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अपना धर्म सबसे उत्तम।

Kmsraj51 की कलम से…..

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    • Apna Dharm Sabse Uttam | अपना धर्म सबसे उत्तम।
      • “जिस राष्ट्र को अपनी संस्कृति पर गर्व नहीं,                                         वह राष्ट्र दीर्घकाल तक जीवित नहीं रह सकता।”  :-  स्वामी विवेकानंद 
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Apna Dharm Sabse Uttam | अपना धर्म सबसे उत्तम।

“जिस राष्ट्र को अपनी संस्कृति पर गर्व नहीं,
                                        वह राष्ट्र दीर्घकाल तक जीवित नहीं रह सकता।”  :- 
स्वामी विवेकानंद 

धर्म किसी पूजा पद्धति का नाम नहीं, बल्कि धर्म जीवन जीने का एक समग्र सामाजिक तरीका है। दुनियां में लगभग 1100 के करीब धर्म हैं; उन सबके अपने – अपने जीवन जीने के तौर तरीके हैं। उनकी :-
____________________

1) धार्मिक मान्यताएं और विश्वास।

2) पूजा पद्धतियां।

3) दैविक विधान और मान्यताएं।

4) धर्म ग्रन्थ और शास्त्र।

5) जन्म संस्कार।

6) विवाह पद्धतियां और रीति रिवाज।

7) मृत्यु संस्कार इत्यादि बहुत कुछ अलग अलग हैं।

इन धर्मों में कहीं धार्मिक कट्टरता है, तो कहीं एकेश्वरवाद। कहीं अपने धर्म को न मानने वालों को जिहाद का शिकार बनाने की प्रवृति है, तो कहीं मिशनरी प्रचारकों के माध्यम से आर्थिक प्रलोभन में धर्मांतरण करवा कर अपने धर्म का विस्तार करने की प्रबल ईच्छा। लेकिन हिन्दू धर्म ही दुनियां का एक मात्र ऐसा धर्म है, जिसमें न धार्मिक प्रचार और विस्तार के लिए आर्थिक प्रलोभन दिया जाता है और न ही तो कोई जिहाद ही की जाती है। यह एक खुला आवाह्न है और खुला प्रचार है। इस धर्म में किसी के साथ धर्म परिवर्तन के लिए कोई जोर जबरदस्ती, प्रलोभनात्मकता या चालाकी नहीं की जाती। जिसे यह धर्म आचारों से, विचारों से या व्यवहारों से अच्छा लगता है। वह इसे अपना सकता है। हिन्दू धर्म दुनियां का इकलौता देश है, जिसमें :- 
___
1) धार्मिक कट्टरता नहीं बल्कि लचीलता है। जो किसी भी धर्म की अच्छाइयों को सदियों से खुद में समाहित करता आया है और बुराइयों का प्रतिकार करता आया है। अन्य धर्मों में अपने धर्म की मान्यताओं को हर हाल में स्वीकारना जरूरी है। अन्यथा धर्म विरोधी कहलायेंगे।
2) एकेश्वरवाद नहीं बल्कि सर्वेश्वरवाद है। जिसमें ईश्वर तत्व को अपने – अपने तरीके, मान्यताओं, पूजा पद्धतियां तथा सामाजिक व्यवहारों द्वारा खोजने की खुली छूट है। किसी पर कोई पाबंदी नहीं। इसका साफ-साफ उदाहरण बहुदेववाद है। हिन्दू धर्म के वृहद समाज में हर उप समाज का अपना – अपना देवी – देवता अलग है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज के प्रतिष्ठित देवता और भगवती – भगवान या ईश्वर को तो वे सभी हिन्दू फिर भी मानते हैं। वे चाहे किसी भी जाति वर्ग के हो या फिर किसी भी हिन्दू समाज विशेष के हो। यानी यहां हर व्यक्ति को ईश्वर को खोजने और पूजने की खुली छूट है। अनेक विकल्प हैं, अनेक देवता हैं और अनेक पूजा पद्धतियां हैं पर अंततोगत्वा सभी की सार्वभौमिक मान्यता परमेश्वर पर व्यवस्थित है। विश्व के अन्य धर्मों में ऐसा नहीं है। वहां एकेश्वरवाद है। कहीं एक गॉड को माना जाता तो कहीं एक अल्लाह या खुदा को। यही वैविध्य में एकत्व की भावना ही तो हिन्दू धर्म की खूबसूरती है।
