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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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kavi sukhmangal singh article

वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त – 2023

Kmsraj51 की कलम से…..

Literary trip from Varanasi to Chandigarh August – 2023 | वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त – 2023

यात्रा वृत्तांत के क्रम में अनेक साहित्यकारों ने समय-समय पर यात्रा की। यात्रा होती है। दो भौगोलिक स्थान के रह रहे लोग आपस में एक दूसरे की बोली- भाषा, संस्कृति- सभ्यता का आदान – प्रदान किया करते हैं। यात्रा विविध वाहन से की जाती है। जैसे – विमान, बस, नाव, जलयान, और पैदल भी यात्रा होती है।

अनहद कृति से बुलावा आया – अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका की साहित्य आश्रय स्ट्रीट 2023, हेतु बुलावा 2 जुलाई 2023 को मेरे मेल पर आया मैं किताब की बात, पुस्तक प्रदर्शनी, “परिवार के सदस्यों के लिए हिंदी शब्द यज्ञ का अनूठा अवसर साहित्य शेयर, एक बार पुनः दस्तक दे रहा है लिखा।”

अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के इस कार्यक्रम को ढाई दिन के लिए विविध सांस्कृतिक साहित्यिक गतिविधियों और आगे बढ़कर मिलन बर्तन आपस में होगा। दो दिन का पुस्तक प्रदर्शनी में, आप कर पाएंगे अपनी किताब की बात। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए साहित्य आश्रय 2023 में पंजीकरण कर के अपने बारे में जानकारी देनी थी।

अपनी प्रतिक्रिया एवं प्रश्न काम के जीमेल पर भेजने को आदेशित हुआ था। अनहद कृति अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक ई. पत्रिका का दिनांक 2 जुलाई 2023 का मेल आया। जिसमें हमने पंजीकरण कर लिया था। मन मस्तिष्क पर उसके बारे में चिंतन भी चल रहा था। मन में आया कि भारत शांति का संदेश देने वाला देश है तो एक चार लाइन की रचना प्रस्तुत करते हैं –

शांति का संदेश लेकर चल दिया,
सद्भाव और प्रेम परोसते चल दिया।
संस्कृति संस्कारों में पला यह देश,
बंधुत्व की कामना लिए चल दिया।
ॐ शांति: शांति:

सरयू का पावन किनारा, सरयू में गोता लगाने की ललक, धर्मशास्त्र के अनुसार ‘सरयू में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं, साथ ही मनुष्य को मुक्ति भी मिलती है।’ सरजू तट से तीन किलोमीटर पहले स्थित मेरा आदर्श गांव, ग्राम महिरौली रानी मऊ, जनपद अम्बेडकर नगर मुझे जाना था। गांव में कुछ मकान का कार्य करना था तीन कमरों की दीवार प्लास्टर होनी बाकी थी। स पत्नी उर्मिला सिंह के साथ मैं गांव पर पहुंच गया आवश्यकता है कारीगर, मजदूर की। पड़ोसी प्रताप सिंह की मदद से मजदूर और मिस्त्री भी मिल गये। काम शुरू हो गया। प्लास्टर का काम पूरा हो गया होता सीमेंट कम थी पैसे भी चूक गये। काम बंद करना है। उसके बाद हमने अपने मित्र जो बालीपुर में रहते हैं उनका कुछ सामान जिसे लाया था, जैसे- बेलचा, रसियां, लोहे की कढ़ाई, लोहे का सब्बल आदि को लेकर अपनी अल्टो गाड़ी से पहुंचने गया था। समान पहुंचा कर जब वापस आ रहा था कि तभी ग्राम अहिरौली रानी मऊ जनपद अंबेडकर नगर के दक्षिणी छोर पर हरिजन बस्ती के पास अपनी गाड़ी को रोकना पड़ा, और बात होने लगी, विभा चसवाल जी से, आपने बताया कि- 4,5,6 अगस्त को अनहद कृति का साहित्याश्रय रिट्रीट 2023 होगा, में आपको बुलावा है। हम दोनों में लगभग आधा घंटा की बात चलीं, विभा जी ने दो रचनाएं और भेजने के लिए मुझे कहा। दूसरे दिन हमें बनारस जाना था इसलिए मैंने कहा ठीक है कल रचना भेज दी जाएगी। रात्रि से ही दूसरे दिन भोर से तैयारियां जोर- शोर से होने लगी।

यात्राएं क्यों आवश्यक है —

यात्रा की महत्व बताती हुई नोबेल पुरस्कार प्राप्त ब्राजील की कवियित्री मार्था मेरिडोस की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूं —

रचना का शीर्षक रचना पढ़ने से लगा, यात्रा क्यों आवश्यक है? —

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
करते नहीं कोई यात्रा।
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की दुनियां,
करते नहीं किसी की तारीफ।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप:
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान।
नहीं करने देते मदद अपनी और,
ना ही करते हैं दूसरों की।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, और अगर आप:
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के।

चलते हैं रोज उन्हीं रोज वाले रास्तों पे,
नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार।
नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग या,
आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं अगर आप:,
नहीं बदल सकते हो अपनी जिंदगी को जब,
हों, आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से।

अगर आप अ निश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हो निश्चित को,
अगर आप नहीं करते हो पीछा किसी स्वप्न का।
अगर आप नहीं देते हों इजाजत खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार किसी,
समझदार सलाह से दूर भाग जाने की,
तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

(इसी रचना पर नोबेल पुरस्कार मिला)

सनातन धर्म मंदिर जो इंदिरा गांधी हालीडे होम के पास ही था दर्शन पूजन करने के उपरांत कैंटीन में आकर चाय – पानी करके अपने रूम में चला गया जो हालीडे होम में मिला था कि आकर आराम कर रहा था तभी हाल के सामने समोसा जलेबी और काफी का काउंटर लग चुका था। बावरा जी से मैं बोला कि चलिए सभा स्थल! वहां पहुंचा तो देखा कि हालीडे होम सेक्टर 24 का सजा हुआ था। नजारा देखने में बहुत बढ़िया सजावट। दोनों लोग साथ में हाल के पास पहुंचे थे। हाल के गेट पर काउंटर लगे थे पर ताजी सजी हुई जलेबी, समोसा, चाय, चाय की चाह, पीने की इच्छा अंदर से जाहिर हुई। समय भी दिन में 12:00 बज चुके थे। समोसा को जैसे ही तोड़ा उसमें हरी मटर भिगोकर डाली गई थी बहुत आनंद आया खाने के बाद वह बहुत ही लाजवाब लगा। पहले जलेबी खाई फिर समोसे और अंत में कॉफी पी।

