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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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2026 - KMSRAJ51 की कलम से

शिक्षा में क्रांति अभी बाकी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

Shiksha Mein Kranti Abhi Baaki Hai | शिक्षा में क्रांति अभी बाकी है।

# शिक्षा में क्रांति अभी बाकी है | # एक शिक्षक की प्रेरणादायक यात्रा 

एक शिक्षक का जुनून अभी बाकी है…

सफर शुरू हुआ था
एक छोटे से ग्रामीण विद्यालय से,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय गवसरा मुसहर से—
जहाँ संसाधन कम थे,
इमारत की सुविधाएँ कम थीं,
लेकिन बच्चों की आँखों में
सपने कम नहीं थे।

वहाँ समाज के उस तबके के बच्चे थे
जिनके लिए शिक्षा तक पहुँचना भी
एक चुनौती हुआ करती थी।
महादलित समाज, अल्पसंख्यक, अत्यंत पिछड़े
और पिछड़े परिवारों के बच्चे—
उनके बीच खड़ा एक शिक्षक
सिर्फ पाठ नहीं पढ़ा रहा था,
वह भविष्य लिखने की कोशिश कर रहा था।

मैंने किताबों से पहले
बच्चों को पढ़ा,
उनकी रुचि पढ़ी,
उनकी समस्याएँ पढ़ीं,
उनके घरों की परिस्थितियाँ पढ़ीं।

अभिभावकों से मिला,
जनप्रतिनिधियों से मिला,
प्रधानाध्यापक से मिला,
लोगों को जोड़ा,
क्योंकि मेरा विश्वास था—

“विद्यालय अकेला बच्चों का भविष्य नहीं बदल सकता,
समाज को भी शिक्षा की इस यात्रा में साथ आना होगा।”

फिर मैंने देखा
पाँचवीं के बाद कई बच्चियाँ
विद्यालय से दूर हो जाती थीं।
विद्यालय की दूरी,
परिवार की मजबूरी
और सामाजिक परिस्थितियाँ
उनके सपनों के रास्ते में खड़ी थीं।

मन में एक सवाल उठता था—

क्या किसी बच्ची का सपना
सिर्फ इसलिए छोटा हो जाए
कि उसके गाँव में आगे की पढ़ाई का विद्यालय नहीं है?

नहीं!

तभी मैंने तय किया—
लड़कियों की शिक्षा के लिए
कुछ करना होगा।

संसाधन कम थे,
लेकिन हौसला बड़ा था।

2007 में
TLM प्रदर्शनी से एक नया अध्याय शुरू हुआ।
बच्चों के साथ मिलकर
सीखने को आसान और रोचक बनाने वाली
शिक्षण-सामग्री तैयार की।

पहली कोशिश में
द्वितीय स्थान मिला।

लेकिन मंजिल कहाँ थी?

अगले वर्ष
फिर कोशिश की,
और इस बार
प्रथम स्थान।

फिर सीआरसी से बीआरसी तक
यह कारवाँ चलता रहा।

कभी साधन मिले,
कभी नहीं मिले।

कभी लोगों ने कहा—
“इतनी मेहनत क्यों करते हैं?”
कभी कहा गया—
“इससे क्या फायदा होगा?”

लेकिन मेरे भीतर एक आवाज थी—

“अगर बच्चों के सीखने में एक प्रतिशत भी सुधार होगा,
तो यह प्रयास बेकार नहीं जाएगा।”

एक बार प्रदर्शनी के लिए
संसाधन और उचित स्टॉल तक उपलब्ध नहीं था।
लोगों ने कहा—
छोड़ दीजिए।

लेकिन मैंने नहीं छोड़ा।

जहाँ जगह मिली,
वहीं से शुरुआत की।

क्योंकि शिक्षक के लिए
मंच बड़ा होना जरूरी नहीं,
उसका उद्देश्य बड़ा होना चाहिए।

मेहनत रंग लाई।
बीआरसी स्तर पर भी
प्रथम स्थान मिला।

और फिर वही प्रयास
बालिकाओं की शिक्षा के लिए
एक बड़ी जीत में बदल गया।

प्रखंड प्रमुख ने अपना वचन निभाया
और मेरा विद्यालय
राजकीय प्राथमिक विद्यालय से
उत्क्रमित मध्य विद्यालय गवसरा मुसहर बना।

उस दिन सिर्फ विद्यालय अपग्रेड नहीं हुआ था—

उस दिन कई बच्चियों के सपनों की
कक्षा पाँच से कक्षा आठ तक की यात्रा शुरू हुई थी।

और मैंने जाना—

एक शिक्षक की छोटी-सी कोशिश
किसी बच्चे के जीवन में
बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है।

फिर कारवाँ आगे बढ़ता गया।

अंततः
विद्यालय मध्य से उच्च माध्यमिक में परिणत हुआ।

बाल संसद,
मानव शृंखला,
स्लोगन,
कलाकृतियाँ,
बाल मेले,
रोचक गतिविधियाँ—
हर अवसर को मैंने
बच्चों के सीखने का अवसर बनाया।

2021 में प्रखंड स्तर पर
मेरे नवाचारों को सम्मान मिला,
2021-22 में जिला स्तर पर
शिक्षक सम्मान मिला।

लेकिन सम्मान के बाद भी
सफर रुका नहीं।

2024 में
जब एक नई भूमिका मिली—
+2 हिंदी शिक्षक के रूप में
भोला सिंह उच्च माध्यमिक विद्यालय पुरुषोत्तमपुर में—
तो लगा जैसे
जीवन ने मुझे फिर एक नई कक्षा दे दी है।

