• Skip to main content
  • Skip to primary sidebar
  • Skip to footer
  • HOME
  • ABOUT
    • Authors Intro
  • QUOTES
  • POETRY
    • ग़ज़ल व शायरी
  • STORIES
  • निबंध व जीवनी
  • Health Tips
  • CAREER DEVELOPMENT
  • EXAM TIPS
  • योग व ध्यान
  • Privacy Policy
  • CONTACT US
  • Disclaimer

KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

Check out Namecheap’s best Promotions!

You are here: Home / Archives for hemraj thakur articles

hemraj thakur articles

अपना धर्म सबसे उत्तम।

Kmsraj51 की कलम से…..

Apna Dharm Sabse Uttam | अपना धर्म सबसे उत्तम।

“जिस राष्ट्र को अपनी संस्कृति पर गर्व नहीं,
                                        वह राष्ट्र दीर्घकाल तक जीवित नहीं रह सकता।”  :- 
स्वामी विवेकानंद 

धर्म किसी पूजा पद्धति का नाम नहीं, बल्कि धर्म जीवन जीने का एक समग्र सामाजिक तरीका है। दुनियां में लगभग 1100 के करीब धर्म हैं; उन सबके अपने – अपने जीवन जीने के तौर तरीके हैं। उनकी :-
____________________

1) धार्मिक मान्यताएं और विश्वास।

2) पूजा पद्धतियां।

3) दैविक विधान और मान्यताएं।

4) धर्म ग्रन्थ और शास्त्र।

5) जन्म संस्कार।

6) विवाह पद्धतियां और रीति रिवाज।

7) मृत्यु संस्कार इत्यादि बहुत कुछ अलग अलग हैं।

इन धर्मों में कहीं धार्मिक कट्टरता है, तो कहीं एकेश्वरवाद। कहीं अपने धर्म को न मानने वालों को जिहाद का शिकार बनाने की प्रवृति है, तो कहीं मिशनरी प्रचारकों के माध्यम से आर्थिक प्रलोभन में धर्मांतरण करवा कर अपने धर्म का विस्तार करने की प्रबल ईच्छा। लेकिन हिन्दू धर्म ही दुनियां का एक मात्र ऐसा धर्म है, जिसमें न धार्मिक प्रचार और विस्तार के लिए आर्थिक प्रलोभन दिया जाता है और न ही तो कोई जिहाद ही की जाती है। यह एक खुला आवाह्न है और खुला प्रचार है। इस धर्म में किसी के साथ धर्म परिवर्तन के लिए कोई जोर जबरदस्ती, प्रलोभनात्मकता या चालाकी नहीं की जाती। जिसे यह धर्म आचारों से, विचारों से या व्यवहारों से अच्छा लगता है। वह इसे अपना सकता है। हिन्दू धर्म दुनियां का इकलौता देश है, जिसमें :- 
___
1) धार्मिक कट्टरता नहीं बल्कि लचीलता है। जो किसी भी धर्म की अच्छाइयों को सदियों से खुद में समाहित करता आया है और बुराइयों का प्रतिकार करता आया है। अन्य धर्मों में अपने धर्म की मान्यताओं को हर हाल में स्वीकारना जरूरी है। अन्यथा धर्म विरोधी कहलायेंगे।
2) एकेश्वरवाद नहीं बल्कि सर्वेश्वरवाद है। जिसमें ईश्वर तत्व को अपने – अपने तरीके, मान्यताओं, पूजा पद्धतियां तथा सामाजिक व्यवहारों द्वारा खोजने की खुली छूट है। किसी पर कोई पाबंदी नहीं। इसका साफ-साफ उदाहरण बहुदेववाद है। हिन्दू धर्म के वृहद समाज में हर उप समाज का अपना – अपना देवी – देवता अलग है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज के प्रतिष्ठित देवता और भगवती – भगवान या ईश्वर को तो वे सभी हिन्दू फिर भी मानते हैं। वे चाहे किसी भी जाति वर्ग के हो या फिर किसी भी हिन्दू समाज विशेष के हो। यानी यहां हर व्यक्ति को ईश्वर को खोजने और पूजने की खुली छूट है। अनेक विकल्प हैं, अनेक देवता हैं और अनेक पूजा पद्धतियां हैं पर अंततोगत्वा सभी की सार्वभौमिक मान्यता परमेश्वर पर व्यवस्थित है। विश्व के अन्य धर्मों में ऐसा नहीं है। वहां एकेश्वरवाद है। कहीं एक गॉड को माना जाता तो कहीं एक अल्लाह या खुदा को। यही वैविध्य में एकत्व की भावना ही तो हिन्दू धर्म की खूबसूरती है।
3) धर्म ग्रंथों या शास्त्रों पर मौलिक चर्चा और नवीन व्याख्या करने की खुली छूट है हिन्दू धर्म में। जबकि अन्य धर्मों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। दुनियां के किसी भी धर्म में यह व्यवस्था नहीं शायद कि कोई उनके मूल धर्म ग्रंथों की नए सिरे से व्याख्या कर सके। जो करेगा, वह नापेगा। जो धार्मिक कट्टरता का प्रतीक है। हिन्दू धर्म धार्मिक कट्टरता के पक्ष में ही नहीं है। हां इतना जरूरत है कि जो हमारे धर्म को छेड़ेगा, उसे धार्मिक तरीके से जबाव हमारा धर्म भी देता है। बाईबल और कुरान आदि पर स्वतंत्र व्याख्या इन धर्मों की मान्यता से हट कर कर पाना सम्भव नहीं है शायद। जबकि श्रीमद्भागवत गीता, वेद, पुराण षट् शास्त्रों पर कोई भी स्वतंत्र व्याख्याएं करते आए हैं और कर रहे हैं तथा करते चले जाएंगे। यह हिन्दू धर्म के खुलेपन और स्वतन्त्र विचार का प्रतीक है। यानी यहां धर्म में सकारात्मक बदलाव भी वक्त के साथ स्वीकार्य है और दूसरे धर्मों में इस रीति का अभाव है। यहां सती प्रथा थी। विरोध हुआ तो बन्द हो गई। यहां बाल विवाह होते थे। विरोध हुआ तो बन्द हो गए। यहां नर बलि की प्रथा थी। विरोध हुआ तो बन्द की गई। यहां विधवा विवाह वर्जित था। कालान्तर में वह भी अवधारणा टूटी। गलत का विरोध जायज था और उसे बन्द करना अति जायज था। यह प्रतीक है हिन्दू धर्म के खुलेपन का। जबकि दूसरे धर्मों में कुछ सामाजिक कुरीतियों को आज भी ढोया जा रहा है। हिजाब और तीन तलाक जैसी कुरीतियों को अब आधुनिक समाज में मुस्लिम भाई बहनों को भी समाप्त कर देना चाहिए। परन्तु वे आज भी बने हुए हैं। यह किसी धर्म का विरोध नहीं बल्कि हिन्दू धर्म का तुलनात्मक अध्ययन है।
4) वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वेभवन्तु सुखिन, सर्वसन्तु निरामया, की सर्वमंगल भावना दुनियां के एक मात्र धर्म – हिन्दू धर्म में है। जो सभी प्राणियों को एकोब्रह्म की भावना से देखता है और सभी धर्मों को सम्मान देता है। दुनियां के अन्य धर्म तो सिर्फ अपने आप को ही श्रेष्ठ मानते हैं और उन्हें न मानने वालों को विधर्मी मानते हैं। यह बड़प्पन है हिन्दू धर्म में।
                 इतना ही नहीं दुनियां का बहुत पुराना धर्म पारसी धर्म भी इसी भारत भूमि की हिन्दू धर्म की सहिष्णुता के कारण आज यहीं भारत में कुछ अंशों में बचा है। वरना तो आज वह अपने ही देश में लुप्त प्राय हो गया है, जिस देश में वह कभी जन्मा था। भारत ने हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारस इत्यादि धर्मों को अपने हिन्दू धर्म प्रधान होने के बाद भी बराबर संजो कर रखा है। यहां ईसाइयों की चंगाई सभाएं खुलेआम होती है और गिरिजा घरों में कन्फेशन आज भी होता है। यहां मस्जिदों में अज़ान आज भी लगती है और नमाज खुलेआम पढ़ी जाती है। खैर बौद्ध, सिख तथा जैन धर्म तो हिंदू धर्म से ही प्रस्फुटित धर्म है। वे तो अपना – अपना धार्मिक प्रचार खुले आम करते ही हैं। कानून के दायरे में भारत में सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने – अपने धार्मिक स्थल बनाने की खुली छूट है।
                      परन्तु सवाल यह है कि क्या दुनियां के अन्य देशों में भी यह धार्मिक सहिष्णुता जिन्दा है? गांधार में दुनियां का सबसे बड़ा शिव मन्दिर था। आज उसकी स्थिति पता करो। पाकिस्तान में दुनियां का सबसे बड़ा विष्णु मन्दिर था। आज उसकी स्थिति पता करो। पंजाब जो भारत की आजादी से पहले का था। आजादी के बाद दो भागों में बंट गया। पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब। पश्चिमी पंजाब जो आज भारत का हिस्सा नहीं है। वहां हिन्दुओं की स्थिति का पता करो। पाकिस्तान भारत से 1947 में अलग ही धार्मिक आधार पर हुआ था। जिसमें मुस्लिम भाइयों ने दलील दी थी कि हम पाक यानी पवित्र है और ये हिन्दू या हिन्दू धर्म से उद्भूत अन्य धर्म के लोग नापाक यानी अपवित्र हैं। इसलिए हम इन अपवित्र लोगों के साथ नहीं रह सकते। हमें अलग देश चाहिए। बाबा साहेब अम्बेडकर जी लिखते हैं कि मैं इस विभाजन को तब सही मानूंगा जब पूरे के पूरे मुस्लिम भाई पाकिस्तान चले जाएं और पूरे के पूरे हिन्दू धर्म के मतावलंबी भारत में रहें। परन्तु ऐसा भी कुछ नहीं हुआ। कई मुस्लिम भाई बहने भारत में ही रहे और कई हिन्दू – सिख आदि पाकिस्तान में ही रहे। आज भारत में तो धर्म निरपेक्षता के चलते और धार्मिक सहिष्णुता के चलते मुस्लिम भाई बहनों को पूरी सुरक्षा है। उधर पाकिस्तान और बंगला देश में हमारे हिन्दू और सिख आदि भाई बहनों की संख्या दिन प्रति दिन घटती जा रही है। आखिर क्यों? क्या यह स्वतः सिद्ध नहीं करता कि हिन्दू धर्म विश्व का सबसे मानवतावादी धर्म है। हां हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा जहर आज जातिवाद ने घोल कर रखा है। जिस दिन हमारे हिन्दू धर्म से यह जातिवाद का जहर उतर जाएगा, उस दिन भारत फिर से सोने की चिड़िया ही कहलाएगा। हिंदुओं को भारत में अन्य धर्मों के लोगों के रहने से भी कोई आपत्ति नहीं है। बल्कि हिंदुस्तान तो एक धार्मिक संग्रहालय है। शर्त यह है कि कोई हमारे धर्म के लोगों को जबरन, पैसों का प्रलोभन दे कर, लब जेहाद कर के या धार्मिक कट्टरपंथी जेहाद कर के अपने धर्म में मिलाकर उनका धार्मिक परिवर्तन न करें। यह बहुत ही गलत है। भारतीय संविधान के आर्टिकल 25 में हमें धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार मिला है। उसके तहत आप अपने धर्म का प्रचार करें और हम हिन्दू धर्म का प्रचार करेंगे। फिर जिसे जो अच्छा लगता है वह उसे सहज प्रक्रिया से अपनाएं। उसमें न हमें समस्या है और न तुम्हे। जबरदस्ती, प्रलोभनात्मकता तथा चालाकी किसी भी सूरत में मंजूर नहीं है। एक विडम्बना भारतीय संविधान की यह भी है कि आर्टिकल 30 में अल्पसंख्यकों को तो अपने अपने धर्म की शिक्षा देने का अधिकार उनके अपने स्कूलों कॉलेजों में दिया गया है और उसी संविधान के अनुच्छेद 30(A) में हिन्दू धर्म के लोग न अपने स्कूलों कॉलेजों में हिन्दू धर्म की शिक्षा दे सकते हैं और न सरकारी स्कूलों में। यह दोहरा रवैया भी धर्म निरपेक्षता के सिद्धान्त को कहीं न कहीं आहत करता है। इसलिए इस सन्दर्भ में भी भारत सरकार को संवैधानिक उपचारों के अधिकार के तहत इन दो कानूनों – 30 और 30(A) को पुनः धर्म निरपेक्षता के आधार पर निर्धारित करना चाहिए। एक देश, एक संविधान होने के बावजूद भी दोहरे कानून ठीक नहीं हैं। 
                     बहुत से लोग धर्म और अध्यात्म को एक ही मानते हैं। जबकि ये दो अलग – अलग पहलू हैं। यह जरूर है कि धर्म अध्यात्म तक ले जाने वाली सीढ़ी है। परन्तु दोनों में दिन रात का अन्तर है। धर्म सामाजिक जीवन जीने की एक व्यवस्थित पद्धति है, जिसमें सामाजिक तानेबाने के अनुसार हर धार्मिक समाज का अपना वैचारिक संविधान बनाया गया होता है और उस समाज विशेष के लोग उसी संविधान के तहत जीवन व्यतीत करते हैं। इधर अध्यात्म आत्मा और परमात्मा के महा मिलन का एक श्रद्धा, विश्वास, भावपूर्ण ज्ञान और विवेक का रास्ता है। इसलिए इन दोनों को एक मानना हमारी भूल है। धर्म में वाद – विवाद जरूरी है और अध्यात्म निर्विवाद होता है। अध्यात्म में विवाद के लिए नहीं समर्पण के लिए स्थान है। परन्तु इस स्थिति तक कोई भी व्यक्ति या साधक धर्म के मार्ग में ठोकरें खा – खा कर ही पहुंचता है, एकदम से नहीं। ये दिनों एक दूसरे से सह सम्बद्ध जरूर हैं पर एक नहीं है। इसलिए यदि आप अध्यात्म के चर्म को पाना चाहते हैं तो अपने – अपने धर्म में संगठित और सुरक्षित रहिए। जो धर्म की रक्षा करेगा, धर्म उसकी रक्षा करता है – यही मूल मंत्र है। 

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह लेख धर्म की व्यापक अवधारणा को स्पष्ट करता है और विशेष रूप से हिंदू धर्म की सहिष्णु, लचीली और मानवतावादी प्रकृति पर प्रकाश डालता है। लेखक के अनुसार धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें मान्यताएँ, संस्कार, रीति-रिवाज, धर्मग्रंथ और सामाजिक आचार सम्मिलित होते हैं। विश्व में अनेक धर्म हैं, पर उनके स्वरूप, नियम और दृष्टिकोण एक-दूसरे से भिन्न हैं।

    लेख में यह प्रतिपादित किया गया है कि हिंदू धर्म अन्य कई धर्मों की तरह न तो कट्टरता, न जबरन धर्मांतरण और न ही आर्थिक या वैचारिक दबाव का समर्थन करता है। यह एक खुला और स्वैच्छिक मार्ग है, जिसे कोई भी व्यक्ति अपने आचार, विचार और व्यवहार से प्रभावित होकर अपना सकता है। हिंदू धर्म की विशेषता उसकी लचीलापन, सर्वेश्वरवाद, बहुदेववाद और विविधता में एकता की भावना है।