हाल में सभा स्थल पर लोग बैठना शुरू हो चुके थे हम दोनों लोग भी वहां जाकर उपस्थित हुए साहित्यकारों का परिचय होने लगा जगह-जगह से आए हुए थे साहित्यकार अपना – 2 नाम पता संपूर्ण विवरण के साथ बता रहे थे। एक दूसरे के विचारों का आदान-प्रदान हो रहा था। जब साहित्यकारों के परिचय का कार्यक्रम समाप्त हुआ उसके बगल में ही भोजन का काउंटर लगा हुआ था जब वहां पहुंचा, पहुंचने पर देखा की विविध तरह के व्यंजन काउंटर पर लगाए गए हैं उसमें पापड़, छोले, पुरी, बेसन और मैदे की रोटी, चावल ,दाल, सलाद, रायता, मीठा और काफी का स्टाल लगा था। साहित्याश्रय रिट्रीट का यह कार्यक्रम ढाई दिनों तक चला जिसमें अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह का भोजन परोसा जाता था। कभी-कभी फल का भी काउंटर लगा हुआ मिला। मनभावन व्यंजनों को देखकर ऐसा लगता था कि मानों शादी का कोई बड़ा फंक्शन हो।

लोग छक कर भोजन खाते,
कार्यक्रम में खो जाते।
ऐसा कार्यक्रम फिर हो,
सब लोग मानते रहते।
चंडीगढ़ की पावन धरा पे,
चंडी का गुणगान सुनाते।
अनहद कृति की शुभ बेला,
यादों को अपने घर ले जाते।

भोजन करने के उपरांत दूसरी मीटिंग में शामिल रचनाकारों की रचनाएं सुनीं गयी जिसको रचनाकार स्वयं अपनी भागीदारी सुनिश्चित किया करते थे। अपनी-2 रचना वाईफाई लगे हुए अनहद कृति के पोर्टल पर लोग पढ़ते थे। अच्छी रचनाओं पर तालियों की गड़गड़ाहट से सभा स्थल गूंज उठा करता था सभा में शामिल लोग आनंदित हो जाते थे।

सुबह सवेरा होता, लोग नृत्य क्रिया से निवृत होकर एक-एक करके बाहर निकलते कि इस समय विभा चसवाल जी बाहर निकलीं और मैं भी बाहर निकल आया, बात चली चौपाल की, कुर्सियां लान में लगाया जाय, कुर्सियां हम लोग रखने लगे लान में लाइन में। एक कमरे के सामने चाय बिस्कुट रखा हुआ था। लोग बारी-बारी से बिस्कुट खाते चाय पीते। तभी वहां पर राजेंद्र प्रसाद गुप्त बावरा जो चंदौली जनपद से थे डेड पैकेट नमकीन लाकर रख वहां रख दिया उसे भी लोग चखे, नमकीन बड़ा चटपटा था। लोगों को बहुत अच्छा लगा।

रचनाओं का दौरा चला उपस्थित रचनाकारों की अध्यक्षता संपादक द्वय आदरणीय पुष्पराज चसवाल, डॉ प्रेमलता चसवाल ‘पुष्प’ ने की। संचालन का काम अमेरिका से पधारी प्रवासी भारतीय मूल की डॉक्टर विभा चसवाल ने किया। इस कार्यक्रम में रिकॉर्डिंग भी की गई साथ ही साथ यू एस ए से भारतीय मूल की ललिता बत्रा ने ड्रोन से भी फोटोग्राफी की।

दिन में सभा स्थल पर कार्यक्रम चलाया गया चलता रहा यहां संगीत भी प्रस्तुत हुई सरस्वती पूजा अर्चना, पुष्प अर्पित किए सरस्वती जी को। शाम 5:00 बजे टूर पर जाने का कार्यक्रम था लोग बस में सवार हुए और पहुंच गए सुखना झील पर। झील का सैर बहुत अच्छा था।

यात्रा के दौरान आवश्यकता —

काम हो जाने पर लौट आने की नियत। तीन जोड़ी कपड़े। मंजन, तौलिया, साबुन, चंदन, पूजा की सामग्री। जाने और घर आने की तारीख। जिसके पास जाना है उसका नाम पूरा पता शहर का नाम मोबाइल नंबर शहर का पिन कोड आदि। थोड़ा पैसा, आधार कार्ड, पैन कार्ड व डेबिट कार्ड। जहां जाना है उस जगह की जानकारी शहर के किस हिस्से में है, जाना पहचाना लैंड मार्क, व्हाट्सएप पर लोकेशन व्यस्त है, यात्रा की अनुमति पत्र (टिकट), कागज पर छपा हुआ, अथवा यस एम यस प्रारूप में।

यात्रा में क्या न ले जाएं —

  • अरे हो जाएगा वाली आस।
  • उसने बुलाया है तो जा रे वाली सोच।
  • देख लेंगे वाला दृष्टिकोण!
  • अकड़।

पुस्तक को भेंट स्वरुप एक दूसरे रचनाकार को दे दी —

साहित्यकारों में अलग-अलग तरह से, शहरों से जुड़े हुए लोगों में, आदान-प्रदान करना शुरु कर दिया। अनेक साहित्यकारों ने अपनी पुस्तक को भेंट स्वरुप एक दूसरे रचनाकार को दे दी।

प्रभात शर्मा, हिमाचल प्रदेश सेवानिवृत्त सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड धर्मशाला जनपद कांगणा, की अपनी पुस्तक ‘शीशम का पेड़’ मुझे दिये। पुस्तक में सद् भाव, संस्कृति, संस्कार, आदर सत्कार, वृद्धों के संग व्यवहार, पारिवारिक एकाकीपन जीवन जीना, सुदूर नौकरी करने से लाभ-हानि, जमीन-जायदाद के झगड़े का निपटारा करने का सुझाव, शर्मा जी ने सादो उर्फ शुभ राम शरण भारद्वाज को केंद्र में रखकर पुस्तक ‘शीशम का पेड़’ प्रकाशित किया, जो पढ़ने योग्य है और ज्ञान बढाने वाली है।

भारतीय कवियों को प्रकृति की गोंद में क्रीड़ा करने का सौभाग्य प्राप्त है। यह हरे-भरे उपवनों में, सुन्दर जलाशय के तट पर, नदियों के किनारे, पहाड़ों की वादियों में, विचरण करते और प्रकृति के नाना प्रकार के मनोंहारी रुपों से परिचित होकर सजीव चित्रण करने में सफलता हासिल करते हैं। भारतीय कवियों का प्रकृति वर्णन सौंदर्य ज्ञान उच्च कोटि का होता है। कवि बुद्धि बाद के चक्कर में पड़ कर व्यक्त प्रकृति के नाना रूपों में एक अव्यक्ति किंतु सजीव सत्ता का साक्षात्कार करता है। उन छवियों से भावमग्न होते हैं।

