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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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प्रेरणादायक हिंदी कहानियां।

मैं क्षत्राणी हूँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मैं क्षत्राणी हूँ। ♦

महाभारत काल एवं सभी पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं के अनेक पात्र ऐसे हैं जिनका योगदान उस काल की घटना विशेष में बहुत ही सराहनीय रहा है किन्तु उसका उतना उल्लेख नहीं हुआ जितना केंद्रीय पात्रों का।

ऐसी ही एक पात्र है महाभारत काल की हिडिम्बा, जिसने अपने इकलौते पुत्र की आहुति इस युद्ध में दे दी थी। आज की कहानी उस माँ को समर्पित है जिसके बलिदान की बदौलत अर्जुन की उस शस्त्र से रक्षा हुई जो युद्ध के परिणाम को बदल सकता था।

——•——

न जाने कब से मैं अपने कक्ष में उदास, व्यथित एवं निःसहाय बैठी हूँ किन्तु न ह्रदय की टीस कम हो रही है और न अश्रु थम रहे हैं। न अतीत की स्मृतियों की श्रृंखला ही रुक रही है।

अपने इकलौते पुत्र घटोत्कच की वीरगति का समाचार ह्रदय को शूल की तरह बींधे जा रहा है। न कोई मेरे दुःख को बांटने वाला है न अभी तक सांत्वना के दो शब्द ही मेरे हिस्से में आये हैं। संताप की अग्नि मुझे निरंतर दग्ध करती जा रही है।

सोचती हूँ कि जीवन में मुझे क्या मिला ? न जाने किस कर्म दोष के कारण मेरा राक्षस कुल में जन्म तो हुआ किन्तु राक्षसों की तामसिक वृत्तियों से मुझे कभी प्रीति नहीं रही। या यूँ भी कह सकते हैं की जन्म से दानवी हो कर भी मैं अपनी वृत्तियों से राक्षसी नहीं रही।

मुझे मनुष्यों का मांस और दानवों को प्रिय लगने वाली अनेक वस्तुएँ सदा अप्रिय रहीं। शायद एक मनुष्य के प्रति मेरा प्रेम और आकर्षण मेरी इन्हीं प्रवृत्तियों का परिणाम था। हिडिम्बा के मानस पटल पर अतीत साकार हो गया ………

क्या मैं कभी भूल सकती हूँ वह दिन, जब मेरे सहोदर ने मुझे एक मनुष्य को पकड़ कर लाने की आज्ञा मुझे दी थी और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मैं वन में गयी थी। वहाँ मैंने अति सुन्दर, पराक्रमी, बलवान मध्यम पाण्डव भीम को देखा और प्रथम दृष्टि में ही उनसे प्रेम कर बैठी।

इस प्रेम को पाने के लिए मुझे अपने कुल का कोप तथा बहिष्कार सहना पड़ा। इस त्याग के पश्चात् भी मुझे अपना प्यार अत्यन्त अल्प अवधि के लिए ही मिला। ‘ पुत्रवती होते ही आर्य पुत्र भीम को लौटा दूँगी ‘ ऐसा वचन मैंने माता कुंती को दिया था, जिसे पुत्र घटोत्कच के जन्म लेते ही मैंने पूर्ण निष्ठा से निभाया।

अब पुत्र घटोत्कच और आर्य पुत्र के प्रेम की स्मृतियाँ ही मेरे जीवन का एकमात्र सहारा थीं। समय का पहिया घूमता रहा और घटोत्कच युवा हो गया। बिल्कुल अपने पिता के समान ही तेजस्वी, निडर, पराक्रमी।

एक दिन अचानक पुत्र घटोत्कच के कारण ही मुझे आर्य पुत्र भीम के पुनः दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वह बलि के लिए उन्हें ही पकड़ लाया। मैं इस कल्पना से भी कांप गयी और मुझे अनायास ही उन सभी बलि दिए गए मनुष्यों की याद हो आयी और इस विचार से ग्लानि हुई कि आज जैसे मैं आर्य पुत्र की बलि की कल्पना से भी कांप गयी उसी प्रकार उन पत्नियों, माताओं का जीवन कैसे बीत रहा होगा जिनकी हम लोगों ने अनुष्ठान के नाम पर बलि चढ़ा दी थी। उस दिन से मैंने जीवन भर कभी बलि न देने का निश्चय किया।

