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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हेमराज ठाकुर

बात वक्त की।

Kmsraj51 की कलम से…..

Baat Waqt Ki | बात वक्त की।

ये लगे हैं बुझाने लौ चिरागों की जलने से पहले ही,
फिर मचा रहे हैं शोर कि चिराग जलते क्यों नहीं हैं?
अंधेरा तो छटा नहीं फिर चिरागों का क्या फायदा?
पर हिम्मत तो देखिए इनकी साहब!
हर अमावस को करते हैं पूनम का वायदा।

क्या फायदा दीवारें खड़ी करने से,
तूफान आ जाने के बाद।
अब समेटने का नाटक कर रहे हैं,
जब आंधियां सब उड़ाकर ले गई।

यूं नहीं कहते हैं बुजुर्ग ,
कि नालियां साफ आसमा में निकाला करो।
बेकार है कुरेदना उन्हें भारी बरसात आने के बाद।
उर्वरकों से फैलते, फलते – फूलते हैं पौधे सभी,
पर कुछ भी असर नहीं करती है बेमौसमी खाद।

हर बात वक्त की ही होती है अच्छी साहब,
बेवक्ता तो भोजन भी जहर बन जाता है।
आज का दौर हो गया है कुछ ऐसा हजूर,
अपना अजीज भी मौके पर जहर उगलवाता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता समय की महत्ता और अवसर चूकने के दुष्परिणामों पर केंद्रित है। कवि उन लोगों की आलोचना करते हैं जो समस्याओं को समय रहते हल करने के बजाय पहले ही उम्मीदों की लौ बुझा देते हैं और बाद में शोर मचाते हैं कि प्रकाश क्यों नहीं हुआ।

    कवि बताते हैं कि जब अंधेरा छंटा ही नहीं, तो चिराग जलाने का लाभ भी नहीं मिलता, फिर भी लोग हर अमावस्या को पूर्णिमा का वादा करते रहते हैं। यह उन झूठे आश्वासनों का प्रतीक है जो बिना वास्तविक प्रयास के दिए जाते हैं।

    आगे कविता समझाती है कि तूफान के बाद दीवारें खड़ी करना या बाढ़ के बाद नालियां साफ करना व्यर्थ है। अर्थात, काम हमेशा सही समय पर ही प्रभावी होता है; देर से किया गया प्रयास अक्सर निष्फल रहता है।

    कवि यह भी कहते हैं कि हर कार्य का अपना उचित समय होता है—जैसे बेमौसम खाद का पौधों पर असर नहीं होता, वैसे ही अनुचित समय पर किया गया कार्य परिणाम नहीं देता।

    अंततः कविता वर्तमान समाज की विडंबना दिखाती है कि समय पर साथ देने के बजाय अपने ही लोग अवसर आने पर हानि पहुंचाते हैं। संदेश यह है कि जीवन में सफलता और संबंधों की स्थिरता के लिए समय की समझ, सही निर्णय और समय पर कार्य करना अत्यंत आवश्यक है।

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यह कविता (बात वक्त की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2026 - KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur poems, samay ki kimat poem in hindi, samay par kavita, short poem on time in hindi, कविता हिंदी में, बात वक़्त की, बात वक़्त की कविता हिंदी में, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की कविताएं

अपना धर्म सबसे उत्तम।

Kmsraj51 की कलम से…..

Apna Dharm Sabse Uttam | अपना धर्म सबसे उत्तम।

“जिस राष्ट्र को अपनी संस्कृति पर गर्व नहीं,
                                        वह राष्ट्र दीर्घकाल तक जीवित नहीं रह सकता।”  :- 
स्वामी विवेकानंद 

धर्म किसी पूजा पद्धति का नाम नहीं, बल्कि धर्म जीवन जीने का एक समग्र सामाजिक तरीका है। दुनियां में लगभग 1100 के करीब धर्म हैं; उन सबके अपने – अपने जीवन जीने के तौर तरीके हैं। उनकी :-
____________________

