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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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सुख मंगल सिंह की कविताएं

राखो चुंदरिया संवारि।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rakho Chundaria Sanvaari | राखो चुंदरिया संवारि।

भीगल जाले मोर चुनरिया, छुपाये छिपे ना द्युति दागरी।
चूक चटक चंदा जो छिपा था, चुंदरी तो चटकार री॥

भीगल चुंदरी निखिल निचोड़ा, मोहन ज्यों सपने साथ री।
घट-घट खोजत नीक चुनरिया, पायो अपने पास री॥

इहै चुनरिया नहीं तुम्हारी, प्यारी-प्यारी यारी दुलारी।
जेते सुन्दर चुंदरी पायो, तेते ज्ञान, मान, ग्यान अगाध री॥

जा बुन लायो मोहन मोरे, मौन ज्यों महा भंडार री।
चुनरी चुरा चारो चौकछु रे, सूर्य चन्द्रमा जान्यो संसार रे॥

आंगन लाये पिया चुनरिया भीगी झीनी सारी।
गणपति गावत बीच बाजार, नीक चुनरिया नीक किनारी॥

रंगी चुनरिया को रंग निराला, मागत मधुवन मां नन्दलाल।
मंगल मंदिर बूझत न्यारी, देखत बारी – बारी – सारी॥

सोलह सी बंद चुंदरी चोखी, चार चौपटा नाग-पास री।
रंगना धूमिल चुंदरी चटकीली, राखो राजे इसे संवारि री॥

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — यह कविता मोहन (श्री कृष्ण) और उसकी प्यारी चुंदरी के प्रेम की कहानी को व्यक्त करती है। चुंदरी को धीरे-धीरे मोहन की प्यारी यारी और उसके ज्ञान के साथ मिल जाती है। मोहन की प्रेरणा से, वह चुंदरी अपने स्वामी के पास आती है और उसका साथ देती है, जैसे सूर्य और चंद्रमा समय-समय पर संसार को प्रकाशित करते हैं। चुंदरी का रंग निराला होता है और वह मंगल मंदिर की शोभा को बढ़ाती है, जैसे मधुवन में नन्दलाल के साथ खुशियों की गाथा। इस रूप में, चुंदरी को मोहन के प्रेम और उसकी भक्ति का प्रतीक माना जा सकता है।

—————

यह कविता (राखो चुंदरिया संवारि।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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भ्रमर गुंजार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Bhramar Gunjar | भ्रमर गुंजार।

भ्रमर तुम्हारे गुंजारों पर,
फूल-फूल हंसे कलियां मुस्कायी।
पंकज के पंखुड़ियों में तुम,
बंद हुये रजनी जब आई।

रजनी भर दुःख झेला तुमने,
रश्मि रथी जब नभ में छाई।
छिप गये तारे नभ में सारे,
उषा लली चिड़ियां चहकायी।

मुंह धोकर जल-पान कि ये सब,
उठ गये बाल युवा नर – नारी।
बांध पीठ पर बस्ता बालक,
पढ़ने की सब की तैयारी।

भौंरे सहगामी बन मधु-रस,
चूस सुमन से छत्ता भरते।
शहद बना जीवन हित ‘मंगल’,
दिनभर दौड़ लगाते रहते।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — भ्रमर(भौरे) दिन – रात एक करके जी-तोड़ मेहनत करती है, एक फूल से दूसरे फूल पर, फिर तीसरे फूल पर जाती है, इस तरह से वह अनगिनत फूलों पर जाती है और उन फूलों से थोड़ा – थोड़ा रस लेकर अपने छत्ते में इकट्ठा करती है। इतनी कड़ी मेहनत के बाद तब कही जाकर मधु बनता है, जो हम सभी को बहुत पसंद हैं। भ्रमर(भौरे) से हमें यह सीख मिलती है की कठिन से कठिन मेहनत करने से कतराना व घबराना नहीं चाहिए। हम सभी को हर परिस्थिति से डटकर सामना करना चाहिए।

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यह कविता (भ्रमर गुंजार।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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जागृत का एक दिन।

Kmsraj51 की कलम से…..

A Day Of Awakening | जागृत का एक दिन।

सम्मुख तेरे प्राण वान हूं,
या निष्प्राण हूं क्या बतलाऊं।
जागृति दर्पण के सम्मुख मैं,
क्या देखूं क्या देख न पाऊं।

फिर भी देखो उस महात्मा को,
नीरव में रसना – अर्पण है।
स्वर से स्वर का सम्मेलन ही,
प्राणवान जागृत दर्पण है।

जहां अनुत्तरित प्रश्न वहीं पर,
मिथ्या जगत का स्वप्न बड़ा है।
एक दिवस उठकर दौडूंगा,
नापूंगा जो जहां जड़ा है।

कलम उठा लिखने बैठूंगा,
अपनी गौरव गाथा को।
सबको दिखा सकूं दर्पण में,
संस्कृति और सभ्यता को।