नई कक्षा,
नई उम्र के विद्यार्थी,
नई चुनौतियाँ
और नई जिम्मेदारियाँ।

मैंने हिंदी को
सिर्फ एक विषय नहीं माना।

मैंने बच्चों से कहा—

हिंदी सिर्फ परीक्षा पास करने की भाषा नहीं,
हिंदी हमारे विचारों को
अभिव्यक्ति देने की शक्ति है।

व्याकरण को रोचक बनाया,
रोल-प्ले और गतिविधियों को अपनाया,
हर कक्षा में प्रेरक संवाद जोड़े,
सामान्य ज्ञान के प्रश्नों से
बच्चों की जिज्ञासा जगाई।

युथ क्लब और इको क्लब के माध्यम से
बच्चों को गतिविधियों से जोड़ा।

और फिर 2025 में
मुझे राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान मिला।

लेकिन आज भी
मैं खुद से यही कहता हूँ—

सम्मान मंजिल नहीं है,
सम्मान तो उस रास्ते की
एक छोटी-सी पहचान है।

बीस वर्ष से अधिक बीत गए…

लेकिन मेरे भीतर का शिक्षक
आज भी थका नहीं है।

आज भी जब किसी कार्यक्रम का
प्रस्ताव स्वीकार करता हूँ,
तो रात में नींद कम
और विचार ज्यादा आते हैं—

कैसे होगा?
क्या नया करूँ?
बच्चों को और बेहतर कैसे जोड़ूँ?
इस बार पहले से अच्छा कैसे करूँ?

क्योंकि—

शिक्षक की उम्र बढ़ सकती है,
लेकिन उसका जुनून बूढ़ा नहीं होना चाहिए।

आज शिक्षक दिवस पर
मैं अपने सभी शिक्षक साथियों से
एक विनम्र अपील करना चाहता हूँ—

आइए,
हम सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा न करें,
बच्चों के सपने पूरा करने का माध्यम बनें।

सिर्फ अंक न देखें,
बच्चे की प्रतिभा देखें।

सिर्फ कमजोर बच्चे की कमी न देखें,
उसके भीतर छिपी संभावना देखें।

सिर्फ विद्यालय की दीवारें न देखें,
उन दीवारों के भीतर
बनते हुए भविष्य को देखें।

और अगर संसाधन कम हों,
तो निराश मत होना—

क्योंकि संसाधनों से बड़ा
शिक्षक का संकल्प होता है।

अगर रास्ते में बाधाएँ आएँ,
तो रुकना मत—

क्योंकि एक शिक्षक के कदम रुकते हैं,
तो किसी बच्चे का सपना रुक सकता है।

आइए,
हर बच्चे को अवसर दें,
हर बच्ची को उड़ान दें,
हर कक्षा को प्रयोगशाला बनाएं,
हर विद्यालय को उम्मीद का केंद्र बनाएं।

क्योंकि—

एक शिक्षक बदलेगा,
तो एक कक्षा बदलेगी।

एक कक्षा बदलेगी,
तो एक विद्यालय बदलेगा।

एक विद्यालय बदलेगा,
तो एक समाज बदलेगा।

और जब शिक्षक मिलकर बदलेंगे—

तब शिक्षा में क्रांति आएगी!

लेकिन याद रखिए—

क्रांति अभी बाकी है…
क्योंकि बच्चों के सपने अभी बाकी हैं।

मेरा सफर अभी बाकी है…
क्योंकि शिक्षा का बदलाव अभी बाकी है।

मेरी उम्र बढ़ी है,
मेरा जुनून नहीं।

बीस साल बीत गए,
लेकिन मेरे अंदर का शिक्षक
आज भी कहता है—

**“कुछ और करना है…

बच्चों के लिए कुछ और करना है…”**

और जब तक
किसी बच्चे की आँख में सपना है,
जब तक किसी बच्ची को
अपने भविष्य के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है,
जब तक किसी शिक्षक के भीतर
कुछ बेहतर करने की आग बाकी है—

**तब तक…

शिक्षा में क्रांति बाकी है।**

**और मेरे अंदर…

एक शिक्षक का जुनून बाकी है।**

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता एक समर्पित शिक्षक की बीस वर्षों की संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक यात्रा का जीवंत वर्णन है। यह दर्शाती है कि कैसे एक शिक्षक का दृढ़ संकल्प और जुनून सीमित संसाधनों के बावजूद समाज और बच्चों का भविष्य बदल सकता है।

    कविता के मुख्य बिंदु

    • वंचितों के लिए जमीनी संघर्ष: यात्रा एक संसाधनहीन ग्रामीण विद्यालय से शुरू होती है, जहाँ महादलित और पिछड़े वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। शिक्षक ने केवल किताबें नहीं पढ़ाईं, बल्कि बच्चों की पारिवारिक परिस्थितियों को समझकर पूरे समुदाय और अभिभावकों को शिक्षा से जोड़ा।

    • बालिका शिक्षा के लिए पहल: पाँचवीं के बाद लड़कियों का स्कूल छूटना देखकर उन्होंने व्यवस्था बदलने की ठानी। उनके निरंतर प्रयासों से विद्यालय को प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर तक अपग्रेड किया गया, जिससे अनेक बच्चियों की आगे की पढ़ाई का रास्ता खुला।