    हिंदू धर्म में धर्मग्रंथों की स्वतंत्र व्याख्या, संवाद और समयानुसार सकारात्मक सुधार की परंपरा रही है। इसी कारण सती प्रथा, बाल विवाह, नर बलि जैसी कुरीतियाँ समय के साथ समाप्त हुईं। लेख में “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सिद्धांतों को हिंदू धर्म की वैश्विक और सर्वमंगल दृष्टि का प्रतीक बताया गया है।

    लेख भारत की धार्मिक सहिष्णुता का उदाहरण देते हुए बताता है कि यहाँ विभिन्न धर्मों को समान स्वतंत्रता मिली है, जबकि कई अन्य देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंताजनक है। साथ ही, लेखक जबरन, प्रलोभन या छल से होने वाले धर्मांतरण का विरोध करता है और संविधान में धार्मिक समानता से जुड़े कुछ प्रावधानों की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता बताता है।

    अंत में धर्म और अध्यात्म के अंतर को स्पष्ट किया गया है—धर्म सामाजिक जीवन की व्यवस्था है, जबकि अध्यात्म आत्मा-परमात्मा के मिलन का मार्ग। धर्म अध्यात्म तक पहुँचने की सीढ़ी है, पर दोनों एक नहीं हैं। लेख का निष्कर्ष है कि अपने धर्म में संगठित और जागरूक रहकर ही व्यक्ति अध्यात्म के शिखर तक पहुँच सकता है।

—————

यह Article (अपना धर्म सबसे उत्तम।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2025 - KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur articles, Hindu Dharma, Shanathan Dharma, अपना धर्म सबसे उत्तम, जातिवाद, धर्म और अध्यात्म, धर्म की परिभाषा, धर्मग्रंथों की व्याख्या, धर्मांतरण, धार्मिक लचीलापन, धार्मिक समन्वय, धार्मिक सहिष्णुता, धार्मिक स्वतंत्रता, बहुदेववाद, भारतीय संविधान अनुच्छेद 25, भारतीय संस्कृति, मानवतावादी धर्म, वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वेश्वरवाद, सामाजिक सुधार, हिंदू धर्म, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Difference between Tantra, Mantra and Tatva Gyan | तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।

एक अध्यात्मिक विश्लेषण 

बहुतायत लोगों की यह धारणा होती है कि तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान — ये तीनों एक ही विषय के अलग- अलग नाम हैं पर विषय एक ही है। किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। अध्यात्म-विज्ञान की दृष्टि से देखें तो ये तीनों अलग-अलग पड़ाव हैं। प्रत्येक का अपना क्षेत्र, उद्देश्य और लक्ष्य है। इन्हें क्रमवार समझना आवश्यक है :-

1. तंत्र विज्ञान — भौतिकता का कौशल

तंत्र प्राचीन भारत की भौतिक सामग्रियों के संतुलित संयोजन का विज्ञान था। यह शरीर, औषधि, धातु, रस, दिशा और समय जैसे भौतिक तत्त्वों के प्रयोग से चमत्कार उत्पन्न करने की कला थी।
तंत्र को समझने के लिए कठोर अभ्यास की आवश्यकता होती थी, जिसे आज के युग में “ट्रेनिंग” कहा जाता है। आधुनिक विज्ञान के विकास के साथ-साथ तंत्र अब भौतिक, रासायनिक और जैव विज्ञान का अंग बन चुका है।
तंत्र वस्तुतः बौद्धिक विलास का विज्ञान था — आज यह सार्वजनिक हो चुका है और आधुनिक प्रयोगशालाओं में इसके सिद्धांत विज्ञान के रूप में आत्मसात हो चुके हैं।

2. मंत्र विज्ञान — मानसिक साधना का विज्ञान

मंत्र विद्या वस्तुतः बौद्धिक विलास का विज्ञान है । यह तंत्र से एक कदम आगे की कड़ी थी। इसमें शब्द-साधना और ध्वनि-ऊर्जा के माध्यम से मानसिक जगत को साधा जाता था।
मंत्रों से प्रत्यक्ष भौतिक चमत्कार नहीं होते थे, किंतु सूक्ष्म शरीर शक्तिशाली बनता था।
तंत्र जहाँ भौतिक शरीर को सशक्त करता था, वहीं मंत्र विज्ञान मन और चेतना को सशक्त करता था।

मंत्र-साधना से साधक को मानसिक सिद्धि और वाक्-सिद्धि प्राप्त होती थी —

  • मानसिक सिद्धि से वह दूसरों के मन के भाव पढ़ सकता था।
  • वाक्-सिद्धि से उसके शब्द वरदान या शाप का प्रभाव धारण करते थे।

आज का मनोविज्ञान इसी विद्या के कुछ अंशों को आधुनिक रूप में समझाने का प्रयास करता है। परंतु इस विद्या का मूल तर्क से नहीं,  कल्पना शक्ति से संचालित होता है, और यही कारण है कि आधुनिक तर्कशील समाज में यह विद्या लुप्तप्राय हो गई है। जो मंत्र विज्ञान आज प्रयोग होता भी है,  वह एक तो बहुत कम होता है और फिर वह सिद्ध पुरुषों के अभाव में प्रयोग होता है,जिससे समाज को भ्रम में तो डाला जा रहा है पर राहत नहीं पहुंच रही है। मंत्र विज्ञान मन की ताकत को बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम था और है। पर शर्त यह है कि इसकी भी सिद्धि शास्त्र में बताए अनुसार किसी सिद्ध के सानिध्यम में कर लेनी होती है। मात्र किताबों से पढ़ने से कोई खास प्रभाव मंत्र विज्ञान का नहीं होता है। मंत्रों की यूं तो आज भरमार है। परन्तु मंत्र विद्या लगभग लुप्तप्राय हो गई है।

3. तत्व ज्ञान — आत्मा और परमात्मा का संयोग है

तत्व ज्ञान इन दोनों से बिल्कुल भिन्न है। यह न तो तंत्र की भौतिकता से जुड़ा है, न मंत्र की मानसिकता से।
यह ज्ञान आत्मा के उस मूल स्रोत की खोज है, जिससे समस्त ऊर्जा प्रवाहित होती है —
वह कहाँ से आती है, कहाँ जाती है, और कौन-सा तत्व उसे संचालित करता है? इन सब घटनाओं का विधिवत ज्ञान ही तत्व ज्ञान है।

तत्व ज्ञान किसी चमत्कार या देव-सिद्धि का विज्ञान नहीं है।
यह आत्मिक अनुभूति का मार्ग है — आत्मा और परमात्मा के मिलन की यात्रा।
जो व्यक्ति इस ज्ञान को जानकर व्याख्या सहित लोक में प्रकट कर सके, वही तत्वज्ञानी कहलाता है।

गीता और संत-मत दोनों ही कहते हैं —

“जिसे आत्मा और परमात्मा का वास्तविक ज्ञान हो वही ज्ञानी है, शेष सब ज्ञापक मात्र हैं।”

इस ज्ञान की प्राप्ति सद्गुरु की कृपा से ही संभव है —
चाहे वह दर्शन कृपा हो,  स्पर्श-कृपा हो, दृष्टि-कृपा हो या शब्द-कृपा हो। परन्तु कृपा सदगुरु से ही इनमें से किसी एक माध्यम से या सभी माध्यमों से व्यक्ति को प्राप्त होती है।
यह ज्ञान गुरु-मुख से प्राप्त होता है; इसे केवल पढ़ने, जपने या तर्क से नहीं पाया जा सकता।

यह गूढ़, गोपनीय और रूहानी साधना है — जो मन से प्रारंभ होकर आत्मा में विलीन होती है।
यहीं से आत्मा का परमात्मा से समीप्य आरंभ होता है।
भौतिकता से मोह छूटता है, दिखावा समाप्त होता है और मन शांति को प्राप्त होता है।आत्मा प्रफुल्लित होती है। यह असल में आत्म विलास का विषय है।

4. उदाहरण — सिद्धि बनाम मुक्ति

मंत्र और तंत्र से सिद्धियां मिल सकती हैं — आठ सिद्धि, नौ निधि, 24 प्रकार की शक्तियाँ — पर वे मुक्ति नहीं देतीं।
कुन्ती के पास मंत्र-सिद्धि थी, पर क्या वह दुख-मुक्त हुईं? नहीं न।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के गुरु तोतापुरी के ज्ञान बारे सब जानते हैं कि उन्होंने स्वामी जी को क्या ज्ञान दिया था? स्वामी जी मां काली को सिद्ध भी कर चुके थे। परन्तु फिर भी स्वामी जी को अपनी तत्व-साधना से देवी-सिद्धि के बंधन को तोड़ना पड़ा था।

भगवान राम और कृष्ण तक सांसारिक पीड़ा से मुक्त नहीं रहे।
अतः सिद्धि मुक्ति का मार्ग नहीं है — केवल तत्व-ज्ञान ही परम मुक्ति का द्वार है।

5. निष्कर्ष — सत्य की ओर मार्ग

आज के युग में तंत्र और मंत्र के साधक तो मिल जाएंगे, पर तत्वज्ञानी दुर्लभ हैं।
जो सत्य की खोज करना चाहता है, उसे चमत्कारों से नहीं, सद्गुरु की शरण से आरंभ करना होगा।
तभी वह उस आनंद-भाव को प्राप्त करेगा जिसके लिए सूरदास ने कहा था —

“यह गूंगे के गुड़ समान है — स्वाद तो है, पर कहा नहीं जा सकता।”

तत्व-ज्ञान की वही स्थिति है — जो समुद्री जहाज के ऊपर बैठे पंछी की होती है। वह पंछी विशाल सागर में दसों दिशाओं में जी भर कर उड़ लेता है पर अंततः जब उसे थकान महसूस होती है तो,उसे विश्राम करने के लिए कोई सहारा या आधार न मिलने के कारण; वह पुनः उसी जहाज पर लौट कर आता है। ऐसी ही सच्चे तत्व ज्ञान की प्राप्ति की लालसा वाले साधक की स्थिति अंततः होती है ।
जहाँ साधक का मन हर दिशा में भटकने के बाद उसी “जहाज” में लौट आता है, जो उसका सच्चा आश्रय है — परमात्मा।

तंत्र शरीर का, मंत्र मन का, और तत्व ज्ञान आत्मा का विज्ञान है।
सिद्धियाँ तंत्र और मंत्र से मिल सकती हैं, पर सच्ची मुक्ति केवल तत्व ज्ञान से ही संभव है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान—ये तीनों शब्द अक्सर एक ही अर्थ में उपयोग किए जाते हैं, परंतु वास्तव में ये अध्यात्म के तीन अलग-अलग चरण हैं। इनका क्षेत्र, उद्देश्य और साधना-मार्ग भिन्न है।

    तंत्र विज्ञान भौतिक जगत से जुड़ा हुआ है। यह शरीर, औषधि, धातु, दिशा, समय और अन्य तत्वों के संयोजन का विज्ञान है। प्राचीन काल में इसे भौतिक चमत्कारों का स्रोत माना जाता था। तंत्र साधक अपने अभ्यास से शरीर और पदार्थों की शक्तियों को नियंत्रित करता था। आज के समय में इसका वैज्ञानिक रूप भौतिक, रासायनिक और जैविक विज्ञान के रूप में विकसित हो चुका है।

    मंत्र विज्ञान मानसिक शक्ति का विज्ञान है। इसमें ध्वनि, शब्द और उच्चारण के माध्यम से मन तथा चेतना को नियंत्रित किया जाता है। मंत्र-साधना से साधक को मानसिक सिद्धि (दूसरों के विचारों को जानने की शक्ति) और वाक्-सिद्धि (शब्दों से प्रभाव डालने की शक्ति) प्राप्त होती है। तंत्र जहाँ शरीर को सशक्त करता है, वहीं मंत्र मन को। किंतु यह विद्या आज लुप्तप्राय है क्योंकि इसे गुरु के सानिध्य में ही साधा जा सकता है, मात्र पुस्तकीय ज्ञान से नहीं।

    तत्व ज्ञान इन दोनों से कहीं ऊँचा है। यह आत्मा और परमात्मा के मिलन की साधना है। इसमें कोई चमत्कार नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभूति और मुक्ति का मार्ग है। तत्वज्ञानी वह होता है जो आत्मा के मूल स्रोत को पहचान लेता है। यह ज्ञान गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है—तर्क या अध्ययन से नहीं।

    तंत्र और मंत्र साधक को सिद्धियाँ तो दे सकते हैं, परंतु सच्ची मुक्ति केवल तत्व ज्ञान से ही मिलती है। यही वह मार्ग है जो मनुष्य को भौतिक और मानसिक बंधनों से मुक्त कर सच्चे आनंद, शांति और परमात्मा से एकत्व की अनुभूति कराता है। यही अध्यात्म का परम लक्ष्य है।

—————

यह Article (तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2025 - KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur articles, तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

कैसे संभव है देश का विकास?

Kmsraj51 की कलम से…..

Kaise Sambhav Hai Desh Ka Vikas | कैसे संभव है देश का विकास?

⇒ चिन्तित और उद्विग्न मानस ने…

सामाजिक विषमताओं और विकृतियों को लेकर चिन्तित और उद्विग्न मानस ने जब मुझे रात्रि के तीसरे पहर कचोटा तो मुझसे रहा नहीं गया। एकाएक आंखें खुली और मैं जाग उठा। बुद्धि के दर्पण में मानस की विकल शक्ल को झांका तो एक अजीब सी छटपटाहट और बेचैनी सी देखी। अंतःकरण में अनायास ही कई सारे प्रश्न एक साथ आसमानी बिजली की तरह कौंधे, जिन्हे व्यवस्थित करना मेरे लिए किसी जंग जीतने से कम नहीं था। फिर भी बिस्तर पर लेटे – लेटे हर एक उमड़ते हुए विचार से मानसिक युद्ध करता रहा और जैसा भी हुआ वैसा व्यवस्थापन अपने विचारों का करता रहा। अब इस मानसिक युद्ध में कौन जीता? मैं या मेरे अन्दर उमड़ी बदलते समाज की मान्यताएं? मेरे लिए कहना बहुत ही मुश्किल है पर जैसा भी हुआ, वह तुरन्त एक लेख लिख कर अपने आंतरिक द्वंद्व से मुक्ति पाने के लिए प्रयास करना ही मेरे पास एकमात्र उपाय था।

⇒ शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए … ‘या’ … आज की शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन…

प्रश्न समाज के बदलते विचारों और नवीन भावबोधों को लेकर खड़े हुए थे और खत्म एक लेख का रूप ले कर हुए। अचानक रात्रि के तृतीय पहर में निद्रा में विचार कौंधा कि आज समाज क्यों इतना खुदगर्ज और असंस्कृत होता जा रहा है? एक शिक्षक हूं तो जाहिर सी बात है कि पहले पहल तो सोच शिक्षा और शिक्षक के इर्द गिर्द ही इस मामले को ले कर दौड़ेगी। इसी दिशा में पहला विचार आया कि हमारे यहां तो शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए दी जाती थी और आज शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन बनती जा रही है। कहीं यह तो सामाजिक मान्यताओं के विकृतिकरण का कारण नहीं है?

