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Sanskaar Aur Vinamrata | संस्कार और विनम्रता।
संस्कार और विनम्रता का अटूट संबंध है, संस्कार ही विनम्रता की जननी है। संस्कार के बिना जीवन मरूस्थल की तरह है, जहाँ संस्कार नहीं वहाँ अहंकार ही उत्पन्न होता है। संस्कार के भूलते ही अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है, नदी कभी सूख जाती है, कभी विकराल रूप धारण कर लेती है, गाँव के गाँव नदी में समा जाती है। नदी को अपने प्रचंड प्रवाह पर घमंड हो जाना स्वाभाविक है, नदी मर्यादा भूल जाती है, यह भी भूल जाती है कि कभी उसकी सुखी रेत पर बच्चे गेंद खेलते हैं। नदी को अपने ताकत का अहंकार हो गया, वह सोचने लगा मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु और मानव को बहा कर कहीं भी ले जा सकता हूँ। बर्बाद करने की ताकत है मुझमे, एक दिन समुद से उसकी बहस हो गई क्योंकि अहंकार के कारण विनम्रता जा चुकी थी। गर्वीले अंदाज में मुस्कराते हुए समुद से कहा, बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या-क्या लाऊँ, मैं सर्व शक्तिमान हूं, मैं मकान, पेड़, पशु. मानव – जो तुम्हारी इच्छा हो, उसे लाकर तुम्हें समर्पित कर दूंगी।
संस्कार और विनम्रता समुद्र में कूट-कूट कर भरा था….. वह समझ गया, अहंकार के नशे में चूर है नदी, समुद ने बड़ी विनम्रता से बोला- अगर कुछ लाना ही चाहते हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आओ… मैं भी तो देखूँ – नदी ने हाँ कह दी। नदी पूरा जोर (शक्ति) लगाया पर छोटे-छोटे घास को उखाड़ न पाया, उसकी सारी जल शक्ति विफल हो गई। अंत में नदी मायूस होकर समुद्र के पास गया और बोला – मैं सब कुछ ला सकता, लेकिन घास नहीं क्योंकि घास झुक जाती है और मैं ऊपर से गुजर जाती हूँ। समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा- पहाड़, पेड़, कठोर होते हैं, आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन घास विनम्र होता है, वह झुकना जानता है, उसे प्रचंड आँधी, तूफान या जल का प्रचंड वेग कुछ नहीं बिगाड़ सकते। जिह्वा अंत तक साथ रहती है लेकिन दांत टूट जाते हैं, अभिमान फरिश्तों को भी शैतान बना देती है और विनम्रता इंसान को फरिश्ता बना देती है।
बीज़ की यात्रा पेड़ तक है, नदी की यात्रा सागर तक और मनुष्य की यात्रा परमात्मा तक, अहंकार एवं अभिमान विनाश की जननी है। प्रभु भक्ति से संस्कार जागृत होती है, जो लोग धर्म को मज़ाक समझते हैं उन्हें क्या मालूम प्रभु भक्ति कितना कठिन है। प्रभु चित्रगुप्त की नज़र से न कोई बचा है न कोई बच सकता है। उचित फल उचित समय पर अवश्य मिलता है, सदा वासना में लीन रहने वाले, दूसरों का अहित करने वाले और भगवान को न मानने वाले, दुष्कर्म में लिप्त रहने वाले, भले कुछ समय के लिए (पिछले जन्म के) कर्म के कारण सुखमय जीवन व्यतित कर लें, लेकिन उनके पापों का परिणाम अवश्य भोगना पड़ेगा।
सच्चे मन से भगवान का नाम लेने का कोई मुल्य नहीं होता, कलयुग में नाम ही जप लेना मोक्ष का द्वार खोल देता है। इंसान को विनम्र एवं संस्कारी बना देता है। एक बालक बड़ा ही जिद्दी स्वभाव का था, भगवान का नाम लेने में कोई दिलचस्पी नहीं। एक बार उसके पिताजी ने यज्ञ किया, वह बालक अपने को एक कमरे में बंद कर लिया, सभी पुजारी एवं अन्य विद्वान जन प्रयास करके थक गए, सभी असफल रहे। जब बालक स्वयं घर के बाहर निकला तो पुजारी जी ने कस कर उसकी कलाई पकड़ ली, असहनीय दर्द के कारण अनायास ही बालक के मुख से निकला- हे राम मुझे बचाओ, ये कैसी जबरदस्ती…….