सामूहिक पुस्तक विमोचन —

अनहद कृत के सामूहिक पुस्तक विमोचन में जो 6 अगस्त को सभागार में आयोजित कार्यक्रम चंडीगढ़ में संपन्न हुआ था। इस कार्यक्रम में स्नेही चौबे कवियित्री व सीनियर साफ्टवेयर इंजीनियर, बंगलोर कर्नाटका की, मेरी अविरल अभिव्यक्ति जिसका आमुख-अविरल अभिव्यक्ति के विविध आयामों में डॉ प्रेमलता चसवाल ‘पुष्प’ ने किया है। आप अनहद कृत ई. पत्रिका की संपादक हैं। फिर मेरे जैसी अदना रचनाकार को क्या लिखना शेष है। राजेंद्र प्रसाद गुप्ता बावरा की पुस्तक ‘चित्र-रेखा’ आप उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद से सोगाई गांव से हैं जहां कर्म नासा नदी की धार कल-कल करती अविरल बहती है।

यह पुस्तक पौराणिक कथा पर आधारित है खंड काव्य इसे कहा जा सकता है। इस पुस्तक की एक रचना प्रस्तुत है—

प्रज्ज्वलित ज्योति भू पर अगर,
प्रसरित है कण-कण धवल धार।
ऊषा ले आई रश्मि-हार,
त्रृण – त्रृण पर छाई मुक्तावलि,
उस छवि – धर का नतमस्तक वंदन।

—♦—

वसा कर बस्ती एक विचित्र,
चित्रपट पर अंकित कर रूप।
जला देना न स्वर्ग – संसार,
कि, हो मर्माहत मेरा रूप।

चित्र – रेखा गूढ़ रहस्यों से भरी शोणित पुर नरेश वाणासुर की पुत्री, वाणासुर का मंत्री, कुम्भाट की पुत्री, द्वारिका पुर नरेश, श्री कृष्ण के पुत्र, प्रदुम्न के पुत्र, देवाधिदेव की अर्धांगिनी, ऊषा की शिक्षिका को आधार मानकर अपनी रचनाओं को स्वरूप प्रदान किया।

दो संस्कृति का मिलन के अंतिम बंद प्रस्तुत में —

कैसी सुंदर घटा छटा का,
ऊंच अटा पर छायी।
मानो उभय बिंदु पर रजनई,
ऊंचा ली अंग ड़ायी।

उक्त रचना से इस चित्रलेखा का राजेंद्र प्रसाद गुप्त बावरा ने समापन किया।

रमेश चंद्र ‘मस्ताना’ की पुस्तक कागज के फूलों में…’

मस्ताना जी के ऊपर सरस्वती की अनुपम कृपा झलकती है आपने इस पुस्तक में लोक संस्कृति, संस्कार आदि पर आधारित छप्पन रचनाओं को संकलित करने का उत्तम प्रयास किया है।

मस्ताना जी की रचना –
भोर की पहली किरण
दूर पहाड़ों की ओट से
स्वर्ण मुकुट पहन
धरती की ओर सरकती
पूछती है मेरी घर आंगन तक!

—♦—

मेरे हिस्से की धूप
मुझे हर पल नई ताजगी
नई उमंग,
नया जोश दे जाती है- २

और नारी संसार नामक शीर्षक से नारी जगत की विशेषताओं को अपनी रचना मेरा है। जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है।

यात्रा प्रायः विविध चरण में होती है। यात्रा में जगह-जगह ठहराव होता है। कुछ यात्रा एक दिशा में होती है। एक दिशा में होने वाली यात्रा की मूल एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाना और वहां सम्पन्न होने वाले कार्यक्रम में भाग लेना होता है इसके बाद यात्रा जिस जगह से शुरू होती है वहीं आकर यात्रा स्थगित हो जाती है। यात्रा में अनुसंधान, मनोविनोद, तीर्थ दर्शन व विचारों का आदान-प्रदान होता है।

किसी बड़ी संस्था में प्रकाशित रचना को फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप इंस्टाग्राम ब्लॉग पर पोस्ट कर देते हैं हम तो उन रचनाओं को कॉपी करके अखिल भारतीय सद्भावना संगठन, आलो पोयट्री, अभी पोस्ट कर देते हैं। साहित्य काव्य संकलन पर मेरी 145 रचनाएं प्रकाशित है। शब्द इन, वेबली काम, हिंदी साहित्य शिल्पी आदि।

चंडीगढ़ की यात्रा करने के लिए उसे मेल में हमें यह रचना लिखने को मजबूर किया—

आपने पुकार दिया,
मेरे विचार को,
आपका आशीर्वाद हो,
मेरी मनोबल को
शुभ आशीर्वाद देकर
चिंतन को
निखार दिया।

मौका दिया मौका,
लेकर विचार किया।
सर्जन के सुख को
मोतियों में ढाल लिया।

ट्राई के फैसले से फेसबुक के सीईओ “मार्क जुकरबर्ग जी” को जब निराशा हुई तो हमने वेब दुनिया पर लिखा की “जुकरबर्ग जी को अपने उद्देश्यों पर कायम रहकर कार्य रूप देने में धीरज पूर्वक कार्य करने होंगे।” धन्यवाद!

तेरे दामन में जितने सितारे हैं,
होंगे ए फलक।
मुझको अपनी मां की,
मैली ओढ़नी अच्छी लगी।

साहित्य आश्रम रिट्रीट समारोह का समापन 6 अगस्त 2023 को दोपहर में हो गया। सभा स्थल से राजेंद्र प्रसाद गुप्त बावरा और मैं अपना – अपना बैग आदि लेकर सनातन धर्म मंदिर चंडीगढ़ आ कर टेंपो का इंतजार कर रहे थे, परंतु कोई ना मिलने से थोड़ा आगे बढ़े वहां से बीस-बीस रुपए में चंडीगढ़ बस स्टेशन पहुंचे। पहुंचे ही एयर कंडीशन बस मिल गई। ₹440 / प्रति, व्यक्ति चंडीगढ से दिल्ली का किराया लगा। बस आगे बढ़ी आ गया करनाल, बस रूकी। वहां चाय पीना चाहा तो देखा ₹50 की एक काफी दुकानदार दे रहा था। सह चर बावरा जी के मना करने के बाद हम दोनों वापस बस में सवार हो गये।

हमारी बस दिल्ली के काफी करीब आ गई थी।
सूर्य ढलने लगे, अंधेरा होने लगा।
विद्युत प्रकाश फैलने लगा, बड़ी – बड़ी बिल्डिंग दिखने लगीं।
अगल – बगल मंदिर, सड़क पूरी जाम।

