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गौमाता ही भारत माँ की पहचान है।

गौमूत्र चिकित्सा – गौ मूत्र लाभ और दुष्प्रभाव।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ गौमूत्र चिकित्सा – गौ मूत्र लाभ और दुष्प्रभाव। ϒ

गोमूत्र के लाभ, गौमूत्र चिकित्सा, गौ मूत्र लाभ और दुष्प्रभाव, गाय का उपयोग, गोमूत्र स्वास्थ्य लाभ।

शास्‍त्रों में ऋषियों-महर्षियों ने गौ की अनंत महिमा लिखी है। उनके दूध, दही़, मक्खन, घी, छाछ, मूत्र आदि से अनेक रोग दूर होते हैं। गोमूत्र एक महौषधि है। इसमें पोटैशियम, मैग्नीशियम क्लोराइड, फॉस्‍फेट, अमोनिया, कैरोटिन, स्वर्ण क्षार आदि पोषक तत्व विद्यमान रहते हैं इसलिए इसे औषधीय गुणों की दृष्टि से महौषधि माना गया है।

गौ-माता से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण जानकारी।

गौ एवं गौ विज्ञान से जुड़े प्रश्नोत्तर एवं आयुर्वेदिक दृष्टी से गौमाता का महत्व।

»»» Q & A ⇒

गौ एवं गौ विज्ञान से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले कुछ प्रश्नोत्तर यहाँ दिये गए है। अगर आपके मन में इन प्रश्नों के अलावा भी कोई प्रश्न आए तो आप इस पेज पर कमेंट के रूप में हम से पूछ सकते है। आपके द्वारा पूछे गए अच्छे प्रश्नों को हम यहाँ जोड़ कर सभी के लिए उसका उत्तर उपलब्ध करवाएँगे।

प्रश्न 1. गौ क्या है?

उत्तर 1. गौ ब्रह्मांड के संचालक सूर्य नारायण की सीधी प्रतिनिधि है।इसका अवतरण पृथ्वी पर इसलिए हुआ है ताकि पृथ्वी की प्रकृति का संतुलन बना रहे। पृथ्वी पर जितनी भी योनियाँ है सबका पालन-पोषण होता रहे। इसे विस्तृत में समझने के लिए ऋगवेद के 28वें अध्याय को पढ़ा जा सकता है।

प्रश्न 2. गौमाता और विदेशी गौ में अंतर कैसे पहचाने?

उत्तर 2. गौमाता एवं विदेशी गौ में अंतर पहचानना बहुत ही सरल है| सबसे पहला अंतर होता है गौमाता का कंधा (अर्थात गौमाता की पीठ पर ऊपर की और उठा हुआ कुबड़ जिसमें सूर्यकेतु नाड़ी होती है), विदेशी गाय में यह नहीं होता है एवं उसकी पीठ सपाट होती है।दूसरा अंतर होता है गौमाता के गले के नीचे की त्वचा जो बहुत ही झूलती हुई होती है जबकि विदेशी काऊ के गले के नीचे की त्वचा झूलती हुई ना होकर सामान्य एवं कसीली होती है। तीसरा अंतर होता है गौमाता के सिंग जो कि सामान्य से लेकर काफी बड़े आकार के होते है जबकि विदेशी काऊ के सिंग होते ही नहीं है या फिर बहुत छोटे होते है। चौथा अंतर होता है गौमाता कि त्वचा का अर्थात गौमाता कि त्वचा फैली हुई, ढीली एवं अतिसंवेदनशील होती है जबकि विदेशी काऊ की त्वचा काफी संकुचित एवं कम संवेदनशील होती है।

प्रश्न 3. अगर थोड़ा सा भी दही नहीं हो तब दूध से दही कैसे बनाएँ?

उत्तर 3. हल्के गुन-गुने दूध में नींबू निचोड़ कर दही जमाया जा सकता है। इमली डाल कर भी दही जमाया जाता है। गुड़ की सहायता से भी दही जमाया जाता है। शुद्ध चाँदी के सिक्के को गुन-गुने दूध में डालकर भी दही जमाया जा सकता है।

प्रश्न 4. किस समय पर दूध से दही बनाने की प्रक्रिया शुरू करें?