3) धर्म ग्रंथों या शास्त्रों पर मौलिक चर्चा और नवीन व्याख्या करने की खुली छूट है हिन्दू धर्म में। जबकि अन्य धर्मों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। दुनियां के किसी भी धर्म में यह व्यवस्था नहीं शायद कि कोई उनके मूल धर्म ग्रंथों की नए सिरे से व्याख्या कर सके। जो करेगा, वह नापेगा। जो धार्मिक कट्टरता का प्रतीक है। हिन्दू धर्म धार्मिक कट्टरता के पक्ष में ही नहीं है। हां इतना जरूरत है कि जो हमारे धर्म को छेड़ेगा, उसे धार्मिक तरीके से जबाव हमारा धर्म भी देता है। बाईबल और कुरान आदि पर स्वतंत्र व्याख्या इन धर्मों की मान्यता से हट कर कर पाना सम्भव नहीं है शायद। जबकि श्रीमद्भागवत गीता, वेद, पुराण षट् शास्त्रों पर कोई भी स्वतंत्र व्याख्याएं करते आए हैं और कर रहे हैं तथा करते चले जाएंगे। यह हिन्दू धर्म के खुलेपन और स्वतन्त्र विचार का प्रतीक है। यानी यहां धर्म में सकारात्मक बदलाव भी वक्त के साथ स्वीकार्य है और दूसरे धर्मों में इस रीति का अभाव है। यहां सती प्रथा थी। विरोध हुआ तो बन्द हो गई। यहां बाल विवाह होते थे। विरोध हुआ तो बन्द हो गए। यहां नर बलि की प्रथा थी। विरोध हुआ तो बन्द की गई। यहां विधवा विवाह वर्जित था। कालान्तर में वह भी अवधारणा टूटी। गलत का विरोध जायज था और उसे बन्द करना अति जायज था। यह प्रतीक है हिन्दू धर्म के खुलेपन का। जबकि दूसरे धर्मों में कुछ सामाजिक कुरीतियों को आज भी ढोया जा रहा है। हिजाब और तीन तलाक जैसी कुरीतियों को अब आधुनिक समाज में मुस्लिम भाई बहनों को भी समाप्त कर देना चाहिए। परन्तु वे आज भी बने हुए हैं। यह किसी धर्म का विरोध नहीं बल्कि हिन्दू धर्म का तुलनात्मक अध्ययन है।
4) वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वेभवन्तु सुखिन, सर्वसन्तु निरामया, की सर्वमंगल भावना दुनियां के एक मात्र धर्म – हिन्दू धर्म में है। जो सभी प्राणियों को एकोब्रह्म की भावना से देखता है और सभी धर्मों को सम्मान देता है। दुनियां के अन्य धर्म तो सिर्फ अपने आप को ही श्रेष्ठ मानते हैं और उन्हें न मानने वालों को विधर्मी मानते हैं। यह बड़प्पन है हिन्दू धर्म में।
                 इतना ही नहीं दुनियां का बहुत पुराना धर्म पारसी धर्म भी इसी भारत भूमि की हिन्दू धर्म की सहिष्णुता के कारण आज यहीं भारत में कुछ अंशों में बचा है। वरना तो आज वह अपने ही देश में लुप्त प्राय हो गया है, जिस देश में वह कभी जन्मा था। भारत ने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारस इत्यादि धर्मों को अपने हिन्दू धर्म प्रधान होने के बाद भी बराबर संजो कर रखा है। यहां ईसाइयों की चंगाई सभाएं खुलेआम होती है और गिरिजा घरों में कन्फेशन आज भी होता है। यहां मस्जिदों में अज़ान आज भी लगती है और नमाज खुलेआम पढ़ी जाती है। खैर बौद्ध, सिख तथा जैन धर्म तो हिंदू धर्म से ही प्रस्फुटित धर्म है। वे तो अपना – अपना धार्मिक प्रचार खुले आम करते ही हैं। कानून के दायरे में भारत में सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने – अपने धार्मिक स्थल बनाने की खुली छूट है।
                      परन्तु सवाल यह है कि क्या दुनियां के अन्य देशों में भी यह धार्मिक सहिष्णुता जिन्दा है? गांधार में दुनियां का सबसे बड़ा शिव मन्दिर था। आज उसकी स्थिति पता करो। पाकिस्तान में दुनियां का सबसे बड़ा विष्णु मन्दिर था। आज उसकी स्थिति पता करो। पंजाब जो भारत की आजादी से पहले का था। आजादी के बाद दो भागों में बंट गया। पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब। पश्चिमी पंजाब जो आज भारत का हिस्सा नहीं है। वहां हिन्दुओं की स्थिति का पता करो। पाकिस्तान भारत से 1947 में अलग ही धार्मिक आधार पर हुआ था। जिसमें मुस्लिम भाइयों ने दलील दी थी कि हम पाक यानी पवित्र है और ये हिन्दू या हिन्दू धर्म से उद्भूत अन्य धर्म के लोग नापाक यानी अपवित्र हैं। इसलिए हम इन अपवित्र