1) धार्मिक मान्यताएं और विश्वास।

2) पूजा पद्धतियां।

3) दैविक विधान और मान्यताएं।

4) धर्म ग्रन्थ और शास्त्र।

5) जन्म संस्कार।

6) विवाह पद्धतियां और रीति रिवाज।

7) मृत्यु संस्कार इत्यादि बहुत कुछ अलग अलग हैं।

इन धर्मों में कहीं धार्मिक कट्टरता है, तो कहीं एकेश्वरवाद। कहीं अपने धर्म को न मानने वालों को जिहाद का शिकार बनाने की प्रवृति है, तो कहीं मिशनरी प्रचारकों के माध्यम से आर्थिक प्रलोभन में धर्मांतरण करवा कर अपने धर्म का विस्तार करने की प्रबल ईच्छा। लेकिन हिन्दू धर्म ही दुनियां का एक मात्र ऐसा धर्म है, जिसमें न धार्मिक प्रचार और विस्तार के लिए आर्थिक प्रलोभन दिया जाता है और न ही तो कोई जिहाद ही की जाती है। यह एक खुला आवाह्न है और खुला प्रचार है। इस धर्म में किसी के साथ धर्म परिवर्तन के लिए कोई जोर जबरदस्ती, प्रलोभनात्मकता या चालाकी नहीं की जाती। जिसे यह धर्म आचारों से, विचारों से या व्यवहारों से अच्छा लगता है। वह इसे अपना सकता है। हिन्दू धर्म दुनियां का इकलौता देश है, जिसमें :- 
___
1) धार्मिक कट्टरता नहीं बल्कि लचीलता है। जो किसी भी धर्म की अच्छाइयों को सदियों से खुद में समाहित करता आया है और बुराइयों का प्रतिकार करता आया है। अन्य धर्मों में अपने धर्म की मान्यताओं को हर हाल में स्वीकारना जरूरी है। अन्यथा धर्म विरोधी कहलायेंगे।
2) एकेश्वरवाद नहीं बल्कि सर्वेश्वरवाद है। जिसमें ईश्वर तत्व को अपने – अपने तरीके, मान्यताओं, पूजा पद्धतियां तथा सामाजिक व्यवहारों द्वारा खोजने की खुली छूट है। किसी पर कोई पाबंदी नहीं। इसका साफ-साफ उदाहरण बहुदेववाद है। हिन्दू धर्म के वृहद समाज में हर उप समाज का अपना – अपना देवी – देवता अलग है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज के प्रतिष्ठित देवता और भगवती – भगवान या ईश्वर को तो वे सभी हिन्दू फिर भी मानते हैं। वे चाहे किसी भी जाति वर्ग के हो या फिर किसी भी हिन्दू समाज विशेष के हो। यानी यहां हर व्यक्ति को ईश्वर को खोजने और पूजने की खुली छूट है। अनेक विकल्प हैं, अनेक देवता हैं और अनेक पूजा पद्धतियां हैं पर अंततोगत्वा सभी की सार्वभौमिक मान्यता परमेश्वर पर व्यवस्थित है। विश्व के अन्य धर्मों में ऐसा नहीं है। वहां एकेश्वरवाद है। कहीं एक गॉड को माना जाता तो कहीं एक अल्लाह या खुदा को। यही वैविध्य में एकत्व की भावना ही तो हिन्दू धर्म की खूबसूरती है।
3) धर्म ग्रंथों या शास्त्रों पर मौलिक चर्चा और नवीन व्याख्या करने की खुली छूट है हिन्दू धर्म में। जबकि अन्य धर्मों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। दुनियां के किसी भी धर्म में यह व्यवस्था नहीं शायद कि कोई उनके मूल धर्म ग्रंथों की नए सिरे से व्याख्या कर सके। जो करेगा, वह नापेगा। जो धार्मिक कट्टरता का प्रतीक है। हिन्दू धर्म धार्मिक कट्टरता के पक्ष में ही नहीं है। हां इतना जरूरत है कि जो हमारे धर्म को छेड़ेगा, उसे धार्मिक तरीके से जबाव हमारा धर्म भी देता है। बाईबल और कुरान आदि पर स्वतंत्र व्याख्या इन धर्मों की मान्यता से हट कर कर पाना सम्भव नहीं है शायद। जबकि श्रीमद्भागवत गीता, वेद, पुराण षट् शास्त्रों पर कोई भी स्वतंत्र व्याख्याएं करते आए हैं और कर रहे हैं तथा करते चले जाएंगे। यह हिन्दू धर्म के खुलेपन और स्वतन्त्र विचार का प्रतीक है। यानी यहां धर्म में सकारात्मक बदलाव भी वक्त के साथ स्वीकार्य है और दूसरे धर्मों में इस रीति का अभाव है। यहां सती प्रथा थी। विरोध हुआ तो बन्द हो गई। यहां बाल विवाह होते थे। विरोध हुआ तो बन्द हो गए। यहां नर बलि की प्रथा थी। विरोध हुआ तो बन्द की गई। यहां विधवा विवाह वर्जित था। कालान्तर में वह भी अवधारणा टूटी। गलत का विरोध जायज था और उसे बन्द करना अति जायज था। यह प्रतीक है हिन्दू धर्म के खुलेपन का। जबकि दूसरे धर्मों में कुछ सामाजिक कुरीतियों को आज भी ढोया जा रहा है। हिजाब और तीन तलाक जैसी कुरीतियों को अब आधुनिक समाज में मुस्लिम भाई बहनों को भी समाप्त कर देना चाहिए। परन्तु वे आज भी बने हुए हैं। यह किसी धर्म का विरोध नहीं बल्कि हिन्दू धर्म का तुलनात्मक अध्ययन है।
4) वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वेभवन्तु सुखिन, सर्वसन्तु निरामया, की सर्वमंगल भावना दुनियां के एक मात्र धर्म – हिन्दू धर्म में है। जो सभी प्राणियों को एकोब्रह्म की भावना से देखता है और सभी धर्मों को सम्मान देता है। दुनियां के अन्य धर्म तो सिर्फ अपने आप को ही श्रेष्ठ मानते हैं और उन्हें न मानने वालों को विधर्मी मानते हैं। यह बड़प्पन है हिन्दू धर्म में।
                 इतना ही नहीं दुनियां का बहुत पुराना धर्म पारसी धर्म भी इसी भारत भूमि की हिन्दू धर्म की सहिष्णुता के कारण आज यहीं भारत में कुछ अंशों में बचा है। वरना तो आज वह अपने ही देश में लुप्त प्राय हो गया है, जिस देश में वह कभी जन्मा था। भारत ने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारस इत्यादि धर्मों को अपने हिन्दू धर्म प्रधान होने के बाद भी बराबर संजो कर रखा है। यहां ईसाइयों की चंगाई सभाएं खुलेआम होती है और गिरिजा घरों में कन्फेशन आज भी होता है। यहां मस्जिदों में अज़ान आज भी लगती है और नमाज खुलेआम पढ़ी जाती है। खैर बौद्ध, सिख तथा जैन धर्म तो हिंदू धर्म से ही प्रस्फुटित धर्म है। वे तो अपना – अपना धार्मिक प्रचार खुले आम करते ही हैं। कानून के दायरे में भारत में सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने – अपने धार्मिक स्थल बनाने की खुली छूट है।
                      परन्तु सवाल यह है कि क्या दुनियां के अन्य देशों में भी यह धार्मिक सहिष्णुता जिन्दा है? गांधार में दुनियां का सबसे बड़ा शिव मन्दिर था। आज उसकी स्थिति पता करो। पाकिस्तान में दुनियां का सबसे बड़ा विष्णु मन्दिर था। आज उसकी स्थिति पता करो। पंजाब जो भारत की आजादी से पहले का था। आजादी के बाद दो भागों में बंट गया। पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब। पश्चिमी पंजाब जो आज भारत का हिस्सा नहीं है। वहां हिन्दुओं की स्थिति का पता करो। पाकिस्तान भारत से 1947 में अलग ही धार्मिक आधार पर हुआ था। जिसमें मुस्लिम भाइयों ने दलील दी थी कि हम पाक यानी पवित्र है और ये हिन्दू या हिन्दू धर्म से उद्भूत अन्य धर्म के लोग नापाक यानी अपवित्र हैं। इसलिए हम इन अपवित्र लोगों के साथ नहीं रह सकते। हमें अलग देश चाहिए। बाबा साहेब अम्बेडकर जी लिखते हैं कि मैं इस विभाजन को तब सही मानूंगा जब पूरे के पूरे मुस्लिम भाई पाकिस्तान चले जाएं और पूरे के पूरे हिन्दू धर्म के मतावलंबी भारत में रहें। परन्तु ऐसा भी कुछ नहीं हुआ। कई मुस्लिम भाई बहने भारत में ही रहे और कई हिन्दू – सिख आदि पाकिस्तान में ही रहे। आज भारत में तो धर्म निरपेक्षता के चलते और धार्मिक सहिष्णुता के चलते मुस्लिम भाई बहनों को पूरी सुरक्षा है। उधर पाकिस्तान और बंगला देश में हमारे हिन्दू और सिख आदि भाई बहनों की संख्या दिन प्रति दिन घटती जा रही है। आखिर क्यों? क्या यह स्वतः सिद्ध नहीं करता कि हिन्दू धर्म विश्व का सबसे मानवतावादी धर्म है। हां हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा जहर आज जातिवाद ने घोल कर रखा है। जिस दिन हमारे हिन्दू धर्म से यह जातिवाद का जहर उतर जाएगा, उस दिन भारत फिर से सोने की चिड़िया ही कहलाएगा। हिंदुओं को भारत में अन्य धर्मों के लोगों के रहने से भी कोई आपत्ति नहीं है। बल्कि हिंदुस्तान तो एक धार्मिक संग्रहालय है। शर्त यह है कि कोई हमारे धर्म के लोगों को जबरन, पैसों का प्रलोभन दे कर, लब जेहाद कर के या धार्मिक कट्टरपंथी जेहाद कर के अपने धर्म में मिलाकर उनका धार्मिक परिवर्तन न करें। यह बहुत ही गलत है। भारतीय संविधान के आर्टिकल 25 में हमें धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार मिला है। उसके तहत आप अपने धर्म का प्रचार करें और हम हिन्दू धर्म का प्रचार करेंगे। फिर जिसे जो अच्छा लगता है वह उसे सहज प्रक्रिया से अपनाएं। उसमें न हमें समस्या है और न तुम्हे। जबरदस्ती, प्रलोभनात्मकता तथा चालाकी किसी भी सूरत में मंजूर नहीं है। एक विडम्बना भारतीय संविधान की यह भी है कि आर्टिकल 30 में अल्पसंख्यकों को तो अपने अपने धर्म की शिक्षा देने का अधिकार उनके अपने स्कूलों कॉलेजों में दिया गया है और उसी संविधान के अनुच्छेद 30(A) में हिन्दू धर्म के लोग न अपने स्कूलों कॉलेजों में हिन्दू धर्म की शिक्षा दे सकते हैं और न सरकारी स्कूलों में। यह दोहरा रवैया भी धर्म निरपेक्षता के सिद्धान्त को कहीं न कहीं आहत करता है। इसलिए इस सन्दर्भ में भी भारत सरकार को संवैधानिक उपचारों के अधिकार के तहत इन दो कानूनों – 30 और 30(A) को पुनः धर्म निरपेक्षता के आधार पर निर्धारित करना चाहिए। एक देश, एक संविधान होने के बावजूद भी दोहरे कानून ठीक नहीं हैं। 
                     बहुत से लोग धर्म और अध्यात्म को एक ही मानते हैं। जबकि ये दो अलग – अलग पहलू हैं। यह जरूर है कि धर्म अध्यात्म तक ले जाने वाली सीढ़ी है। परन्तु दोनों में दिन रात का अन्तर है। धर्म सामाजिक जीवन जीने की एक व्यवस्थित पद्धति है, जिसमें सामाजिक तानेबाने के अनुसार हर धार्मिक समाज का अपना वैचारिक संविधान बनाया गया होता है और उस समाज विशेष के लोग उसी संविधान के तहत जीवन व्यतीत करते हैं। इधर अध्यात्म आत्मा और परमात्मा के महा मिलन का एक श्रद्धा, विश्वास, भावपूर्ण ज्ञान और विवेक का रास्ता है। इसलिए इन दोनों को एक मानना हमारी भूल है। धर्म में वाद – विवाद जरूरी है और अध्यात्म निर्विवाद होता है। अध्यात्म में विवाद के लिए नहीं समर्पण के लिए स्थान है। परन्तु इस स्थिति तक कोई भी व्यक्ति या साधक धर्म के मार्ग में ठोकरें खा – खा कर ही पहुंचता है, एकदम से नहीं। ये दिनों एक दूसरे से सह सम्बद्ध जरूर हैं पर एक नहीं है। इसलिए यदि आप अध्यात्म के चर्म को पाना चाहते हैं तो अपने – अपने धर्म में संगठित और सुरक्षित रहिए। जो धर्म की रक्षा करेगा, धर्म उसकी रक्षा करता है – यही मूल मंत्र है। 