उत्तर 4. रात्री में दूध को दही बनने के लिए रखना सर्वश्रेष्ठ होता है। ताकि दही एवं उससे बना मट्ठा, तक्र एवं छाछ सुबह सही समय पर मिल सके।

प्रश्न 5. गौमूत्र किस समय पर लें?

उत्तर 5. गौमूत्र लेने का श्रेष्ठ समय प्रातःकाल का होता है और इसे पेट साफ करने के बाद खाली पेट लेना चाहिए। गौमूत्र सेवन के 1 घंटे पश्चात ही भोजन करना चाहिए।

प्रश्न 6. गौमूत्र किस समय नहीं लें?

उत्तर 6. मांसाहारी व्यक्ति को गौमूत्र नहीं लेना चाहिए। गौमूत्र लेने के 15 दिन पहले मांसाहार का त्याग कर देना चाहिए। पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को सीधे गौमूत्र नहीं लेना चाहिए, गौमूत्र को पानी में मिलाकर लेना चाहिए। पीलिया के रोगी को गौमूत्र नहीं लेना चाहिए। देर रात्रि में गौमूत्र नहीं लेना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में गौमूत्र कम मात्र में लेना चाहिए।

प्रश्न 7. क्या गौमूत्र पानी के साथ लें?

उत्तर 7. अगर शरीर में पित्त बढ़ा हुआ है तो गौमूत्र पानी के साथ लें अथवा बिना पानी के लें।

प्रश्न 8. अन्य पदार्थों के साथ मिलकर गौमूत्र की क्या विशेषता है? (जैसे की गुड़ और गौमूत्र आदि संयोग)

उत्तर 8. गौमूत्र किसी भी प्रकृतिक औषधी के साथ मिलकर उसके गुण-धर्म को बीस गुणा बढ़ा देता है। गौमूत्र का कई खाद्य पदार्थों के साथ अच्छा संबंध है जैसे गौमूत्र के साथ गुड़, गौमूत्र शहद के साथ आदि।

प्रश्न 9. गाय का गौमूत्र किस-किस तिथि एवं स्थिति में वर्जित है? (जैसे अमावस्या आदि)

उत्तर 9. अमावस्या एवं एकादशी तिथि तथा सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण वाले दिन गौमूत्र का सेवन एवं एकत्रीकरण दोनों वर्जित है।

प्रश्न 10. वैज्ञानिक दृष्टि से गाय की परिक्रमा करने पर मानव शरीर एवं मस्तिष्क पर क्या प्रभाव एवं लाभ है?

उत्तर 10. सृष्टि के निर्माण में जो 32 मूल तत्व घटक के रूप में है वे सारे के सारे गाय के शरीर में विध्यमान है। अतः गाय की परिक्रमा करना अर्थात पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करना है। गाय जो श्वास छोड़ती है वह वायु एंटी-वाइरस है। गाय द्वारा छोड़ी गयी श्वास से सभी अदृश्य एवं हानिकारक बैक्टेरिया मर जाते है। गाय के शरीर से सतत एक दैवीय ऊर्जा निकलती रहती है जो मनुष्य शरीर के लिए बहुत लाभकारी है। यही कारण है कि गाय की परिक्रमा करने को अति शुभ माना गया है।

प्रश्न 11. गाय के कूबड़ की क्या विशेषता है?

उत्तर 11. गाय के कूबड़ में ब्रह्मा का निवास है। ब्रह्मा अर्थात सृष्टि के निर्माता। कूबड़ हमारी आकाश गंगा से उन सभी ऊर्जाओं को ग्रहण करती है जिनसे इस सृष्टि का निर्माण हुआ है, और इस ऊर्जा को अपने पेट में संग्रहीत भोजन के साथ मिलाकर भोजन को ऊर्जावान कर देती है। उसी भोजन का पचा हुआ अंश जिससे गोबर, गौमूत्र और दूध गव्य के रूप में बाहर निकलता है वह अमृत होता है।

प्रश्न 12. गौमाता के खाने के लिए क्या-क्या सही भोजन है? (सूची)