बस अब रेंगने लगी, उतर गया कश्मीरी गेट पे। इधर-उधर देखा, किसी-किसी से पूछा। पहुंच गया बाथरूम के, गेट पर बैग रखा। बारी-बारी, दोनों ने बाथरूम किया। फिर पूछना शुरू किया, ही ई एल सेक्टर 15 अशोकनगर। स्टेशन से बाहर निकला, चाय की चुस्की ली। टेंपो वालों से बात की, एक तैयार हुआ।

रुपया लिया उसने, 200 दोनों का। टैंपू आगे बढ़ा, लाल किला गीता कॉलोनी।
होते यमुना ब्रिज, दाहिनी तरफ अक्षर-धाम। ललिता पार्क बाय तरफ, और फिर आई टी ओ। मयूर विहार फेस वन, के बाद औवर ब्रिज से दाहिने। चिल्ला गांव बायें और त्रिलोकपुरी बायें। स्टोक रेडी हॉस्पिटल, अगले चौराहा पर जिज्ञासु जी। जिन्हें देखकर हम लोग आये थे, फिर उसी टेंपो में सवार हो, पहुंच गए सी ई एल गेट। रात में विश्राम किया, भोजन ले आराम मिला।

सुबह सवेरे नित्य क्रिया किया, आगे सेक्टर 52 के लिए चल पड़े। अशोकनगर मेट्रो स्टेशन से, तीस – तीस रुपया दे सेक्टर 52 पहुंचे। वहां से टेंपो मिला, एक मूर्ति के पास अवतार दिया। मेट्रो ट्रेन सेक्टर 52 से गुजरी, बोला दरवाजा बाय खुलेगा। जब सेक्टर सोरह से गुजरी, आवाज मिली दरवाजा बाय खुलेगा। सेक्टर 17 पर आने वाली, दरवाजा बायें खुलेगा। बाट निकल गार्डन, दरवाजा बायें खुलेगा। नोएडा सिटी सेंटर, दरवाजा बायें खुलेगा।

एक मूर्ति से मेरा छोटा लड़का आकर हमें और राजेंद्र प्रसाद को दुबारा अपने फ्लैट पर ले गया वहां भोजनालय किया। दो घंटे हाल चाल भी इसके बाद टिफिन में लंच आ गया। चल दिए फिर अशोकनगर की तरफ, और बाहर निकला। पुलिस वालों ने टैंपू किधर करवा दिया, आगे बढ़ा टेंपो मिला। वह ले जाकर कहीं और छोड़ दिया, दूसरा टेंपो मिला, गंतव्य स्थान से पहले ही छोड़ दिया। घर दृढ़ता आगे बढ़ा। जल्दी-जल्दी बैग उठाया, अशोकनगर मेट्रो स्टेशन जिज्ञासु जी ने पहुंचाया। ₹20 के टिकट पर, नई दिल्ली मेट्रो रेल ले आई। प्रयागराज एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हुआ, पहुंच गया 7 तारीख को प्रयागराज।

प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर गुप्त जी का बड़ा लड़का जो एस पी ओ है लेने आया। उसने हम दोनों को घर ले जाकर भोजन कराया। नमकीन – चाय पिलाई स्वादिस्त भोजन था। कुछ देर के बाद हम लोग राजेन्द्र गुप्त बावरा जी के समधी से मिलने गए, साथ में वह गुप्त जी का सुपुत्र – बहू भी गयी। फिर प्रयाग सिटी स्टेशन से बस से बनारस पहुंच गया।

—♦—

चंडीगढ़ यात्रा – सुखद अनुभूति, की तैयारी — व विशेष 

यात्रा में साहस की आवश्यकता होती है। यात्रा मनुष्य के बुद्धि को उन्मुक्त करती है। लेखको में वैचारिक आग्रह और दूराग्रह भी होते है, जिसे साहित्य में आपत्तिजनक माना जाता है। देखना है हम लोग विविध भाषायी एकाकार जहां करेंगे वहां का नजारा कैसा होगा।

चंडीगढ़ में पुस्तक प्रदर्शनी लगेगी! यह सुनकर मैं और राजेंद्र प्रसाद गुप्त “बावरा” उत्साहित हो उठे? बावरा ने इच्छा जाहिर किया कि मेरी प्रकाशित पुस्तक ‘चित्र-रेखा और जनतंत्र-महिमा’ पुस्तक मेले में लग सकती है क्या! हमने कहा जरुर आप अपनी पुस्तक लगाइए मैं फॉर्म भर देता हूँ पुस्तक प्रदर्शनी में स्टाल लगेंगे उसके पेपर फिलअप कर देता हूँ परन्तु याद रहे 10-10 पुस्तकें प्रदर्शनी में लगाने के लिए ले जाना है, साथ में एक स्थानीय पत्रिका भी ले जानी है।

बावरा जी यत्र-तत्र जहाँ भी उनकी पुस्तके थीं वहां से 12-12 पुस्तकों को इकठ्ठा करके बैग में रखना शुरू कर दिये। इसे सुनकर मुझे अच्छा लगा की उन्होंने अपनी पुस्तकें ले जाने वाले बैग में रख ली है।

हमनें बावरा जी को साहित्य काव्य संकलन में 19-12-2014 को प्रकाशित काव्य रचना सुनाई —

मुझे देखो मैं भी प्यार करता हूँ,
एहसास के ठाव – गाँव में ही रहता हूँ।
ज्ञान की गंगा में गोता खा रहा हूँ,
नदी बहुत गहरी उसी में नहा रहा हूँ।
कई बरसो से डूबता उतर रहा हूँ,
मुझे देखो मैं भी प्यार करता हूँ।

दिखे दिखता दिलदार दिलवर दिलेर दिखाई,
लिख-लिख-लिख लिखते लरिकन लरिकाई।
लड़ते-लड़ते लाखो लालित्य लाल लाई,
सज-सुघर सुहृद सजल साहित्य पाई।
विश्व के साहित्य प्रेम को साकार करता हूँ,
मुझे देखो मैं भी प्यार करता हूँ।

मेरा भी मन हिलोरे भरने लगा पुस्तक प्रदर्शनी में पुस्तक लगाने के लिए, फिर मैंने कंप्यूटर के जानकार, को पुस्तकों को छापने हेतु मित्र रतन को बुलाया उन्हें ढेंकानाल उड़ीसा यात्रा (तृतीय खण्ड ई बुक), ओडिशा साहित्यिक धर्मयात्रा क्रमशः 2015 और 2018 में प्रकाशित, सु पाथेय षट्दर्शन (चतुर्थ खण्ड) स्वर्ग विभा अवतरण ई-बुक सूरज की रौशनी को आने तो दो, काव्य साधना (प्रथम खण्ड ई-बुक) की प्रतियाँ प्रकाशन करने वाले को दे दी। साथ ही दिया “कवि हूँ मैं सरयू तट का” (काव्य संग्रह)।