    • नवाचार और रचनात्मक शिक्षण: 2007 से TLM (शिक्षण सामग्री) प्रदर्शनियों, बाल संसद, मानव शृंखला और इको क्लब जैसी गतिविधियों के जरिए पढ़ाई को रोचक बनाया। +2 शिक्षक की नई भूमिका में उन्होंने हिंदी को रटने का विषय नहीं, बल्कि वैचारिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया।

    • सम्मान और अटूट जुनून: अपने नवाचारों के लिए उन्हें प्रखंड, जिला और 2025 में राज्य स्तरीय सम्मान मिला। हालांकि, वे इन पुरस्कारों को मंजिल नहीं मानते। बीस साल बाद भी उनका उत्साह, नींद और बच्चों के लिए कुछ नया करने की बेचैनी आज भी जस की तस है।

    • शिक्षक समाज से आह्वान: कविता के अंत में साथी शिक्षकों से अपील की गई है कि वे केवल पाठ्यक्रम पूरा करने या अंक देखने तक सीमित न रहें। संसाधनों के अभाव से निराश होने के बजाय वे बच्चों की प्रतिभा निखारें।

    जब तक हर बच्चे का सपना पूरा नहीं हो जाता और हर बच्ची को संघर्ष से मुक्ति नहीं मिल जाती, तब तक शिक्षा में असली क्रांति आनी बाकी है।

—————

यह कविता (शिक्षा में क्रांति अभी बाकी है।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2026 - KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: Hindi poem on education, Shiksha mein kranti abhi baki hai, teacher motivation, Teachers Day Poem in Hindi, vivek kumar, vivek kumar poems, ग्रामीण शिक्षा, प्रेरणादायक हिंदी कविता संग्रह, बालिका शिक्षा, शिक्षक का जुनून, शिक्षक दिवस कविता, शिक्षा पर कविता, शिक्षा में क्रांति अभी बाकी है, हिंदी कविता सारांश

दो वक्त की रोटी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Do Waqt Ki Roti | दो वक्त की रोटी।

एक दिन पत्नी ने भर्राए स्वर में पूछा—

“क्या मेरी पहचान बस इतनी-सी रह गई है?
सुबह से शाम तक चूल्हे की धुएँ में घुलती रहूँ,
और लोग कहें…
मैं तो बस एक नौकरानी हूँ।
बताओ, तुमने मुझे दिया ही क्या है?”

पति ने सिर झुका लिया,
कुछ पल तक शब्द भी खामोश रहे।
फिर उसने गहरी साँस ली और कहा—

“अगर दो वक्त की रोटी बनाना
तुम्हें नौकरानी होने का एहसास देता है,
तो ज़रा उस इंसान का भी दर्द समझो,
जो दो वक्त की रोटी के लिए
हर रोज़ अपना पूरा जीवन दाँव पर लगा देता है।”

वह सुबह अँधेरे में घर से निकलता है,
और शाम को थककर लौटता है।
धूप उसे जलाती है,
बारिश उसे भिगोती है,
सर्द हवाएँ उसके शरीर को चीरती हैं।
मालिक की डाँट भी सहता है,
किस्मत की मार भी सहता है।
फिर भी होंठों पर एक ही दुआ रहती है—
“बस मेरे घर का चूल्हा जलता रहे।”

तुम्हारे हाथों की रोटी
इस घर का स्वाद है,
और मेरे माथे का पसीना
उसी रोटी का आटा है।

तुम्हारी ममता से घर महकता है,
मेरी मेहनत से घर चलता है।
एक ने घर बनाया है,
दूसरे ने उसे बसाया है।

न तुम मेरी नौकरानी हो,
न मैं तुम्हारा मालिक।
हम तो उस रिश्ते के दो पहिए हैं,
जिसका नाम परिवार है।

याद रखना…
रोटी सिर्फ आटे और पानी से नहीं बनती,
उसमें पति के संघर्ष का पसीना भी होता है,
और पत्नी के प्रेम की आँच भी।

जिस दिन रिश्तों में
‘मैं’ और ‘तू’ का हिसाब शुरू हो जाता है,
उसी दिन अपनापन कम होने लगता है।

आओ, एक-दूसरे की कमियाँ नहीं,
एक-दूसरे की मेहनत देखें।
क्योंकि…

पति कमाकर घर चलाता है,
पत्नी सँभालकर घर बसाती है।
दोनों का संघर्ष अलग-अलग है,
लेकिन दोनों का सम्मान एक समान है।

यही सम्मान घर को मकान बनने से बचाता है,
और यही प्रेम दो वक्त की रोटी को
जीवन का सबसे बड़ा प्रसाद बना देता है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता पति-पत्नी के बीच आपसी सम्मान, समझ और साझेदारी का भावपूर्ण संदेश देती है। कविता में पत्नी घर के काम और रोटी बनाने को लेकर स्वयं को नौकरानी जैसा महसूस करती है। तब पति उसे समझाता है कि जिस दो वक्त की रोटी को बनाना उसे बोझ लगता है, उसी रोटी के लिए वह प्रतिदिन कठिन परिश्रम करता है और अनेक संघर्षों को सहता है।

    कविता बताती है कि पत्नी की मेहनत और प्रेम से घर बसता है, जबकि पति की मेहनत और संघर्ष से घर चलता है। दोनों में कोई मालिक या नौकर नहीं, बल्कि दोनों परिवार रूपी गाड़ी के दो समान पहिए हैं। रोटी में जहाँ पत्नी के प्रेम और ममता की आँच होती है, वहीं पति के पसीने और संघर्ष की कमाई भी शामिल होती है।