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह लेख धर्म की व्यापक अवधारणा को स्पष्ट करता है और विशेष रूप से हिंदू धर्म की सहिष्णु, लचीली और मानवतावादी प्रकृति पर प्रकाश डालता है। लेखक के अनुसार धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें मान्यताएँ, संस्कार, रीति-रिवाज, धर्मग्रंथ और सामाजिक आचार सम्मिलित होते हैं। विश्व में अनेक धर्म हैं, पर उनके स्वरूप, नियम और दृष्टिकोण एक-दूसरे से भिन्न हैं।

    लेख में यह प्रतिपादित किया गया है कि हिंदू धर्म अन्य कई धर्मों की तरह न तो कट्टरता, न जबरन धर्मांतरण और न ही आर्थिक या वैचारिक दबाव का समर्थन करता है। यह एक खुला और स्वैच्छिक मार्ग है, जिसे कोई भी व्यक्ति अपने आचार, विचार और व्यवहार से प्रभावित होकर अपना सकता है। हिंदू धर्म की विशेषता उसकी लचीलापन, सर्वेश्वरवाद, बहुदेववाद और विविधता में एकता की भावना है।

    हिंदू धर्म में धर्मग्रंथों की स्वतंत्र व्याख्या, संवाद और समयानुसार सकारात्मक सुधार की परंपरा रही है। इसी कारण सती प्रथा, बाल विवाह, नर बलि जैसी कुरीतियाँ समय के साथ समाप्त हुईं। लेख में “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सिद्धांतों को हिंदू धर्म की वैश्विक और सर्वमंगल दृष्टि का प्रतीक बताया गया है।

    लेख भारत की धार्मिक सहिष्णुता का उदाहरण देते हुए बताता है कि यहाँ विभिन्न धर्मों को समान स्वतंत्रता मिली है, जबकि कई अन्य देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंताजनक है। साथ ही, लेखक जबरन, प्रलोभन या छल से होने वाले धर्मांतरण का विरोध करता है और संविधान में धार्मिक समानता से जुड़े कुछ प्रावधानों की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता बताता है।

    अंत में धर्म और अध्यात्म के अंतर को स्पष्ट किया गया है—धर्म सामाजिक जीवन की व्यवस्था है, जबकि अध्यात्म आत्मा-परमात्मा के मिलन का मार्ग। धर्म अध्यात्म तक पहुँचने की सीढ़ी है, पर दोनों एक नहीं हैं। लेख का निष्कर्ष है कि अपने धर्म में संगठित और जागरूक रहकर ही व्यक्ति अध्यात्म के शिखर तक पहुँच सकता है।

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यह Article (अपना धर्म सबसे उत्तम।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Difference between Tantra, Mantra and Tatva Gyan | तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।

एक अध्यात्मिक विश्लेषण 

बहुतायत लोगों की यह धारणा होती है कि तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान — ये तीनों एक ही विषय के अलग- अलग नाम हैं पर विषय एक ही है। किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। अध्यात्म-विज्ञान की दृष्टि से देखें तो ये तीनों अलग-अलग पड़ाव हैं। प्रत्येक का अपना क्षेत्र, उद्देश्य और लक्ष्य है। इन्हें क्रमवार समझना आवश्यक है :-

