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poetry by prapti singh

अपना अधिकार।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♦ अपना अधिकार। ♦

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ये करो, वो नहीं।
ऐसे करो, वैसे नहीं।
इससे बात करो, उससे नहीं।
ऐसे बैठो, ऐसे हँसो।
दिन भर खी-खी मत करो।
काम सुघड़ता से किया करो।
अपने घर जा के बेइज़्ज़त करोगी हमें॥

ये नही करने आता।
वो नही करने आता।
ठीक से कैसे बैठते हैं।
सबको खुश कैसे रखते हैं।
क्या सीखा है जीवन भर।
यही सीख के आयी हो।
मोहल्ले भर में बेइज्जती कराती फिरती हो।
ये सब करना है तो अपने घर जाओ वापस॥

कच्ची उम्र में ब्याह दी गयी।
उस नन्ही सी जान ने।
जीवन भर दूसरों का कहना ही सीखा था।
अपने मुँह में ज़बान होती है।
या दाँत भी होते हैं, ये जानती भी न थी।
कच्ची उम्र में खानदान की इज़्ज़त संभालना।
पड़ता था उसे, जब कि जानती भी नहीं कि,
हंसने बोलने से इज़्ज़त कैसे निकल जाती है॥

सीखते, संभालते उम्र निकल जाती है।
लेकिन अपना घर नही मिलता।
औरतों को खुल कर हंसने बोलने मुस्कुराने,
का अधिकार नही मिलता॥

♦–  प्राप्ति सिंह –♦

जरूर पढ़े: दिल से कागज में उतर ही जाती है।

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♥⇔♥

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