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आपसी सम्मान

दो वक्त की रोटी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Do Waqt Ki Roti | दो वक्त की रोटी।

एक दिन पत्नी ने भर्राए स्वर में पूछा—

“क्या मेरी पहचान बस इतनी-सी रह गई है?
सुबह से शाम तक चूल्हे की धुएँ में घुलती रहूँ,
और लोग कहें…
मैं तो बस एक नौकरानी हूँ।
बताओ, तुमने मुझे दिया ही क्या है?”

पति ने सिर झुका लिया,
कुछ पल तक शब्द भी खामोश रहे।
फिर उसने गहरी साँस ली और कहा—

“अगर दो वक्त की रोटी बनाना
तुम्हें नौकरानी होने का एहसास देता है,
तो ज़रा उस इंसान का भी दर्द समझो,
जो दो वक्त की रोटी के लिए
हर रोज़ अपना पूरा जीवन दाँव पर लगा देता है।”

वह सुबह अँधेरे में घर से निकलता है,
और शाम को थककर लौटता है।
धूप उसे जलाती है,
बारिश उसे भिगोती है,
सर्द हवाएँ उसके शरीर को चीरती हैं।
मालिक की डाँट भी सहता है,
किस्मत की मार भी सहता है।
फिर भी होंठों पर एक ही दुआ रहती है—
“बस मेरे घर का चूल्हा जलता रहे।”

तुम्हारे हाथों की रोटी
इस घर का स्वाद है,
और मेरे माथे का पसीना
उसी रोटी का आटा है।

तुम्हारी ममता से घर महकता है,
मेरी मेहनत से घर चलता है।
एक ने घर बनाया है,
दूसरे ने उसे बसाया है।

न तुम मेरी नौकरानी हो,
न मैं तुम्हारा मालिक।
हम तो उस रिश्ते के दो पहिए हैं,
जिसका नाम परिवार है।

याद रखना…
रोटी सिर्फ आटे और पानी से नहीं बनती,
उसमें पति के संघर्ष का पसीना भी होता है,
और पत्नी के प्रेम की आँच भी।

जिस दिन रिश्तों में
‘मैं’ और ‘तू’ का हिसाब शुरू हो जाता है,
उसी दिन अपनापन कम होने लगता है।

आओ, एक-दूसरे की कमियाँ नहीं,
एक-दूसरे की मेहनत देखें।
क्योंकि…

पति कमाकर घर चलाता है,
पत्नी सँभालकर घर बसाती है।
दोनों का संघर्ष अलग-अलग है,
लेकिन दोनों का सम्मान एक समान है।

यही सम्मान घर को मकान बनने से बचाता है,
और यही प्रेम दो वक्त की रोटी को
जीवन का सबसे बड़ा प्रसाद बना देता है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता पति-पत्नी के बीच आपसी सम्मान, समझ और साझेदारी का भावपूर्ण संदेश देती है। कविता में पत्नी घर के काम और रोटी बनाने को लेकर स्वयं को नौकरानी जैसा महसूस करती है। तब पति उसे समझाता है कि जिस दो वक्त की रोटी को बनाना उसे बोझ लगता है, उसी रोटी के लिए वह प्रतिदिन कठिन परिश्रम करता है और अनेक संघर्षों को सहता है।

    कविता बताती है कि पत्नी की मेहनत और प्रेम से घर बसता है, जबकि पति की मेहनत और संघर्ष से घर चलता है। दोनों में कोई मालिक या नौकर नहीं, बल्कि दोनों परिवार रूपी गाड़ी के दो समान पहिए हैं। रोटी में जहाँ पत्नी के प्रेम और ममता की आँच होती है, वहीं पति के पसीने और संघर्ष की कमाई भी शामिल होती है।

    कवि का मुख्य संदेश है कि रिश्तों में ‘मैं’ और ‘तू’ का हिसाब करने के बजाय एक-दूसरे के संघर्ष और योगदान को समझना चाहिए। पति और पत्नी का संघर्ष भले ही अलग-अलग हो, लेकिन दोनों का सम्मान समान है। यही आपसी प्रेम, सम्मान और समझ एक साधारण मकान को खुशहाल घर बनाते हैं और दो वक्त की रोटी को जीवन का सबसे बड़ा प्रसाद बना देते हैं।

—————

यह कविता (दो वक्त की रोटी।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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