    कवि का मुख्य संदेश है कि रिश्तों में ‘मैं’ और ‘तू’ का हिसाब करने के बजाय एक-दूसरे के संघर्ष और योगदान को समझना चाहिए। पति और पत्नी का संघर्ष भले ही अलग-अलग हो, लेकिन दोनों का सम्मान समान है। यही आपसी प्रेम, सम्मान और समझ एक साधारण मकान को खुशहाल घर बनाते हैं और दो वक्त की रोटी को जीवन का सबसे बड़ा प्रसाद बना देते हैं।

—————

यह कविता (दो वक्त की रोटी।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Unnat Bihar – Ujjwal Bihar | उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार।

(अतीत का गौरव, वर्तमान का परिश्रम, भविष्य का विश्वास)

गंगा गाथा गा रही जागो मेरे लाल,
ज्ञान की ज्योति फिर जले हो विकास कमाल।
माटी की हर रेत में गौरव की पहचान,
फिर से आगे बढ़ चले शिक्षा का अभियान।

नालंदा की रोशनी फैली थी संसार,
फिर से वैसा ही बने, अपना बिहार।
बोधिवन की शांति से उजले हों विचार,
प्यार और सद्भाव से बढ़े प्रेम अपार।

गाँव-गाँव विज्ञान का हो सच्चा विस्तार,
डिजिटल हर घर बने सशक्त हर परिवार।
खेतों में ड्रोन उड़ें खुशहाल हों किसान,
मेहनत से भर जाएँ खुशियों का मैदान।

विद्यालय बनें सभी सीखने का द्वार,
युवा करें मेहनत से सपनों को साकार।
नारी शक्ति आगे बढ़े छू ले आसमान,
अपने दम पर लिखे वह नई सफलता गान।

सौर ऊर्जा हर घर दे उजियारा अपार,
हरित राह पर चल पड़े अपना बिहार।
उद्योग बढ़ें काम मिले खुशहाल हर द्वार,
न्याय सदा सच्चा रहे स्वच्छ रहे व्यवहार।

जाति भेद की बात छोड़ मिलकर करें विचार,
एकता का दीप जले मजबूत हो आधार।
परिश्रम हो हमारी ताकत ज्ञान बने हथियार,
संकल्पों से बदल दें हम अपने सपनों का संसार।

आओ मिलकर ठान लें करें नया विस्तार,
उन्नत उज्ज्वल बिहार बने भारत का श्रृंगार।
मेहनत शिक्षा एकता से बदले हर हाल,
विश्व पटल पर चमके फिर अपना बिहार कमाल।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार केवल एक विषय नहीं बल्कि नई पीढ़ी का संकल्प है। यह रचना बिहार की ऐतिहासिक विरासत, शैक्षिक चेतना,  तकनीकी प्रगति और सामाजिक समरसता का समन्वित स्वर है।
    अतीत की प्रेरणा वर्तमान का परिश्रम और भविष्य की उजली आशा यही इसका मूल संदेश है।

—————

यह कविता (उन्नत बिहार, उज्ज्वल बिहार।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2026 - KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: Hindi Poems, vivek kumar poems, डिजिटल बिहार, नारी सशक्तिकरण, नालंदा, प्रेरणादायक हिंदी कविता संग्रह, बिहार कविता, बिहार विकास, युवा शक्ति, राष्ट्र निर्माण, विकसित बिहार, विवेक कुमार, शिक्षा

योग दिवस – 2026

Kmsraj51 की कलम से…..

Yoga Day – 2026 | योग दिवस – 2026

Yoga Day - 2026

योग का जन्मदाता जिसे माना जाता
भारत देश वो है कहलाता।

ऋषि मुनियों की देन माना जाता
पतंजलि इसका पिता कहलाता।

आत्मा को परमात्मा से है मिलाता
ज्ञान की ज्योति भी है जलाता।

रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता
मन को भी वश में करना सिखाता।

असाध्य रोग जब है लगते
योग की ओर फिर दौड़े दौड़े चलते।

अपरिचित थी दुनिया इसके गुणों से
लोकप्रियता बढ़ रही है वर्ष 2014 से।

अनेक संस्थान इसके आसन है सिखाते
फिर लोग इन्हें अपने जीवन में हैं अपनाते।

आज एक और योग दिवस आया
बहुतों ने एक दिन के लिए योग अपनाया।

फोटो खिंचवाया जहां चाह वहां चिपकाया
फिर पूरा वर्ष भर इससे किनारा बनाया।

योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं
औरों को भी इसके गुणों की महत्ता बताएं।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है —

    यह कविता योग के महत्व, इतिहास और वर्तमान स्थिति को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। कवि बताते हैं कि भारत योग की जन्मभूमि है और महर्षि पतंजलि को योग का जनक माना जाता है। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने तथा ज्ञान और आत्मिक जागृति का मार्ग भी है।

    कविता में योग के स्वास्थ्य लाभों का वर्णन किया गया है। योग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, मन को नियंत्रित करना सिखाता है और अनेक शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। कवि यह भी बताते हैं कि जब लोग गंभीर रोगों से ग्रस्त होते हैं, तब वे योग की ओर आकर्षित होते हैं।

    आगे कवि योग की बढ़ती वैश्विक लोकप्रियता का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि वर्ष 2014 के बाद इसकी पहचान और व्यापक हुई है। अनेक संस्थान लोगों को योग का प्रशिक्षण दे रहे हैं और लोग इसे अपने जीवन में अपना रहे हैं।

    अंत में कवि केवल योग दिवस पर औपचारिकता निभाने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हैं। वे संदेश देते हैं कि योग को एक दिन तक सीमित न रखकर अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए तथा इसके लाभों की जानकारी दूसरों तक भी पहुंचानी चाहिए।

मुख्य संदेश:
योग स्वस्थ शरीर, शांत मन और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम है। इसे केवल योग दिवस पर नहीं, बल्कि नियमित रूप से जीवन में अपनाना चाहिए।

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यह कविता (योग दिवस – 2026) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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बात वक्त की।

Kmsraj51 की कलम से…..