उत्तर 12. हरी घास, अनाज के पौधे के सूखे तने, सप्ताह में कम से कम एक बार 100 ग्राम देसी गुड़, सप्ताह में कम से कम एक बार 50 ग्राम सेंधा या काला नमक, दाल के छिलके, कुछ पेड़ के पत्ते जो गाय स्वयं जानती है की उसके खाने के लिए सही है, गाय को गुड़ एवं रोटी अत्यंत प्रिय है।

प्रश्न 13. गौमाता को खाने में क्या-क्या नहीं देना है जिससे गौमाता को बीमारी ना हो? (सूची)

उत्तर 13. देसी गाय जहरीले पौधे स्वयं नहीं खाती है। गाय को बासी एवं जूठा भोजन, सड़े हुए फल नहीं देना चाहिए। गाय को रात्रि में चारा या अन्य भोजन नहीं देना चाहिए। गाय को साबुत अनाज नहीं देना चाहिए। हमेशा अनाज का दलिया करके ही देना चाहिए।

प्रश्न 14. गौमाता की पूजा करने की विधि? (कुछ लोग बोलते है कि गाय के मुख कि नहीं अपितु गाय कि पूंछ कि पूजा करनी चाहिए और अनेक भ्रांतियाँ है।)

उत्तर 14. गौमाता की पूजा करने की विधि सभी जगह भिन्न-भिन्न है और इसके बारे में कहीं भी आसानी से जाना जा सकता है। लक्ष्मी, धन, वैभव आदि कि प्राप्ति के लिए गाय के शरीर के उस भाग कि पूजा की जाती है जहां से गोबर एवं गौमूत्र प्राप्त होता है। क्योंकि वेदों में कहा गया है की “गोमय वसते लक्ष्मी” अर्थात गोबर में लक्ष्मी का वास है और “गौमूत्र धन्वन्तरी” अर्थात गौमूत्र में भगवान धन्वन्तरी का निवास है।

प्रश्न 15. क्या गाय पालने वालों को रात में गाय को कुछ खाने देना चाहिए या नहीं?

उत्तर 15. नहीं, गाय दिन में ही अपनी आवश्यकता के अनुरूप भोजन कर लेती है। रात्रि में उसे भोजन देना स्वास्थ्य के अनुसार ठीक नहीं है।

प्रश्न 16. दूध से दही, घी, छाछ एवं अन्य पदार्थ बनाने के आयुर्वेद अनुसार प्रक्रियाएं विस्तार से बताईए।

उत्तर 16. सर्वप्रथमड दूध को छान लेना चाहिए, इसके बाद दूध को मिट्टी की हांडी, लोहे के बर्तन या स्टील के बर्तन (ध्यान रखे की दूध को कभी भी तांबे या बिना कलाई वाले पीतल के बर्तन में गरम नहीं करें) में धीमी आंच पर गरम करना चाहिए। धीमी आंच गोबर के कंडे का हो तो बहुत ही अच्छा है। पाँच-छः घंटे तक दूध गरम होने के बाद गुन-गुना रहने पर 1 से 2 प्रतिशत छाछ या दही मिला देना चाहिए। दूध से दही जम जाने के बाद सूर्योदय के पहले दही को मथ देना चाहिए। दही मथने के बाद उसमें स्वतः मक्खन ऊपर आ जाता है। इस मक्खन को निकाल कर धीमी आंच पर पकाने से शुद्ध घी बनता है। बचे हुए मक्खन रहित दही में बिना पानी मिलाये मथने पर मट्ठा बनता है। चार गुना पानी मिलने पर तक्र बनता है और दो गुना पानी मिलने पर छाछ बनता है।

प्रश्न 17. दूध के गुणधर्म, औषधीय उपयोग| किन-किन चीजों में दूध वर्जित है?