1. तंत्र विज्ञान — भौतिकता का कौशल

तंत्र प्राचीन भारत की भौतिक सामग्रियों के संतुलित संयोजन का विज्ञान था। यह शरीर, औषधि, धातु, रस, दिशा और समय जैसे भौतिक तत्त्वों के प्रयोग से चमत्कार उत्पन्न करने की कला थी।
तंत्र को समझने के लिए कठोर अभ्यास की आवश्यकता होती थी, जिसे आज के युग में “ट्रेनिंग” कहा जाता है। आधुनिक विज्ञान के विकास के साथ-साथ तंत्र अब भौतिक, रासायनिक और जैव विज्ञान का अंग बन चुका है।
तंत्र वस्तुतः बौद्धिक विलास का विज्ञान था — आज यह सार्वजनिक हो चुका है और आधुनिक प्रयोगशालाओं में इसके सिद्धांत विज्ञान के रूप में आत्मसात हो चुके हैं।

2. मंत्र विज्ञान — मानसिक साधना का विज्ञान

मंत्र विद्या वस्तुतः बौद्धिक विलास का विज्ञान है । यह तंत्र से एक कदम आगे की कड़ी थी। इसमें शब्द-साधना और ध्वनि-ऊर्जा के माध्यम से मानसिक जगत को साधा जाता था।
मंत्रों से प्रत्यक्ष भौतिक चमत्कार नहीं होते थे, किंतु सूक्ष्म शरीर शक्तिशाली बनता था।
तंत्र जहाँ भौतिक शरीर को सशक्त करता था, वहीं मंत्र विज्ञान मन और चेतना को सशक्त करता था।

मंत्र-साधना से साधक को मानसिक सिद्धि और वाक्-सिद्धि प्राप्त होती थी —

  • मानसिक सिद्धि से वह दूसरों के मन के भाव पढ़ सकता था।
  • वाक्-सिद्धि से उसके शब्द वरदान या शाप का प्रभाव धारण करते थे।

आज का मनोविज्ञान इसी विद्या के कुछ अंशों को आधुनिक रूप में समझाने का प्रयास करता है। परंतु इस विद्या का मूल तर्क से नहीं,  कल्पना शक्ति से संचालित होता है, और यही कारण है कि आधुनिक तर्कशील समाज में यह विद्या लुप्तप्राय हो गई है। जो मंत्र विज्ञान आज प्रयोग होता भी है,  वह एक तो बहुत कम होता है और फिर वह सिद्ध पुरुषों के अभाव में प्रयोग होता है,जिससे समाज को भ्रम में तो डाला जा रहा है पर राहत नहीं पहुंच रही है। मंत्र विज्ञान मन की ताकत को बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम था और है। पर शर्त यह है कि इसकी भी सिद्धि शास्त्र में बताए अनुसार किसी सिद्ध के सानिध्यम में कर लेनी होती है। मात्र किताबों से पढ़ने से कोई खास प्रभाव मंत्र विज्ञान का नहीं होता है। मंत्रों की यूं तो आज भरमार है। परन्तु मंत्र विद्या लगभग लुप्तप्राय हो गई है।

3. तत्व ज्ञान — आत्मा और परमात्मा का संयोग है

तत्व ज्ञान इन दोनों से बिल्कुल भिन्न है। यह न तो तंत्र की भौतिकता से जुड़ा है, न मंत्र की मानसिकता से।
यह ज्ञान आत्मा के उस मूल स्रोत की खोज है, जिससे समस्त ऊर्जा प्रवाहित होती है —
वह कहाँ से आती है, कहाँ जाती है, और कौन-सा तत्व उसे संचालित करता है? इन सब घटनाओं का विधिवत ज्ञान ही तत्व ज्ञान है।

तत्व ज्ञान किसी चमत्कार या देव-सिद्धि का विज्ञान नहीं है।
यह आत्मिक अनुभूति का मार्ग है — आत्मा और परमात्मा के मिलन की यात्रा।
जो व्यक्ति इस ज्ञान को जानकर व्याख्या सहित लोक में प्रकट कर सके, वही तत्वज्ञानी कहलाता है।

गीता और संत-मत दोनों ही कहते हैं —

“जिसे आत्मा और परमात्मा का वास्तविक ज्ञान हो वही ज्ञानी है, शेष सब ज्ञापक मात्र हैं।”

इस ज्ञान की प्राप्ति सद्गुरु की कृपा से ही संभव है —
चाहे वह दर्शन कृपा हो,  स्पर्श-कृपा हो, दृष्टि-कृपा हो या शब्द-कृपा हो। परन्तु कृपा सदगुरु से ही इनमें से किसी एक माध्यम से या सभी माध्यमों से व्यक्ति को प्राप्त होती है।
यह ज्ञान गुरु-मुख से प्राप्त होता है; इसे केवल पढ़ने, जपने या तर्क से नहीं पाया जा सकता।

यह गूढ़, गोपनीय और रूहानी साधना है — जो मन से प्रारंभ होकर आत्मा में विलीन होती है।
यहीं से आत्मा का परमात्मा से समीप्य आरंभ होता है।
भौतिकता से मोह छूटता है, दिखावा समाप्त होता है और मन शांति को प्राप्त होता है।आत्मा प्रफुल्लित होती है। यह असल में आत्म विलास का विषय है।

4. उदाहरण — सिद्धि बनाम मुक्ति

मंत्र और तंत्र से सिद्धियां मिल सकती हैं — आठ सिद्धि, नौ निधि, 24 प्रकार की शक्तियाँ — पर वे मुक्ति नहीं देतीं।
कुन्ती के पास मंत्र-सिद्धि थी, पर क्या वह दुख-मुक्त हुईं? नहीं न।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के गुरु तोतापुरी के ज्ञान बारे सब जानते हैं कि उन्होंने स्वामी जी को क्या ज्ञान दिया था? स्वामी जी मां काली को सिद्ध भी कर चुके थे। परन्तु फिर भी स्वामी जी को अपनी तत्व-साधना से देवी-सिद्धि के बंधन को तोड़ना पड़ा था।

भगवान राम और कृष्ण तक सांसारिक पीड़ा से मुक्त नहीं रहे।
अतः सिद्धि मुक्ति का मार्ग नहीं है — केवल तत्व-ज्ञान ही परम मुक्ति का द्वार है।

5. निष्कर्ष — सत्य की ओर मार्ग

आज के युग में तंत्र और मंत्र के साधक तो मिल जाएंगे, पर तत्वज्ञानी दुर्लभ हैं।
जो सत्य की खोज करना चाहता है, उसे चमत्कारों से नहीं, सद्गुरु की शरण से आरंभ करना होगा।
तभी वह उस आनंद-भाव को प्राप्त करेगा जिसके लिए सूरदास ने कहा था —

“यह गूंगे के गुड़ समान है — स्वाद तो है, पर कहा नहीं जा सकता।”

