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कातिल बरसात

कातिल बरसात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कातिल बरसात। ♦

सूरज डूबा फिर शाम ढली, अंधेरा छाया और हो गई थी रात।
रोजमर्रा के माफिक खाना खा कर, सो गए सारे थे उस रात।

घना अंधेरा था, कोहरा घनेरा था, घने थे बादल और बरसात।
सुबह आई थी खबर कि आठ को, लील गई कातिल बरसात।

मां से लिपटे बच्चे मिले थे, मलबे में दबे पड़े थे सब मां बाप।
चार थे बच्चे तीन बड़े थे, मेहमान ससुर भी दब गए थे साथ।

वह नव प्रधान था काशन का, थी पंचायत भी नव सौगात।
बूढ़े मां, बाप, भाई घर में न थे, खा गई कुल कातिल बरसात।

उल्टी गंगा बहती यह होती है, मां – बाप हुए हैं आज अनाथ।
छाती पीट रोते हैं बेचारे, देख आठ अर्थियां उठाती एक साथ।

दरक उठी थी पहाड़ी ही सारी, नींद में लेटे थे सारे अर्ध रात।
ढह गया था घर ही सारा तो, करता ही कौन बचाने की बात?

दबे पांव मौत ही थी आई, कर गई बरसात में हाथ थी साफ।
जिन्दा बचा एक बेटा था घर का, बस दो बचे बूढ़े मां – बाप।

वह भयानक मंजर जिसने भी देखा, रह गया था वह बेबाक।
चेहरों पर थे आंसू ही आंसू , भूल न पाएंगे वह कातिल रात।

नोट: यह कविता सत्य घटना पर आधारित है और बहुत ही दुःखद घटना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — दिल दहला देने वाली बहुत ही दुःखद घटना है ये। उन मासूम बेचारो को तो भागने का भी समय नहीं मिला। अत्यंत ही दुःखद अचानक से काल का रूप लिए ये कातिल बरसात आई और पुरे कुल को अपने में समा ले गई। बूढ़े माता-पिता और भाई को परमात्मा शक्ति दे इस विपदा की घड़ी में संभलने की और काल के गाल में गए हुए आत्मा को शांति देना प्रभु। ॐ शांति ! ॐ शांति ! ॐ शांति ! ॐ शांति ! ॐ शांति !

—————

यह कविता (कातिल बरसात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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