लोगों के साथ नहीं रह सकते। हमें अलग देश चाहिए। बाबा साहेब अम्बेडकर जी लिखते हैं कि मैं इस विभाजन को तब सही मानूंगा जब पूरे के पूरे मुस्लिम भाई पाकिस्तान चले जाएं और पूरे के पूरे हिन्दू धर्म के मतावलंबी भारत में रहें। परन्तु ऐसा भी कुछ नहीं हुआ। कई मुस्लिम भाई बहने भारत में ही रहे और कई हिन्दू – सिख आदि पाकिस्तान में ही रहे। आज भारत में तो धर्म निरपेक्षता के चलते और धार्मिक सहिष्णुता के चलते मुस्लिम भाई बहनों को पूरी सुरक्षा है। उधर पाकिस्तान और बंगला देश में हमारे हिन्दू और सिख आदि भाई बहनों की संख्या दिन प्रति दिन घटती जा रही है। आखिर क्यों? क्या यह स्वतः सिद्ध नहीं करता कि हिन्दू धर्म विश्व का सबसे मानवतावादी धर्म है। हां हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा जहर आज जातिवाद ने घोल कर रखा है। जिस दिन हमारे हिन्दू धर्म से यह जातिवाद का जहर उतर जाएगा, उस दिन भारत फिर से सोने की चिड़िया ही कहलाएगा। हिंदुओं को भारत में अन्य धर्मों के लोगों के रहने से भी कोई आपत्ति नहीं है। बल्कि हिंदुस्तान तो एक धार्मिक संग्रहालय है। शर्त यह है कि कोई हमारे धर्म के लोगों को जबरन, पैसों का प्रलोभन दे कर, लब जेहाद कर के या धार्मिक कट्टरपंथी जेहाद कर के अपने धर्म में मिलाकर उनका धार्मिक परिवर्तन न करें। यह बहुत ही गलत है। भारतीय संविधान के आर्टिकल 25 में हमें धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार मिला है। उसके तहत आप अपने धर्म का प्रचार करें और हम हिन्दू धर्म का प्रचार करेंगे। फिर जिसे जो अच्छा लगता है वह उसे सहज प्रक्रिया से अपनाएं। उसमें न हमें समस्या है और न तुम्हे। जबरदस्ती, प्रलोभनात्मकता तथा चालाकी किसी भी सूरत में मंजूर नहीं है। एक विडम्बना भारतीय संविधान की यह भी है कि आर्टिकल 30 में अल्पसंख्यकों को तो अपने अपने धर्म की शिक्षा देने का अधिकार उनके अपने स्कूलों कॉलेजों में दिया गया है और उसी संविधान के अनुच्छेद 30(A) में हिन्दू धर्म के लोग न अपने स्कूलों कॉलेजों में हिन्दू धर्म की शिक्षा दे सकते हैं और न सरकारी स्कूलों में। यह दोहरा रवैया भी धर्म निरपेक्षता के सिद्धान्त को कहीं न कहीं आहत करता है। इसलिए इस सन्दर्भ में भी भारत सरकार को संवैधानिक उपचारों के अधिकार के तहत इन दो कानूनों – 30 और 30(A) को पुनः धर्म निरपेक्षता के आधार पर निर्धारित करना चाहिए। एक देश, एक संविधान होने के बावजूद भी दोहरे कानून ठीक नहीं हैं। 
                     बहुत से लोग धर्म और अध्यात्म को एक ही मानते हैं। जबकि ये दो अलग – अलग पहलू हैं। यह जरूर है कि धर्म अध्यात्म तक ले जाने वाली सीढ़ी है। परन्तु दोनों में दिन रात का अन्तर है। धर्म सामाजिक जीवन जीने की एक व्यवस्थित पद्धति है, जिसमें सामाजिक तानेबाने के अनुसार हर धार्मिक समाज का अपना वैचारिक संविधान बनाया गया होता है और उस समाज विशेष के लोग उसी संविधान के तहत जीवन व्यतीत करते हैं। इधर अध्यात्म आत्मा और परमात्मा के महा मिलन का एक श्रद्धा, विश्वास, भावपूर्ण ज्ञान और विवेक का रास्ता है। इसलिए इन दोनों को एक मानना हमारी भूल है। धर्म में वाद – विवाद जरूरी है और अध्यात्म निर्विवाद होता है। अध्यात्म में विवाद के लिए नहीं समर्पण के लिए स्थान है। परन्तु इस स्थिति तक कोई भी व्यक्ति या साधक धर्म के मार्ग में ठोकरें खा – खा कर ही पहुंचता है, एकदम से नहीं। ये दिनों एक दूसरे से सह सम्बद्ध जरूर हैं पर एक नहीं है। इसलिए यदि आप अध्यात्म के चर्म को पाना चाहते हैं तो अपने – अपने धर्म में संगठित और सुरक्षित रहिए। जो धर्म की रक्षा करेगा, धर्म उसकी रक्षा करता है – यही मूल मंत्र है। 