उत्तर 17. गाय का दूध प्राणप्रद, रक्तपित्तनाशक, पौष्टिक और रसायन है। उनमें भी काली गाय का दूध त्रिदोषनाशक, परमशक्तिवर्धक और सर्वोत्तम होता है। गाय अन्य पशुओं की अपेक्षा सत्वगुणयुक्त है और दैवी-शक्ति का केंद्रस्थान है। दैवी-शक्ति के योग से गोदुग्ध में सात्विक बल होता है। शरीर आदि की पुष्टि के साथ भोजन का पाचन भी विधिवत अर्थात सही तरीके से हो जाता है। यह कभी रोग नहीं उत्पन्न होने देता है। आयुर्वेद में विभिन्न रंग वाली गायों के दूध आदि का पृथक-पृथक गुण बताया गया है। गाय के दूध को सर्वथा छान कर ही पीना चाहिए, क्योंकि गाय के स्तन से दूध निकालते समय स्तनों पर रोम होने के कारण दुहने में घर्षण से प्रायः रोम टूट कर दूध में गिर जाते हैं। गाय के रोम के पेट में जाने पर बड़ा पाप होता है। आयुर्वेद के अनुसार किसी भी पशु का बाल पेट में चले जाने से हानि ही होती है। गाय के रोम से तो राजयक्ष्मा आदि रोग भी संभव हो सकते हैं इसलिए गाय का दूध छानकर ही पीना चाहिए। वास्तव में दूध इस मृत्युलोक का अमृत ही है।

“अमृतं क्षीरभोजनम्”

प्रश्न 18. श्रीखंड के गुणधर्म, औषधीय उपयोग। किन-किन चीजों में श्रीखंड वर्जित है?

उत्तर 18. श्रीखंड में मुख्यरूप से जलरहित दही, जायफल एवं देसी मिश्री होते है। जायफल कुपित हुए कफ को संतुलित करता है एवं मस्तिष्क को शीत एवं ताप दोनों से बचाता है। चूंकि श्रीखंड में जायफल के साथ जलरहित दही की घुटाई होती है इसलिए इस प्रक्रिया में जायफल का गुण 20 गुना बढ़ जाता है। इस कारण श्रीखंड मेघाशक्ति को बढ़ाता है, कफ को संतुलित रखता है एवं मस्तिष्क को शीत एवं ताप दोनों से बचाता है। अत्यधिक शीत ऋतु, अत्यधित वर्षा ऋतु में श्रीखंड का सेवन वर्जित माना गया है। ग्रीष्म ऋतु में श्रीखंड का सेवन मस्तिष्क के लिए अमृततुल्य है। श्रीखंड निर्माण के बाद 6 घंटे के अंदर सेवन कर लिया जाना चाहिए। फ्रीज़ में रखे श्रीखंड का सेवन करने से उसके गुण-धर्म बदल कर हानी उत्पन्न कर सकते है अर्थात इसे सामान्य तापमान पर रख कर ताज़ा ही सेवन करें।