काम लम्बा था उसने ऊपर से चार पुस्तकों को दे दी, दिन में ‘रतन’ ने तैयार कर दिया। हमने भी उन पुस्तकों को पुस्तक मेले में बावरा जी के पुस्तक के बगल में लगा दिया था। मैंने सारी पुस्तकें इंटरनेट पर काम करने वाले साहित्यकारों को आखिरी दिन भेंट कर दिया। अनहद कृत के वयोवृद्ध सम्पादक, साहित्यकार पुष्पराज चसवाल जी को स्वर्ग विभा अवतरण की एक पुस्तक भेंट की।

भारतीय साहित्य में मनुष्य को सर्वोपरि स्थान प्राप्त है और उसे साहित्य रचना देश-समाज हित में ही करनी चाहिए।

देश हित में बात जो करता नहीं,
वह धरा पर पिशाच बन रहता कही।
ज़िंदगी पाया मूल्यवान आदमी का,
माँ- ममता रखता नहीं तू ही ?
उऋण जब होगा नही इस जन्म में,
अगले जन्म में क्या बनेगा सोच ले।

—♦—

03 अगस्त 2023 के पूर्व संध्या पर रतन के किराए के रूम चौकाघाट में मैं पंहुचा। वहां उनके माता-पिता और बहन भी उपस्थित थी उनके घर चाय-पान किया, सुपाथेय षट्दर्शन की प्रतियां ली और काली मंदिर के पास बाइंडिंग करने वाले को दे दिया। कुछ घंटों में बाइंडिंग हो गई में घर से आकर उन पुस्तकों को ले लिया।

उसके बाद – पं.दीनदयाल उपाध्याय नगर, जनपद चंदौली तक जाने की थी रतन जी ने वहां तक पहुचाने का पक्का वादा कर ली, और सुबह-सुबह पांडेयपुर मेरे आवास पर पहुँच गए थे वादा का पक्का, मन के धनी, ईमानदार नेक इंसान हैं रतन जी।

इसीलिए मैं कहता हुं कि मेरा मित्र वही होता है जो वादा खिलाफी कभी नहीं करता।
हमनें अपनी पुस्तकें एक बड़े बैग में रख ली और एक अरेस्टोकेट अटेची में यात्रा से सम्बंधित आवश्यक सामानों को रख लिया और एक बोतल पानी, अपना बैग लेकर रतन के मोटरसाइकल पर बैठकर ज्यों ही घर के सामने कंडेल पुष्प के पास पंहुचा ही था की धरती माँ पुस्तकों को चूमना चाहती थीं कि बैग धरती पर आ गया।

उसे उठाकर मैंने माथे से लगाया और फिर मोटरसाइकिल के पीछे बैग और उसके उपर अटेची बाँध लिया। आगे बढे रतन ने अपने चौकाघाट रूम पर जाकर हेलमेट लिया। सुरक्षा के दृष्टिकोण से हेलमइट आवश्यक है।

आगे बढे पीली कोठी सिटी रेलवे स्टेशन के समीप पंहुचा ही था कि इन्द्र भगवान खुश होकर रिमझिम-रिमझिम बारिश करने लगे इसीलिए कहा है कि —

प्रकृति हमें जीवन जीने की कला सिखाती,
हमें प्रकृति अपने आँगन में सदा बिठाती।
अम्बर ऊपर भूतल निचे फिर जल बरसाती,
सतयुग से कलयुग तक वह सफ़र कराती।
ऋषिमुनियों से भाँति-भांति संसार बसाती,
निर्मल जल गगन बिच मयंक धरा सजाती।

राजघाट पुल पर चढने के पहले बसंत महिला कालेज के पास जोरदार बारिश होने लगी रतन तो चलते चल रहे थे, आगे बढ़ रहे थे, जहाँ-तहां पेड़ के छाँव में रुक जाते। मैं अपने जेब से रुमाल निकाल कर बेग के दोनों तरफ बारिश के पानी को बैग के ऊपर से सुखा कर उसे निचोड़ते हुए आगे बढ़ते रहते बढ़ते-बढ़ते रेलवे स्टेशन के द्वार पर पहुच गया।

रतन ने बैग व अटेची को बरामदे में रख दिया हमने कपडे बदले भीगा हुवा कपडा स्टील की बनी हुई मुसाफिर खाने के कुर्सियों पर फैला दिया, बैग को खोला तो उसमें अपनी पुस्तक सही सलामत थी।

हर हर महादेव!

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस यात्रा वृतांत में समझाने की कोशिश की है — यसाहित्यिक यात्रा के दौरान क्या-क्या तैयारी करना जरुरी होता है और क्या-क्या नहीं करना चाहिए, व किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यात्रा के समय आपका व्यवहार लोगों से कैसा होना चाहिए? जब सभी से मिले तो, एक दूसरे से बात-चित कैसे करें व सभी का सम्मान अच्छे से करे, सभी की बातों को ध्यानपूर्वक सुने और सभी का मनोबल बढ़ाये, तथा अच्छे साहित्यिक कार्य को आगे बढ़ाने में एक दूसरे की मदद करे। एक – एक करके सभी की रचनाओं को सुनकर उनका उत्साह बढ़ाये दिल से। यात्रा के दौरान अपने मन व बुद्धि को शांत व स्थिर रखें, सभी से शालीनता पूर्वक अच्छा व्यवहार करे। “आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप: करते नहीं कोई यात्रा। पढ़ते नहीं कोई किताब, सुनते नहीं जीवन की दुनियां, करते नहीं किसी की तारीफ।”

—————

यह यात्रा वृतांत (वाराणसी से चंडीगढ़ की साहित्यिक यात्रा अगस्त – 2023) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नायक – नायिका।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नायक – नायिका। ♦

भारत में युगों से महिलाओं का गौरव गान किया जाता है।

“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।”

अर्थात:— जहां नारी का पूजन और सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं।

महा राष्ट्रीय में कहा गया है कि —

‘नारी जनमांची पुण्याई ‘!