तत्व-ज्ञान की वही स्थिति है — जो समुद्री जहाज के ऊपर बैठे पंछी की होती है। वह पंछी विशाल सागर में दसों दिशाओं में जी भर कर उड़ लेता है पर अंततः जब उसे थकान महसूस होती है तो,उसे विश्राम करने के लिए कोई सहारा या आधार न मिलने के कारण; वह पुनः उसी जहाज पर लौट कर आता है। ऐसी ही सच्चे तत्व ज्ञान की प्राप्ति की लालसा वाले साधक की स्थिति अंततः होती है ।
जहाँ साधक का मन हर दिशा में भटकने के बाद उसी “जहाज” में लौट आता है, जो उसका सच्चा आश्रय है — परमात्मा।

तंत्र शरीर का, मंत्र मन का, और तत्व ज्ञान आत्मा का विज्ञान है।
सिद्धियाँ तंत्र और मंत्र से मिल सकती हैं, पर सच्ची मुक्ति केवल तत्व ज्ञान से ही संभव है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान—ये तीनों शब्द अक्सर एक ही अर्थ में उपयोग किए जाते हैं, परंतु वास्तव में ये अध्यात्म के तीन अलग-अलग चरण हैं। इनका क्षेत्र, उद्देश्य और साधना-मार्ग भिन्न है।

    तंत्र विज्ञान भौतिक जगत से जुड़ा हुआ है। यह शरीर, औषधि, धातु, दिशा, समय और अन्य तत्वों के संयोजन का विज्ञान है। प्राचीन काल में इसे भौतिक चमत्कारों का स्रोत माना जाता था। तंत्र साधक अपने अभ्यास से शरीर और पदार्थों की शक्तियों को नियंत्रित करता था। आज के समय में इसका वैज्ञानिक रूप भौतिक, रासायनिक और जैविक विज्ञान के रूप में विकसित हो चुका है।

    मंत्र विज्ञान मानसिक शक्ति का विज्ञान है। इसमें ध्वनि, शब्द और उच्चारण के माध्यम से मन तथा चेतना को नियंत्रित किया जाता है। मंत्र-साधना से साधक को मानसिक सिद्धि (दूसरों के विचारों को जानने की शक्ति) और वाक्-सिद्धि (शब्दों से प्रभाव डालने की शक्ति) प्राप्त होती है। तंत्र जहाँ शरीर को सशक्त करता है, वहीं मंत्र मन को। किंतु यह विद्या आज लुप्तप्राय है क्योंकि इसे गुरु के सानिध्य में ही साधा जा सकता है, मात्र पुस्तकीय ज्ञान से नहीं।

    तत्व ज्ञान इन दोनों से कहीं ऊँचा है। यह आत्मा और परमात्मा के मिलन की साधना है। इसमें कोई चमत्कार नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभूति और मुक्ति का मार्ग है। तत्वज्ञानी वह होता है जो आत्मा के मूल स्रोत को पहचान लेता है। यह ज्ञान गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है—तर्क या अध्ययन से नहीं।

    तंत्र और मंत्र साधक को सिद्धियाँ तो दे सकते हैं, परंतु सच्ची मुक्ति केवल तत्व ज्ञान से ही मिलती है। यही वह मार्ग है जो मनुष्य को भौतिक और मानसिक बंधनों से मुक्त कर सच्चे आनंद, शांति और परमात्मा से एकत्व की अनुभूति कराता है। यही अध्यात्म का परम लक्ष्य है।

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यह Article (तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हिमाचल की पुकार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Himachal Ki Pukar | हिमाचल की पुकार।

आज हिमाचल रो रहा है, चहुं ओर देख कर चीख पुकार।
टूटे पर्वत, सड़कें टूटीं, बहा गई नदियां कई लोगों के घरबार।

बेघर हुए, कई अनाथ हुए, कईयों का बह गया सब परिवार।
बेजुबां पशु भी बह गए, पेड़-पौधे तो बह गए लाख – हजार।

वह बह गया! वह ढह गया! रुको! भागो! बचो! – है यही गुंजार।
बस काया का कपड़ा ही शेष रहा, लुट गया बाकी का संसार।

लोगों की मदद लोग ही कर रहे, थक गई है हिमाचल सरकार।
पक्ष – विपक्ष में घमासान मचा है, कौन करेगा इसका उपचार?

सत्ता हो गई निरुत्तर-सी, कुदरत भी न कुछ सुनने को तैयार।
मानव मस्ती में चूर है, सुधारा किसने यहां अपना व्यवहार?

पेड़ काटना, अवैध खनन और गंदगी फैलाना देवों के दरबार।
मान बैठा है सुविधा – जीवी, मानव अपना मौलिक अधिकार।

देव-स्थल हो गए पिकनिक के अड्डे, होने लगे वहां व्यभिचार।
छोटों को रही न कद्र बड़ों की, तनिक भी रहा न शिष्टाचार।

तर्कवादी मानव न मानेगा, कुदरत तो चलाएगी अपने हथियार।
आत्म – शुद्धि कुदरत को भी करनी है, तू करता रह हाहाकार।

पढ़ाई-लिखाई से बुद्धि सठियाई, स्वार्थ बढ़ा और भ्रष्टाचार।
कायदे-कानून सब कागज में रह गए, बाकी मची है मारामार।

संभल ले मूर्ख मानुष अभी भी! बहुत बुरी कुदरत की मार।
आ गई अपनी पर तो छोड़ेगी न फिर, तुझे न तेरा कारोबार।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता यह कविता हिमाचल में आई प्राकृतिक आपदा और उसके कारण हुए विनाश को दर्शाती है। भारी बारिश और बाढ़ से पर्वत टूट गए, सड़कें बह गईं, घर उजड़ गए और कई लोग बेघर-अनाथ हो गए। पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी प्रकृति के इस कहर का शिकार हो गए। कवि बताते है कि इस संकट की घड़ी में लोग ही एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं, जबकि सरकार और सत्ता तंत्र निष्क्रिय और राजनीति में उलझा हुआ है। आपदा के पीछे का कारण भी मनुष्य का लोभ और स्वार्थ ही है – जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अवैध खनन, गंदगी फैलाना और धार्मिक स्थलों को पिकनिक स्पॉट बना देना। मानव ने संस्कार और शिष्टाचार भी त्याग दिए हैं। कवि चेतावनी देता है कि प्रकृति आत्मशुद्धि के लिए विनाश का मार्ग अपनाती है। यदि मनुष्य ने अब भी अपना व्यवहार और जीवनशैली नहीं बदली, तो कुदरत की मार और भी भयानक होगी।
  • 👉 कुल मिलाकर, कविता मानव को प्रकृति का सम्मान करने और समय रहते सचेत होने का संदेश देती है।

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यह कविता (हिमाचल की पुकार।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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मां ने छोड़ी अन्तिम सांसें।

Kmsraj51 की कलम से…..

