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शैक्षिक हिंदी कहानी

मेरू की मंजिल।

Kmsraj51 की कलम से…..

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◊ मेरू की मंजिल। ◊

मेरू को बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था। उधर उसका छोटा भाई चीनू बिल्कुल उससे उलट। बिल्कुल न पढ़ना और खेलकूद में मस्त रहना। मेरू चीनू से उम्र में तीन साल बड़ी थी और नौवीं क्लास में पढ़ती थी। चीनू छठवीं क्लास में था। मेरू अपनी क्लास में हमेशा अव्वल आती थी। उसके मम्मी-पापा को उस पर बहुत गर्व था, लेकिन चीनू की तरफ से वे परेशान रहते थे। जब भी वे पेरेंट्स मीटिंग में जाते तो चीनू के न पढ़ने और शैतानी करने की ज्यादा शिकायतें मिलतीं। लेकिन चीनू में एक खास बात थी कि स्कूल में वह फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी था। मेरू से क्लास के सभी टीचर खुश रहते थे, क्योंकि वह मेहनत से पढ़ाई करने के साथ-साथ स्कूल में समय-समय पर होने वाली गतिविधियों में भी खूब हिस्सा लेती थी।

एक बार एक अन्य स्कूल में एक साइंस क्विज का आयोजन हुआ, जिसमें हिस्सा लेने के लिए स्कूल से सिर्फ मेरू का ही नाम चुना गया। उस स्कूल में क्विज में हिस्सा लेने के लिए बहुत सारे स्कूलों से मेधावी बच्चे आये। शुरू में तो मेरू को डर लगा कि पता नहीं कैसे-कैसे प्रश्न पूछे जाएंगे। लेकिन जब क्विज शुरू हुआ तो उसका सब डर दूर हो गया और उसने सभी प्रश्नों के उत्तर बड़ी कुशलता व निर्भीकता के साथ दिये। अंत में उसे क्विज का विजेता घोषित किया गया। जब स्कूल प्रिंसिपल को पता चला कि मेरू ने क्विज प्रतियोगिता जीत ली है तो वह बहुत खुश हुईं। उन्होंने अपने स्कूल का नाम रोशन करने के लिए उसे सम्मानित किया।

Image
http://kmsraj51.com/

मेरू को साइंस विषय बहुत अच्छा लगता था। जब तक उसे साइंस का कोई टॉपिक समझ में नहीं आ जाता था, तब तक उसका वह पीछा नहीं छोड़ती थी। यही वजह थी कि उसे ही सभी जगह साइंस की होने वाली प्रतियोगिताओं में भेजा जाता। एक बार किसी प्रतियोगिता में उसे पूछा गया कि तुम बड़ा होकर क्या बनोगी, तो उसका जवाब था – साइंटिस्ट। उसने दसवीं क्लास में टॉप किया था। जब 11वीं में आई तो उसने साइंस स्ट्रीम ही चुनी। फिजिक्स व कैमिस्ट्री विषयों के होने वाले प्रयोगों में उसे बड़ा मजा आता था। जब क्लास के बच्चों को कोई बात समझ नहीं आती थी तो वह टीचर की अनुपस्थिति में खुद ही टीचर बन जाती थी।

एक बार स्कूल में एक नाटक का आयोजन किया गया। वह नाटक साइंस विषय पर ही आधारित था, जिसमें स्कूल के बच्चों को अभिनय करना था। उसमें एक साइंस टीचर का भी रोल था। उस रोल को निभाने की बात आई तो इसके लिए मेरू को चुना गया। मेरू प्रतिभाशाली तो थी ही और क्लास में अपने टीचर की अनुपस्थिति में टीचर बन जाती थी तो उसे यह रोल करना बड़ा आसान लगा। उसने यह रोल बखूबी निभाया। उस नाटक को देखने के लिए बड़े-बड़े अधिकारी व गण्यमान्य लोग आये थे। उनमें कुछ फिल्म व टेलीविजन के लोग भी शामिल थे। एक टीवी सीरियल के डायरेक्टर को मेरू साइंस की टीचर के रोल में बहुत पसंद आई।

वह दूसरे दिन प्रिंसिपल से मिले और मेरू के बारे में जानना चाहा। प्रिंसिपल ने मेरू को उनसे मिलाया तो वह उससे बहुत प्रभावित हुए। वह बहुत दिन से ऐसी ही एक बाल कलाकार की खोज में थे, जो उन्हें मेरू के रूप में दिखाई दे गयी थी। उन्होंने उसी समय उसे अपने एक नये टीवी सीरियल में अभिनय करने का ऑफर दे दिया। प्रिंसिपल ने भी अपनी सहमति जताई। यह सुनकर मेरू को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उसे टीवी सीरियल में काम करने का ऑफर मिल सकता है। पर दूसरी तरफ उसका मन तो साइंस पढ़ने और एक बड़ी साइंटिस्ट बनने का था। उसने सोचा कि अगर वह टीवी सीरियल में काम करने लगेगी तो उसकी पढ़ाई का क्या होगा। और उस सपने का क्या होगा, जिसे उसे साकार करना है, क्योंकि सीरियल करने पर वह अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाएगी।

जब पढ़ेगी ही नहीं तो आगे कैसे बढ़ेगी? यह सोच उसने सीरियल के डायरेक्टर को यह कहकर मना कर दिया कि उसका सबसे पहला उद्देश्य पढ़ाई करके साइंटिस्ट बनना है। यह बात सुनकर प्रिंसिपल बहुत खुश हुईं, पर सीरियल के डायरेक्टर के ज्यादा आग्रह करने पर और कुछ अपनी मम्मी-पापा के कहने पर मेरू ने हां तो कर दी, पर एक शर्त रखी कि अगर उसकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए तो वह सीरियल में एक्टिंग के लिए तैयार है। सीरियल डायरेक्टर ने कहा कि वह पढ़ाई के लिए उसे पूरा समय देंगे और उन्होंने प्रिंसिपल से भी आग्रह किया कि वह मेरू को पूरा सहयोग करें। चार महीने में सीरियल की शूटिंग पूरी हुई। लेकिन इस बीच मेरू की पढ़ाई का रुटीन कुछ गड़बड़ा गया। वह पढ़ाई में पिछड़ गई थी, क्योंकि जो समय वह सीरियल करने से पहले पढ़ाई में देती थी वह समय देना सीरियल करने पर मुमकिन नहीं था। उसने अच्छे से शूटिंग पूरी कर ली थी। लेकिन अब उसे अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी, जिसके लिए उसके सभी टीचरों ने उसे पूरा सहयोग किया।

मेरू को 11वीं में बहुत मेहनत करनी पड़ी। उसका हौसला बुलंद था। उसके अच्छे मार्क्स आए। जब 12वीं में आई तो स्कूल की ओर से उसे अमेरिका जाने का मौका मिला। वहां उसने एक साइंस प्रोग्राम में हिस्सा लिया। वह अब ऐसी सीढियों पर चढ़ गई थी, जो उसे साइंटिस्ट बनने की मंजिल पर ले जा रही थीं।

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