श्री हरि चरित्रामृत सागर, में आधारानंद स्वामी लिखते हैं कि सत्संग में महिलाएं भी बहुत उच्च स्तर की थीं।

स्वामीनारायण संप्रदाय में भक्ति धर्म बैरागी एवं ज्ञान से युक्त बहुत सी ऐसी स्त्री – भक्त थीं, जिनकी तुलना पौराणिक युग की स्त्री भक्तों से किया जा सकता है। अत्यंत ही प्रेम पूर्वक मानसी – पूजा करतीं और मार्ग में चलते समय किसी पुरुष के सामने दृष्टि नहीं करी थीं। (भक्त रत्न महिलाएं पृ १३ भाग ४)!

महिला शब्द का प्रयोग वयस्क स्त्रियों के लिए किया जाता है।

वेदों – पुराणों में कहा गया है कि —

“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफला क्रिया।।”

जिस कुल में स्त्री की पूजा होती है उस कुल पर देवता प्रसन्न रहते हैं और जहां स्त्रियों की पूजा, वस्त्र भूषण, तथा मधुर वचन आदि से सत्कार नहीं किया जाता उस कुल का सभी कर्म विफल हो जाता है।

पुरुषों में आठ गुण ख्याति बढ़ाते हैं —

बुद्धि, कुशलता, इंद्रिय निग्रह, शास्त्र ज्ञान, पराक्रम, आधिक नहीं बोलना, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता।

‘अष्टौ गुणा: पुरुषं दीपयन्ति,
प्रज्ञा च कौल्यं च दम: श्रुतं च।
पराक्रम श्चाबहुभाषिता च,
दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।।(विदुर नीति पृ २८)

वेद काल में नारी — वेद काल में नारियों की सभी कार्यों में भूमिका, पत्नी को सम्मान मिलता था। समान अधिकार प्राप्त था नारियों को।

ऋग्वेद काल में नारियों की दशा — ऋग्वेद काल में स्त्रियों को सर्वोच्च शिक्षा दी जाती थी। नारियां शास्त्र और कला के क्षेत्र में निपुणता की परिचायक होती थी।

प्रकांड विद्वान स्त्रियां — वैदिक काल में भारतीय नारियों में विदुषी लोप मुद्रा – जो अगस्त की पत्नी थीं।

विदुषी प्रीति येयी — जो महर्षि दाधीच की धर्मपत्नी थीं।

विदुषी सुलभा — यह जनक राज की विदुषी थीं। जिसने जनक को ही शास्त्रार्थ में हरा दिया था।

ब्रह्मवाहिनी रोमशा — बृहस्पति की पुत्री और भाव भव्य की धर्मपत्नी थीं। इन्होंने ज्ञान का व्यापक प्रचार किया।

ब्रह्म वादिनीं गार्गी — इन्होंने महान विद्वान ज्ञागबल्क को शास्त्रार्थ में हरा दिया।

ब्रह्म वादिनी वाक् — अमृण ऋषि कन्या थी जिन्होंने अंत में अनुसंधान किया और समाज को खेती करने के लिए अन्न दिया।

विदुषी तपती — आदित्य की पुत्री और सावित्री की छोटी बहन थीं। यह अति सुंदरी और प्रकांड विद्वान थी। इनका अयोध्या में संवरण जी से विवाह हुआ था।

शत रुपा, सांगली, मैं ना, स्वाहा, संज्ञा, अपाला आज महिलाओं के साथ-साथ अनुसुइया, सावित्री, तारामती, द्रोपदी जैसी सती जी के गुणों से आज भी विश्व जगत में प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं।

तुलसीदास जी ने लिखा है कि —

‘मूढ तो हिं अतिशय अभिमाना,
नारि सिखावन करसि काना।

तुलसीदास जी का इस दोहे में कहने का तात्पर्य है कि यदि कोई आपके फायदे की बात करें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

कबीर दास की दृष्टि में नारी — इन्होंने नारियों को दो प्रकार का बताया है।

  1. एक प्रकार की नारी साधना में बाधा नहीं पहुंचाती हैं और पतिव्रता होती हैं।
  2. दूसरी तरह की नारी साधना में अवरोध पैदा करती हैं ऐसी नारियों का कबीर ने विरोध नहीं किया है परंतु उनका तिरस्कार कर दिया है।

सूरदास की दृष्टि में नारी — यमन ऋषि की कथा राम बिलावल में, नवम स्कन्द में…

‘सुखदेव कह्यो, सुनौ हो राव!
नारी नागिन एक स्वभाव।
नागिन के कांटै विष होई,
नारी चितवन नर रहै भोई।
नारी सो नर प्रीति लगावै,
पै नारी तिहिं मन नहिं ल्यावै।
नारी संग प्रीति जो करै,
नारी ताहि तुरंत पंरिहरै॥

चाणक्य ने नारी के लिए कहा —

नारी में दया और विनम्रता होती है।
नारी धैर्य का पालन करती है।
समाज के निर्माण में नारी की विशेष भूमिका है।
नारी समाज की निर्माणकर्ता होती हैं।
नारी शरीर से दुर्बल होते हुए भी,
प्राण से वह पुरुष से भी अधिक शक्तिशाली होती है।

‘ जिनी सुंतत्र भए बिगरहिं ‘

जिस समय विरहणी स्वतंत्र हो जाती है। फिर उसके अलग-अलग रूप और कर्म देखे जाते हैं।

नायक कहता है कि —

गोरो गाल तिल तापे काला,
मोहन ‘मंगल’ कैसो जादू डाला।
वदन चंद्र सम मृगनयनी गोरी।
नैना चंचल दिखे चकोरी॥

अपने पति से प्रेमातुर स्त्री दुखी होकर कहती है —

मोसों ना बात बना चातुरी,
गोर सांवरिया माटी जब खोटो!
नायिका प्रीतम से रूठ कर लंदन चली जाती है।

नायक कहता है कि —

मेरी मालन खेलन जात बलैया,
मुंह मोड़ चली लंदन मा गोरी।
कैसो बनि गयो देखो कठोरी,
मान तज्यो अरमान लियो गोरी,
राधा रिसानी मनाय लायो कोई!
रितु की मार सहन नहीं होई॥

प्रेमातुर नायिका का भाव —

प्रिय प्रेम से बावरी,
सांवरो नाच नचायो।
उठि उठि जात पहर में,
भोरहरी ना उसे दिखाय।
सांवतिया काहें को जरि जाय,
सजनवा आपनो देख मुस्कात।
हमारी ओर देखा करो सांवरो,
नाहीं तो हम पीहर जाब॥

चंद्रमा को नहीं पता होता है कि उसकी चाहत में चकोरी अपना प्राण त्याग देगी। नायिका प्रेम में इतना विहवल हो, गयो है जानने और पहचानने की आवश्यकता नायक को करना चाहिए।

नई नवेली नायिका ससुराल में कहती है कि —

कुआं पानी भरन ना जैहों,
काला जादू नजर लगी तैहों।
रंगरेजवा रची रची रच्यो,
गरबीली बनो मोरिया अंगिया?
मोती मढायो पीहर चुनरिया,
बार-बार निखत दर्पण गोरिया।

गुण गर्विता होकर गुजरिया कहती है कि —

पिया तोरा पानी हम से भरा न जाए,
वह काया यह इसलिए नहीं बनायो!