Baat Waqt Ki | बात वक्त की।

ये लगे हैं बुझाने लौ चिरागों की जलने से पहले ही,
फिर मचा रहे हैं शोर कि चिराग जलते क्यों नहीं हैं?
अंधेरा तो छटा नहीं फिर चिरागों का क्या फायदा?
पर हिम्मत तो देखिए इनकी साहब!
हर अमावस को करते हैं पूनम का वायदा।

क्या फायदा दीवारें खड़ी करने से,
तूफान आ जाने के बाद।
अब समेटने का नाटक कर रहे हैं,
जब आंधियां सब उड़ाकर ले गई।

यूं नहीं कहते हैं बुजुर्ग ,
कि नालियां साफ आसमा में निकाला करो।
बेकार है कुरेदना उन्हें भारी बरसात आने के बाद।
उर्वरकों से फैलते, फलते – फूलते हैं पौधे सभी,
पर कुछ भी असर नहीं करती है बेमौसमी खाद।

हर बात वक्त की ही होती है अच्छी साहब,
बेवक्ता तो भोजन भी जहर बन जाता है।
आज का दौर हो गया है कुछ ऐसा हजूर,
अपना अजीज भी मौके पर जहर उगलवाता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता समय की महत्ता और अवसर चूकने के दुष्परिणामों पर केंद्रित है। कवि उन लोगों की आलोचना करते हैं जो समस्याओं को समय रहते हल करने के बजाय पहले ही उम्मीदों की लौ बुझा देते हैं और बाद में शोर मचाते हैं कि प्रकाश क्यों नहीं हुआ।

    कवि बताते हैं कि जब अंधेरा छंटा ही नहीं, तो चिराग जलाने का लाभ भी नहीं मिलता, फिर भी लोग हर अमावस्या को पूर्णिमा का वादा करते रहते हैं। यह उन झूठे आश्वासनों का प्रतीक है जो बिना वास्तविक प्रयास के दिए जाते हैं।

    आगे कविता समझाती है कि तूफान के बाद दीवारें खड़ी करना या बाढ़ के बाद नालियां साफ करना व्यर्थ है। अर्थात, काम हमेशा सही समय पर ही प्रभावी होता है; देर से किया गया प्रयास अक्सर निष्फल रहता है।

    कवि यह भी कहते हैं कि हर कार्य का अपना उचित समय होता है—जैसे बेमौसम खाद का पौधों पर असर नहीं होता, वैसे ही अनुचित समय पर किया गया कार्य परिणाम नहीं देता।

    अंततः कविता वर्तमान समाज की विडंबना दिखाती है कि समय पर साथ देने के बजाय अपने ही लोग अवसर आने पर हानि पहुंचाते हैं। संदेश यह है कि जीवन में सफलता और संबंधों की स्थिरता के लिए समय की समझ, सही निर्णय और समय पर कार्य करना अत्यंत आवश्यक है।

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यह कविता (बात वक्त की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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तिरंगा का करें सम्मान।

Kmsraj51 की कलम से…..

Tiranga Ka Kare Samman | तिरंगा का करें सम्मान।

“तिरंगा हमारी पहचान, शहीदों की अमर निशानी और भारत की शान।”

तिरंगा है भारत की शान,
इसमें बसती देश की जान।
केसरिया कहता साहस–त्याग,
श्वेत सिखाता सत्य–ज्ञान।

हरा रंग हरियाली बोले,
खेत–खलिहान, वन–उपवन डोले।
अशोक चक्र हर पल सिखाए,
रुकना नहीं, आगे ही बढ़ना बोले।

इस ध्वज तले सोई कुर्बानी,
हर धागे में अमर कहानी।
वीरों ने हँसकर प्राण दिए,
तब पाई हमने ये आज़ादी।

ना झुके कभी ये आन–बान,
ना होने दें इसका अपमान।
हर घर में हो इसका आदर,
हर दिल में बसे इसका मान।

आओ आज ये प्रण हम ठानें,
तन–मन से इसे पहचानें।
कर्म, सेवा, सत्य के पथ पर,
चलकर भारत को महान बनाएं।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता तिरंगे के गौरव, महत्व और देशभक्ति की भावना को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती है। कवि बताता है कि तिरंगा भारत की शान और आत्मा का प्रतीक है। इसके तीनों रंग साहस, त्याग, सत्य, ज्ञान और हरियाली जैसे मूल्यों का संदेश देते हैं। अशोक चक्र निरंतर आगे बढ़ते रहने और प्रगति का प्रतीक है।कविता में यह भी दर्शाया गया है कि तिरंगे में वीर शहीदों की कुर्बानियाँ और आज़ादी की अमर गाथाएँ समाई हुई हैं। हमें इस ध्वज का सम्मान बनाए रखना चाहिए और कभी इसका अपमान नहीं होने देना चाहिए। अंत में कवि सभी को सत्य, सेवा और कर्म के मार्ग पर चलकर देश को महान बनाने का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।

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यह कविता (तिरंगा का करें सम्मान।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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एक सफर।

Kmsraj51 की कलम से…..