⇒ आज स्कूलों – कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में…

आज स्कूलों कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में आ गए हैं, जो पुस्तकों को पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। जो थोड़े बहुत पढ़ते भी हैं, वे भी मात्र परीक्षा पास करने के लिए और अच्छे अंक लेने के लिए या फिर सरकारी नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं।

बाकी पुस्तकों को विद्या अध्ययन के लिए पढ़ने का चलन आज पूर्ण रूप से खत्म ही हो गया है। खैर विद्यार्थियों की छोड़िए। वे तो नादान होते हैं। उन्हें तो अभी शिक्षा, विद्या, अविद्या, पारा विद्या, महा विद्या और साक्षरता आदि शब्दों का शब्दार्थ भी ठीक से ज्ञात नहीं है शायद। पर बड़े – बड़े स्कूलों और कॉलेजों में तैनात अध्यापकों और प्रवक्ताओं तथा प्राध्यापकों का भी इस सन्दर्भ में मिजाज कुछ अच्छा नहीं है। इनमें से अधिकांश कभी कृपटो करेंसी तो कभी ऑन लाइन आई पी एल मैच में अपनी टीम लगा कर पैसों के पीछे स्कूलों – कालेजों के कर्तव्य काल में भी भागे हैं तो बाकी शेष बचे सुबह – शाम के समय में अपनी मस्ती में आमादा है।

अब बताइए कि वह भी पुस्तकालयों की बड़ी – बड़ी अलमारियों में पड़ी और धूल फांक रही अच्छे से अच्छी पुस्तकों को कब पढ़ेगा? जिनमें सामाजिक व्यवस्थापन के अनेकानेक मानवीय पहलू लिखे पड़े हैं। उनमें लिखा पड़ा है मानवीय मूल्यों का विवरण, जो मानव को पशु पक्षी – जगत से अलग प्राणी बने रहने की सीख देता है। उनमें लिखा पड़ा है हर विषय का बारीक से बारीक ज्ञान, जो हर अध्यापक को उसके अध्यापन के लिए और मजबूत और तर्कसंगत करता है। पर नहीं, आज के अध्यापकों और छात्रों ने कसम खा रखी है कि पुस्तकालय का दरवाजा तक नहीं देखेंगे। उन्होंने बुद्धि के विलास के लिए गूगल को गुरु जरूर बनाया है पर बुद्धि के विकास के सारे दरवाजे बन्द करने पर तुले हैं। हम सब जानते हैं कि इंटरनेट में आजकल क्या – क्या चलता है और उसके परिणाम क्या हो रहे हैं? बच्चे भी सच्चे हैं।

⇒ गुड में जहर से कम नहीं …

जब गुरु जी हर बात गूगल से देखते हैं तो बच्चे क्यों न देखें? बच्चे तो अध्यापकों को ही अपना आदर्श मानते हैं। और तो और परीक्षा तथा परिणाम के समय में देखे तो ये गुरु चेले अब्बल करते हुए पाए जाते हैं। सौ में से नब्बे किसी के छियानवे फ़ीसदी अंक आते हैं। पूछे तो ज्ञान धेला भी नहीं। गुरु जी को रिजल्ट देना होता है। वह ऑप्शनल प्रश्न गूगल से देख कर परीक्षा में बच्चों को करवा देता है और बच्चे बिन पढ़े ही गुरु जी की कृपा से अच्छे अंकों से पास हो जाते हैं। वे भी गुरु जी के कायल हो जाते हैं। वाह! क्या अच्छे गुरु जी या मैडम जी है हमारे?

बेचारे नादान ये नहीं समझते हैं कि यह सब गुड में जहर से कम नहीं है। गुरु जी काम चोरी के चलते या रिजल्ट देने के चलते और छात्र अच्छे अंक प्राप्त करने के चलते साल के अन्त में इन्ही हथकंडों को अपनाते हैं। अपनाए भी कैसे न? जब साल भर दोनों ने मस्ती ही मारी है और बौद्धिक विलास ही किया है तो फिर समाज में दोनों को अच्छा भी तो अपने को दिखाना है।

अच्छे अंक जब आते हैं तो मां – बाप भी बच्चे से खुश हो जाते हैं तथा गुरु जी के भी कायल हो जाते हैं। वाह! क्या कमाल का पढ़ाते हैं गुरु जी? मेरे बच्चे ने सौ में से छियानवे फ़ीसदी अंक प्राप्त किए हैं। बच्चे की प्रशंसा करते – करते भी नहीं थकते। हमारा बेटा – बेटी भी तो पढ़ाई में तेज है जी। आधी – आधी रात तक नेट में तैयारी कर रहा होता है। अब वह क्या दिखता है ? इसका किसी को कोई खबर नहीं। बस इसी बिगाड़ के चलते बच्चों को और प्रोत्साहन मिलता है। वह अपनी एक दो जिद्दें मां – बाप से और पूरी करवाता है।

फिर एक दिन जब वह बच्चा स्कूल – कालेजों से बाहर आता है तो वह संस्कार हीन और दिशाहीन हो कर समाज में आता है। यदि कहीं जुगाड़बाजी से वह सरकारी सेवा में फिट हो भी जाता है तो समझ लो कि वह किस स्तर की सरकारी सेवा देगा? अब जब प्राप्तांको के आधार पर ही सरकारी नौकरियां दी जाएगी तो नौकरी तो मिल ही जाएगी। फिर बोलो कि भ्रष्टाचार की जड़ कहां है? मैं इन्टरनेट का विरोधी नहीं हूं। विरोधी हूं उसके गलत इस्तेमाल का। यदि सच में शिक्षा के लिए अध्यापकों और बच्चों द्वारा उसका प्रयोग किया जाए तो वह शिक्षा की दशा और दिशा ही बदल देगा।

इधर सरकारें और सरकारों के नीतिकार हैं कि बच्चों को प्रताड़ित करने के अधिकार से अध्यापकों को वंचित करने पर तुले हैं। इससे जो थोड़े बहुत अध्यापक संस्कार और व्यवहार की शिक्षा के पक्षधर है भी, उनके हाथ – पांव भी बंधे पड़े हैं। वे भी देखा देखी में खुद को कुढ़ा हुआ महसूस करते हैं और व्यवस्था का हिस्सा बना लेते हैं। बस अब तो अध्यापक ने अपना मक़सद स्कूल जाना, हाजरी लगाना तथा अपने विषय का पीरियड लगाना ही तय किया है। खाली पीरियड में वह भी नेट में या तो गेम खेलता हुआ मिलेगा या फिर कुछ और देखता हुआ मस्त रहता है।

⇒ पुस्तकालयों का सदुपयोग नहीं हो रहा है…

पुस्तकालयों की स्थापना स्कूलों में यूं ही जाया जा रही है। न अध्यापक पढ़ता है और न छात्र। विषय विशेषज्ञ होने के बावजूद भी कई ऐसे मद होते हैं, जो पुस्तकों को पढ़ने और सामूहिक चर्चा – परिचर्चा से और स्पष्ट होते हैं। पर आज ऐसी बात करना ही मूर्खता की निशानी हो गई है। किताबे यदि पढ़ी जाती है तो मात्र नौकरी लगने के लिए।बस एक बार नौकरी मिल गई तो फिर तो हर व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। नौकरी सरकारी हो या निजी। हर व्यक्ति आज वेतन तो पूरा चाहता है पर काम करना ही नहीं चाहता है। इस नकारात्मकता का कारण आखिर क्या है?

तभी तो कहता हूं कि — “शिक्षा योग का विषय है भोग का नहीं।”
“शिक्षा बौद्धिक विकास का विषय है बौद्धिक विलास का नहीं।”
“शिक्षा आत्मरंजन का साधन है मनोरंजन का नहीं।”
“शिक्षा नैतिकता और चरित्र निर्माण का साधन है विकृतता का नहीं।”
“शिक्षा अनुशासन का विषय है शासन – प्रशासन का नहीं।”
यह बात समूचे विश्व को समझनी चाहिए।

मेरा मानना है कि स्कूल वह निर्माण संस्थान है, जहां भविष्य के समाज के निर्माण के लिए शिक्षार्थी रूपी सामग्री तैयार की जाती है। यदि उस सामग्री के निर्माण में ही गड़बड़ हो जाएगी, तो समाज रूपी इमारत की मजबूती का भी प्रश्न ही पैदा नहीं होता है। यानी सामग्री निर्माता गुरु का नैतिक और चारित्रिक रूप से उन्नत होना और अत्यधिक भौतिकता से दूर रहना जरूरी है।

⇒ शिक्षा व्यवस्था में संस्कार जरूरी है…

“शिक्षा व्यवस्था में संस्कार शिक्षा का जोड़ना जरूरी है। शिक्षकों को छात्रों को रोकने – टोकने के अधिकार देना जरूरी है। अभिभावकों को अंकों के आंकड़ों से बाहर ला कर विद्या और शिक्षा के साथ – साथ राष्ट्रीयता और सामाजिकता का बोध कराना जरूरी है।” “वरना भविष्य का समाज पशु समाज से भी भयानक होगा।” रिश्तों की अहमियत नहीं होगी। पिता – पुत्र में, मां – बेटी में, भाई – बहन में, पति -पत्नी में और पड़ोसी – पड़ोसी में आत्मीयता नहीं रहेगी। सभी अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए और अपनी भौतिक चाह को पूरा करने के लिए कभी भी कुछ भी करने को आमादा रहेगें। कोई मरने मारने से नहीं डरेगा।

इसलिए देश की शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने की आवश्यकता वर्तमान में बहुत ज्यादा हो गई है। इसके चलते सरकारों को भी स्कूलों कालेजों में राजनीति से नहीं बल्कि समाज नीति से मनोयोग पूर्ण तरीके से काम करना चाहिए। शिक्षा के स्तर को शिक्षक ही उन्नत करेगा। बस सरकारों को यह तय करना है कि शिक्षकों को बिना डराए धमकाए एक उचित व्यवस्था दे कर सामाजिक और राजनीतिक मान – सम्मान दे कर कैसे शिक्षा का उत्थान करने के लिए स्वतन्त्र दायित्व देना है?

प्रश्न यह भी है कि यह दायित्व नकारात्मक, आलसी और लोलुप लोगों के हाथों में भी नहीं जाना चाहिए। “अर्थात — शिक्षा धनार्जन का विषय न बने बल्कि ज्ञानार्जन और संस्कृति तथा सभ्यता की सम्बाहक बनकर सामने आए।” जिस व्यवस्था में रोजगार प्राप्ति की राह के साथ – साथ व्यक्ति विद्या तथा परा ज्ञान की प्राप्ति भी करे। ताकि कल जब वह विद्यार्थी समाज में जाएगा तो एक नेक और संस्कारवान व्यक्ति की भूमिका में जाए।

खैर मैं जानता हूं इस बात को कोई नहीं मानेगा। सभी यही कहेंगे कि हम अपना शत प्रतिशत देते हैं। जो शिक्षा व्यवस्था बनी है वह बिलकुल ठीक है। मुझे ही फटकारेंगे। पर अंदर से सभी यह जानते हैं कि असलियत क्या है? सरकारी नौकरी का वर्तमान में यह हाल हो गया है कि एक बार मिलनी चाहिए बस। फिर तो वह व्यक्ति काम करने को राजी नहीं है। निजी क्षेत्रों में भी डर के चलते काम करते हैं वरना हाल वहां भी कुछ खास अच्छे नहीं है। नैतिकता से काम करने को कोई राजी नहीं है।

होना तो यह चाहिए कि नैतिकता के चलते व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करे, जिसकी उसे तनख्वाह मिलती है। तभी वह शिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य है। पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। आजकल सभ्यता और संस्कृति तथा शिक्षा की पहचान सुख-सुविधाएं, रसूख और पैसा हो गया है। शालीनता, विनम्रता, तथा नैतिकता नहीं। समाज की यह बदलती सोच बहुत बड़ी विडम्बना है। यहां पैसों के लिए अपना चरित्र तक बेचने को लोग तैयार है पर मेहनत करने को राजी नहीं है। ऐसे में कैसे संभव है देश का विकास? यह एक चिंतनीय प्रश्न है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हआज समाज क्यों इतना खुदगर्ज और असंस्कृत होता जा रहा है? एक शिक्षक हूं तो जाहिर सी बात है कि पहले पहल तो सोच शिक्षा और शिक्षक के इर्द गिर्द ही इस मामले को ले कर दौड़ेगी। इसी दिशा में पहला विचार आया कि हमारे यहां तो शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए दी जाती थी और आज शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन बनती जा रही है। कहीं यह तो सामाजिक मान्यताओं के विकृतिकरण का कारण नहीं है? आज स्कूलों कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में आ गए हैं, जो पुस्तकों को पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। जो थोड़े बहुत पढ़ते भी हैं, वे भी मात्र परीक्षा पास करने के लिए और अच्छे अंक लेने के लिए या फिर सरकारी नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं। बाकी पुस्तकों को विद्या अध्ययन के लिए पढ़ने का चलन आज पूर्ण रूप से खत्म ही हो गया है। नैतिकता के चलते व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करे, जिसकी उसे तनख्वाह मिलती है। तभी वह शिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य है। पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। आजकल सभ्यता और संस्कृति तथा शिक्षा की पहचान सुख-सुविधाएं, रसूख और पैसा हो गया है। शालीनता, विनम्रता, तथा नैतिकता नहीं। समाज की यह बदलती सोच बहुत बड़ी विडम्बना है। यहां पैसों के लिए अपना चरित्र तक बेचने को लोग तैयार है पर मेहनत करने को राजी नहीं है। ऐसे में कैसे संभव है देश का विकास? यह एक चिंतनीय प्रश्न है। “शिक्षा धनार्जन का विषय न बने बल्कि ज्ञानार्जन और संस्कृति तथा सभ्यता की सम्बाहक बनकर सामने आए।”

—————

यह लेख (कैसे संभव है देश का विकास?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur articles, आज के शिक्षक और छात्र पर निबंध हिंदी में, कैसे संभव है देश का विकास?, कैसे संभव है देश का विकास? - हेमराज ठाकुर, बच्चों के विकास में शिक्षक की भूमिका, वर्तमान समाज में शिक्षक की भूमिका, विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में शिक्षक की भूमिका, विद्यार्थी जीवन में शिक्षक का महत्व पर निबंध, व्यक्ति के विकास में शिक्षा की भूमिका, व्यक्तित्व का विकास एवं शिक्षा, शिक्षा की उपयोगिता, शिक्षा में शिक्षक का महत्व, समाज में शिक्षक की भूमिका पर निबंध, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

विज्ञान और ज्ञान की जंग।

Kmsraj51 की कलम से…..