धरती से नवम मंडल तक मैं,
दीपक ज्योति जलाऊंगा।
ज्ञान ध्यान से कबीर जैसा,
‘मंगल’ दरश कराऊंगा।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — हम सब जानते है की इस मिथ्या जगत की सभी चीजें नाशवान है सब नष्ट हो जायेगा एक दिन, फिर क्यों इन नाशवान चीजों के लिए कभी किसी को तकलीफ़ दे। अपने कर्म ऐसे करते चले की सभी को प्रेरणा मिले अच्छा-अच्छा कर्म करने का। कभी भी कोई ऐसा कार्य न करें की आपके कार्य से किसी को दुःख पहुंचे। एक लेखक अपनी कलम से अपने देश की महान संस्कृति और सभ्यता को दिखाने की कोशिश करता है। धरती से नवम मंडल तक का दर्शन कराता है अपनी लेख से लेखक। अपना जन्म, अपने जननी, व जन्मभूमि राष्ट्र के लिए सच्चे मन से समर्पित करें।

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यह कविता (जागृत का एक दिन।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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नारी शक्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

Nari Shakti | नारी शक्ति।

हे शक्ति स्वरूपा नारी,
तुम हो जग- जन हितकारी।

हो क्षीर – नीर की दानी,
वात्सल्यमयी कल्याणी।
हो सका उश्रृण ना कोई,
आंखों में लहरें पानी।

तेरे इस त्याग तपोमय,
आचरण का जग आभारी।
हे शक्ति स्वरुपा नारी,
तुम हो जग-जन हितकारी।

अधरों से अमन्द पिलाती,
लज्जा का भूषण धारी।
करती सतीत्व का पालन,
बन व्रती एक पति-नारी।

ध्रुव हुये अमर नमः मण्डल,
उग जननी – जीवन -क्यारी।
हे शक्ति स्वरुपा नारी,
तुम हो जग-जन हितकारी।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — वह संघर्ष नहीं, त्याग और ममता की एक प्रतिमा है। वह शक्ति भी है, जो समय आने पर दानवों का विनाश भी करती है। भारतीय नारी ने अपने महत्वपूर्ण भूमिका का पालन हर एक युग में किया है। भारतीय नारी अपने विशेष गुणों के कारण आज के आधुनिक युग में भी पुरुषों से कंधे से कंधा मिला कर हर क्षेत्र में कार्य कर रही है।

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यह कविता (नारी शक्ति।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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प्रकृति नियंता।

Kmsraj51 की कलम से…..

Prakrti Niyanta | प्रकृति नियंता।

प्रकृति नियंता जग जीवों को,
प्राण वायु जीवन धन देता।
लेता नहीं किसी से कुछ भी,
दूषित वायु स्वयं पी लेता।

नदी – झील – झरना – वन – उपवन,
इनके कोमल अंग हैं प्यारे।
इनसे सृजन जलद का होता,
हारते प्यास धरा – जल – ढारे।

धरा – धाम के आभूषण ये,
‘मंगल’ मोद सदा भरते हैं।
समता के पोशाक हैं सारे,
भौतिक ताप सदा हरते हैं।

नीरव जननी में नभ – आंगन,
उद गण ज्योति जलाते रहते।
हरित गैस के कुप्रभाव से,
छिद्र ओजोन घटाते रहते।

शब्दार्थ: उद – उत्कर्ष, प्रकाश,

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — प्रकृति सभी तरह के जीवों को अपनी गॉड में पलटा है, सदैव ही सभी को प्राण वायु जीवन धन देता। प्रकृति कभी भी कुछ लेता नहीं किसी से कुछ भी, दूषित वायु स्वयं पी लेता। नदी-झील, झरना, वन-उपवन ये इनके कोमल अंग हैं प्यारे। इनसे ही सृजन जल का होता है सभी की प्यास बुझती है। धरा के आभूषण ये सदैव ही ऊर्जा प्रकृति में भरते है, सभी जीवों के लिए। मानव ने जो आधुनिकता के नाम पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर तापमान गर्म बना दिया है उसे भी प्रकृति काफी हद तक कम करती हैं। प्रकृति जननी है, सदैव ही प्रकाश व ऊर्जा से सभी जीवों का पोषण करती है। हरित गैस के कुप्रभाव से और छिद्र ओजोन घटाते रहते। इस प्रकृति का हम सबको ख्याल रखना है, तभी वर्तमान और आने वाली पीढ़िया रह पाएंगी इस धरा पर अच्छे से खुशहाल।

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यह कविता (प्रकृति नियंता।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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नाचती बसंती।

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Dancing Basanti | नाचती बसंती।

चानी के फूल खिले, चांदनी मंगन,
सुधियों के दीप जले राहों में,
नाचती बसंती रही बाहों में।