किन्तु इस घटना का एक अच्छा परिणाम ये रहा कि पिता और पुत्र का मिलन तो हुआ।

कुछ वर्षों के बाद महाभारत का भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में मेरे पुत्र ने जो पराक्रम दिखाया उसे देख सारे दिग्गज योद्धा दंग रह गये। मेरा मातृत्व, पालन पोषण गौरवान्वित हो उठा। आख़िर क्षत्राणियां और क्या किया करती हैं ? क्या मैंने भी वही सब कुछ नहीं किया ?

आर्य पुत्रियों के समान ही मैंने जीवन में केवल एक बार प्रेम किया। उस प्रेम को जीवन पर्यन्त निभाया पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ निभाया। एक महा पराक्रमी वीर पुत्र को जन्म दिया। आवश्यकता पड़ने पर अपने एकमात्र पुत्र को युद्ध में प्रस्तुत कर देने में भी नहीं हिचकिचाई।

सोचते सोचते हिडिम्बा को पुनः अपने पुत्र की वीरगति का स्मरण हो आया और अपार हार्दिक वेदना से वह पुनः कराह उठी – ” हा घटोत्कच ! अब तुम्हारे बिना मैं कैसे जीवन यापन करुँगी ?

तुम्हारे वियोग से मुझे असहनीय वेदना हो रही है। क्या मेरे इस संताप और बलिदान की कभी कोई चर्चा होगी। नहीं, शायद कभी नहीं। भला राक्षस कुमारियाँ भी कहीं भविष्य में पढ़े जाने वाले इतिहास की नायिकाएं हुआ करती हैं ?

चर्चा हो या न हो, किन्तु मेरा हृदय और ईश्वर जानता है, कि जन्म से न सही किन्तु कर्म से मैं क्षत्राणी हूँ। हां, हां, हां, मैं क्षत्राणी हूँ। पुत्र घटोत्कच तुमने मेरे यहां जन्म
लेकर मेरा गौरव तो बढ़ाया ही है अपने पिता, पाण्डव कुल और वीरों का गौरव भी बढ़ाया है। .. कहते – कहते व्यथित हिडिम्बा पुनः सिसक उठी।

♦ वेदस्मृति ‘कृती’ जी – पुणे, महाराष्ट्र ♦

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  • “वेदस्मृति ‘कृती’ जी“ ने, बिलकुल ही सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए समझाने की कोशिश की हैं — घटोत्कच की माता हिडिम्बा के त्याग और बलिदान के बारे में बताया है। लोग माता हिडिम्बा के त्याग और बलिदान को भूल गए है। माता हिडिम्बा ने ख़ुशी – ख़ुशी अपने पुत्र घटोत्कच को धर्म युद्ध महाभारत में जाने का आदेश दे दिया।

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यह लेख (मैं क्षत्राणी हूँ।) ” वेदस्मृति ‘कृती’ जी “ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/गीत/दोहे/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी दोहे/कविताओं और लेख से आने वाली नई पीढ़ी और जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूँ ही चलती रहे जनमानस के कल्याण के लिए।

साहित्यिक नाम : वेदस्मृति ‘कृती’
शिक्षा : एम. ए. ( अँग्रेजी साहित्य )
बी.एड. ( फ़िज़िकल )
आई आई टी . शिक्षिका ( प्राइवेट कोचिंग क्लासेज़)
लेखिका, कहानीकार, कवियित्री, समीक्षक, ( सभी विधाओं में लेखन ) अनुवादक. समाज सेविका।

अध्यक्ष : “सिद्धि एक उम्मीद महिला साहित्यिक समूह”
प्रदेश अध्यक्ष : अखिल भारतीय साहित्य सदन ( महाराष्ट्र इकाई )
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान बिहार प्रान्त की महिला प्रकोष्ठ,
श्री संस्था चैरिटेबल ट्रस्ट : प्रदेश प्रतिनिधि ( महाराष्ट्र )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद में – सह संगठन मंत्री, मुंबई ज़िला, महाराष्ट्र
हिन्दी और अँग्रेजी दोनों विधाओं में स्वतंत्र लेखन।