पति पर भरोसा कर नायिका कहती है कि —

अपने राजा में हमरो भरोसो,
बसे पिया आंख में आंजन भयो!
मोरा बिनु सांवरो जिया न जाय,
पास पड़ोस घूमि घरवा आवै।
प्रेम से मिल कर गले लगा ले,
निक निक बतिया से दुलरावै॥

‘जेष्ठा और स्त्री कनिष्ठा ‘—

जिसे पिया चाहे वही सुहागिन,
जाहि स्त्री अधिक चाहे सो जेष्ठा।
कम चाहे जेहि नारी वही कनिष्ठा॥
दोउ लड़ी लड़ी बात बनायो,
पिए को रहि रहि दोऊ समझावैं।
मोहिं काहे को ब्याहे है लायो,
हमरौ आंचल में आगि लगायों॥

मुग्धा भाव —

भौंरा लुभाय रह्रियों कलियन संग,
गगरी ना छलके गोरिया धीरे चलो।
सारी बहोर लहरियों तारों डगरिया,
मारो मन मारि रह्यो संग संवरिया॥

यौवन से अनजान नायिका —

सरकत जाती कहां हे मोर घाघरो,
हुलसित तन मन ओर सांवरो॥

यौवना नायिका —

सतायो जनि सैया,
भरी लेहु मोंहिं बहियां!
सवतन संग जाई रह्यो,
बोलहु नहीं मोसो सैयां।
जाए मनायो सौतन को,
बात बनायो ना हमसो॥

मध्य धीरा नायिका —

मोरा सैयां बेदर्दी,
दर्द ना ही जानै!
तीज त्योहार मा भी,
परदेसवा मां बितावै।
कहा जाता है कि मछली की तड़प का पता समुद्र को नहीं होता है।

मुग्धा नायिका —

भय और लाज से रति न चाहने वाली नायिका मुग्धा नायिका कहलाती है।

कहती –
मोरी बहिया ना पकड़ो,
श्याम गिरधारी!
गल बहिंया ने डारो रे,
ओ बेदर्दी बालमा।

मध्या नायिका —

जिस नारी के तन में मर्यादा और लाज दोनों समान होते हैं वह मध्या नारी कहीं जाती है!

नैना लजाय दिल नहीं मानै,
मोहिं त धीरे जगाए लेना।
हाउ तोहरा ओसारी रे,
जरा अखियां पानी लगा लेना।

विश्रब्धनवोड़ा मुग्धा नायिका —

वह नायिका, जो किंचित भय और लज्जा से रति नहीं चाहने वाली होती है।

मोरा छोड़ दो अचरवा,
मैं प्यार मां झूलूंगी!
आसपास में मेरे लोगवा,
हरि संग प्रीति में खेलूंगी॥

मध्या धीरा नायिका —

अपने पति से आदर युक्त व्यंग कोप जताने वाली।

आयो हमरी अंखियां,
बोलो ना हमसे पिया!
उनको
हमसे ना बोलो पिया?
रात रात निंदिया न आवै!
हरि आज ऊं घी में आवै,
निंदिया गवांय डाली,
भोर भयो आयो अंगना॥

मध्या अधीरा नायिका —

वह नायिका जो पति से अनादर युक्त क्रोध जाने वाली हो, मध्या अधीरता होती हैं।

का हौ करते, कैसो करवावत।
पानी यों कर्यो छिप ना पावर॥

प्रौढ़ धीरा —

अपने पति को डर दिखाकर रति से उदास रहा मानवती स्त्री।

ज्यों पति कुछ बोल्यो,
ललाई बाबा नैना।
मुंह फेरि चल्यो मचल,
36 अंक सो आगे बढ़॥

परकीया नायिका —

वह नायिका जो पराई (पराय) पुरुष से प्रेम करती है।

घर बालम छोड़ी आयो,
बितायिब इहवां रसिया!
मुह हमारा यौहिं ओकरा,
ललचाई नजरों में रतिया॥

प्रौढ़ा नायिका —

वह नायिका दो अत्यंत काम रखती है परंतु कुछ कुछ लज्जा लिए।

प्यारे बलम तोहैं जाने ना दूंगी,
श्याम मोरे नैना का तारा रे !

रतिप्रीका नायिका —

विशेष रति की चाह वाली प्रौढ़ा नायिका।

मोहिं डर लागे अकेला रे,
रात पिया जागत रहियो!
प्रीतम नूपुर मोर ना उतारो,
सांग में अखिल विचार्यौ॥

प्रौढ़ा अधीरता नायिका —

पति त्याग – ताड़ना, कोप जनाने वाली नारी प्रौढ़ा अधीरा कही जाती है।

मैं नहीं जाती पास सैंया के पैंया,
मछरियां बिंदिया लै गई मोर!
मुझ पर डार गयो सारे रंग गागर।

नोट: यहां नायक और नायिका के रूप में वर्णन किया गया। इससे किसी को भी, किसी भी प्रकार का आघात पहुंचाने का कोई मकसद नहीं है। यह एक शोधकर्ता की भाति शोध है। जिसका सूत्र पुस्तकों में अलग-अलग तरह से मिल सकता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख में समझाने की कोशिश की है — स्त्रियां कई रूप में होती है ज्ञान व गुणों, लोक-लज्जा तथा व्यवहार के आधार पर। इस लेख में नायक व नायिका के माध्यम से लेखक ने विस्तार से बताया है की कैसे व किस-किस प्रकार की स्त्रियां इस संसार में होती है। जैसे – मुग्धा भाव वाली नायिका, यौवन से अनजान नायिका, यौवना नायिका, मध्य धीरा नायिका, मुग्धा नायिका, मध्या नायिका, विश्रब्धनवोड़ा मुग्धा नायिका, मध्या धीरा नायिका, मध्या अधीरा नायिका, प्रौढ़ धीरा, परकीया नायिका, प्रौढ़ा नायिका, रतिप्रीका नायिका, प्रौढ़ा अधीरता नायिका, इत्यादि प्रकार के नायिका के माध्यम से समझाया हैं। यह एक शोधकर्ता की भाति शोध है। इस लेख के माध्यम से किसी को भी किसी बी तरह का आघात पहुंचाने का कोई इरादा नही हैं।

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यह लेख (नायक – नायिका।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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मनुस्मृति में कानून।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मनुस्मृति में कानून।  ♦