A Journey | एक सफर।

माया और भटकन पर एकांकी | लक्ष्य, भ्रम और वर्तमान यथार्थ

“मंज़िल की राह में माया का मोह, लक्ष्य को भटका देता है।”

एक लड़का माधव अपने घर से किसी जरूरी कार्य हेतु सुबह-सुबह वाली एक बस से निकल पड़ता है वह कार्य जैसे उसकी जिंदगी का अहम हिस्सा होता है जिससे वह बहुत बड़े पद पर पहुंच सकता है। लेकिन बीच में उसे एक अपने अन्य साथी से मिलना है। उस बस से उतर कर एक छोटे से कस्बे में उसका वह साथी उस समय कमरा लेकर रहता है जो कि माधव के घर से तीस किलोमीटर के आसपास है। दोस्त से मिलकर माधव अपने गंतव्य तक पहुचने के लिए फिर सड़क तक पहुंचना चाहता है जहाँ से उसे बस मिल सके और अपने कार्य को पूर्ण कर सके। धीरे – धीरे वह पैदल चलने लगा पगडंडी में आगे जाकर रास्ता भटक गया लेकिन आगे जाकर कुछ राहगीरों से रास्ता पूछने लगा राहगीर रास्ता बता ही रहे थे कि अचानक उसकी नजर पीछे खड़ी एक सुन्दर नवयुवती पर पड़ी जो झट से बोल पड़ी कि मुझे भी उसी बस तक जाना है उसकी भी कोई परीक्षा है। यह सुनकर माधव मन ही मन खुश हुआ और युवती से उसका नाम पूछने लगा युवती ने अपना नाम माया बताया दोनों की आँखों में बहुत खुशी थी और वार्तालाप करते हुए आगे बढ़े। थोड़ी दूर आगे जाकर माधव को माया अपने बैग से 2 लड्डू निकालकर खाने को देती है चूंकि वह खुद भी खा रही थी।

दोनों में बहुत गहरी दोस्ती हो जाती है। एक दूसरे पर विश्वास करने लगते है। आगे उसी रास्ते में एक बाबा का आश्रम पड़ता है जिसने बहुत सारे कुत्ते पाल रखे है चुकी बाबा बहुत प्रसिद्ध हैं उसने कुत्ते पालने के लिए नौकर भी रखा है लेकिन नौकर किसी दूसरे काम में व्यस्त है। तब तक माया और माधव आश्रम से आधा किलोमीटर दूर थे कि सारे कुत्ते उनकी तरफ दौड़ने लगे। माया ने माधव को बता दिया कि वह रोज यहाँ से गुजरती है माधव को कुत्तों से डरने की जरूरत नहीं है। ऐक छोटी सी छड़ी माधव के हाथ दे देती हैं तब तक सारे कुत्ते उनके समीप आ जाते है माया आगे खड़ी और पीछे डरा हुआ माधव लेकिन लड़की के विश्वास ने उसे हिम्मत दी थी पंद्रह, बीस कुत्ते कुछ छोटे कुछ बड़े माया को चारो तरफ से घेरे थे वह उनको पुचकारते हुए शांत कराने लगी थी कि उनमें से ऐक बड़ा कुत्ता माधव की और बढ़ा पहले कुत्तों के डर से माधव घबराया था पर माया के कहने पर चुप खड़ा रहा लेकिन उस कुत्ते ने माधव को पीठ से काटना शुरू किया। डर के मारे नौजवान ने दोनों हाथों से कुत्ते को पकड़ लिया और पूरी ताकत से अपने नीचे दबोच लिया। माया आगे बाकी कुत्तों को सम्भाल ही रही थी उधर माधव की पीठ से खून बह रहा था लेकिन उसे मालूम नहीं था। तब तक बाबा और उनका नौकर वहाँ पहुँच जाते हैं और वह देखते है कि माधव ने एक कुत्ते को दबोच कर घायल कर दिया हैं जो कि जुर्म है क्योंकि दोनों आश्रम की सीमा से होकर गुजर रहे थे। माया अपनी सफाई देते वहाँ से तुरन्त निकलने लगती हैं उसकी बस और परीक्षा का समय निकला जा रहा था लेकिन माधव बेचारा फंस जाता है और वह आश्रम के बाबा और उनके नौकर से उलझ जाता है, काफी समय बीतने के बाद किसी तरह वह वहाँ से छूट जाता हैं लेकिन फिर रास्ता वीराने जंगल में भटक जाता है वह अपनी माया को फिर ढूंढना चाहता हैं जो उसे उसकी मंजिल तक ले चले लेकिन अब माया बहुत दूर जा चुकी है और माधव रास्ते मे ही भटक रहा हैं। वर्तमान परिवेश के संदर्भ में एकांकी।

♦ लाल सिंह वर्मा जी – जिला – सिरमौर, हिमाचल प्रदेश ♦

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• Conclusion •

  • “लाल सिंह वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस एकांकी के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह एकांकी वर्तमान सामाजिक परिवेश और मानवीय मनोवृत्तियों को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। कथा का नायक माधव अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सुबह बस से निकलता है। रास्ते में वह एक मित्र से मिलने के कारण बस बदलता है और आगे का मार्ग पैदल तय करते हुए रास्ता भटक जाता है। इसी दौरान उसकी मुलाकात माया नामक एक नवयुवती से होती है, जिसे भी परीक्षा देने जाना है। दोनों के बीच सहज बातचीत से विश्वास और मित्रता का भाव उत्पन्न होता है।

