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काल पर कविता

काल – समय।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ काल – समय। ♦

काव्य  : भिक्षुक।

सांझ शिखी के काल में फिर से चौखट पर तुम्हारे,
निन्दित नकारा हुआ वक्ता चिर-उन्मुक्त मन मारे।

ठंडा हुआ नंदिनी अभिमानिनि स्नेह की रानी,
रुक्ष इद्ध अँखियों में पिपासाकुल मधुल-दिवस सिरानी।

युगाब्धों की जीर्ण घूघी में कितनी लेकर प्रत्याशा,
निज-दहक की गर्जन पुंगलों में लहरित पिपासा।

दिवस भर टहला देवेशी! तुम्हारे दर्प-दीघंकृत मति में,
भिक्षा दी न गई इस अगाध क्रूरता तिक्त भव में।

निभृत क्षुब्ध विकल हो भटका गेह निकेतन में,
कितने दारुण गीत सुनाये वृजिन-व्याकुल निशदिन में।

आह! कोई न पिघला मैं चित्कार उठा विह्वल दुर्वचनी,
निशादि-सी उच्छवासित पुनीत तुम देख पड़ी तन्वंगिनी।

मुझे तो तुमने ही बनाया नकारा चिर-प्रवासी,
अब मेरी तुम्हीं हरो अध्व-उद्यम-ताप पराजित उदासी।

जाग्रत हो उठी ये कैसी धाधि दहक उठा उर तापी,
सांझ शिखी के काल में चौखटे पर तड़प रहा पापी।

पौ-पुनर्णव-इंदुकर-छाया में मुझे लुका पंछी गाता,
अधरात के सन-सन स्वर-सा प्राणंत सुधा नहाता।

कस्तूरी वेणा मरिचि-प्रांगण में लावण्य-पुंज मैथुन-अर्हन,
करो जब तुम दिवसमुख में लीन प्रभात-सी पावन।

इसी एक अभव में हो जाये मेरा भी लोमहर्ष-निर्वासन,
जैसे अपनी अरुण-वेली में ज्वाला सा कांतिहीन।

अर्थ: अरुण-वेली = सूर्य किरण, वेणा = खस, प्राणंत = हवा, पुनर्णव = नाखून,
इंदुकर = चंद्रमा को रौशनी, धाधि= ज्वाला, अध्व= राह, तन्वंगिनी = कोमलांगी,
दुर्वचनी = भिक्षुक, दीघंकृत = डूबा हुआ, घूघी = झोली

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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  • “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल`“ जी ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — भोर में ही भिक्षुक उठकर अपने नित्य कर्म से निवृत होकर, सूर्य की पहली किरण के साथ ही अपनी झोली लेकर भिक्षा मांगने के लिए निकल पड़ता हैं। उस समय सुबह की मंद-मंद सेहतमंद हवा का आनंद लेते हुए निकल पड़ता है। जो भी प्रेम व सच्ची श्रद्धा से भिक्षा मिलता है वह लेकर वापस आ जाता है। निभृत क्षुब्ध विकल हो भटका गेह निकेतन में, कितने दारुण गीत सुनाये वृजिन-व्याकुल निशदिन में। समय चक्र से कोई भी प्राणी अछूता नही है।

—————

यह कविता (काल – समय।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव `परिमल` जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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