……. पुजारी जी ने मुस्कुराते हुए कहा आज जो नाम लिए हो, इसकी कभी कीमत मत लगाना। कुछ समय बाद बालक की मृत्यु हो गई, यमराज ने भगवान चित्रगुप्त से पूछा… इसका पाप – पुण्य क्या है? प्रभु चित्रगुप्त ने कहा, यह कभी प्रभु का नाम नहीं लिया, किन्तु विपत्ति में एक बार राम का नाम लिया है। इसे क्या फल दिया जाए? बालक से ही पूछा गया,..वह मौन रहा। अब यमराज और प्रभु चित्रगुप्त व्याकुल हो कर उस बालक को ब्रह्मा जी के पास ले गए, ब्रह्मा जी भी कुछ नहीं बोले, फिर यमराज और भगवान चित्रगुप्त उस बालक को भगवान शिव के पास ले गए, वह भी कुछ नहीं बोले, फिर सभी विष्णु जी के पास गए… विष्णुजी मुस्करा दिए। एक बार नाम लेने का फल इस बालक को मिल गया, ब्रह्मा, विष्णु, महेश- तीनों का दर्शन हो गया।
झूठे आडंबर में न फंसकर केवल अपने इष्टदेव का नाम लेना ही सच्ची भक्ति है। पापकर्म से दूर रहना, किसी का अहित न करना, सदा दूसरों की मदद करना, नारी सम्मान करना, झूठ न बोलना, सत्कर्म करना ही सच्ची भक्ति है। ईर्ष्या, जलन, द्वेष से मुक्त रखना, विनम्र होना, संस्कार नहीं भूलना, पाखंड से दूर रहना ही मोक्ष का द्वार खोलता है। हर आदमी विद्वान नहीं हो सकता लेकिन विद्वान की संगत में रहकर, सत्य की राह पर चल कर, प्रभु को प्राप्त कर सकता है “मैं” से मुक्त होना ही मोक्ष है।
♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦
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- “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह लेख संस्कार और विनम्रता के महत्व पर ध्यान केंद्रित करता है। संस्कार को विनम्रता की जननी माना गया है। बिना संस्कार के जीवन की तुलना मरुस्थल की होती है, जहां अहंकार ही उभरता है। अहंकार संस्कार भूलने के परिणाम से उत्पन्न होता है। यह लेख एक कहानी के माध्यम से इस विषय को प्रकट करता है, जिसमें नदी और समुद्र के बीच की बहस दर्शाई गई है। समुद्र ने विनम्रता की महत्वता को समझाया और अहंकार का त्याग किया। इससे पाठक को समझाया गया है कि विनम्रता और संस्कार की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेखक ने भगवान के नाम लेने के महत्व को भी उजागर किया है, जो अहंकार को दूर करके विनम्रता को विकसित करता है। लेखक द्वारा बताए गए सिद्धांतों के माध्यम से पाठक को सच्ची भक्ति और मोक्ष की ओर प्रेरित किया जाता है।
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यह Article (संस्कार और विनम्रता।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।
आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—
मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।
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We light a lamp and temporarily dispense with darkness. A lamp doesn’t have the power to eradicate darkness completely, similarly by the law, we never feel satisfied, even after our questions have been answered. Our castes and religions have come to existence by breaking down the single truth into multiple parts. That is why we don’t get the sense of completeness. Since the inner conscious of every sect is different, it is difficult to perceive completeness through it.
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Guru plays an important role in anyone’s life. Narad is an exemplary Guru to all those in search of salvation with the extra ordinary Bhakti, owing to which he enjoys a close relationship with God. Born as Ratnakar, lives the life of a robber. Valmiki rejects his evil ways and becomes a faithful disciple of Narad. Ratnakar followed Narad with total faith and sincerity. There should not be any doubt between the disciple and guru. God is attainable through devotion under the guidance of Guru.