    यात्रा के दौरान बाबा के आश्रम के पास कुत्तों का सामना होता है। माया के भरोसे माधव भय पर काबू पाने का प्रयास करता है, किंतु एक कुत्ते के काट लेने से स्थिति गंभीर हो जाती है। बाबा और उनके नौकर के आने पर माधव को दोषी ठहरा दिया जाता है, जबकि माया अपनी परीक्षा के कारण आगे निकल जाती है। इस घटना के बाद माधव अकेला, घायल और दिशाहीन रह जाता है।

    एकांकी यह संकेत देती है कि जीवन में क्षणिक भरोसा, भ्रम और परिस्थितियाँ कभी-कभी व्यक्ति को उसके लक्ष्य से भटका देती हैं। माया यहाँ केवल एक पात्र नहीं, बल्कि आकर्षण, मोह और भ्रम का प्रतीक भी है, जो मंज़िल तक पहुँचने के बजाय नायक को रास्ते में ही भटका देती है।

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यह एकांकी (एक सफर।) “लाल सिंह वर्मा जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं लाल सिंह वर्मा सुपुत्र श्री भिन्दर सिंह, गांव – खाड़ी, पोस्ट ऑफिस – खड़काहँ, तहसील – शिलाई, जिला – सिरमौर, हिमाचल प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक शिक्षक हूं, शिक्षा विभाग में भाषा अध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है, हिंदी भाषा से सम्बन्धित साहित्यिक विधाओं में रचनाएं लिखना तथा विशेष रूप से सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व मानवीय मूल्यों से सम्बन्धित रचनाओं का अध्ययन करना पसंद है। इस Platform (KMSRAJ51.COM) के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

शैक्षिक योग्यता – J.B.T, BEd., MA in English and MA in Hindi, हिंदी विषय में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण की है। अध्यापक पात्रता परीक्षा L.T., J.B.T., TGT पास की है। केंद्र विश्वविद्यालय PHD• (पीएचड•) प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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बाल विवाह – एक अभिशाप।

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Baal Vivaah Ek Abhishaap | बाल विवाह – एक अभिशाप।

बाल विवाह के खिलाफ कविता | बेटी की आवाज़, समाज के नाम संदेश

“बेटी बोझ नहीं, भविष्य है — उसे सपने पूरे करने का अधिकार दो।”

बेटी ने पूछा बापू से —
“इतनी ब्याह की क्या जल्दी?”
थोड़ी तो बढ़ जाने दो,
अभी तो मैं नादान हूँ,
थोड़ी तो ढल जाने दो।
अनजान डगर पर चलने से पहले,
जीवन को तो समझ लेने दो।

अभी तो बचपन भी न जिया,
थोड़ा तो जी जाने दो।
खेलों की किलकारी बाकी है,
किताबों से दोस्ती बाकी है,
सपनों की उड़ान अधूरी है,
आँखों में आस अभी बाकी है।

माँग में सिंदूर भरने से पहले,
हाथों में कलम थमा लेने दो,
घर की ज़िम्मेदारी से पहले,
मुझे खुद को पहचान लेने दो।

मैं बोझ नहीं, उम्मीद हूँ पापा,
कल का उजाला हूँ पापा,
आज अगर मुरझा दी गई,
तो कैसे खिल पाऊँ पापा?

कुड़वी रस्मों की बेड़ियाँ,
मेरे पाँव से हटा लेने दो,
बेटी हूँ, इंसान हूँ मैं,
मुझे भी जीने का हक़ दो पापा।

जो आज पढ़ेगी, वही कल
घर को रोशन करेगी,
अधपकी उम्र में ब्याही गई
किस्मत से ही हारेगी।

इस अभिशाप से समाज को
आज ही बचा लेने दो,
बेटी को बेटी रहने दो,
उसे जबरन बहू मत बन जाने दो।

बापू, मेरी एक बात सुन लो —
ये परंपरा नहीं, अपराध है,
जो कलियों को रौंद दे,
वो संस्कृति नहीं, अभिशाप है।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता बेटी की पीड़ा, चेतना और अधिकारों की सशक्त अभिव्यक्ति है। बेटी अपने पिता से कम उम्र में विवाह न करने की विनती करती है और कहती है कि वह अभी जीवन, शिक्षा और अपने सपनों को समझना चाहती है। वह बताती है कि बचपन, खेल, पढ़ाई और आत्म-परिचय अभी अधूरे हैं, जिन्हें पूरा करने का उसे अवसर मिलना चाहिए।

    कविता में बेटी स्वयं को बोझ नहीं, बल्कि भविष्य की उम्मीद और उजाले के रूप में प्रस्तुत करती है। वह समाज की कड़वी परंपराओं और बाल विवाह जैसी प्रथाओं को अपराध और अभिशाप बताती है। कवि का संदेश स्पष्ट है कि बेटी को पढ़ने, जीने और स्वयं निर्णय लेने का अधिकार मिलना चाहिए, क्योंकि शिक्षित बेटी ही परिवार और समाज को उज्ज्वल बना सकती है।

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यह कविता (बाल विवाह – एक अभिशाप।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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क्या बदलाव लायेगा नया साल।

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Kya Badlaav Layega Naya Saal | क्या बदलाव लायेगा नया साल।