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  • सनातन धर्म
    सनातन धर्म में प्रकृत्ति की पूजा की जाती है। पेड़-पौधों से लेकर, जल, वायु, अग्नि, बादल, सागर, आदि सभी को धार्मिक रूप में देखा जाता है। यहां तक कि मनुष्य को ही स्वयं भगवान मानकर उसकी सेवा करने की सीख दी गई है।
  • अलौकिक पशु
    ऐसा ही कुछ जानवरों के साथ भी है क्योंकि गाय को हिन्दू धर्म में अलौकिक पशु का दर्जा देकर पूजा जाता है। गाय को प्रकृत्ति का ही एक रूप मानकर पूजा जाता है।
  • दैवीय गुणों वाला
    शायद यही वजह है कि गाय के दूध से लेकर उसके मूत्र तक को दैवीय गुणों वाला माना जाता है।
  • गाय के दूध
    गाय के दूध के फायदे तो आप कई बार सुन चुके हैं, साथ ही गोबर का प्रयोग खाद के तौर पर किया जाता है, इस बात से भी हम सभी परिचित हैं।
  • गौ मूत्र के फायदे
    आज हम आपको इन सबसे हटकर गो-मूत्र के फायदों से परिचित करवाएंगे जिन पर शायद आप विश्वास भी ना कर पाएं।
  • दवाईयां
    गौमूत्र का नाम सुनकर आप लोग अपनी नाक-भौं सिकोड़ लिए होंगे लेकिन सच यह है कि गौ मूत्र का प्रयोग कई दवाइयों में भी किया जाता है।
  • 108 प्रकार की बीमारियां
    इसके साथ ही यह करीब 108 प्रकार की बीमारियों के इलाज में भी फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें विशेष हार्मोन और खनिज मिले होते हैं।
  • पेट की समस्या
    पेट की समस्या, त्वचा रोग, कोई पुराना दर्द, सांस का रोग, नेत्र की समस्या, मुख रोग, कृमिरोग आदि रोगों का इलाज संभव होता है। जानकारों का कहना है कि इसमें नाइट्रोजन, कॉपर, फॉस्फेोट, यूरिक एसिड, पोटैशियम, यूरिक एसिड, क्लोिराइड और सोडियम पाया जाता है।
  • दिल की बीमारी
    इतना ही नहीं गौमूत्र मधुमेह, दिल की बीमारी, कैंसर, मिर्जी, एड्स और माइग्रेन जैसी बीमारियों को भी ठीक करता है।
  • किन बातों का ध्यान
    आइए जानते हैं इन सबके बावजूद गौमूत्र का सेवन करने से दौरान किन बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।
  • बूढ़ी या अस्वस्थ गाय
    कभी भी बूढ़ी या अस्वस्थ गाय का मूत्र नहीं पीना चाहिए। इसे लेने से पहले एक मिट्टी या कांच के बर्तन में सूती कपड़े से आठ तहों से छानकर पीना चाहिए।
  • एनीमिया
    अगर त्रिफला और गाय के दूध का सेवन एक साथ किया जाए तो यह शरीर में एनीमिया की बीमारी को दूर करता है और साथ ही यह खून को भी साफ करता है।
  • आयुर्वेद
    आयुर्वेद के अनुसार शरीर में तीन दोषों (वात, पित्त और कफ) के कारण समस्याएं उत्पन्न होती हैं और गाय के मूत्र का सेवन करने से दूर होती हैं।
  • रक्त
    गाय का मूत्र पीने से रक्त शुद्ध होता है जिसकी वजह से मनुष्य उन बीमारियों से बच सकता है जो रक्त की अशुद्धि की वजह से होती हैं।
  • तनाव का नाश
    वे लोग जो हर समय तनाव ग्रस्त रहते हैं, उन्हें दिल की समस्याओं का भी खतरा होता है। गौमूत्र का सेवन इस तनाव का भी नाश कर एक स्वस्थ शरीर देता है।
  • पापों का काट
    शास्त्रों का कहना है कि वर्तमान जन्म में हम जो भोग रहे हैं वह पिछले जन्म से संबंधित होते हैं। गौमूत्र के भीतर गंगा का वास माना जाता है इसलिए इसका सेवन आपके पिछले जन्म के पापों का काट साबित होता है।
  • गौ मूत्र से सिकाई
    जोड़ों के दर्द पर अगर गौ मूत्र से सिकाई की जाए तो यह काफी फायदा पहुंचाता है। आपको राहत का अनुभव होगा।
  • पेट की गैस