अनेक प्रतिष्ठित हिन्दी/अँग्रेजी पत्र – पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित।

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कर्मों का फल जन्म जन्मों तक।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कर्मों का फल जन्म जन्मों तक। ♦

एक सन्यासी ने भगवान की भक्ति करते – करते जीवन के तीन पड़ाव गुजार दिए, चौथे पड़ाव में वो भ्रमण पर निकल पड़े, रास्ते मे भयंकर जंगल था जिसमें डाकुओं का राज था।

कुछ दूर जाने पर साधु ने देखा कि डाकुओं ने पीछा शुरू कर दिया है। लेकिन सन्यासी ने सोचा, मेरे पास क्या है जो छीन लेंगे और अपनी मस्ती से चलते रहे। डाकुओं ने भी देख लिया कि यह एक सन्यासी है, इसके पास कुछ नही मिलेगा।

जैसे ही वो डाकू सन्यासी के पास से गुजरे उन्हें जमीन पर पड़ी अठमाशी दिखाई दी, ठीक उसी समय सन्यासी के पैर में भयंकर कांटा लगा। सन्यासी ने भगवान को याद किया, इसलिए नहीं कि डाकुओं को आठमाशी मिली और ना ही इसलिये कि भक्ति का फल क्या मिला, पर इसलिए कि डाकुओं के सामने यह घटना घटी।

साधु भगवान को याद कर ही रहे थे कि भगवान जी ने दर्शन दिए और कहा, हे, साधु, चिंतित मत हो। यह सब कर्मों का फल है। पूर्व जन्म में आपके कर्म इतने खराब थे कि आपको यहां फांसी लगनी थी पर इस जन्म के कर्मों से केवल कांटे में टल गई और जो ये डाकू है इनके पूर्व जन्म के कर्म इतने अच्छे थे, इन्हें यहां राज्य सिंहासन मिला था जो इस जन्म के कर्मों के कारण केवल आठमाशी में टल गया।

जैसे कि पानी मे फेंकी गई कंकर से उठी लहर आखिरी किनारे तक पहुँचती है। उसी तरह कर्मों का फल भी जन्म जन्मों तक चलता है। अच्छे कर्म करे व अच्छा फल पाए।

♦ दौलत राम गर्ग जी – जींद – हरियाणा ♦

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— Conclusion —

  • “दौलत राम गर्ग जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लघु कथा में समझाने की कोशिश की है — आपकी कोशिश यही हो की आपकी वजह से कभी भी किसी को कोई दुःख न पहुंचे। इसलिए सदैव ही अच्छे कर्म करे जिससे आपका वर्तमान और भविष्य दोनों अच्छा हो। जैसे कि पानी मे फेंकी गई कंकर से उठी लहर आखिरी किनारे तक पहुँचती है। उसी तरह कर्मों का फल भी जन्म जन्मों तक चलता है। अच्छे कर्म करे व अच्छा फल पाए।

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यह लघु कथा (कर्मों का फल जन्म जन्मों तक।) “दौलत राम गर्ग जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा जन्म — जींद – हरियाणा, तहसील सफीदों, गांव खातला में हुआ, मैट्रिक तक शिक्षा गांव में ही प्राप्त की फिर पानीपत S D College से B. Com में डिग्री प्राप्त की। 2 वर्ष तक इसी कॉलेज में कार्यरत रहा। 1977 में बैंक की नौकरी शुरू की और 2014 में Sr. Manager की पोस्ट से रिटायर हुआ। इस दौरान कलकत्ता, फरीदाबाद, उदयपुर, दिल्ली, चंडीगढ़, हिसार व रोहतक स्थानों में सेवा का मौका मिला। 1977 से ही गांव छोड़ दिया था। 1987 से दिल्ली में ग्रस्थ आश्रम है। अब रिटायरमेंट जीवन गुजार रहे है।

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