नववर्ष 2026 पर प्रेरणादायक हिंदी कविता | उम्मीद और बदलाव

बीते को भुलाना, नए को अपनाना,
जो खोया उसका रोना, पाए पर इतराना,
अच्छाई से दोस्ती, बुराई से घबड़ाना,
खट्टी मीठी यादों का बीता सफर सुहाना,

यादों के झरोखों से बज रहा तराना,
गजब फलसफा है मेरे भाई,
जेहन में मेरे पुनः एक बात दोहराई,
अधूरी आस क्या इस वर्ष होगी पास,

नववर्ष के आगमन ने ज्यों ही खुशियां फैलाई,
तभी एक बार फिर उद्गार उमड़ आई,
2026, क्या बदलाव है लाई?
क्या सच्चाई की जीत और बेईमानी की होगी हार,

ईर्ष्या द्वेष मिटाकर भाईचारे का सपना होगा साकार,
क्या बेरोजगारी मिटेगी, रोजगार मिलेगी,
अमन चैन से भरी जिंदगी कटेगी,
कभी दिलासा कभी डर का छाया साया,

उम्मीदों ने मुझे हौसला है दिलाया,
डर को है झुकाना, हिम्मत को बढ़ाना,
शिक्षा, स्वच्छता और
सामाजिक कार्य को अपनाना,
इस मंत्र को कभी न भुलाना,

यही बात जन-जन को है समझाना,
बदलाव को है अपने देश में लाना,
नववर्ष में यही गीत गुनगुनाना।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता बीते वर्ष की स्मृतियों, अनुभवों और सीख को आत्मसात करते हुए नववर्ष से जुड़ी आशाओं और आत्ममंथन को अभिव्यक्त करती है। कवि कहता है कि जीवन में बीते दुख-सुख, हार-जीत, अच्छाई-बुराई सभी का अपना महत्व होता है, जिनसे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। यादों की खट्टी-मीठी अनुभूतियाँ मन में नए प्रश्न और नई उम्मीदें जगाती हैं।

    नववर्ष 2026 के आगमन पर कवि समाज और देश में सकारात्मक बदलाव की कामना करता है—सच्चाई की जीत, बेईमानी की हार, ईर्ष्या-द्वेष का अंत और भाईचारे का विस्तार। बेरोजगारी के समाप्त होने, रोजगार बढ़ने और अमन-चैन से भरे जीवन की आकांक्षा व्यक्त की गई है।

    कविता का संदेश है कि डर को परे रखकर हिम्मत बढ़ाई जाए और शिक्षा, स्वच्छता व सामाजिक कार्यों को अपनाकर देश में वास्तविक परिवर्तन लाया जाए। अंततः यह कविता नववर्ष को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मसुधार और सामाजिक जिम्मेदारी का संकल्प बनाने का आह्वान करती है।

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यह कविता (क्या बदलाव लायेगा नया साल।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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है तो नववर्ष।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hai Tho Nav Varsh | है तो नववर्ष।

देशी का राग रटते रहो
पर देशी महीनों के नाम तो कहो
फिर अंग्रेजी क्या देशी क्या
है तो नववर्ष …….

वर्ष भर दिनांक में गिनती करते
प्रविष्टे कितने ये भी नहीं जानते
फिर अंग्रेजी क्या देशी क्या
है तो नववर्ष …….

सारा रिकॉर्ड दिनांक में लिखा जाता
कहीं प्रविष्टे का नाम तक नहीं आता
फिर अंग्रेजी क्या देशी क्या
है तो नववर्ष …….

देवनागरी का ज्ञान तक नहीं
जहां देखो रोमन अंक हैं वहीं
फिर अंग्रेजी क्या देशी क्या
है तो नववर्ष …….

कब मंगसर तो कब पौष आते
सिर्फ संडे, मंडे और जनवरी,
फरवरी ही याद कर पाते
फिर अंग्रेजी क्या देशी क्या
है तो नववर्ष …….

नई पीढ़ी को सिर्फ अंग्रेजी ज्ञान बांटते
अपनी संस्कृति से रूबरू नहीं करवाते
फिर अंग्रेजी क्या देशी क्या
है तो नववर्ष …….

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता समाज में व्याप्त उस विरोधाभास को उजागर करती है, जहाँ लोग दिखावे के तौर पर देशीपन और संस्कृति की बात तो करते हैं, लेकिन अपने ही परंपरागत ज्ञान से अनभिज्ञ रहते हैं। कवि बताता है कि लोग वर्षभर तारीख़ों की गिनती तो करते हैं, पर भारतीय पंचांग की प्रविष्टि, देशी महीनों के नाम, और देवनागरी लिपि का ज्ञान तक नहीं रखते।

    अंग्रेज़ी कैलेंडर, रोमन अंकों और संडे–मंडे, जनवरी–फरवरी तक सीमित सोच ने हमारी सांस्कृतिक पहचान को पीछे धकेल दिया है। नई पीढ़ी को केवल अंग्रेज़ी शिक्षा दी जा रही है, जबकि उन्हें अपनी भाषा, लिपि और परंपरा से परिचित नहीं कराया जा रहा।

    कवि इसी विडंबना पर प्रश्न उठाता है कि जब हम अपनी संस्कृति को जानते ही नहीं, तो फिर अंग्रेज़ी नया साल हो या देशी नववर्ष — दोनों में अंतर ही क्या रह जाता है। कविता आत्ममंथन और सांस्कृतिक चेतना जगाने का संदेश देती है।

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यह कविता (है तो नववर्ष।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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