War of Science and Knowledge | विज्ञान और ज्ञान की जंग।

विज्ञान और ज्ञान की जंग मानव समाज में बहुत पुरानी है। भारतीय पौराणिक कथाओं को पढ़े तो सुरों – असुरों या देव – दानवों की मुख्य लड़ाई ही शायद विज्ञान और ज्ञान की थी। सुर या देव जहां ज्ञान आधारित जीवन पद्धति के समर्थक थे तो असुर या दानव विज्ञान आधारित जीवन पद्धति के समर्थक थे शायद। ज्ञानाधारित जीवन पद्धति यदि मर्यादाओं, शालिंताओं, आस्थाओं और विश्वासों पर टिकी थी तो उसका मनोबल और नैतिक चरित्र भी उतना ही दृढ़ और उन्नत था।

उदाहरणार्थ — ऋषि मुनियों का जीवन देखा जा सकता है। वहीं आसुरी सिद्धांत की परम्परा इसके विपरित थी। वे स्व को महत्व देते थे तथा पुरुषार्थ को ही सब कुछ मानते थे। ज्ञानाधारित शिक्षा पद्धति परमार्थ प्रधान थी तो विज्ञानाधारित शिक्षा पद्धति स्वार्थ प्रधान थी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आसुरी सिद्धांत “वीर भोग्य वसुन्धरा” की सूक्ति पर चलता था।

असुर चमत्कार को प्रणाम करते थे तो देव और मानव भगवान को। तब सुरा, सुन्दरी, मांस, मदिरा का सेवन आसुरी प्रवृति का द्योतक था तो आज इनके सेवन से रहित प्राणी को गवार समझा जा रहा है। आज समाज की दशा और दिशा अलग होती जा रही है। आज पश्चिम की विज्ञानधारित शिक्षा पद्धति ने भारतीय समाज को पूरी तरह से जकड़ लिया है। जिसके चलते आज का मानव चालाक तो बहुत हो गया है पर मानसिक रूप से कमजोर और मलिन बहुत हो गया है। अब तो जबरन कहना पड़ता है:-

अपने ही देश में, अपनी ही सभ्यता संस्कृति बेगानी हो गई।
बस इसी के ही चलते, पश्चिम को घुसने में आसानी हो गई।

यह बात भी झुठलाई नहीं जा सकती कि संस्कारों, व्यवहारों तथा प्रतिकारों की जद्दोजहद नई और पुरानी पीढ़ी में हमेशा से चलती आई है और यह चलती रहनी चाहिए। क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और परिवर्तन संघर्ष धर्मी प्रक्रिया है।

सकारात्मक परिवर्तन सामाजिक विकास के लिए जरूरी है फिर भले ही पुरानी पीढ़ी चाहे उसका प्रतिकार ही क्यों न करती रहे। हां नकारात्मक परिवर्तन का प्रतिकार नई पीढ़ी को भी स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि हम मानव प्राणी है और मानव प्राणी होने के कारण हमे मानव समाज के हित के लिए प्रतिस्थापित नीति और नियमों को सहेज कर रखना चाहिए।

फिर भले ही वे नियम अवैज्ञानिक या अप्राकृतिक ही क्यों न हो। यदि ऐसा न किया गया तो सदियों से संस्कृति और सभ्यता की मर्यादाओं में बंधा मानव समाज पढ़ा लिखा पशु समाज बन जाएगा; जिसमें न ही तो दया शेष रहेगी और न ही लाज शर्म।

वह जंगली जीवन की तरह कामुक और शक्ति आधारित हो जाएगा। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। वह एक मनमुखी समाज को जन्म देगा, जो मानव समाज के लिए सुखद अनुभव नहीं होगा।

हमारी शिक्षा पद्धति भक्ति प्रधान थी तो आज हम पर संचालित मैकाले माडल की पश्चिमी शिक्षा आसक्ति और शक्ति आधारित हो गए है। यही कारण है कि आज समाज मानसिक रूप से तो अपवित्र होता जा रहा है पर शारीरिक तौर पर पवित्र और सुन्दर बनने की कोशिश कर रहा है। फिर वह बाह्य पवित्रता चाहे कासमैटिक फुहड़ता आधारित ही क्यों न हो।

आज सचमुच मानवीय मूल्यों का निरन्तर पतन होता जा रहा है। यह सब काम विज्ञान आधारित शिक्षा ने खराब किया है। हमारी ज्ञान आधारित शिक्षा बहुत उन्नत थी, है और रहेगी। हमारे यहां योग को महत्व दिया जाता है और उनके पश्चिम में प्रयोग को महत्व दिया जाता है। हमारे यहां प्यार को महत्व दिया जाता है तो उनके वहां विकार को महत्व दिया जाता है। हमारे यहां सम्भोग को दर्शन की दृष्टि से देखा जाता है तो उनके वहां सम्भोग को प्रदर्शन की दृष्टि से देखा जाता है शायद। यदि ऐसा नहीं है तो वर्तमान समाज में युवा पीढ़ी में फिल्मी जगत से प्रभावित हो कर अंग प्रदर्शन और अल्प वस्त्रीकरण की अवधारणा क्यों कर उत्पन हुई? क्या यह पछुआ का प्रभाव है या फिर कुछ और?

विज्ञान के मतानुसार संतानोत्पत्ति के लिए एक स्त्री और एक पुरुष चाहिए। वे आपस में रति क्रीड़ा करके दैहिक आनंद भी ले सकते हैं और संतान भी पैदा कर सकते हैं। उनके अनुसार यही प्राकृतिक नियम है। इसलिए मानव जाति को अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भौतिक, रासायनिक और जैविक जरूरतों को पूरा करना कोई अपराध नहीं है।

जैसे पशु समाज में नर – मादा संयोग ही उत्पत्ति का आधार होता है। फिर वे नर – मादा सगे भाई – बहन हो या फिर मां – बेटा या पिता – पुत्री। पूरी तरह से ऐसी तो नहीं पर कुछ ऐसी ही आजादी आज की युवा पीढ़ी चाहती है शायद। यदि उन्हे उनके मन माफिक आजादी मिली तो वह दिन भी दूर नहीं है, जिस दिन मानव और पशु समाज के संतानोत्पत्ति के क्रिया व्यापार एक जैसे हो जाएंगे। कोई नाता रिश्ता नहीं रहेगा। वे रति क्रीड़ा, व्यसनीय क्रीड़ा और सौंदर्य प्रदर्शन में, अंग प्रदर्शन की पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं। इस प्रणाली में अमर्यादा में जीना ही मानव जीवन का उद्देश्य समझा जाता है शायद। यहां चरित्र नाम की कोई चीज नहीं होनी चाहिए, ऐसी अवधारणा है।

जबकि हमारी संकृति ज्ञानाधारित शिक्षा की समर्थक है। यहां संतानोत्पत्ति के लिए एक पति और एक पत्नी मानव समाज में होना जरूरी है। यहां नातों रिश्तों की मानवीय सामाजिक नियमावली का बड़ा महत्व है। जो मानव समाज में बहुत ही जरूरी है। यहां पड़ोस की लड़की को भी लड़का बहन कहता है और लड़की उसे दिल से भाई कहती है। पर हां पछुआ रीत जब से आई है अब यह रिवायत बदलती जा रही है। बहन का स्थान मैडम और भाई का स्थान सर ने ले लिया है।

अब स्त्री – पुरुष एक दूसरे को भाई – बहन कहने से कतराते हैं। यहां पर स्त्री को बुरी नजर से देखना और पर पुरुष को बुरी नजर से देखना घोर अपराध समझा जाता हैं।यहां मर्यादा का पालन करना मानव जीवन का उद्देश्य समझा जाता है। यहां चारित्रिक पवित्रता की प्रधानता को महत्व दिया जाता है।

वहां पश्चिम में सब विपरीत है। हमारे गर्ल फ्रेंड या बॉय फ्रेंड की अवधारणा ही नहीं है और आज यह चलन भारतीय समाज में आम हो गया है। प्रेमी – प्रेमिका का रिश्ता हमारे यहां मुखर था और वह कुछ यूं था कि वे एक दूसरे के लिए मर मिटने वाले होते थे। प्रेमी के मृत्यु को प्राप्त होने पर प्रेमिका कई बार जौहर तक कर लेती थी। यह उनका पवित्र प्रेम और समर्पण था।

पर वहां पश्चिमी रिवायत में इसे तर्क की कसौटी पर कसा जाता है और इसे कोरी मूर्खता और नारी का शोषण कहते हैं। ठीक है कि यह नारी के ही साथ क्यों होता था।पत्नी की मृत्यु पर फिर पुरुषों को भी जौहर करना चाहिए था। पर यह भी झुठलाया नहीं जा सकता है कि जो माताएं बहनें जौहर करती थी, वे मानसिक रूप से कितनी दृढ़ और समर्पित रही होगी?

यही वे कारण थे जिनसे विदेशी उपनिवेशकों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करने की विचारणा जागी। उन्हे लगा कि यदि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के शैक्षिक ढर्रे को पश्चिमी रीत में नहीं बदला गया तो इनका मनोबल तोड़ना बहुत ही मुश्किल होगा। जो उनके उपनिवेशवाद की राह में निरन्तर रोड़ा बनता जा रहा था।

हमारे भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति थी। जिसमें अर्थोपार्जन की शिक्षा बाद में दी जाती थी, पहले सामर्थ्य उपार्जन और जनोपार्जन की शिक्षा दी जाती थी। हमारे यहां शिक्षार्थी को सरकारी सेवाओं में तैनात होने की शिक्षा बाद में दी जाती थी। पहले उसे मानव बनने की शिक्षा दी जाती थी। ऐसा नहीं है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में विज्ञान नहीं था। ऐसा विज्ञान था कि सुन कर सब दंग रह जाए। हमारे यहां शरीर छोड़ कर आत्मा को आकाश में भ्रमण कराने की विद्या आती थी।

पढ़े योग वशिष्ठ, जिसमें महर्षि वशिष्ठ भगवान राम को उस विद्या से परिचित करवाते हैं। भगवान शिव को मनुष्य का सिर काटकर पर जीवो का शीश स्थापित करने की विद्या भी आती थी। उदाहरण श्री गणेश जी और प्रजापति दक्ष के सिरों का पुनर्स्थापन है। पर यह विद्या अपात्र अर्थात स्वार्थी लोगों को नहीं दी जाती थी। यदि यह अपात्र को दी भी गई होती तो अनर्थ हो गया होता।

आज भले ही वे परम गोपनीय विज्ञानाधारित रहस्य हमारे पुरखों के साथ दफ़न हो गए हो। पर वह अपने आप में एक परम विज्ञान था। यदि ऐसी कला आज के वैज्ञानिक युग में हमे आ जाती तो हम तो अपने आप को ही हिरण्याक्षिपु की तरह भगवान कहलवाने लगते। अपनी ही संतानों के दुश्मन बन बैठते। छुटपुट उदाहरण तो फिर भी ऐसे देखने को आज भी मिल ही जाते हैं।

भारत में आज भी ऐसे वैद्य विद्यमान हैं, जो नाड़ी पकड़ कर आदमी का सारा एम आर आई, सी टी स्कैन तथा एक्स रे कर दे। मानो वे चलती फिरती सजीव पारदर्शी मशीनें हैं। पर उस सामर्थ्य उपार्जन वाली कड़ी साधना वाली विद्या को कोई क्यों सीखे और उसे कोई विज्ञान क्यों कहे? क्योंकि वह विद्या अनुशासन प्रधान है और आज आदमी अनुशासन चाहता ही नहीं है।

यह परम सत्य है कि 84 लाख योनियों से भटकता – भटकता मुश्किल से जीव अन्त में कहीं मनुष्य योनि में जन्म लेता है। बाकी सारी योनियां पशु योनियां या जड़ योनियां हैं। ऐसे में पाश्विकता का मनुष्य में रहना स्वभाविक है। पर वह पाश्विकता हमारे व्यवहार में दिखे, इसका मानव समाज में प्रतिकार अनादि काल से होता आ रहा है और होना भी चाहिए।

सभी जानते हैं कि विवाह करने के पश्चात पति – पत्नी क्या करते हैं? यहां तक कि मां – बाप, बहन – भाई सबको नव युग्म के पारस्परिक पति – पत्नी व्यवहार का पूरा पता होता है पर इसका यह मतलब तो कतई नहीं होता कि वे दोनों पति – पत्नी व्यवहार खुले आम पशुवत करे।

मानव समाज में हर कार्य की एक मर्यादा होती है, जो रहनी भी चाहिए। वरना मानव और पशु समाज में कोई खास अन्तर भविष्य में नजर नहीं आएगा। भविष्य पुराण और सूक्ष्म वेद की भविष्यवाणी क्यों इतनी पहले ही सिद्ध होती जा रही है कि घोर कलियुग में न ही तो सेवा, साधना रहेगी और न ही तो प्यार – प्रेम। हर नर – नारी चरित्रहीन होंगे और अल्पायु होंगे। नातों रिश्तों की कोई कद्र ही नहीं होगी।

खैर यह कहना भी गलत होगा कि विज्ञान पूरी तरह से खराब है। पर कई ऐसे पहलू हैं, जहां विज्ञान का सहारा लेना कतई ठीक नहीं है। मानवीय मूल्यों के क्षेत्र में विज्ञान को ठूंसेंगे तो स्त्री-पुरुषों में झगड़ा हो जाएगा। सामाजिक मान्यताओं में उथलपुथल मच जाएगी। निरन्तर होते जा रहे मानवीय मूल्यों के पतन के चलते देश की शासनिक और प्रशासनिक ताकतों को नैतिक मूल्यों के प्रतिस्थापन के लिए स्कूली शिक्षा प्रणाली में आज पुरातन योग और संस्कार शिक्षा को भी जोड़ना होगा। तभी मनुष्यों का और मानव समाज का उत्थान सम्भव है।

हमे आज पुनः अपनी विकार के दमन की शिक्षा प्रणाली को पाठ्यक्रम में जोड़ना होगा। यदि यूं ही विकार को जागृत करने वाली प्रणाली हावी रही तो हमारी आगामी पीढ़ियां भीरू और अपंग पैदा होगी। क्योंकि अति किसी भी चीज की ठीक नहीं होती।जब आदमी अति विकारी या अति संस्कारी हो जाता है तो वह मानव समाज के संतुलन में नहीं बैठता। इसलिए सृष्टि के संचालन के लिए न ही तो अति विकार भला है और न ही तो अति संस्कार। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन समत्व को ही योग कहते है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हमे आज पुनः अपनी विकार के दमन की शिक्षा प्रणाली को पाठ्यक्रम में जोड़ना होगा। यदि यूं ही विकार को जागृत करने वाली प्रणाली हावी रही तो हमारी आगामी पीढ़ियां भीरू और अपंग पैदा होगी। क्योंकि अति किसी भी चीज की ठीक नहीं होती।जब आदमी अति विकारी या अति संस्कारी हो जाता है तो वह मानव समाज के संतुलन में नहीं बैठता। इसलिए सृष्टि के संचालन के लिए न ही तो अति विकार भला है और न ही तो अति संस्कार। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन समत्व को ही योग कहते है। सभी जानते हैं कि विवाह करने के पश्चात पति – पत्नी क्या करते हैं? यहां तक कि मां – बाप, बहन – भाई सबको नव युग्म के पारस्परिक पति – पत्नी व्यवहार का पूरा पता होता है पर इसका यह मतलब तो कतई नहीं होता कि वे दोनों पति – पत्नी व्यवहार खुले आम पशुवत करे। मानव समाज में हर कार्य की एक मर्यादा होती है, जो रहनी भी चाहिए। वरना मानव और पशु समाज में कोई खास अन्तर भविष्य में नजर नहीं आएगा। भविष्य पुराण और सूक्ष्म वेद की भविष्यवाणी क्यों इतनी पहले ही सिद्ध होती जा रही है कि घोर कलियुग में न ही तो सेवा, साधना रहेगी और न ही तो प्यार – प्रेम। हर नर – नारी चरित्रहीन होंगे और अल्पायु होंगे। नातों रिश्तों की कोई कद्र ही नहीं होगी।

—————

यह लेख (विज्ञान और ज्ञान की जंग।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: Essay on the war of science and knowledge, hemraj thakur, hemraj thakur articles, vigyaan aur gyaan ki jang, war of science and knowledge, ज्ञान और विज्ञान में क्या अंतर है?, विज्ञान और ज्ञान का युद्ध, विज्ञान और ज्ञान की जंग, विज्ञान और ज्ञान की जंग - हेमराज ठाकुर, विज्ञान और ज्ञान की जंग पर निबंध, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

गणतंत्र दिवस और भारतीय संविधान।

Kmsraj51 की कलम से…..