Mother Breathed Her Last | मां ने छोड़ी अन्तिम सांसें।

मां ने छोड़ी अन्तिम सांसें, इस तन से सब रिश्ता – नाता टूटा।
वह चली गई परलोक गमन पर, धरती का सब यहीं पर छुटा।

एक टक गाड़ी आंखे छत पर, नयनों से त्यागे अन्तिम प्राण।
जिव्हा लट गई, श्वासें उखड़ी, टूटी नाड़ी, झूल गए दोनों कान।

अजीब तड़प हुई तन में थी, मौत ने लिया ये कैसा इम्तेहान?
टूटी सांसों की डोरी क्षण भर में, छूट गया यह सकल जहान।

दुनियां का मिलता सब हाट बाट में, पर मां तो नहीं मिलती।
खुशियां हैं लाख यहां, मां की गोद सी खुशियां नहीं मिलती।

था ममता का साया अब तक उनका, अब तो संबल रहा नहीं।
ऐसा कौन सा दुख था जीवन में, जो मां ने शायद सहा नहीं?

पिता का जाना, भैया का देह त्यागना, बहना भी तो चली गई।
ऐसे में मां की ममता की छाया, हम पर अब तक बनि रही।

इस संसार में देह धार कर, मां के गर्भ से ही तो मैं आया था।
अंगुली पकड़ कर पथ पर चलना, मां ने ही तो सिखाया था।

सूना कक्ष अब मां हो गया, घर लगता कुछ खाली – खाली है।
मां-बाप, गुरु के रिश्ते ही तो सच्चे हैं, बाकी तो सब जाली हैं।

इस रहस्य भरे संसार में, जन्म-मरण का अजीब सा खेला है।
मौत का मातम देख के लगता है, जीव जग कारा में धकेला है।

आठ जुलाई दो हजार पच्चीस को, सांय, मां का जाना हुआ।
बोलते – बोलते वह चली गई, खत्म ज़िन्दगी का अफसाना हुआ।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता एक संकलित भावनात्मक श्रद्धांजलि है, जिसमें कवि ने एक मां के निधन से उपजी पीड़ा, खालीपन और यादों को गहराई से व्यक्त किया है। मां ने 8 जुलाई 2025 को अंतिम सांस ली, और उसी क्षण से कवि का संसार अकेला, सूना और अधूरा हो गया। कवि ने मां के अंतिम क्षणों का मार्मिक चित्रण किया है — उनकी अंतिम सांस, नाड़ी का टूटना, शरीर का जड़ होना, ये सब देखकर कवि को लगा जैसे मौत ने बहुत कठोर इम्तहान लिया हो। वह बताता है कि इस संसार में सब कुछ मिल सकता है, पर मां दोबारा नहीं मिलती। मां की गोद में जो सुकून था, वह किसी चीज़ में नहीं मिलता। कवि याद करता है कि जीवन के दुखों — पिता, भाई और बहन के निधन — को भी मां ने धैर्य से सहा, और अपने बच्चों पर ममता की छाया बनाए रखी। मां ने ही उसे चलना सिखाया, जीवन की राह दिखाई। अब जब मां नहीं रही, तो घर का हर कोना सूना लगने लगा है। वह कहता है कि माता-पिता और गुरु के रिश्ते ही सच्चे होते हैं, बाकी सब संबंध क्षणभंगुर हैं। अंत में वह मृत्यु की निस्सारता और जीवन के अनिश्चय की बात करता है — यह संसार एक रहस्यमयी जेल जैसा है, जिसमें जन्म और मृत्यु की लुका-छिपी चलती रहती है। मां के जाने से उसकी ज़िन्दगी का एक अध्याय समाप्त हो गया है।

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यह कविता (मां ने छोड़ी अन्तिम सांसें।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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कुदरत का कहर तो बरपेगा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kudrat Ka Kahar Tho Barapega | कुदरत का कहर तो बरपेगा।

उजड़ रही है देखो बस्तियां आज,
उजड़ रहे हैं सब खेत – खलियान।
वह दिन भी शायद दूर नहीं अब,
जब बन जाएगी धरती ही श्मशान।

न कार रहेगी, न कोठियां तब,
न घर रहेंगे और न ही तो मकान।
नदी नालों में बहती लाशें दिखेगी,
पहाड़ बनेंगे सब सपाट मैदान।

विकास के नाम पर लूट मचाई है,
भ्रष्टाचार की अब खुल गई दुकान।
जर्रा जर्रा कुदरत का ताण्डव करेगा,
क्या तब समझेगा ये पागल इंसान?

हां बात और भी काम की है एक,
बताना जरूरी सनातन वो विधान।
नए दौर के नए लोगों में बिल्कुल भी,
दिखता न जिसका है नामों – निशान।

देवी पूजी न देवता, साधु – सन्त माना न,
वाहेगुरु न गॉड, खुदा न ही तो भगवान।
खनन माफिया और वन माफिया मिलकर,
कर रहे हैं अवैध खनन और अवैध कटान।

सरकारें सोई है कुंभकर्णी नींद में,
उनका न इधर है तनिक भी ध्यान।
अधिकारी मिले हैं माफियाओं से,
जनता बेचारी होती है परेशान।

न्याय मांगे भी तो वह किससे मांगे?
नीचे से ऊपर तक हेलो का घमासान।
शिकायत करें तो वह भी किससे करें?
मिलता ही नहीं कहीं कोई समाधान।

सत्ताधीश सब सत्ता में चूर, क़ानून की,
महकमें उड़ाते धज्जियां शहर ए आम।
खुल्लमखुल्ला लूट पड़ी है चहुं ओर को,
मूकधर्मी जनता की भी है बन्द ज़ुबान।

कुदरत का कहर तो बरपेगा ही,
और क्या करेगा फिर भगवान?
अभी वक्त है, सम्भल ओ लोलुप !
जरा आँखें खोल ले पागल इन्सान।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता प्रकृति के विनाश और मानवीय लालच पर करारा प्रहार करती है। कवि कहता है कि इंसान ने विकास के नाम पर बस्तियां, खेत-खलिहान और पहाड़ तक उजाड़ दिए हैं। यदि यही स्थिति रही तो एक दिन पूरी धरती श्मशान बन जाएगी। कविता में भ्रष्टाचार, खनन माफिया और वन माफिया द्वारा प्रकृति के दोहन को उजागर किया गया है। सरकारें और अधिकारी माफियाओं से मिलीभगत करके मौन हैं, और आम जनता असहाय है। न्याय की कोई उम्मीद नहीं, क्योंकि हर स्तर पर भ्रष्टाचार फैला हुआ है। कवि इस पतनशील समाज को यह याद दिलाता है कि सनातन धर्म, आस्था, और आध्यात्मिकता से भी लोग दूर हो गए हैं — ना देवी-देवता पूजे जाते हैं, न साधु-संतों को सम्मान दिया जाता है। अंततः यह कविता एक जागरूकता का संदेश है — कि अगर अब भी इंसान नहीं संभला, तो प्रकृति का कहर निश्चित है। इसलिए कवि चेतावनी देता है:  ”

    “अभी भी वक्त है, जाग जा ओ पागल इंसान!”