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह लेख धर्म की व्यापक अवधारणा को स्पष्ट करता है और विशेष रूप से हिंदू धर्म की सहिष्णु, लचीली और मानवतावादी प्रकृति पर प्रकाश डालता है। लेखक के अनुसार धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें मान्यताएँ, संस्कार, रीति-रिवाज, धर्मग्रंथ और सामाजिक आचार सम्मिलित होते हैं। विश्व में अनेक धर्म हैं, पर उनके स्वरूप, नियम और दृष्टिकोण एक-दूसरे से भिन्न हैं।

    लेख में यह प्रतिपादित किया गया है कि हिंदू धर्म अन्य कई धर्मों की तरह न तो कट्टरता, न जबरन धर्मांतरण और न ही आर्थिक या वैचारिक दबाव का समर्थन करता है। यह एक खुला और स्वैच्छिक मार्ग है, जिसे कोई भी व्यक्ति अपने आचार, विचार और व्यवहार से प्रभावित होकर अपना सकता है। हिंदू धर्म की विशेषता उसकी लचीलापन, सर्वेश्वरवाद, बहुदेववाद और विविधता में एकता की भावना है।

    हिंदू धर्म में धर्मग्रंथों की स्वतंत्र व्याख्या, संवाद और समयानुसार सकारात्मक सुधार की परंपरा रही है। इसी कारण सती प्रथा, बाल विवाह, नर बलि जैसी कुरीतियाँ समय के साथ समाप्त हुईं। लेख में “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सिद्धांतों को हिंदू धर्म की वैश्विक और सर्वमंगल दृष्टि का प्रतीक बताया गया है।

    लेख भारत की धार्मिक सहिष्णुता का उदाहरण देते हुए बताता है कि यहाँ विभिन्न धर्मों को समान स्वतंत्रता मिली है, जबकि कई अन्य देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंताजनक है। साथ ही, लेखक जबरन, प्रलोभन या छल से होने वाले धर्मांतरण का विरोध करता है और संविधान में धार्मिक समानता से जुड़े कुछ प्रावधानों की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता बताता है।

    अंत में धर्म और अध्यात्म के अंतर को स्पष्ट किया गया है—धर्म सामाजिक जीवन की व्यवस्था है, जबकि अध्यात्म आत्मा-परमात्मा के मिलन का मार्ग। धर्म अध्यात्म तक पहुँचने की सीढ़ी है, पर दोनों एक नहीं हैं। लेख का निष्कर्ष है कि अपने धर्म में संगठित और जागरूक रहकर ही व्यक्ति अध्यात्म के शिखर तक पहुँच सकता है।

—————

यह Article (अपना धर्म सबसे उत्तम।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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