Republic Day and Indian Constitution – गणतंत्र दिवस और भारतीय संविधान।

भारत एक गणतांत्रिक देश है। यह सत्य किसी से छुपा नहीं है। परंतु भारत के गणतंत्र दिवस तक की कहानी कैसे-कैसे कदम दर कदम आगे बढ़ती है, यह बात नई पीढ़ी तक ले जाना पुरानी पीढ़ी का जिम्मा है। इसके विषय में जब चर्चा की जाती है तो नई पीढ़ी के लिए एक क्रमिक ज्ञान समायोजित करना पुरानी पीढ़ी का दायित्व बन जाता है। इस कड़ी में यदि हम भारतीय संविधान के निर्माण की गाथा को शुरू से खंगालने की कोशिश करेंगे तो 9 नवंबर 1946 ईस्वी का वह दिन हमें जरूर याद आता है, जिस दिन संविधान सभा के अस्थाई सदस्य डॉ सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में संविधान सभा की बैठक पहली बार हुई थी। 1946 में ही डॉ राजेंद्र प्रसाद जी को संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया था। हालांकि यह सभा बाद में 1947 में भारत के आजाद होने के पश्चात दो भागों में बंट गई थी। भारत की संविधान सभा अलग और पाकिस्तान की संविधान सभा अलग हो गई थी। भारतीय संविधान सभा की घोषणा 15 अगस्त 1947 ईस्वी को भारत की आजादी के उपलक्ष पर डॉ राजेंद्र प्रसाद जी की अध्यक्षता में ही की गई थी। इस सभा में कुल 284 सदस्य चुने गए थे तथा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी को संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष चुना गया था। डॉक्टर भीमराव जी को भारतीय संविधान के जनक की उपाधि भी दी गई है। अंबेडकर जी भारत के प्रथम कानून और न्याय मंत्री थे।

भारतीय संविधान की मूल प्रति…

भारतीय संविधान सभा ने भारतीय संविधान को लिखना शुरू किया। भारत के संविधान को बनाने के लिए विश्व के लगभग 60 गणतांत्रिक देशों के संविधानों का अध्ययन किया गया था। भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित गणतांत्रिक संविधान है। इस संविधान को तैयार करने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन का समय लगा था। भारतीय संविधान को अपने हाथों से लिखने वाले श्री प्रेम बिहारी नारायण रायजादा जी थे। नारायण जी एक कैलीग्राफी आर्टिस्ट थे। इनका जन्म 1901 में दिल्ली में हुआ था। इन्होंने संविधान को लिखने के बदले में किसी भी प्रकार का वेतन या भत्ता नहीं लिया था। इस संविधान की हस्तलिखित एक मूल प्रकृति(मूल प्रति) महाराज बाड़ा स्थित ग्वालियर की सेंट्रल लाइब्रेरी में रखी गई है। इस मूल प्रति में डॉ राजेंद्र प्रसाद तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ-साथ संविधान सभा के 284 सभी सदस्यों के हस्ताक्षर मूल रूप से चिन्हित है।

भारतीय संविधान में बनाती बार कुल 395 अनुच्छेद थे। ये अनुच्छेद 22 भागों में विभाजित थे तथा इसमें 8 अनुसूचियां थी। परंतु आजकल भारतीय संविधान में 395 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां है जो 25 भागों में विभाजित की गई है। भारत का संविधान 251 पन्नों में लिखा गया है। यह संविधान 26 नवंबर 1949 ईस्वी को पारित किया गया था। इसलिए 26 नवंबर को संविधान दिवस के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2015 में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी की 125वी जयंती मनाई गई। उसी दिन से पूरे भारतवर्ष में 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में हर वर्ष मनाया जा रहा है।

भारत एक पूर्ण गणतंत्र राष्ट्र…

26 जनवरी 1950 ईस्वी को भारत का संविधान भारतीय संविधान की प्रस्तावना के तहत भारत में विधिवत लागू किया गया। इस दिन से भारत एक पूर्ण गणतंत्र राष्ट्र बन गया। इसलिए इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है “संविधान जनता के लिए हैं और जनता ही इसकी अंतिम संप्रभु है। प्रस्तावना लोगों के लक्ष्य, आकांक्षाओं को प्रकट करती है।” प्रस्तावना के इस कथन पर आज भारत की जनता को कितनी संप्रभुता मिली है? यह समझाना आज किसी अजूबे से कम नहीं है। संविधान की माने तो भारत की जनता को राष्ट्र की मूल व्यवस्थाओं के सन्दर्भ में निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार प्राप्त होना चाहिए। परन्तु भारत में आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी जनता को वे अधिकार प्राप्त नहीं है, जो संविधान ने उसे मौलिक अधिकारों के तहत प्रदान किए हैं। सबसे बड़ी अवहेलना समानता के अधिकार के तहत हो रही है। एक देश एक विधा की दृष्टि से यदि देखे तो समानता के अधिकार की नागरिकता के आधार पर धजियाँ उड़ाई जा रही है।

  • जातिवाद और धर्मवाद के आधार पर मानव – मानव में बहुत भेद किया जा रहा है।व्यक्ति – व्यक्ति और समुदाय विशेष के कुछ विशेषाधिकार निहित है, जो समानता के अधिकार की तौहीन है। कुछ वर्गों और समुदायों को संविधान में निर्धारित समय सीमाओं से परे हो कर अधिकार दिए जा रहे हैं और कुछ को कुछ नहीं। यह एक देश एक विधान के तहत अन्याय है।
  • यही हाल विवाह पद्धति के सन्दर्भ में भी है। ये बातें कैसे और किससे कहें? 1950 से 2021 तक संविधान के 105 संशोधन किए जा चुके हैं, पर कहीं भी जन लोकपाल बिल और समान नागरिक संहिता की बात को महत्व नहीं मिल पाया है।

यह सच है कि समय – समय पर ऐसी मांगे उठती रही है। परन्तु उन्हें राजनैतिक षड्यंत्रों की चक्की में पीस दिया जाता है। यदि ठीक से गौर करे तो पूर्ण गणतंत्र राज्य के लिए इन नियमों का कड़ाई से लागू होना अति आवश्यक है। वरना सत्ता और प्रशासनिक वर्ग का प्रभुत्व जनता पर स्थापित हो जाता है। जो वर्तमान समय में दिख भी रहा है। नेतागिरी और आधिकारिक धौंस अभी भी अंग्रेजी हकूमत के जैसी भारत में निरन्तर बनी हुई है। मनाने को तो हम हर वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता हैं, पर क्या वह सही मायने में गणतंत्र दिवस है?

शायद नहीं। क्योंकि आज भी भारत की एक बहुत बड़ी आबादी गरीबी और भूखमरी से जूझ रही है। आज भी आम जनमानस पूर्ण रूप से आजाद नहीं है। क्योंकि उस पर हुकामों और लाल फित्ता धारियों का दबाव है। सम्पति का समान वितरण आज भी कहां हो रहा है। संपति का तीन चौथाई हिस्सा आज भी उच्च और धनाढ्य लोगों के पास है। आम जनमानस को मिलता है तो मात्र एक तिहाही हिस्सा। आज भी भारत की जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा मूलभूत सुविधाओं से वंचित है।

आज प्रश्न है तो वह यह है कि आखिर भारत में कब पूर्ण गणतंत्र मनाया जाएगा? जब हर आदमी को उसका पूरा अधिकार मात्र कागजों में ही नहीं बल्कि असल में मिलेगा।अन्ना हजारे ने एक प्रयास भी किया था। पर वह भी सिरे नहीं चढ़ पाया। जिन पूर्वजों ने अपना बलिदान देकर भारत को यह सपना देख कर आजाद करवाया था, कि भारत की जनता को पूर्ण गणतंत्रता प्राप्त हो। उनके दिलों पर आज क्या बीतती होगी, यदि वे किसी लोक या दुनियां से आज भारत का दृश्य देखते होंगे।

वे तो अंग्रेज थे, जो भारतीयों का काम कभी भी समय पर नहीं करते थे। फिर करते भी थे तो पूरी खुशामद करवा कर ही करवाते थे। पर आज तो काम करवाने वाला भी भारतीय है और काम करने वाला भी भारतीय ही है। आज हालत उससे भी बदतर है। बिना रिश्वत या चाटुकारिता के कोई काम करने को राजी नहीं है। शायद ऐसे भारत की कल्पना तो कभी हमारे पुरखों ने न की हो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : हिन्दू और हिंदुत्व – एक समीक्षा।

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज भी भारत की एक बहुत बड़ी आबादी गरीबी और भूखमरी से जूझ रही है। आज भी आम जनमानस पूर्ण रूप से आजाद नहीं है। क्योंकि उस पर हुकामों और लाल फित्ता धारियों का दबाव है। सम्पति का समान वितरण आज भी कहां हो रहा है। संपति का तीन चौथाई हिस्सा आज भी उच्च और धनाढ्य लोगों के पास है। आम जनमानस को मिलता है तो मात्र एक तिहाही हिस्सा। आज भी भारत की जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। नेतागिरी और आधिकारिक धौंस अभी भी अंग्रेजी हकूमत के जैसी भारत में निरन्तर बनी हुई है। मनाने को तो हम हर वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता हैं, पर क्या वह सही मायने में गणतंत्र दिवस है?

—————

यह लेख (गणतंत्र दिवस और भारतीय संविधान।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur articles, original copy of indian constitution, republic day and indian constitution, Republic Day and Indian Constitution - गणतंत्र दिवस और भारतीय संविधान, गणतंत्र दिवस और भारतीय संविधान - हेमराज ठाकुर, भारतीय संविधान की मूल प्रति, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

शिक्षा – सुन्दरता और सम्मान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिक्षा – सुन्दरता और सम्मान। ♦

आज आधुनिकता के दौर में शिक्षा का गुणांक अच्छे अंक प्राप्त करना, सुन्दरता का मापदंड बाह्य रंग रूप तथा सम्मान का मानक पैसा हो गया है। यही पश्चिम की सोच थी कि भारतीय लोग अपनी संस्कृति के परम भाव से बाहर निकल जाए। ताकि उनकी सुरक्षात्मक आधारभूत विश्वास और नैतिकता प्रिय शक्ति टूट जाए और वे विदेशी भीरू और बेशर्म संस्कृति के गुलाम बन जाए।

आज रटा और सटा सिस्टम की शिक्षा पद्धति भारत में हावी हो गई है। या तो छात्र रटा मार कर परीक्षा पास कर देते हैं और अच्छे नम्बर ले आते हैं, समझ भले ही उस विषय की उन्हे हो या न हो। या फिर MCQ में सटा यानी तुका लगाकर अंक प्राप्त करते हैं।फिर बड़े खुश होते हैं कि देखो क्या जजमेंट है हमारी। न जाने क्यों शिक्षाविद यह आंकड़ों की शिक्षा प्रणाली निरन्तर हावी किए जा रहे हैं? जबकि यह सबको पता है कि शिक्षा का सम्बन्ध भावात्मक और विचारत्मक धरातल में विकास करने को ले कर होता है न कि मात्र बौद्धिक तौर पर विकसित करना।

पर आज के समय में तो बौद्धिक स्तर पर भी विकास कहां हो रहा है? बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने के लिए भी समझ का होना जरूरी है। आज की शिक्षा प्रणाली नौकरी के लिए रटा और सटा वाली बनाना मजबूरी है। शर्म आती है कभी-कभी तो। घोर स्वार्थी हो रहे है आज का शिक्षित इन्सान। क्या यही शिक्षा है?

सुन्दर का अर्थ है सु+अन्दर अर्थात जो अन्दर से अच्छा हो। पर हमने बाह्य रंग रूप को सुन्दर कहना शुरू कर दिया। जबकि वह सुरूप कहलाता था। शब्दों के आज अर्थ बदल दिए हैं।

पैसा सामाजिक जरूरतों के लिए एक अनिवार्य विनिमय था। पर आज वही मान सम्मान का परिचायक हो गया है। जबकि मान सम्मान व्यक्ति के ज्ञान और ध्यान, सेवा और सत्संग तथा तप व त्याग से सम्बन्ध रखता था।

आज अगर अष्टावक्र की माने तो हम चर्मकार हो गए हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज रटा और सटा सिस्टम की शिक्षा पद्धति भारत में हावी हो गई है। या तो छात्र रटा मार कर परीक्षा पास कर देते हैं और अच्छे नम्बर ले आते हैं, समझ भले ही उस विषय की उन्हे हो या न हो। या फिर MCQ में सटा यानी तुका लगाकर अंक प्राप्त करते हैं।फिर बड़े खुश होते हैं कि देखो क्या जजमेंट है हमारी। न जाने क्यों शिक्षाविद यह आंकड़ों की शिक्षा प्रणाली निरन्तर हावी किए जा रहे हैं? जबकि यह सबको पता है कि शिक्षा का सम्बन्ध भावात्मक और विचारत्मक धरातल में विकास करने को ले कर होता है न कि मात्र बौद्धिक तौर पर विकसित करना।

—————

यह लेख (शिक्षा – सुन्दरता और सम्मान।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur articles, short essay on education in hindi, शिक्षा पर निबंध 150 शब्दों में, शिक्षा पर निबंध हिंदी में, शिक्षा में गुणवत्ता पर निबंध, शिक्षा सुन्दरता और सम्मान - हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

हिन्दू और हिंदुत्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hindu and Hindutva – हिन्दू और हिंदुत्व।

हिन्दू और हिंदुत्व – एक समीक्षा।

हिंदुस्तान में हिन्दू और हिन्दुत्व की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। आज पूरी दुनियां में भारत एक ऐसा देश है, जिसमें हिन्दू और हिन्दुत्व के ऊपर एक जंग सी छिड़ गई है। सोशल मीडिया हो या प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या सामान्य जन वार्ता। राजनैतिक दल हो या फिर सामाजिक – धार्मिक संगठन। सभी की टिप्पणियां और मुहिमें हिन्दू और हिन्दुत्व के पक्ष और विपक्ष में निरन्तर चलती रहती है।

ऐसा नहीं है कि हिन्दू और हिन्दुत्व के विपक्ष में मात्र गैर हिन्दू समुदाय ही खड़े नजर आते हैं। बल्कि खुद को कट्टर हिन्दू कहने वाले लोग भी हिन्दू और हिन्दुत्व के खिलाफ मुक्त स्वर में बोलते हुए नजर आते हैं। खैर विचारधारा अपनी – अपनी।