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यह कविता (कुदरत का कहर तो बरपेगा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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पर्यावरण का नुकसान।

Kmsraj51 की कलम से…..

Paryavaran Ka Nuksan | पर्यावरण का नुकसान।

मेरी रूह रोती है कांप – कांप कर,
देखा के पर्यावरण का नुकसान।
चिन्ता लगी है मन में इक भरी कि,
हो न जाए कहीं यह धरती शमशान।

दया आती है तेरी करणी पर,
तू कर क्या रहा है ओ इंसान?
सृष्टि रचाने वाले से डर जरा,
तू क्यों बना है खुद भगवान?

नदियां नाल हो रही है ,
पर्वत हो रहे हैं मैदान ।
जंगल हो रहे हैं वन विहीन सारे ,
बंजर हो रहे हैं हर खेत – खलियान।

दया आती है तेरी करनी पर ,
तू कर क्या रहा है ओ इंसान?
सृष्टि रचाने वाले से डर जरा,
तू क्यों बना है खुद भगवान?

चारों ओर है शोर ही शोर बस ,
शांति के लिए ना है कोई स्थान ।
कंक्रीट के जंगल को देख बोले वन प्राणी,
बात हम कहां जाए ओ पागल इंसान?

दया आती है तेरी करनी पर,
तू कर क्या रहा है ओ इन्सान?
सृष्टि रचाने वाले से डर जरा,
तू क्यों बना है खुद भगवान?

मौसम के भी मिजाज है बिगड़े,
कहीं सूखा तो कहीं आंधी -तूफान ।
प्रदूषण के कहर से कुदरत है रोती,
क्यों बढ़ रहा है धरती का तापमान?

दया आती है तेरी करनी पर,
तू कर क्या रहा है ओ इंसान?
सृष्टि रचाने वाले से डर जरा,
तू क्यों बना है खुद भगवान?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में कवि ने पर्यावरण के लगातार हो रहे विनाश पर गहरा दुःख और चिंता व्यक्त की है। कवि बार-बार इंसान से कहता है कि इंसान की स्वार्थपूर्ण और विनाशकारी गतिविधियों के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है। नदियाँ गंदे नालों में बदल रही हैं, जंगल खत्म हो रहे हैं, पर्वत समतल होते जा रहे हैं और खेत बंजर हो गए हैं। कवि इंसान को चेतावनी देता है कि वह खुद को भगवान समझने की भूल कर रहा है और सृष्टि को नष्ट कर रहा है। हर ओर शांति के स्थान पर शोर है, और वन्य प्राणी भी बेघर हो गए हैं। मौसम अस्थिर हो गए हैं — कहीं सूखा तो कहीं तूफान — और प्रदूषण के कारण धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है। कवि बार-बार इंसान से कहता है कि वह अपने कर्मों पर विचार करे और सृष्टि के रचयिता से डरे, क्योंकि जिस रास्ते पर वह चल रहा है, वह धरती को विनाश की ओर ले जा रहा है। कविता एक गहरी चेतावनी है — कि अगर इंसान नहीं सुधरा, तो यह धरती एक दिन शमशान बन जाएगी।

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यह कविता (पर्यावरण का नुकसान।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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संघर्ष है कहानी हर जीवन की।

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Sangharsh Hai Kahani Har Jeevan Ki | संघर्ष है कहानी हर जीवन की।

Struggle is The Story of Every Life

ऊंचे शिखर से निकली नदियां,
कहां सागर से पहले रुकती हैं?
लाख दीवारों से रोके चाहे कोई,
वे डैम फांदती हैं न कि झुकती हैं।

कौन बनाता है कहां राहें कब उनको?
वे खुद ही अपनी राहें नित बनाती हैं।
कहीं चलती हैं सीधी धारा सी मैदानों में ,
कहीं पहाड़ों में टकरा कर बलखाती हैं।

सीधी चलना नदी की सरलता है होती,
बलखाना जीवन संघर्षों से टकराना है।
नदी का स्वभाव है हमेशा आगे बढ़ना,
रोकने में लगा रहता सदा ही जमाना है।

हो मंजिल कितनी अनजान या दूर,
वे बेपरवाह हो, अपना जल बहाती हैं।
लेती कहां है विश्राम वे राह में तब तक ?
जब तक वे प्रिय सागर में न मिल जाती है।

मंजिल को पाने की हो होड़ नदी सी तो,
सफलता क्यों किसी के कदम न चूमेगी?
हो सूरज सी नियमावली गर जीवन में तो,
दुनियां फिर उसके चारों ओर क्यों न घूमेंगी?

झुकती नहीं है दुनियां आज, कौन कहता है?
झुकती है पर इसको झुकाने वाला चाहिए।
समझती नहीं है दुनियां आज, कौन कहता है?
समझती है पर इसको समझाने वाला चाहिए।

ज्यों सागर में मिलकर विलीन है वे होती,
त्यूं जीवन अन्त में परम में मिल जाता है।
संघर्ष है कहानी हर जीवन की इस जग में,
खुशी का फुल संघर्ष धर्म में खिल जाता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता नदी के प्रतीक के माध्यम से जीवन के संघर्ष, आत्मविश्वास और निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इसमें बताया गया है कि जैसे ऊँचे शिखरों से निकलने वाली नदियाँ कभी अपनी मंजिल (सागर) से पहले नहीं रुकतीं, वैसे ही मनुष्य को भी बाधाओं से डरना नहीं चाहिए। चाहे रास्ते में कितनी भी दीवारें हों, संघर्ष से जूझते हुए आगे बढ़ते रहना ही जीवन का सार है। नदी कभी सीधे रास्ते पर बहती है तो कभी पहाड़ों से टकराकर बल खाती है, जो दर्शाता है कि जीवन में कभी सरलता होती है तो कभी कठिनाइयाँ आती हैं। लेकिन नदी का स्वभाव है निरंतर बहते रहना, और यह हमें सिखाता है कि लक्ष्य की प्राप्ति तक कभी रुकना नहीं चाहिए। कविता यह भी कहती है कि दुनिया को झुकाने या समझाने के लिए पहले खुद में दृढ़ता और नेतृत्व होना चाहिए। यदि हमारे जीवन में नियम सूर्य जैसे हों और मंजिल को पाने की ललक नदी जैसी हो, तो सफलता हमारे कदम जरूर चूमेगी। अंत में, जैसे नदी सागर में विलीन हो जाती है, वैसे ही मनुष्य का जीवन अंततः परम तत्व (ईश्वर) में विलीन हो जाता है। जीवन एक संघर्ष है, लेकिन इस संघर्ष में ही सच्ची खुशी और सफलता का फूल खिलता है।

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यह कविता (संघर्ष है कहानी हर जीवन की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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व्यवस्था ही हुई अब लंगड़ी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Vyavastha Hi Huee Ab Langadi Hai | व्यवस्था ही हुई अब लंगड़ी है।

The poet says that the people to whom people complain about thieves, they themselves are also involved with them somewhere or the other, this is the reason why the faces of the criminals look cheerful.