भारतवर्ष में राजा न्याय का मूल होता था।
राजा के साथ एक विद्वान और न्याय करता बैठता था।
सभा में राजा विद्वान ब्राह्मण और अनुभवी मंत्री को साथ रखता था।
राजा के साथ तीन ब्राह्मण और एक विद्वान न्याय करता बैठता था।

न्यायिक सभा में दीवानी और फौजदारी का केस चलता था।
सभा में सत्य बोलने के लिए सभी को आज्ञा दी जाती थी।

सत्य बोलने वाले को न्यायालय में जाना नहीं चाहिए।
अगर न्यायालय वह जाता है तो सत्य ही बोलना चाहिए।
झूठ बोलने वाला मनुष्य को पापी कहा जाता था।
न्यायालय में बादी और प्रतिवादी के सामने गवाही लिया जाता था।

दोनों पक्ष के गवाहों को न्याय करता एकत्रित करवाता था।
इस प्रकार वह न्यायालय में समझा-बुझाकर परीक्षा लेता था।

न्याय करता गवाहों से पूछता जो वृतांत तुम लोगों ने बातें किया,
उन बातों को तुम लोग सत्य सत्य कहो क्योंकि इस अभियोग में तुम साक्षी हो।
अपनी गवाही में जो सत्य बोलता है वह मृत्यु के बाद उत्तम स्वर्ग प्राप्त करता है।
इस लोक में अद्वितीय यस पाता और स्वयं ब्रह्मा उसका साक्षात्कार करता है।

जो मनुष्य झूठी गवाही देता है वह वरुण के बंधन में बनता है।
वह मनुष्य 100 जन्मों तक दुख पाता है।

इसलिए मनुष्य को सत्य साक्षी गवाही देनी चाहिए।
सत्यता से गवाही देने वाला पवित्र होता है।
सत्यता से उसका यश वृद्धि होती है।
सभा में उपस्थित गवाही देनी पढ़ती है।

साक्षी देने वाले को सत्य बोलना चाहिए।
जीव का साक्षी स्वयं जीव है, जीव के शरण में स्वयं जीव है।
जीव मनुष्य का परम साक्षी है, उसका निरादर नहीं करना चाहिए।

जबकि पापी अपने मन में विचार करता है कि हमें कोई नहीं देखता।
लेकिन देवता उसको और उसके ह्रदय के भाव को स्पष्ट देखते हैं।
देहधारी मनुष्यों के कर्मों को यह लोग स्वयं देखते हैं-
आकाश पृथ्वी जल हृदय चंद्रमा सूर्य अधिनियम बायो-
रात्रि और दोनों को धूल और न्याय।

न्याय किया जाए इसके लिए सभा में आगे और समझाया जाता था।
जो पापी मनुष्य न्याय करता के इस प्रश्न का भी झूठ उत्तर देता है,
वह सीधे नर्क के पूर्व अंधकार में ठोकर खाता है।

पहले गवाहों को सभा मध्य समझाया जाता था।
फिर भी गवाह झूठी गवाही देता तो उसे देश निकाला जाता था।
राजा वेद पढ़ने वाले विद्यार्थी व शिल्पकार और भांड साक्षी देने से बरी रहते थे।
राज नियम कठोर और स्पष्ट हुआ करते थे।

उपद्रव चोरी बेबी चार्ट बदनामी करने,
मारपीट और अव्यवस्था में फौजदारी के,
अभियोग में साक्षी की योग्यता के नियम कठोर होते थे।

सभा में नियम का पालन करने के लिए आदेश दिए जाते थे।
मनुस्मृति में कितनी है, कानूनों को 18 भागों में बांटा गया है।
सभी कानूनों का पालन कठोरता से कराया जाता था।

मारपीट, बदनामी करना, चोरी – डाका और उपद्रो अथवा हो व्यभिचार।
जुआ खेलना और बाजी लगाना, फौजदारी कानून में इसे लिया जाता।

ऋण, धरोहर, किसी की संपत्ति के स्वामी हुए बिना उसे बेचना,
दान का फेर लेना, वेतन ना देना, प्रतिज्ञा का पालन न करना,
बिक्री और खरीद की हुई वस्तु का लौटाना।
स्वामी और सेवक में झगड़ा होना।
सीमा के संबंध में झगड़ा होना।

पति और पत्नी के कर्तव्य, उत्तराधिकार पाना।
यार सब दीवाने के मुकदमे दर्ज होते थे।

प्राचीन काल में बनाए गए नियम और कानून आज के नियम और कानून में कुछ समानता के साथ आज का नियम बहुत व्यापक हो गया है फर्क केवल इतना है कि प्राचीन काल में जो नियम बनाए जाते थे, उनका कड़ाई से पालन किया जाता था।

आज जो नियम है उनमें पारदर्शिता तो है परंतु कुछ लोग न्याय पाने के लिए अपना पूरा जीवन खो देते हैं और उनकी अगली पीढ़ी भी न्याय के लिए न्यायालय के दरवाजे खटखटा रहता है।

न्यायपालिका पर जनता का पूरा विश्वास होता है। न्यायपालिका के आदेशों का पालन शासन और प्रशासन करता कराता है।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से, लेख के माध्यम से बखूबी समझाने की कोशिश की है – इस लेख में कवि ने मनुस्मृति में जो कानून था उसे विस्तार से बताया है। प्राचीन काल में बनाए गए नियम और कानून आज के नियम और कानून में कुछ समानता के साथ आज का नियम बहुत व्यापक हो गया है फर्क केवल इतना है कि प्राचीन काल में जो नियम बनाए जाते थे, उनका कड़ाई से पालन किया जाता था। ” आज जो नियम है उनमें पारदर्शिता तो है परंतु कुछ लोग न्याय पाने के लिए अपना पूरा जीवन खो देते हैं और उनकी अगली पीढ़ी भी न्याय के लिए न्यायालय के दरवाजे खटखटा रहता है। “

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यह लेख (मनुस्मृति में कानून।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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  • एक सफर।
  • बाल विवाह – एक अभिशाप।
  • क्या बदलाव लायेगा नया साल।
  • है तो नववर्ष।
  • मोह।
  • अपना धर्म सबसे उत्तम।
  • ठंडी व्यार।
  • रिश्तों को निभाना सीखो।
  • तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।
  • मित्र।
  • आखिर क्यों।
  • समय।
  • काले बादल।
  • सुबह का संदेश।
  • चलो दिवाली मनाएं।
  • दीपों का त्योहार।

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https://www.youtube.com/watch?v=0XYeLGPGmII

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तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

ठंडी व्यार।

रिश्तों को निभाना सीखो।

तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।

मित्र।

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