पर यहां कई सवाल खड़े होते हैं कि जो ये लोग हिन्दू और हिन्दुत्व के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और जो ये हिन्दू और हिन्दुत्व के पक्ष में आंदोलित लोग नजर आ रहे हैं; ये सभी असल में हिन्दू और हिन्दुत्व के अर्थ को जानते भी है या नहीं। या फिर मात्र पक्ष के लिए पक्ष और विरोध के लिए विरोध करते रहते हैं। कहीं ये राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक संगठनात्मक विचारधारा से बंध कर तो यह सब करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं? कहीं ये सामाजिक सरोकारों को ठोकर मारकर अपने संगठनात्मक सरोकारों को साधने की कोशिश करते हुए तो ऐसी हरकत करने की जरूरत नहीं कर रहे हैं, जो समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।

• हिन्दू शब्द का अर्थ •

उससे पूर्व की हम आगे की बात करें। हिन्दू शब्द के अर्थ को समझना जरूरी है। यूं तो भारत में हिन्दू कहलाने वाले लोग स्वयं को सनातनी कहते हैं, जो सनातन धर्म की “वसुधैव कुटुंबकम्” की अवधारणा के धरातल पर खड़ी एक मानवीय सरोकारों की इमारत है। पर फिर भी हिन्दू शब्द के अर्थ को समझना जरूरी है। मेरे मत के अनुसार यदि हिन्दू शब्द को भाषिक संरचना के आधार पर परिभाषित किया जाए तो हिन्दू शब्द “हिं + दू” के मेल से बना है। इसमें “हिं” का अर्थ हिंसा और “दू” का अर्थ दूर होता है। अर्थात ऐसा व्यक्ति/समुदाय/समाज जो हिंसा से दूर रहता हो, वह हिन्दू है।

हिंसा मानसिक, तानसिक या फिर कोई भी हो सकती है। इसी प्रकार अहिंसात्मक भावना से ओतप्रोत मानस ही हिन्दुत्व है। इस सन्दर्भ में यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है, वह चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय का क्यों न हो। वह हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख हो या इसाई या फिर पारसी। जो सत्य और अहिंसा परमो धर्म का मार्ग नहीं अपनाता, वह हिन्दू धर्म का होकर भी हिन्दू नहीं है। यदि मैं गलत हूं तो फिर हिन्दू धर्म की पवित्र पुस्तकों के प्रमाण भी गलत है। महर्षि वाल्मिकी और तुलसी कृत रामायण में महा पण्डित रावण को राक्षस और कविलाई समाज के नायक गुह को तथा पशु समुदाय यानी वानर तथा रिक्ष समुदाय के हनुमान, सुग्रीव, अंगद तथा जामवंत आदि को साधु व सज्जन सिद्ध करना इसी हिंदूवादी सोच का उदाहरण है।

शबरी जैसी निम्न जाति की वृद्ध औरत के जूठे बेर प्रभु राम द्वारा खाना तथा केवट जैसे सामान्य जन के गले लगना आदि सभी प्रमाण हिंदूवादी सोच को पुष्ट करते हैं। और भी न जाने कितने-कितने प्रमाण कई शास्त्रों में भरे पड़े हैं। पर नहीं आज ये बाते किसी को न ही तो सुननी है और न ही समझनी है।

आज तो बस एक ही भूत सबके सिर पर सवार है कि मैं हिन्दू माता-पिता की संतान हूं तो मैं हिन्दू हूं। अधिकांश भाई बहन ऐसे हैं जिन्हें हिन्दू धर्म का क ख ग तक मालूम नहीं है पर है हम हिन्दू। मेरी बात झूठ है तो करें सर्वे। पूछिए जरा हिन्दू कहलाने वाले लोगों से कि वेद कितने हैं? पुराण कितने हैं? क्रमबद्ध उनकी सूची बनाने को कहे।इतनी सी बात से ही सारी हेकड़ी निकल जाएगी। उन ग्रंथों में लिखा ज्ञान तो दूर की कौड़ी है।

मेरा मक़सद किसी को जलील करना और किसी की पैरवी करना नहीं है। सोशल मीडिया में कई मुस्लिम भाई भी राम को अपना पूर्वज बताते हुए नजर आते हैं और वे ये मानते हैं कि हमारे पूर्वज हिन्दू थे। उनकी कवरगाहों में उर्फ कर के उनके हिन्दू होने का प्रमाण लिखा हुआ मिलता है। खैर मैं इस बात की पुष्टि नहीं कर रहा हूं। पर उन्हे बोलते मैने जरूर सुना है।

मेरा मतलब है कि फिर इस हिन्दू और हिन्दुत्व के मुद्दे पर इतनी जुमानी जंग क्यों? विशेष तौर पर इस मुद्दे पर भाजपा और आर एस एस से समर्थित लोगों को निशाने पर गैर भाजपाई और गैर आर एस एस संगठनों के हिन्दू कहलाने वाले लोग ही रखते हैं।खैर गैर हिंदूवादी संगठनों और समुदाय की बात तो अलग है। इस सन्दर्भ में मुझे तो इतना सा ही कहना है कि वह चाहे किसी भी दल या विचारधारा से जुड़ा हुआ व्यक्ति क्यों न हो। यदि वह किसी जीव की बलि चढ़ाता है, मांस खाता है, मदिरा पीता है, नशा करता है, अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे के मन को ठेस पहुंचाता है, भ्रष्टाचार, अनाचार, दुर्व्यवहार, बलात्कार और कोई अन्य असामाजिक कृत्य करता है तो वह हिन्दू हो ही नहीं सकता। शायद इस बात से बहुतों को बुरा भी लगे, क्योंकि आज का अधिकांश हिन्दू समाज इन्ही बुराइयों से बुरी तरह से घिरा हुआ है। “पर हित सरिस धर्म न भाई” की लोक मंगल भावना बहुतायत गायब सी हो रही है।

• संपूर्ण हिंदुत्व को प्रतिस्थापित करना? •

आज हिन्दू समाज को जाति प्रथा, बलि प्रथा, धर्मवाद और आरक्षण व्यवस्था जैसी मुसीबतों से दो-दो हाथ होना बहुत जरूरी है। जातिवाद के नाम पर हिन्दू धर्म को मानने वाले वर्गों में ही संघर्ष है। इस लड़ाई में कई राजनैतिक दल भी आमने सामने है। भीम आर्मी के लोग जहां जाति प्रथा को मनु स्मृति का फैलाया भ्रम समझते हैं तो वहीं अपने आपको उच्च वर्ग समझने वाला हिंदू समाज इस बात को मानने को कतई राजी नहीं है। उच्च वर्गीय कहलाने वाले हिंदू समाज का मानना है कि मनुस्मृति में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि शुद्र का बेटा शूद्र और ब्राह्मण का बेटा ब्राम्हण ही कहलाएगा। अर्थात वहां कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था का नियम प्रतिपादित किया गया है न कि जातिगत दासता का। उनके अनुसार यह वंशानुगत जातिगत परंपरा हमारे भारतीय संविधान की देन है, जिसमें ब्राह्मण का बेटा ब्राम्हण और शूद्र का बेटा शूद्र कहलाने की संवैधानिक मंजूरी प्रदान करके रखी है। इस सन्दर्भ में वे आरक्षण का भी हवाला देते हैं। इधर जातिगत आधार पर आरक्षण पाने वाले समुदायों के लोग अपना आरक्षण छोड़ने को किसी भी हद तक मंजूर नहीं है। ऐसे में भारतीय समाज से जातिगत भावना को दूर किए बिना संपूर्ण हिंदुत्व को प्रतिस्थापित करना कहीं से भी संभव होता हुआ नजर नहीं आता।

• जातिगत भेदभाव और छुआछूत •

आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारे भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत उतने ही मजबूत और दृढ़ है जितने कि वे स्वतंत्रता से पहले थे। इसमें भी अगर गौर से देखें उच्च वर्गीय कहलाने वाले समाज में इस प्रथा में कुछ सुधार जरूर हुए हैं। यहां ब्राह्मण, राजपूत, ठाकुर, राणा, कनैत, राठी, कुम्हार, तरखान आदि जातियों का आपस में एक साथ उठना बैठना और एक दूसरे के साथ मिलकर के खाना-पीना तथा आपस में अपने बेटे – बेटियों के रिश्ते तय करना लगभग शुरू हो चुका है; जो सामाजिक उत्थान की दिशा में एक अच्छा कदम है।

परंतु दूसरी ओर आरक्षण का लाभ लेने वाले निम्न वर्गीय कहलाने वाली जातियों के लोग आपस में यह क्रिया करते हुए नजर नहीं आते। लोहार और कोली, चर्मकार तथा अन्य निम्न जाति के लोग आपस में न ही तो सामाजिक तौर पर इकट्ठे बैठकर के खाना खाते हैं और न ही सामाजिक रिश्तो को निभाने में आपस में रिश्तेदारी करते हैं। सबसे पहले हिंदू और हिंदूवादी संगठनों को भारत से इस जातिवाद के भूत को बाहर फेंकना होगा। उसके साथ – साथ दूसरी सबसे बड़ी चुनौती भारतीय देवी-देवताओं को खुश करने के लिए निरीह पशु – पक्षियों की बलि चढ़ाने की प्रथा को समाप्त करने की है।

क्या यह हिंसात्मक घटनाएं नहीं है? सब जानते हैं कि ये कुप्रथाएं हैं और ये बंद होनी चाहिए। पर बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन? हिंदू धर्म के गैर भाजपाई और गैर स्वयं सेवक संगठन के लोग इन विचारधाराओं से जुड़े हुए हिंदुत्व का पक्षधर बनने वाले लोगों को साफ नसीहत देते हुए नजर आते हैं कि खुद ये लोग सभी प्रकार की हिंसाएं करते हैं और दूसरों को हिंदू बनने की नसीहत देते हैं। आखिरकार इस दोहरे चरित्र से ये लोग कब बाहर आएंगे, जिससे इनकी कथनी और करनी में एकरूपता नजर आए और हिन्दू समाज इनकी विचारधारा पर विश्वाश कर सके ? सवाल यह भी जायज है। यह तो नहीं चलेगा कि औरों को उपदेश और खुद को गोहटे।

⇒ भारत में हिंदुत्व कायम करना है तो…

हिंदूवादी संगठनों को यदि सचमुच भारत में हिंदुत्व कायम करना है तो उन्हें अपनी विचारधारा के साथ-साथ अपने सामाजिक व्यवहार को भी हिंदुत्व के आधार पर ही ढालना होगा। रही बात धर्मवाद की; उसमें तो भारत में असंख्य चुनौतियां हैं। यह ठीक है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है परंतु फिर भी हिंदुत्व की भावना सभी धर्मों से ऊपर उठकर धर्मनिरपेक्ष ही है। यह सच है कि सिख धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म आदि कई धर्म हिंदू धर्म के ही घटक है परंतु यहां भारतीय धार्मिक परंपरा के अनुसार मुस्लिम धर्म को हिंदू धर्म का कट्टर विरोधी धर्म भी माना जाता है। इसके समकक्ष ईसाई धर्म का प्रारूप भी खड़ा कर दिया जाता है। परंतु मैं इस बारे में अपनी राय ऊपर ही स्पष्ट कर चुका हूं कि अहिंसा की भावना से ओतप्रोत हर व्यक्ति मेरी नजर में हिंदू है।

उपरोक्त सभी कारण इस बात की पुष्टि करते हैं कि कुछ लोग मात्र विरोध के लिए विरोध और मात्र पक्ष के लिए पक्ष करते हुए नजर आते हैं, जबकि उन्हें हिंदू और हिंदुत्व की सही-सही समझ है ही नहीं। हालात यहां तक हो गए है कि हिंदू धर्म के ही मानने वाले कुछ राजनैतिक दलों के उच्च पदस्थ नेता हिंदू समाज के ही बीच में शहर ए आम हिंदुत्व को हराने की बात तक कह डालते हैं। आज भारत के लिए सचमुच एक बहुत बड़ी विडंबना है कि जिन पूर्वजों ने हिंदुत्व की भावना को पुष्ट करने के लिए अपनी अस्थियां तक गला दी, उनको आज यह कहकर श्रद्धांजलि दी जा रही है कि हमने हिंदुस्तान में हिंदू बहुल क्षेत्र में हिंदुत्व को परास्त कर दिया है।

• मानव धर्म •

शारीरिक संरचना के आधार पर देखें तो समूचे विश्व के लोग एक जैसी संरचना के आधार पर बने हुए हैं। उनके रंग जरूर अलग-अलग हो सकते हैं परंतु शरीर की बनावट एक जैसी है। उनके जन्मने और मरने का तरीका एक जैसा है। भले ही अंत्येष्टि की क्रिया अलग-अलग हो। उनके रक्त का रंग सबका एक जैसा है, भले ही उनके ग्रुप अलग – अलग हो। इस आधार पर अगर धर्म को परिभाषित करने की कोशिश करें तो कहना न होगा कि कुदरत ने मनुष्य जाति के लिए धरती पर एक ही धर्म प्रतिस्थापित किया है जिसका नाम है मानव धर्म।

• हिंदुत्व का मूल मंत्र •

संरचनात्मक ढांचे के अनुसार कुदरत ने जातियां भी दो ही बनाई हैं, जिनका नाम है नर और नारी। फिर ये बाकी के विवाद क्यों और किस लिए? संसार को सुंदर बनाने के लिए और अधिक सुखदाई बनाने के लिए हमें अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे की सुख – शांति में कभी बाधा नहीं पहुंचानी चाहिए। यही हिंदुत्व का मूल मंत्र है।

• चन्द पैसों के लालच में अपना जमीर नहीं बेचना •

पर न जाने आज समाज के हर बुद्धिजीवी वर्ग को और समाज के हर प्रतिष्ठित व्यक्ति को कौन सा नशा लग गया है कि वे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दे रहे हैं और जनमानस के एक बड़े भाग की भावना को अपनी आर्थिक समृद्धि या सांस्कृतिक उठापटक के चलते आहत कर रहे हैं। उन्हे यह ध्यान रखना चाहिए कि वे समाज के आदर्श होते हैं। वे यदि समाज में फुहड़ता परोसेंगे तो समाज उनकी नकल करके फुहड़ता का शिकार बनता जाएगा। वे यदि शालीनता पेश करेंगे तो समाज भी शालीन होगा। इसलिए उन्हें बड़ी जिम्मेवारियों के साथ हर भूमिका अदा करनी चाहिए। चन्द पैसों के लालच में अपना जमीर नहीं बेचना चाहिए।

हर नेता – अभिनेता को बड़ी जिम्मेवारी के साथ अपना बयान देना चाहिए। हिंदुस्तान में हिंदुत्व की भावना को हराने की बात करना अपने आप में बहुत बड़ी विडंबना है। इसका सीधा सा अर्थ है हिंदुस्तान में अहिंसात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देना और असामाजिक व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना। आज प्रत्येक भारतीय को जाति, धर्म और सम्प्रदाय के झगड़ों से ऊपर उठ कर पूर्ण हिंदुत्व को समझना होगा तथा उपनिवेशवाद की विकृत मानसिकता से बाहर आना होगा। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जिस दिन हम पूरे भारत को मानसिक रूप से विदेशी संस्कृति और सभ्यता का गुलाम बना देंगे।

• शारीरिक गुलामी से कहीं ज्यादा खतरनाक मानसिक गुलामी •

यह विषय भी विचारणीय है कि शारीरिक गुलामी से कहीं ज्यादा खतरनाक मानसिक गुलामी होती है। इस बात के प्रमाण इतिहास में भरे पड़े हैं कि संस्कृति और सभ्यताएं कई बार विकृत मानसिकता की शिकार हो चुकी है। उदाहरण के लिए पारसी धर्म है, जो आज लगभग अपने ही जन्म स्थल देश में समाप्त सा हो चुका है। हां भारत ही एक ऐसा देश है, जहां उसके भी कुछ अंश शेष है। यही है हिंदुत्व के समर्थक हिन्दुस्तान का हिन्दू जनमानस। जो सब धर्मों का सम्मान करता है पर शर्त यह है कि वे दूसरे धर्मों के मतावलंबी भी किसी दूसरे धर्म के भाव बोध को जाने – अनजाने में ठेस पहुंचाने की कोशिश न करें।

जबकि आज के दौर में यही सब जान बूझ कर हो रहा है। भारत में दक्षिण और वाम पंथ की लड़ाई अधिकतर इन्ही वैचारिक संघर्षों के धरातल पर निरन्तर जारी है। आज लोग अपनी मानवीय संवेदनाओं को खोते जा रहे हैं। हमे निर्भया हत्या काण्ड के दौरान हुए राष्ट्रव्यापी आंदोलनों का दृश्य और भाव भी याद है तथा आज श्रद्धा और उसके जैसी कई और निर्मम हत्याओं के मामले भी याद है। पर यह साफ – साफ देखा जा सकता है कि धीरे – धीरे देश के लोगों की मानसिक भावनाएं व संवेदनाएं निरन्तर पतन की ओर जा रही है।

निर्भया के दौर का जन भाव आज श्रद्धा के मामले तक फीका पड़ गया। ऐसा नहीं है कि सब कुछ खत्म ही हो गया है। पर यह सत्य है कि लोग व्यवस्था की चक्की में पिस कर ज्यादा चिकने हो गए हैं। या शायद उन्हे यह ज्ञान हो गया हो कि व्यवस्था का विरोध करने से कुछ नहीं होगा क्योंकि यहां सुनता ही कोई नहीं है। यहां तो हकीकत यह हो गई है कि जिसकी चलती है तो उसकी क्या गलती है?