चोरों की करते शिकायत जिनसे,
वे खुद भी चोरों से मिले हुए हैं।
माजरा समझ में आने लगा है कि,
चोरों के चेहरे क्यों खिले हुए हैं?

शिकायत जो करते हैं वे सच कहते हैं,
पर शिकायत सुनने वाले कहां सुनते हैं?
जिनकी की है शिकायत दुखियारे ने,
उनका झूठ भी सच जैसा ही सुनते हैं।

शिकायत करें तो करें पर कहां करें?
शिकायत सुनने वाला ही कोई नहीं।
यहां तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे,
कौन है ऐसा, जिसकी आत्मा सोई नहीं?

क्या सही है? सब जानते हैं सच सारा ,
देख कर भी सब अनदेखा सा करते हैं।
कानों सुन कर भी अनसुना सा करना,
सच्चे लोग तभी तो आत्महत्या से मरते हैं।

अंधा हुआ है हर आदमी आजकल क्या?
क्या बहरा हुआ हर छोटा – बड़ा कान है?
पैसा और पहुंच है जिनके पास माकूल तो,
उनके लिए न कोई कानून न ही विधान है।

न्याय दिलाना है तो जीते जी ही दिलाओ,
मरने के बाद की संवेदनाएं तो मंजूर नहीं।
गुनहगारों को बचाना बेकसूरों को फंसाना,
यह तो न्याय व्यवस्था का कोई दस्तूर नहीं।

प्राधिकरण के पांव में मोच है आई क्या,
या फिर व्यवस्था ही हुई अब लंगड़ी है?
वे सुनते क्यों नहीं सच्चे पक्के लोगों की,
मजबूरी है या फिर सोच ही इनकी संगड़ी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता समाज और न्याय व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनदेखी पर तीखा प्रहार करती है। कवि कहता है कि जिससे लोग चोरों की शिकायत करते हैं, वे स्वयं भी कहीं न कहीं उन्हीं से मिले होते हैं, यही कारण है कि अपराधियों के चेहरे खिले हुए नजर आते हैं। शिकायत करने वाले सच्चाई कहते हैं, लेकिन सुनने वाले उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते। जिन लोगों की शिकायत की जाती है, उनका झूठ भी सच मान लिया जाता है। इस व्यवस्था में पीड़ितों को न्याय मिलना कठिन हो गया है, क्योंकि यहां “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” वाली स्थिति बनी हुई है। कवि यह भी दर्शाता है कि समाज में अन्याय देखकर भी लोग अनदेखा कर देते हैं और सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। यही कारण है कि सच्चे और ईमानदार लोग हताश होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं। आजकल हर व्यक्ति स्वार्थ में अंधा और बहरा हो गया है, जिससे पैसे और सत्ता वालों को कानून और नियमों की कोई परवाह नहीं। कवि समाज से अपील करता है कि न्याय जीवित अवस्था में ही दिया जाना चाहिए, मरने के बाद की संवेदनाएँ व्यर्थ हैं। अगर दोषियों को बचाया जाएगा और निर्दोषों को फंसाया जाएगा, तो यह न्याय व्यवस्था का अपमान है। अंत में, कवि सवाल उठाता है कि क्या प्राधिकरण (अधिकार प्राप्त संस्थाएँ) निष्क्रिय हो गई हैं या फिर न्याय व्यवस्था ही पंगु हो चुकी है। यह कविता एक कटु सत्य को उजागर करती है और न्याय प्रणाली की निष्क्रियता पर सवाल खड़े करती है।

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यह कविता (व्यवस्था ही हुई अब लंगड़ी है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हिमाचल की राजधानी “शिमला”।

Kmsraj51 की कलम से…..

Himachal Ki Rajdhani Shimla | हिमाचल की राजधानी “शिमला“।

There is a dense shade of green deodar trees here. There are towns all around and many villages located far away. The capital of Himachal is "Shimla".

कोठियों पर कोठियां, बनकर हुई यहां सवार है।
हिमाचल की राजधानी, शिमला का यह बाजार है।

पहाड़ी की टेकरी पर बसा, हुआ यह निर्माण है।
इन्हीं में प्रबन्धित शहर की, आबादी तमाम है।

देवदार के हरे पेड़ों की, बड़ी घनी यहां छांव है।
चारों ओर को कस्बे हैं, दूर दूर बसे कई गांव हैं।

कह रहा है यह पहाड़ अब, कमजोर मेरे पांव है।
रोक दो निर्माण अब मुझ पर, नहीं तो व्यवधान है।

पर शहरीकरण की होड़ में, सुनता इसकी कौन है?
लोग किए जा रहे हैं निर्माण, बेचारा रहता मौन है।

बरसात में चेताता है कभी, “भाई दरकते पहाड़ है।”
अभी भी वक्त है “समझो”, वरना, आगे बड़ा बिगाड़ है।

विकास की अंधेरी दौड़ें में, शहरों की होड़ में इंसान है।
उसे कोई लाख समझाए, भले मकान पर बना मकान है।

कुदरत की पीड़ा न समझेगा, फिर तो उठाना तूफान है।
इंसान को भी समझना चाहिए, कि वह नहीं भगवान है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता प्राकृतिक सुंदरता और अंधाधुंध शहरीकरण के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। इसमें शिमला शहर के विस्तार और निर्माण कार्यों के कारण प्राकृतिक संतुलन के बिगड़ने की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। कवि बताते हैं कि शिमला की पहाड़ियों पर लगातार कोठियों और इमारतों का निर्माण हो रहा है, जिससे यह क्षेत्र भौतिक रूप से तो विकसित हो रहा है, लेकिन इसका प्राकृतिक सौंदर्य और संतुलन प्रभावित हो रहा है। देवदार के घने पेड़, कस्बे और दूर-दराज के गांव इस क्षेत्र की सुंदरता बढ़ाते हैं, लेकिन पहाड़ अब खुद को कमजोर महसूस करने लगे हैं। वे संकेत दे रहे हैं कि अगर यह निर्माण कार्य नहीं रुका, तो भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ जाएगा। बारिश के मौसम में पहाड़ दरकने लगते हैं, यह चेतावनी देता है कि यदि समय रहते समझदारी नहीं दिखाई गई, तो भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। कवि यह संदेश देते हैं कि विकास की अंधी दौड़ में लोग प्रकृति की चेतावनियों को अनदेखा कर रहे हैं। अगर इंसान ने कुदरत की शक्ति को नहीं समझा, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इंसान भगवान नहीं है, इसलिए उसे प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलना चाहिए।

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यह कविता (हिमाचल की राजधानी “शिमला”।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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