय शैली की रचना कर रहस्य ज्ञान को व्यक्त किया॥

जिस प्रकार ज्ञानी को ज्ञानी ही पहचान सकता,
सर्वोत्तम को जिस प्रकार सर्वोत्तम ही पहचानता।
उसी तरह महा ज्ञानी सर्वोत्तम महागुरु आदि शंकराचार्य,
देवाधिदेव शिव शंकर स्वरूप है आदि शंकराचार्य॥

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में कवि ने, आदि शंकराचार्य जी के गुणों, शक्तियों और कार्यों को समझाने की कोशिश की है। आदि शंकराचार्य जी कलयुग के प्रथम गुरु है।

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यह कविता (आदि शंकराचार्य कलयुग के प्रथम गुरु।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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गुरु की महत्ता और गुरु पूर्णिमा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु की महत्ता और गुरु पूर्णिमा। ♦

भारतीय समाज में मनाए जाने वाले पूज्यनीय पुण्य देने वाले भारत के सभी त्योहार होते हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों में यह त्यौहार अलग-अलग रूप में भी मनाए जाते हैं।

जो किसी न किसी रूप में हमारे ईश्वर से साक्षात्कार कराने वाले होते हैं। जो हमारे आसपास की दुनिया में फैल ज्ञान की शक्ति को संतुलित रखने में मददगार होते हैं। विविध सभ्यताओं का ज्ञान कराते हैं। मानव जीवन को शुभम रूप से चलाने के लिए उमंग और उत्साह भरते हैं। सत्य की खोज, शोध – खोज का अवसर प्रदान करते हैं।

उन्हें आने वाले त्यौहारों में से एक आषाढ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन जनमानस अलग-अलग समूहों में अपने – अपने लौकिक जगत में व्याप्त गुरुओं के शरण में जाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

आशीर्वाद प्राप्त करने के उपरांत वह अपने को धन्य मानते हैं। सच में अलौकिक जगत की उत्पत्ति करता संरक्षक रक्षक भगवान भोलेनाथ, भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी हैं जो हमारे सच्चे सर्वसंपन्न परिपूर्ण गुरु हैं।

सब के मालिक हैं और जगत के, जगत को चलाने वाले हैं। फिर भी मानव लौकिक जगत में मनुष्य तात्कालिक लाभ की कामना से गुरु की खोज में लगा रहता है।

जिस ईश्वर ने ही जगत में भेजा है, जो हमारे आप जैसे हैं उन्होंने तब और तपस्या के बल पर अपने को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। उन्हें परम उत्तम मानकर गुरु मान लेता है। मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख – दु :ख प्राप्त करता है।

गुरु माता है और गुरु पिता है।
गुरु आचार्य महान ज्ञान वान है।
अध्यापक ब हु तेरी जगत में,
सद्गुरु शकल जहां विद्वान है।

•» ब्रह्मा गुरु है! जो जगत वासियों का व्यक्तित्व निर्माण करने वाले हैं। संसार की स्थित उत्पत्ति और प्रलय के हेतु हैं।

•» विष्णु जी गुरु हैं! वह शिष्य की रक्षा करते हैं उसके अंदर की नकारात्मकता को दूर करते हैं और उसके अवगुणों को दूर करके भगाते हैं। भगवान विष्णु किसी कारण बस भूले भटके शिष्य को भी सत मार्ग पर लाकर सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं। भगवान विष्णु के प्रति प्रेम रखने वाला मनुष्य बैकुंठधाम को जाता है। वह जन्म – मृत्यु के भय से दूर रहता है क्योंकि भगवान जन्म मृत्यु के भय का नाश करने वाले हैं! भगवान विष्णु के भक्त का भक्ति प्रवाह बढ़ने लगता है।

•» शंकर जी यानी महादेव गुरु! महादेव जी चराचर के जगतगुरु है। वैर रहित, शांति मूर्ति, आत्माराम और जगत के परम आराध्य देव हैं। घमंडी धर्म की मर्यादा को तोड़ने वाले का विनाश करने वाले हैं। श्री शंकर जी की घटक जटाओं में गंगा जी सुशोभित होती हैं –