उदाहरण के लिए हाल ही में विवादों में घिरी पठान फिल्म के गाने को ही ले लो। एक पक्ष उसे ठीक ठहरा रहा है और दूसरा गलत। जबकि दोनों पक्षों में वाद विवाद करने वाले अधिकतर हिन्दू ही है। जबकि असलियत तो यह है कि इस तरह के अश्लील चलचित्रों को स्क्रीन पर प्रदर्शित करने से रोकने के लिए तो सभी धर्मों के लोगों को एक जुट होकर सामने आना चाहिए। इस प्रकार की अर्धनग्नता भरी सभ्यता समाज में परोसना नीरी पाश्विकता परोसना है। यह पाश्विकता न ही तो हिन्दू धर्म वालों की सामाजिकता के लिए ठीक है और न ही तो मुस्लिम धर्म के लोगों की सामाजिकता के लिए।

इतना ही नहीं किसी भी धर्म की सामाजिकता के लिए ऐसी पाश्विकता बिल्कुल भी सुसभ्य नहीं है। ऐसी घटनाएं चाहे जान बूझ कर कोई करे चाहे अनजाने में। उसका सार्वजनिक विरोध होना चाहिए। फिर वह किसी भी धर्म का हो या फिर किसी भी समुदाय का। यह फूहड़ मानसिकता समाज के लिए किसी भी सूरत में ठीक नहीं है। ऐसे उचाटन भरे फिल्मी दृश्य तथा नशीले पदार्थों के सेवन समाज को मानसिक तौर पर अपाहिज बना कर छोड़ेंगे।

शायद इससे बड़ी कोई और हिंसा, मानसिक हानि हो ही नहीं सकती। फिर भी किसी को अपनी ही बात को सही ठहराना हो तथा अपनी रोजी के चक्कर में समाज के पतन को नजरंदाज करना हो, तो उसका कोई इलाज नहीं है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

Must Read : क्या लिव इन रिलेशनशिप ठीक है?

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — मेरे मत के अनुसार यदि हिन्दू शब्द को भाषिक संरचना के आधार पर परिभाषित किया जाए तो हिन्दू शब्द “हिं + दू” के मेल से बना है। इसमें “हिं” का अर्थ हिंसा और “दू” का अर्थ दूर होता है। अर्थात ऐसा व्यक्ति/समुदाय/समाज जो हिंसा से दूर रहता हो, वह हिन्दू है। अगर धर्म को परिभाषित करने की कोशिश करें तो कहना न होगा कि कुदरत ने मनुष्य जाति के लिए धरती पर एक ही धर्म प्रतिस्थापित किया है जिसका नाम है मानव धर्म। संरचनात्मक ढांचे के अनुसार कुदरत ने जातियां भी दो ही बनाई हैं, जिनका नाम है नर और नारी। फिर ये बाकी के विवाद क्यों और किस लिए? संसार को सुंदर बनाने के लिए और अधिक सुखदाई बनाने के लिए हमें अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके दूसरे की सुख – शांति में कभी बाधा नहीं पहुंचानी चाहिए। यही हिंदुत्व का मूल मंत्र है। अश्लील चलचित्रों को स्क्रीन पर प्रदर्शित करने से रोकने के लिए तो सभी धर्मों के लोगों को एक जुट होकर सामने आना चाहिए। इस प्रकार की अर्धनग्नता भरी सभ्यता समाज में परोसना नीरी पाश्विकता परोसना है। यह पाश्विकता न ही तो हिन्दू धर्म वालों की सामाजिकता के लिए ठीक है और न ही तो मुस्लिम धर्म के लोगों की सामाजिकता के लिए।

—————

यह लेख (हिन्दू और हिंदुत्व – एक समीक्षा।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ। Tagged With: Essay on Hindu and Hinduism, hemraj thakur, hemraj thakur articles, Hindu and Hindutva, hindu aur hindutva mein kya antar hai, What is Hindutva : हिन्दुत्व क्या है और क्या हैं इसकी विशेषताएं, क्या है हिन्दुत्व ? -kmsraj51, सनातन धर्म, हिंदुत्व और हिंदू में फर्क, हिंदुत्व का इतिहास, हिंदू धर्म और हिंदुत्व, हिंदू हिंदुत्व और हिंदुइज्म, हिन्दू और हिंदुत्व, हिन्दू और हिंदुत्व - हेमराज ठाकुर, हिन्दू और हिंदुत्व एक समीक्षा, हिन्दू और हिंदुत्व क्या है, हिन्दू और हिंदुत्व पर निबंध in hindi, हिन्दू की पहचान, हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व का फ़र्क़, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी। ♦

गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा।

भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

अब वे व्यापारी से यहां के सरकारी हुक्काम बन बैठे। जब भारत के रियासती शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता को भी अंग्रेजी चाल का पता चला कि ये तो हमे उकसाने का और लड़ाने का काम कर रहे हैं और अपना सम्राज्य स्थापित कर रहे हैं, तो तब अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए भारतीय शासक वर्ग के साथ – साथ आम जनता के जागरूक तबके ने भी आजादी की जंग मिलकर अंग्रेजी शासन व्यवस्था के खिलाफ छेड़ दी।

फिर वह चाहे 1857के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बात हो या फिर असेंबली हाल के बम्ब विस्फोट की घटना। चाहे फिर आजाद हिन्द फौज की स्थापना की बात हो या फिर भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम। इन सभी प्रक्रियाओं में एक लम्बा वक्त जरूर लगा पर यह भी सत्य है कि यही वे घटनाक्रम थे, जिनकी बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं और “आजादी का अमृत महोत्सव” उत्सव मना रहे हैं।

यह भी सच है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इस महा अभियान में गर्म दल और नर्म दल दोनों ने अपनी – अपनी भूमिकाएं अपने – अपने तरीके से निभाई। पर न जाने आज “आजादी के 75साल” बीत जाने के बाद हम क्यों उन तमाम वीर शहीद बहादुरों को भूल से जा रहे हैं, जिन्होंने हमे यह आजादी की सौगात दिलाने में अंग्रेजी हुकूमत की कड़ी यातनाओं के साथ – साथ अपने प्राणों की आहुति भी खुशी – खुशी दी। यदि आज हम औपचारिकता के तौर पर विशेष अवसरों के मौकों पर चन्द स्वतंत्रता सेनानियों को और आजादी के प्रमुख नेताओं को याद करते भी हैं तो उसमें भी एक अधूरा सा पन मुझे नजर आता है।

मैं सोचता हूं कि क्या मात्र इन चन्द कद्दावर नेताओं या स्वतंत्रता सेनानियों ने ही भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई? यदि ऐसा ही था तो फिर भारत इतने लम्बे दौर तक गुलाम क्यों रहा? क्यों फिर रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान ही भारत आजाद नहीं हुआ? ऐसे अनगिनत सवाल बुद्धि के विवेक कक्ष में उठते हैं और दौड़ते रहते हैं।

यह सभी जानते हैं कि अकेला चना भाड़(पहाड़) नहीं फोड़ता। पर फिर भी पूरी मुहिम का अधिकाश श्रेय उस मुहिम के मुख्य पत्र को जाता है और जाना भी चाहिए, क्योंकि उसने उस मुहिम को शुरू किया होता है तथा बाकियों को चेतना दे कर उस मुहिम में शामिल किया होता है। परन्तु मेरे मन में फिर से एक प्रश्न कौंधता है कि ठीक है, मुख्य पत्र को श्रेय दो। परन्तु उस मुहिम को सफल बनाने में अपना योगदान देने वाले अनेकों साथियों को भी तो उस सन्दर्भ में याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने उस मुहिम को कामयाब बनाया होता है। पर नहीं, यह एक परिपाटी सी बन गई है और निरन्तर चली आ रही है कि मुख्य पात्र को ही याद किया जाता है और बाकियों को समय के गहवर में बिसार दिया जाता है।

कुछ ऐसा ही आजादी के आंदोलन की घटना में भी देखने को मिलता है। जो लोग इस मुहिम के नायक थे या यूं कहो कि रसूखदार व्यक्तित्व थे, उन्हे तो आज भी हम याद करते हैं और उनके नाम के कसीदे गढ़ते हैं। पर जिन्होंने जमीनी स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम को गति दी और अंजाम दिया, उन्हे इतिहास के पन्नों में स्थान तक नहीं दिया गया।

यह बात ठीक है कि प्रभावशाली व्यक्तित्वों का जिक्र विशेष रूप से होना चाहिए।परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फिर बाकियों को बिल्कुल भूल ही जाएं।यह तो उनके साथ न्याय नहीं है और इसके साथ – साथ यह रवैया नई पीढ़ी में भी नकारात्मकता भरता है कि “करता कोई और है और वाहवाही किसी और को ही मिलती है।” मेरा मानना है कि जिसका जो मान – सम्मान बनता है, वह उसे मिलना चाहिए। तभी किसी कार्य या बात का उत्कर्ष बना रहता है। वरना नकारात्मकता स्वभाविक है।

आज आजादी के अमृत महोत्सव के सुअवसर पर यह बात मैं इसलिए कर रहा हूं कि हम सब मिलकर इस बात का मन्थन करे कि इस आजादी को दिलाने में अपना योगदान और बलिदान देने वाले ऐसे कितने स्वतंत्रता सेनानी थे, जो हमारे क्षेत्र या जिले के थे पर इतिहास के पन्नों में उनका नाम न होने के कारण आज समाज उन्हें और उनके बलिदानों को थोड़ा सा भी नहीं जानता। यदि थोड़ा बहुत कुछ कोई जानता भी है तो वह भी गौण है।

मेरे जिला मण्डी हिमाचल प्रदेश से ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में अपना योगदान तो दिया पर उन्हें इतिहास में या लोक साहित्य में वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था। हां कृष्ण कुमार नूतन और डा गंगा राम राजी ने अपने साहित्य में कुछ – कुछ जिक्र इन स्वतंत्रता सेनानियों का जरूर किया है पर उससे शायद इन्हें वह सम्मान मिला हो, जिसके ये हकदार हैं। इन स्वतंत्रता सेनानियों में कुछ की जानकारी जो मैं जुटा पाया हूं, कुछ यूं है :—

• रानी खैरागढ़ी उर्फ रानी ललिता कुमारी •

रानी खैरागढ़ी का नाम जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रगण्य है। असल में इनका नाम रानी ललिता कुमारी था। परन्तु इनका पैतृक घर खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में था, जहां से इनका विवाह जिला मण्डी के प्रथम पढ़े लिखे राजा भवानी सेन से हुआ था। शायद तत्कालीन पहाड़ी रिवायत के चलते मण्डी जनपद के लोगों ने रानी का नाम उनके मायके के नाम के आधार पर खैरीगढ़ी रख दिया हो। क्योंकि पहाड़ों में उस दौर औरतों को उनके असली नाम से हट कर उनके पैतृक गांव के आधार पर रखे नाम से ही पुकारा जाता था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि रानी के राष्ट्र प्रेम से प्रभावित होकर जनता उन्हे प्यार से रानी खैरीगढी कहते और यही नाम मशूहर हो गया। जबकि रानी के पिता के गांव का नाम खैरागढ़ था तो उस आधार से नाम तो खैरागढी बनता था। पर जनता ने खैरीगढ़ी रख दिया तो वही प्रसिद्ध हुआ।

जानकारों की माने तो राजा भवानी सेन मण्डी का पहला पढ़ा लिखा राजा हुआ। इस कारण उनके लिए एक पढ़ी लिखी रानी के रिश्ते की तलाश की गई। चारों ओर जब खोजबीन शुरू हुई तो एक उचित रिश्ता खैरागढ़ उत्तर प्रदेश में जा कर रानी ललिता कुमारी का मिला। राजा की रानी से शादी हो गई। उत्तर प्रदेश में उन दिनों अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावतें चर्म पर थी। तो जाहिर है कि कुमारी ललिता भी पढ़ी लिखी सजग नारी होने के नाते उन बगावती सुरों में ताल देने में अहम किरदार रही होगी। रानी का यह चस्का विवाह के बाद भी कम नहीं हुआ। जब उसने देखा की मण्डी रियासत की जनता के साथ न्याय नहीं हो रहा है। वे अंग्रेजी शासन व्यवस्था के चंगुल में कोल्हू के बैल की तरह परेशान है और राजा तथा राजा के मंत्री भी जनता का शोषण ही कर रहे हैं।

उन्हे जनता के सुख – दुःख की चिन्ता ही नहीं है और राजा जनता से कट कर अपने ही रसूख में जी रहा है। तब रानी ने जनकल्याण और देश प्रेम की भावना राज्य की जनता में भरना शुरू की। यह खबर राजा को अंग्रेजों ने और राजा के चाटुकार मंत्रियों ने गुप्त रूप से देना शुरू कर दी थी और राजा को रानी के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया था। राजा मंत्रियों और अंग्रेजों की बातों में आ कर रानी से विमुख होता रहा। नौबत यहां तक आ गई कि रानी को राजा के प्रेम से वंचित रहना पड़ा। परन्तु रानी ने हार नहीं मानी। वह जनता की सेवा में लगी रही और उनमें राष्ट्र प्रेम की आग जलाती रही। जब रानी को लगा कि राजा उसकी बाते नहीं मानेगा तो वह स्वयं राज्य का कामकाज देखने लगी। परन्तु वहां भी मंत्रियों ने रानी के आदेशों की पालना को नकारना शुरू किया।