    रोजाना सुबह गौमूत्र के साथ आधा ग्लास नींबू पानी पीने से पेट की गैस दूर होती है।
  • पेट की चर्बी
    एक गिलास पानी में शहद और गौमूत्र मिलाकर पीने से पेट की चर्बी कम होती है और अन्य लाभ भी प्राप्त होते हैं।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता
    नियमित तौर पर इसका सेवन करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और विभिन्न बीमारियों से शरीर का बचाव होता है।
  • अस्पृश्य
    वे लोग जो गौमूत्र को अस्पृश्य मानते हैं, इस लेख को पढ़कर उन्हें भी समझ आएगा कि इसकी खूबियों का कोई सानी नहीं है।
  • जोड़ों का दर्द
    जोड़ों में दर्द होने पर गोमूत्र का प्रयोग दो तरीकों से किया जा सकता है। इनमें से पहला तरीका है, दर्द वाले स्थान पर गोमूत्र से सेंक करें। और सर्दी में जोड़ों का दर्द होने पर 1 ग्राम सोंठ के चूर्ण के साथ गोमूत्र का सेवन करें।
  • दंत रोग
    दांत दर्द एवं पायरिया में गोमूत्र से कुल्ला करने से लाभ होता है। इसके अलावा पुराना जुकाम, नजला, श्वास- गोमूत्र एक चौथाई में एक चौथाई चम्मच फूली हुई फिटकरी मिलाकर सेवन करें।
  • मोटापा
    गोमूत्र के माध्यम से आप मोटापे पर आसानी से नियं‍त्रण पा सकते हैं। आधे गिलास ताजे पानी में 4 चम्मच गोमूत्र, 2 चम्मच शहद तथा 1 चम्मच नींबू का रस मिलाकर नित्य सेवन करें।
  • हृदयरोग
    4 चम्मच गोमूत्र का सुबह-शाम सेवन करना हृदय रोगियों के लिए लाभकारी होता है। इसके साथ ही मधुमेह रोगियों के लिए भी यह लाभकारी है। मधुमेह के रोगियों को बिना ब्यायी गाय का गोमूत्र प्रतिदिन डेढ़ तोला सेवन करना चाहिए।
  • पीलिया
    200-250 मिली गोमूत्र 15 दिन तक पिएं, उच्च रक्तचाप होने पर एक चौथाई प्याले गोमूत्र में एक चौथाई चम्मच फूली हुई फिटकरी डालकर सेवन करें और दमा के रोगी को छोटी बछड़ी का 1 तोला गोमूत्र नियमित पीना लाभकारी होता है।
  • यकृत, प्लीहा बढ़ना
    5 तोला गोमूत्र में 1 चुटकी नमक मिलाकर पि‍एं या पुनर्नवा के क्वाथ को समान भाग गोमूत्र मिलाकर लें। आप यह भी कर सकते हैं कि गर्म ईंट पर उससे गोमूत्र में कपड़ा भिगोकर लपेटें तथा प्रभावित स्थान पर हल्की-हल्की सिंकाई करें।
  • कब्ज या पेट फूलने पर
    A. 3 तोला ताजा गोमूत्र छानकर उसमें आधा चम्मच नमक मिलाकर पिलाएं।
    B. बच्चे का पेट फूल जाए तो 1 चम्मच गोमूत्र पिलाएं। और गैस की समस्या में प्रात:काल आधे कप गोमूत्र में नमक तथा नींबू का रस मिलाकर पिलाएं या फिर पुराने गैस के रोग के लिए गोमूत्र को पकाकर प्राप्त किया गया क्षार भी गुणकारी है।
  • गले का कैंसर
    100 मिली गोमूत्र तथा सुपारी के बराबर गाय का गोबर दोनों को मिलाकर स्वच्छ बर्तन में छान लें। सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होकर निराहार 6 माह तक प्रयोग करें।
  • चर्मरोग
    नीम गिलोय क्वाथ के साथ सुबह-शाम गोमूत्र का सेवन करने से रक्तदोषजन्य चर्मरोग नष्ट हो जाता है। इसके अलावा चर्मरोग पर जीरे को महीन पीसकर गोमूत्र मिलाकर लेप करना भी लाभकारी है।
  • आंख के रोग
    आंख के धुंधलेपन एवं रतौंधी में काली बछिया के मूत्र को तांबे के बर्तन में गर्म करें। चौथाई भाग बचने पर छान लें और उसे कांच की शीशी में भर लें। उससे सुबह-शाम आंख धोएं।
  • पेट में कृमि
    आधा चम्मच अजवाइन के चूर्ण के साथ 4 चम्मच गोमूत्र 1 सप्ताह सेवन करें। और कब्ज की समस्या होने पर हरड़ के चूर्ण के साथ गोमूत्र सेवन करें।