रुनुन – झुनुन भनक उठी पायलिया पांव,
महमहायि रजनी गन्धा रजनी के गांव।

चंचल चित्त चहक उठा चाहों में,
नाचती बसन्ति रही बाहों में।

छुवन चाहे अरुणायी अधर को हिलोरे,
खग कुल के कलरव में नाच उठी भोर।

प्रीति पगे द्रम – दल के छाहों में,
नाचती बसन्ति रही बाहों में।

अलसाये नयनों से सुषमा निहार,
भक्त जुटे नवरात्रि माता के द्वार।

‘मंगल’ कुहांस घिरे राहों में,
नाचती बसन्ति रही बाहों में।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जब प्रकृति खुशनुमा होती है तो इंसानी मन भी प्रसन्न होती है। अपने चारों तरफ सबकुछ अच्छा – अच्छा लगता है। जब भी नवरात्री आती है भक्तों का उमंग उत्साह देखने लायक होता है, जैसे अभी सावन में शिव भक्तों का उमंग उत्साह देखने लायक देखने लायक है। प्रकृति की हरियाली हर एक मन को मोह लेता है और एक अलग ही सुखमय शांति की अनुभूति कराता है प्रकृति।

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योग दिवस – 21 जून

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Yog Divas June 21 | योग दिवस – 21 जून

आज 21 जून के अंक
अखिल संस्कृति के मनस – प्रवाह।
योग का यह सुंदर उद्देश्य,
जगाया जन चेतन मन चाह।

प्रेरणा का पावन उद्गार,
योग से होते सभी निरोग।
यही सम्यक संत विचार,
विश्व महिमा मंडित उद्योग।

पिलाते कटुता कूट स्नेह,
पढ़ाते मानवता का पाठ।
यही सम मिश्र अहिंसा सत्य,
काछते सब सेवा का ठाट।

राग – रंग संगम ‘मंगल’ भाव,
सुझा देते सबको यह राह।
योग का यह सुंदर उद्देश्य,
जगाया जन चेतन मन चाह।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — हर रोज़ सुबह के समय योग करने के फायदे अनमोल है – यह हमारी पहली सांस को पुन: चक्रित करता है। योग का अभ्यास करने से शरीर किक-स्टार्ट होता है। ह्रदय रोग से बचाव करता है योग। दिमाग सदैव ही रहता है एक्टिव। बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता। योग के द्वारा सांसों को साध कर परमानन्द की अनुभूति किया जा सकता है। तन और मन को निरोग रखने के लिए प्रतिदिन योग करे।

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यह कविता (योग दिवस – 21 जून) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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गौरैया सबको भाये।

Kmsraj51 की कलम से…..

Gauraiya Sabko Bhaaye | गौरैया सबको भाये।

नीम डाल पर नाचूं गाऊं,
जीवन की बगिया महकाऊं।
घर आंगन में दाना चुगती,
चीं चीं करती सदा फुदकती।

बाज झपट्टा मार सके ना,
काठ नीड़ में करती मस्ती।
उठकर भोर पहर मैं धाऊं,
जीवन की बगिया महकाऊं।

भोर हुआ उठ जाओ बाबू ,
स्वस्थ रहो इठलाओ बाबू।
मात – पिता के प्यारे तुम हो,
सबका साथ निभाओ बाबू।

मंगलमय हो जीवन सबका,
यही सहारा सबसे पाऊं।
नीम डाल पर नाचूं – गाऊं,
जीवन की बगिया महकाऊं।

टंगा काठ का बना घोसला,
संरक्षण का बढ़ा हौसला।

कुशल क्षेम की बात न पूछो,
संरक्षण का यही सिलसिला।
गौरैया हूं सबको भाऊं,
नीम डाल पर नाचूं – गाऊं,
जीवन की बगिया महकाऊं।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — गौरैया हमारे घर-आँगन का पक्षी है। यह ‘ची-ची’ करके बोलती है। गौरैया बहुत सामाजिक पक्षी होती हैं। वे आमतौर पर छतों, पुलों और पेड़ के खोखले में अपने घोंसले का निर्माण करते हैं। शहरों में तो ये इंसानों के घरों के खिड़की के ऊपर या फिर घरों के छत पर अपना घोसला बना लेते हैं। सवेरा होने पर इनका कलरव सुनाई देता है। धर्म पुराणों के अनुसार, गौरैया पक्षी साहस और सावधानी के प्रतीक के रूप में माना जाता है। यह पक्षी आपको जीवन की परेशानियों में साहस दिखाना सिखाता है। साथ ही खुशियों की अहमियत याद दिलाने के लिए ये पक्षी आपके जीवन में आते हैं। कुछ अन्य जानकारों का मानना है कि पक्षी घर में सद्भावना का संदेश लेकर आते है। वास्तु शास्त्र के मुताबिक गौरैया का मनुष्य जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। गौरैया जिस घर में अपना घोंसला बनाती है, वहां सभी तरह के वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। घर की उत्तर दिशा और ईशान कोण में गौरैया अपना घोंसला बनाती है, तो यह अत्यंत शुभ होता है।

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यह कविता (गौरैया सबको भाये।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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