गंगा – यमुना के संगम में,
करता जो अज्ञात स्नान!
प्रसन्नता से परिपूर्ण होकर
पहुंचता अपनी-अपनी धाम।

गुरु पूर्णिमा के दिन से वर्षा ऋतु का काल प्रारंभ माना जाता है वर्षा काल में साधु संत 4 माह तक भ्रमण करके जगत उत्थान के लिए संस्कृति रक्षा और सभ्यता के लिए, धर्म, ज्ञान का प्रचार – प्रसार करते हैं। ज्ञानार्जन के लिए यह चातुर्मास उपयुक्त माना जाता है।

गर्मी और उमस से भरी जिंदगी को शीतलता प्रदान होती है। चारों तरफ हरियाली का वातावरण रहता है मानव मन जो, मानव मन को आह्लादित कर लेता है।

आषाढ़ की पूर्णिमा के ही दिन कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्म हुआ था। जिन्होंने महाभारत की रचना की थी। कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास जी महाभारत के साथ – साथ वेद – पुराण वेदांत – दर्शन ( ब्रह्म सूत्र) शारीरिक सूत्र, योग शास्त्र सहित अनेक उत्कृष्ट कृतियों की रचना की है।

आज ही के दिन भगवान बुद्ध ने काशी में आकर काशी के प्रमुख संस्थान सारनाथ में यहां सारंग नाथ जी, जो भगवान शंकर के साले कहे जाते हैं उनका मंदिर है उसी के पास में अपने पांच शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था।

शंकर जी ने आज ही के दिन आषाढ़ मास की पूर्णिमा को सप्त ऋषियों को योग और तत्वज्ञान की दीक्षा दी थी। सप्त ऋषियों ने भारत सहित दुनिया में फैल कर विश्व कल्याण के लिए योग दर्शन का बयान संसार को दिया।

गुरु का अर्थ होता है कि वह अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाए, आत्म ज्योति जगाने का काम करें, भक्तों के अंदर आत्मज्योति का बोध कराए।

गुरु की महत्ता को सभी ने स्वीकारा है सभी शास्त्र गुरु तत्व की प्रशंसा करते हैं। गुरु प्रशंसा के योग्य होता है।

स्वामी विवेकानंद जी महाराज के गुरु रामकृष्ण परमहंस जी थे। जिन्होंने एक साधारण बालक को दुनिया का सबसे महान दार्शनिक ज्ञाता और बुद्धिमान बना दिया।

अयोध्या नरेश चक्रवर्ती महाराजा दशरथ के गुरु वशिष्ठ जी के जिनकी सलाह के बिना अयोध्या के दरबार का कोई भी कार्य नहीं होता था। कोई भी कार्य करने के पहले अयोध्या में गुरु वशिष्ठ से आज्ञा लेकर ही किया जाता था।

गुरु का योग्य होना बहुत आवश्यक है। गुरु अपने शिष्य को उपदेश आत्मक वाणी से लक्ष्य की लालसा को निर्मल करने का मार्गदर्शक होता है। गुरु का कर्तव्य है कि वह अपने शिष्य में सद्विद्या का संचार, संचारित करने का तन – मन से प्रयत्न करें।

महाराज मनु ने भी गुरु को महान कहा है उन्होंने गुरु की सेवा करने से ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है बताया। आचार्य को देवता मानने को उन्होंने कहा।

भक्ति काल में भक्त और संत एक स्वर से मुक्त कंठ से गुरु की महिमा और प्रशंसा के गीत गान करते रहते थे।

हिंदी साहित्य गौरव प्रदान करने वाले श्रृंगार रस के कवि सूरदास जी को उनके गुरु वल्लभाचार्य जी के द्वारा यह कहा जाना कि तुम जगत में, घिघियाते ही रहोगे? कवि सूरदास जी गुरु के आशीर्वाद को लेकर श्रृंगार रस के महान कवि हुए आज तक श्रृंगार रस का ऐसा कोई कवि शायद ही धरती पर आया हो।

गुरु की आवश्यकता अलौकिक जगत में हमेशा होती रहती है। अलग-अलग चीजों के ज्ञान के लिए अलग-अलग गुरु की आवश्यकता होती है, जो जीवन में उस वस्तु से संबंधित ज्ञान दे सके सारा जीवन सीखने के लिए ही होता है।