गोमूत्र सेवन में कुछ सावधानियां रखना भी बेहद आवश्यक है। जानिए ऐसी ही 6 जरूरी सावधानियां –

  • देशी गाय का गोमूत्र ही सेवन करें। गाय गर्भवती या रोगी न हो।
  • जंगल में चरने वाली गाय का मूत्र सर्वोत्तम है।
  • 1 वर्ष से कम की बछिया का मूत्र सर्वोत्तम है।
  • मालिश के लिए 2 से 7 दिन पुराना गोमूत्र अच्‍छा रहता है।
  • पीने हेतु गोमूत्र को 4 से 8 बार कपड़े से छानकर प्रयोग करना चाहिए।
  • बच्चों को 5-5 ग्राम और बड़ों को 10 से 20 ग्राम की मात्रा में गोमूत्र सेवन करना चाहिए।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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In English

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गाय हम सब की मां।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT08

ϒ गाय हम सब की मां। ϒ

गाय के दूध, घृत, दही, गोमूत्र और गोबर के रस को मिलाकर पंचगव्य तैयार होता है। पंचगव्य के प्रत्येक घटक द्रव्य महत्वपूर्ण गुणों से संपन्न हैं।

Cow - kmsraj51

इनमें गाय के दूध के समान पौष्टिक और संतुलित आहार कोई नहीं है। इसे अमृत माना जाता है। यह विपाक में मधुर, शीतल, वातपित्त शामक, रक्तविकार नाशक और सेवन हेतु सर्वथा उपयुक्त है।

गाय का दही भी समान रूप से जीवनीय गुणों से भरपूर है। गाय के दही से बना छाछ पचने में आसान और पित्त का नाश करने वाला होता है।

गाय का घी विशेष रूप से नेत्रों के लिए उपयोगी और बुद्धि-बल दायक होता है। इसका सेवन कांतिवर्धक माना जाता है।

गोमूत्र प्लीहा रोगों के निवारण में परम उपयोगी है। रासायनिक दृष्टि से देखने पर इसमें पोटेशियम, मैग्रेशियम, कैलशियम, यूरिया, अमोनिया, क्लोराइड, क्रियेटिनिन जल एवं फास्फेट आदि द्रव्य पाये जाते हैं।

गोमूत्र कफ नाशक, शूल गुला उदर रोग, नेत्र रोग, मूत्राशय के रोग, कष्ठ, कास, श्वास रोग नाशक, शोथ, यकृत रोगों में राम-बाण का काम करता है।

चिकित्सा में इसका अन्त: बाह्य एवं वस्ति प्रयोग के रूप में उपयोग किया जाता है। यह अनेक पुराने एवं असाध्य रोगों में परम उपयोगी है।
गोबर का उपयोग वैदिक काल से आज तक पवित्रीकरण हेतु भारतीय संस्कृति में किया जाता रहा है।

यह दुर्गंधनाशक, पोषक, शोधक, बल वर्धक गुणों से युक्त है। विभिन्न वनस्पतियां, जो गाय चरती है उनके गुणों के प्रभावित गोमय पवित्र और रोग-शोक नाशक है।

अपनी इन्हीं औषधीय गुणों की खान के कारण पंचगव्य चिकित्सा में उपयोगी साबित हो रहा है।

ध्यान दें:≈> 

दुग्धाहार, श्रेष्ठाहार- दूध स्तनधारी प्राणियों के लिये वरदान है उस ईश्वर का जिसने दुनिया में उन्हें भेजा। गाय के साथ-साथ भैंस और बकरी के दूध का भी हम इस्तेमाल करते हैं। शायद ही ऐसा कोई मनुष्य हो जो दूध का पान किए बगैर ही बड़ा हो गया हो। “मातृ क्षीरंत अमृतं शिशुभ्य:” मां का दूध बच्चे के लिये अमृत है।

गौमाता की सुरक्षा के लिए संकल्प लीजिए, गौमाता की पूजा के लिये संकल्प लीजिए। चाहे किसी भी जाति सम्प्रदाय के हों, दूध पीने की आदत डालें। प्रक्रिया जो भी हो, मांस लाल होता है, दूध सफेद होता है। सफेद यानी शांति का प्रतीक। यह भी ईश्वर का एक संकेत ही है।

गाय को लेकर विशेष चर्चा इसलिए है कि गाय को बचाने के प्रयास हो रहे हैं। गाय हमारी माता है। हम सब उसके बच्चे हैं, उसके दूध पर आश्रित हैं। गाय का दूध गिलास में लेकर हम पीते हैं तो यह पुष्टिका है, कम से कम इतना तो कहा जा सकता है। गाय के दूध की उपयोगिता का वर्णन प्राय: असंभव है। ये बड़ी-बड़ी डेयरियां कहां से चलती हैं? ये पकवान कहां से बनते हैं? ये चाकलेट कहां से बनती है? ये मिठाइयां कहां से बनती हैं? स्वादिष्ट पनीर, दही, मावा सब के सब दूध से ही ताे बनते हैं। एक तरह से दूध न होता तो संसार नहीं होता।