समस्त 12 बारीकियों के, उसको सीखने के लिए मनुष्य को अच्छे गुरु की आवश्यकता होती है। अच्छा गुरु वह होता है जो उस विषय में पारंगत होता है। गुरु शिष्य के बीच बहुत गहरा संबंध होता है। गुरु को कभी भी कच्चा नहीं होना चाहिए और यह गुरु कच्चा है तो उसे शिष्य को गुरु नहीं बनाना चाहिए, इसीलिए शास्त्र सद्गुरु बनाने का उपदेश देता है।

मनुष्य को हमेशा सच्चे गुरु की तलाश करते रहना चाहिए। आंख मूंद कर किसी को अपना गुरु नहीं बनाना चाहिए। मानव जीवन में पग – पग पर गुरु की आवश्यकता होती है। जिससे हम थोड़ा सा भी ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह भी गुरु ही होता है। स्कूल कॉलेज में हमें पढ़ाने वाला अध्यापक ही गुरु होता है।

किसी वस्तु की विशेष जानकारी देने वाला व्यक्ति भी गुरु होता है। भारतीय हाउस गुरु की हो रही है जो जीवन के चौथे पल में आवश्यकता होती है। आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर को प्राप्त कराने वाले गुरु की आवश्यकता पर यहां बल दिया जा रहा है। कहा गया है-

गुरु करिए जांच,
पानी पीजिए छान।

विशुद्ध परंपरा का पालन करते हुए सभ्यता – संस्कृति और समाज का ध्यान रखते हुए गुरु दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से लेख के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस लेख में बहुत सारे उदाहरण के माध्यम से लेखक ने विस्तार से बताया है की, समय – समय पर हर युग में गुरु के महत्व और भूमिका को उच्च स्थान प्राप्त है। जीवन में गुरु की आवश्यकता को सभी ने स्वीकार किया है। “गुरु का अर्थ होता है कि वह अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाए, आत्म ज्योति जगाने का काम करें, भक्तों के अंदर आत्मज्योति का बोध कराए।”

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यह लेख (गुरु की महत्ता और गुरु पूर्णिमा।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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मनुस्मृति में कानून।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मनुस्मृति में कानून।  ♦

भारतवर्ष में राजा न्याय का मूल होता था।
राजा के साथ एक विद्वान और न्याय करता बैठता था।
सभा में राजा विद्वान ब्राह्मण और अनुभवी मंत्री को साथ रखता था।
राजा के साथ तीन ब्राह्मण और एक विद्वान न्याय करता बैठता था।

न्यायिक सभा में दीवानी और फौजदारी का केस चलता था।
सभा में सत्य बोलने के लिए सभी को आज्ञा दी जाती थी।

सत्य बोलने वाले को न्यायालय में जाना नहीं चाहिए।
अगर न्यायालय वह जाता है तो सत्य ही बोलना चाहिए।
झूठ बोलने वाला मनुष्य को पापी कहा जाता था।
न्यायालय में बादी और प्रतिवादी के सामने गवाही लिया जाता था।

दोनों पक्ष के गवाहों को न्याय करता एकत्रित करवाता था।
इस प्रकार वह न्यायालय में समझा-बुझाकर परीक्षा लेता था।

न्याय करता गवाहों से पूछता जो वृतांत तुम लोगों ने बातें किया,
उन बातों को तुम लोग सत्य सत्य कहो क्योंकि इस अभियोग में तुम साक्षी हो।
अपनी गवाही में जो सत्य बोलता है वह मृत्यु के बाद उत्तम स्वर्ग प्राप्त करता है।
इस लोक में अद्वितीय यस पाता और स्वयं ब्रह्मा उसका साक्षात्कार करता है।

जो मनुष्य झूठी गवाही देता है वह वरुण के बंधन में बनता है।
वह मनुष्य 100 जन्मों तक दुख पाता है।