गौमाता को अपने घर में रखकर तन-मन-धन से सेवा करनी चाहिये, ऐसा कहा गया है जो तन-मन-धन से गौ की सेवा करता है, तो गौमाता उसकी सारी मनोकामनाएँ पूरी करती है।

प्रातः काल उठते ही श्री भगवत्स्मरण करने के पश्चात यदि सबसे पहले गौमाता के दर्शन करने को मिल जाये तो इसे अपना सौभाग्य मानना चाहिये।

यदि रास्ते में गौ आती हुई दिखे, तो उसे अपने दाहिने से जाने देना चाहिये।

गौ के सामने कभी पैर करके बैठना या सोना नहीं चाहिये, न ही उनके ऊपर कभी थूकना चाहिये, जो ऐसा करता है वो महान पाप का भागी बनता है।

गौमाता को घर पर रखकर कभी भूखी – प्यासी नहीं रखना चाहिये, न ही गर्मी में धूप में बाँधना चाहिये। ठण्ड में सर्दी में नहीं बाँधना चाहिये, जो गाय को भूखी – प्यासी रखता है उसका कभी श्रेय नहीं होता।

नित्य प्रति भोजन बनाते समय सबसे पहले गाय के लिए रोटी बनानी चाहिये। गौग्रास निकालना चाहिये। गौ ग्रास का बड़ा महत्व है।

गौओ के लिए चरणी बनानी चाहिये, और नित्य प्रति पवित्र ताजा ठंडा जल भरना चाहिये, ऐसा करने से मनुष्य की “२१ पीढियाँ” तर जाती है।

गाय उसी ब्राह्मण को दान देना चाहिये, जो वास्तव में गाय को पाले, और गाय की रक्षा सेवा करे, यवनों को और कसाई को न बेचे। अनाधिकारी को गाय दान देने से घोर पाप लगता है।

नित्य प्रति गाय के परम पवित्र गोबर से रसोई लीपना और पूजा के स्थान को भी, गोमाता के गोबर से लीपकर शुद्ध करना चाहिये।

गाय के दूध, घी, दही, गोबर और गौमूत्र, इन पाँचो को ‘पञ्चगव्यऽ के द्वारा मनुष्यों के पाप दूर होते है।

कहते हैं गौ के “गोबर में लक्ष्मी जी” और “गौ मूत्र में गंगा जी” का वास होता है इसके अतिरिक्त दैनिक जीवन में उपयोग करने से पापों का नाश होता है, और गौमूत्र से रोगाणु नष्ट होते है।

जिस देश में गौमाता के रक्त का एक भी बिंदु गिरता है, उस देश में किये गए योग, यज्ञ, जप, तप, भजन, पूजन , दान आदि सभी शुभ कर्म निष्फल हो जाते है।

नित्य प्रति गौ की पूजा आरती परिक्रमा करना चाहिये। यदि नित्य न हो सके तो “गोपाष्टमी” के दिन श्रद्धा से पूजा करनी चाहिये।

गाय यदि किसी गड्डे में गिर गई है या दलदल में फस गई है, तो सब कुछ छोडकर सबसे पहले गौमाता को बचाना चाहिये। गौ रक्षा में यदि प्राण भी देना पड़ जाये तो सहर्ष दे देने से गौलोक धाम की प्राप्ति होती है।

यदि तीर्थ यात्रा की इच्छा हो, पर शरीर में बल या पास में पैसा न हो, तो गौ माता के दर्शन, गौ की पूजा और परिक्रमा करने से, सारे तीर्थो का फल मिल जाता है। गाय सर्वतीर्थमयी है। गौ की सेवा से घर बैठे ही ३३ करोड़ देवी – देवताओ की सेवा हो जाती है।

आओ हम-सब मिलकर गौमाता की रक्षा करने का दृढ़ संकल्प ले।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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