इसलिए मनुष्य को सत्य साक्षी गवाही देनी चाहिए।
सत्यता से गवाही देने वाला पवित्र होता है।
सत्यता से उसका यश वृद्धि होती है।
सभा में उपस्थित गवाही देनी पढ़ती है।

साक्षी देने वाले को सत्य बोलना चाहिए।
जीव का साक्षी स्वयं जीव है, जीव के शरण में स्वयं जीव है।
जीव मनुष्य का परम साक्षी है, उसका निरादर नहीं करना चाहिए।

जबकि पापी अपने मन में विचार करता है कि हमें कोई नहीं देखता।
लेकिन देवता उसको और उसके ह्रदय के भाव को स्पष्ट देखते हैं।
देहधारी मनुष्यों के कर्मों को यह लोग स्वयं देखते हैं-
आकाश पृथ्वी जल हृदय चंद्रमा सूर्य अधिनियम बायो-
रात्रि और दोनों को धूल और न्याय।

न्याय किया जाए इसके लिए सभा में आगे और समझाया जाता था।
जो पापी मनुष्य न्याय करता के इस प्रश्न का भी झूठ उत्तर देता है,
वह सीधे नर्क के पूर्व अंधकार में ठोकर खाता है।

पहले गवाहों को सभा मध्य समझाया जाता था।
फिर भी गवाह झूठी गवाही देता तो उसे देश निकाला जाता था।
राजा वेद पढ़ने वाले विद्यार्थी व शिल्पकार और भांड साक्षी देने से बरी रहते थे।
राज नियम कठोर और स्पष्ट हुआ करते थे।

उपद्रव चोरी बेबी चार्ट बदनामी करने,
मारपीट और अव्यवस्था में फौजदारी के,
अभियोग में साक्षी की योग्यता के नियम कठोर होते थे।

सभा में नियम का पालन करने के लिए आदेश दिए जाते थे।
मनुस्मृति में कितनी है, कानूनों को 18 भागों में बांटा गया है।
सभी कानूनों का पालन कठोरता से कराया जाता था।

मारपीट, बदनामी करना, चोरी – डाका और उपद्रो अथवा हो व्यभिचार।
जुआ खेलना और बाजी लगाना, फौजदारी कानून में इसे लिया जाता।

ऋण, धरोहर, किसी की संपत्ति के स्वामी हुए बिना उसे बेचना,
दान का फेर लेना, वेतन ना देना, प्रतिज्ञा का पालन न करना,
बिक्री और खरीद की हुई वस्तु का लौटाना।
स्वामी और सेवक में झगड़ा होना।
सीमा के संबंध में झगड़ा होना।

पति और पत्नी के कर्तव्य, उत्तराधिकार पाना।
यार सब दीवाने के मुकदमे दर्ज होते थे।

प्राचीन काल में बनाए गए नियम और कानून आज के नियम और कानून में कुछ समानता के साथ आज का नियम बहुत व्यापक हो गया है फर्क केवल इतना है कि प्राचीन काल में जो नियम बनाए जाते थे, उनका कड़ाई से पालन किया जाता था।

आज जो नियम है उनमें पारदर्शिता तो है परंतु कुछ लोग न्याय पाने के लिए अपना पूरा जीवन खो देते हैं और उनकी अगली पीढ़ी भी न्याय के लिए न्यायालय के दरवाजे खटखटा रहता है।

न्यायपालिका पर जनता का पूरा विश्वास होता है। न्यायपालिका के आदेशों का पालन शासन और प्रशासन करता कराता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, लेख के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस लेख में कवि ने मनुस्मृति में जो कानून था उसे विस्तार से बताया है। प्राचीन काल में बनाए गए नियम और कानून आज के नियम और कानून में कुछ समानता के साथ आज का नियम बहुत व्यापक हो गया है फर्क केवल इतना है कि प्राचीन काल में जो नियम बनाए जाते थे, उनका कड़ाई से पालन किया जाता था। ” आज जो नियम है उनमें पारदर्शिता तो है परंतु कुछ लोग न्याय पाने के लिए अपना पूरा जीवन खो देते हैं और उनकी अगली पीढ़ी भी न्याय के लिए न्यायालय के दरवाजे खटखटा रहता है। “

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यह लेख (मनुस्मृति में कानून।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

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