तब रानी को लगा कि व्यक्तिगत सुखों से कहीं ज्यादा बड़ा सुख जन सामूहिक सुख है। एक राज घराने का प्रमुख कर्तव्य भी वही होता है। रानी की यह सोच उसके अविवाहित जीवन के बगावती तेवरों को और ताव देती है तथा रानी इस पहाड़ी रियासत में आजादी के आंदोलन की प्रमुख पैरोकार बनी। अब उसे अपने जैसे कुछ और ऐसे सरफीरों की तलाश थी, जिनके भीतर भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ रानी की ही तरह बगावती आग जल रही थी। इतना ही नहीं, कुछ जानकारों का तो कहना है कि परिस्थितियां तो यहां तक बिगड़ गई थी कि रानी को इस सन्दर्भ में राजा भवानी सेन से भी दो – दो हाथ करने पड़े थे। यानी पहाड़ी रियासतों में रानी खैरागड़ी ने झांसी की रानी की भूमिका निभाई।

• भाई हिरदा राम •

इनका नाम मण्डी रियासत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुखता से लिया जाता है। इनका जन्म 28 नवम्बर 1885 को मण्डी शहर में श्री गज्जन सिंह जी के घर हुआ था। लोगों में इनको भाई के नाम से प्रसिद्धी मिली थी। स्वामी कृष्णानंद जी से प्रेरणा ले कर ये क्रांति पथ पर चल पड़े थे। सन 1914 में ये अमृतसर में रासबिहारी बोस, डा• मथरा सिंह, भाई परमानंद तथा पिंगले आदि क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए। धीरे – धीरे ये रासबिहारी बोस के विश्वास पात्र बने।

31 दिसम्बर 1914 की विरपाली धर्मशाला में हुई क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक में इन्हें बंब बनाने का काम दिया गया। यह बात भी खासी चर्चा में है कि भगत सिंह जी ने जो बंब असैम्बली हाल में फैंका था, वह भाई हिरदा राम ने बनाया था। इन्हे इस संघर्ष में अंग्रेजी सरकार द्वारा असैम्बली बंब धमाके की साजिश में पकड़े जाने पर फांसी की सजा सुनाई गई, परन्तु बाद में वह सजा आजीवन कारावास की सजा में बदली गई। आजीवन कारावास की सजा पाने के लिए इन्हें काला पानी यानी अंडोमान की जेल में भेजा गया। वहां पर वीर सावरकर और भाई हिरदा राम एक ही कोठरी में रखे गए थे।

सन 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो भाई जी को जेल से मुक्ति मिली। इस तरह अपने जीवन को राष्ट्र सेवा में समर्पित करते हुए 21अगस्त 1965 ई० को भाई जी पंच तत्त्व में विलीन हो गए। इनकी यादगार में आज मण्डी शहर के बीचो बीच बनी इन्दिरा मार्केट में एक प्रतिमा बनाई गई है, जिसका अनावरण 21अगस्त 2002 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल जी ने तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री भारत सरकार एवम पूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश श्री शांता कुमार जी के साथ मिल कर किया था। इस अवसर पर सांसद सुरेश चंदेल, महेश्वर सिंह और अनिल शर्मा जी भी मौजूद रहे।

• कृष्णा नन्द स्वामी •

स्वामी जी मण्डी शहर के निवासी थे। इनके स्वतंत्रता आन्दोलन का क्षेत्र सिंध प्रांत रहा। इनकी सारी गतिविधियां सिंध से ही चलती थी। स्वामी जी ने 35 वर्षों के अपने स्वतंत्रता संघर्ष में कई बार जेल की सजा भुगती। यही वे कारण थे, जिनके चलते सरदार पटेल ने इन्हे सिंध के गांधी की उपाधि दी थी। इन्होंने दो लाख से भी अधिक हिंदुओं को समुद्र के रास्ते सिंध से मुम्बई और अहमदाबाद पहुंचाया था।

इनकी जेल यातनाओं में 1921-22 में पिकेटिंग के लिए धारा 132 के अधीन एक वर्ष का कारावास, खुलेआम भाषण के लिए धारा 108 सी.पी. सी. के अधीन अक्टूबर 1922 से सितम्बर 1923 तक एक वर्ष का कारावास, सी. पी. सी.की धारा 177 के तहत 1930 से 1931 तक एक वर्ष का कारावास, 1932 से 1934 तक दो साल का कारावास तथा भारत छोड़ो आन्दोलन में 1942 से1945 तक तीन साल का कारावास गिना जाता है। भाई हिरदा राम जी ने भी स्वामी जी से ही क्रान्ति की प्रेरणा पाई थी।

• अर्जुन सिंह राणा •

अर्जुन सिंह राणा जी का जन्म 30 मई 1920 को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान में हुआ। राणा जी एक पढ़े – लिखे व्यक्ति थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में बढ़-चढ़कर के भाग लिया। 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी, उस फौज में राणा जी ने कैप्टन के पद पर अपनी सेवाएं दी थी। राणा जी ने एक वर्ष तक का कारावास भी भोगा। इनका संबंध हिमाचल प्रदेश स्वतंत्रता सेनानी संगठन से भी रहा।

• केशव चंद्र शर्मा •

केशव चन्द्र शर्मा जी जिला मण्डी के रिवालसर नामक स्थान में रियूर नामक ग्राम के निवासी थे। 1944 में शर्मा जी प्रजामंडल की गतिविधियों में शामिल हुए थे। इतना ही नहीं ये नौकरी करते थे परंतु आंदोलन का सहयोग करने के लिए इन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। रियासती विलय आंदोलन में शर्मा जी ने भी भरपूर संघर्ष किया था। शर्मा जी ने 4 माह 10 दिन तक मंडी जेल में सजा भी काटी थी।

• खेम चंद •

खेम चंद जी का जन्म लगभग 1904 ई० के आस पास हुआ माना जाता है। इनके पिता का नाम श्री बृज लाल था। इनका जन्म स्थान जिला मंडी के मंडी शहर में भूतनाथ नामक स्थान पर हुआ था। इन्होंने अपने पिता के साथ जलावतन रहने से देशभक्ति की भावना प्राप्त की थी। मंडी राज्य में प्रजामंडल आंदोलन में खेम चंद जी ने अपनी सक्रिय भूमिका अदा की थी। इस दौरान इन्हें मुंशी की नौकरी से भी निष्कासित कर दिया गया था। सन 1936 – 37 में खेम चंद जी ने मंडी सत्याग्रह में भी अपनी भागीदारी प्रदान करके आजादी के संघर्ष में अपना योगदान दिया था।खेम चंद जी का स्वर्गवास 3 जुलाई 1982 ई० को हुआ।

• गुलजारी राम •

गुलजारी राम जी का जन्म 10 अगस्त 1915 ई० में जिला मंडी के सरका घाट इलाके में भदरोट नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री टोडर था। आजाद हिंद फौज में इन्होंने बतौर सैनिक काम किया। गुलजारी राम जी दिसंबर 1940 से मई 1946 तक सिंगापुर, रंगून और मलाया आदि स्थानों में लंबे कारावास में भी रहे। इन्हें बिना वेतन के निष्कासित कर दिया गया था और पांच वर्ष तक युद्ध बंदी बनाकर इन्हें कठिन से भी कठिन यातनाएं दी गई थी।

• गौरी प्रसाद •

गौरी प्रसाद जी का जन्म 18 अक्टूबर 1918 ई० को जिला मंडी के नेरचौक नामक स्थान पर हुआ था। प्रसाद जी लाहौर से मेडिसिन में डिग्री लेकर आए थे। उन दिनों लाहौर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था इसलिए प्रसाद जी ने वहीं से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की प्रेरणा प्राप्त की थी।

इस आंदोलन में कूदकर गौरी प्रसाद जी ने अपना बढ़-चढ़कर योगदान दिया। जब वहां से लौटकर वे मंडी आए तो उन्होंने 1940 में मंडी प्रजामंडल में प्रवेश किया। 1940 से लेकर 1947 ई॰ तक प्रजामंडल के प्रधान रहे। इसी दौरान उन्हें 6 मार्च की जेल की सजा भी खानी पड़ी थी। सन 1951 में प्रसाद जी को विधानसभा का सदस्य चुना गया था। प्रसाद जी का योगदान अनेक संस्थानों एवं गतिविधियों में निरंतर रहता था।

• जे पी बागी •

बागी जी का जन्म 15 जुलाई 1908 ई० को स्कूल बाजार जिला मंडी में हुआ माना जाता है। अंग्रेजो के खिलाफ हमेशा बगावती तेवर रखने वाले जे पी बागी को यह बागी नाम इसी कारण प्राप्त हुआ था। 1928 से 1934 तक लाहौर जेल में लाहौर षड्यंत्र के जुर्म में उन्हे 6 साल तक के कारावास की सजा भी हुई थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और 1947 तक 2 वर्ष 6 माह कारावास में रहे। कुल साढ़े ग्यारह वर्ष तक जेल यात्रा में रहे। भारत सरकार ने इन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया था।

• नरेंद्र पाल जोशी •

नरेंद्र जी जिला मंडी के लूनापानी के निवासी थे। 15 मई 1892 में उनका जन्म हुआ था। इन्होंने 1912 में एक अंग्रेज की हत्या की थी। यही इनका स्वाधीनता संग्राम में प्रवेश होने का प्रथम सोपान था। इन्होंने शादी नहीं की थी। 1918 में सूरत के जंगलों में पुलिस मुठभेड़ में इन्हें गोली लगी थी। जलियावाला बाग कांड के बाद अंग्रेजों का विरोध करते हुए पकड़े गए और पांच साल तक जेल में ही रहे। 1942 में जब जेल से रिहाई हुई तो पुनः संघर्ष में जुट गए। रावलपिंडी बम विस्फोट में 3 वर्ष का कारावास हुआ। 1928 में अंग्रेजों ने इन्हे पुनः गिरफ्तार कर लिया। 1932 में हिसार में 1 वर्ष का कारावास और काटा। सन 1934 में पुनः 3 वर्ष की सजा हुई। 1936 के बाद आर्य प्रतिनिधि सभा में कार्य कियाl इसके बाद वे लूनापानी में स्थाई रूप से रहने लगे थे।

• बुद्ध भाट •

भाट जी जिला मंडी की तत्कालीन सुकेत रियासत के सुंदर नगर पुराना बाजार में रहते थे। इनकी भागीदारी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से रही। इन्होंने कई वर्षों तक कठिन सजा भी काटी। सुकेत रियासत के विरुद्ध क्रांति तथा षड्यंत्र के झूठे आरोप में अभियोग तथा लंबे समय के लिए कारावास की यातनाएं भाट जी ने सही। सुकेत रियासत की जेल तथा पंजाब जेल में ग्यारह मास, जालन्धर में छः मास, रायपुर में दस मास, मुल्तान में आठ मास, रावलपिंडी में दस मास तथा शिमला में एक मास तक कारावास काटा।

• सन्त सिंह आजाद •

सन्त सिंह जी का जन्म 1914 में कटोह नामक गांव में समराला में हुआ था। जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज खड़ी की तो सन्त सिंह आजाद जी भी नेता जी के आवाह्न पर उनकी फौज में लेफ्टिनेंट के पद पर शामिल हुए। आजाद हिन्द फौज का हिस्सा होने के नाते ही इन्होंने अपने नाम के साथ आजाद शब्द जोड़ दिया था।

सन्त सिंह आजाद ने नवम्बर 1943 में मांडला में “दिल्ली चलो” का नारा बुलन्द किया था तथा 1944 में दलेल नामक स्थान पर अंग्रेजों पर हमला किया था। इसी साल वे दीमापुर चले गए थे और वहां पर एक हमले के दौरान जख्मी हो गए थे।इसके बाद अंग्रेज सेना द्वारा गिरफ्तार किए गए।

17 अप्रैल 1946 को मण्डी पहुंच कर प्रजामंडल के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया। सन 1947 में पुनः तीन मास के लिए मण्डी की जेल में कारावास काटा। सत्याग्रह आन्दोलन में शामिल होने के कारण बिलासपुर के राजा द्वारा बन्दी बना लिए गए तथा जेल में भारी मार पीट उनके साथ की गई थी। वहां से छूटने पर पुनः सत्याग्रह आन्दोलन में सक्रियता से जुट गए। भारत सरकार ने इन्हे 1972 में ताम्रपत्र से सम्मानित किया।

• कुछ नायक ऐसे भी •

कुछ नायक ऐसे भी थे जिन्होंने अपने परिवार की कोई परवाह न करते हुए देश से अंग्रेजों को खदेड़ने के कार्य में रात दिन एक कर दिया। मण्डी एक ऐसा जिला रहा है, जहां से बहुतेरे स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं। इतना ही नहीं इन स्वतंत्रता प्रेमियों को राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता था और मण्डी का नाम राष्ट्रीय फलक पर अंकित कर राष्ट्र की आजादी में अपना अहम योगदान दिया। इसी प्रकार के अनेकों रणबांकुरों ने अपने घर परिवार की परवाह छोड़ कर देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया। परंतु उन्हें समय के प्रवाह में जमाने ने भूला दिया। वे सब उनके योगदान के अनुसार न ही तो आज याद किए जाते हैं और न ही उन्हें इतिहास के पन्नों में जगह मिली। यह दशा अपने आप में एक गम्भीर विडम्बना है। यही वे कारण है, जिनके चलते समाज में कोई भी किसी कुव्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो कर अपना बलिदान नहीं देना चाहता। क्योंकि हमें समाज की काम निकल जाने के बाद भूल जाने की आदत पता है। इसलिए हम भी अपनी सुख सुविधा का उपभोग करते हुए व्यवस्था के साथ हो जाते हैं। जबकि हम सब जानते हैं कि यहां बहुत गलत हो रहा है।

अतः आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आज समाज को जरूरत है उन आजादी के रणबांकुरों के इतिहास को खोजने की और उस इतिहास को सबके सामने लाने की तथा युवा पीढ़ी को पढ़ाने की। ताकि युवा पीढ़ी को प्रेरणा और उन आजादी के परवानों को सम्मान मिल सके जो वक्त के गहर में कहीं खो से गए हैं। गुलामी की जंजीरों से मुक्ति का संघर्ष लगभग विश्व के अधिकतर देश समय – समय पर अपने – अपने ढंग से करते आए हैं और उसी कड़ी में एक नाम हमारे भारत देश का भी है। भारत वर्ष के इतिहास की एक समृद्ध कहानी है। जहां यह देश विभिन्न आतताइयों से अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए निरन्तर कडा संघर्ष करता रहा, वहीं इसे एक लम्बे दौर तक व्यापार के बहाने हिन्दुस्तान के शासक बन बैठे अंग्रेजों की गुलामी का भी शिकार होना पड़ा। भारतीय जातिवाद, धर्मवाद और साम्राज्यवाद को उकसा – उकसा कर अंग्रेजों ने सत्ताधीशों के साथ – साथ आम जनता को भी आपस में लड़वा – भिड़वा कर फूट डालो और शासन करो की नीति का सहारा लेकर पूरे भारत वर्ष पर धीरे – धीरे अधिकार प्राप्त किया।

—————

यह लेख (आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ। Tagged With: freedom fighters of district mandi, freedom fighters of district mandi himachal pradesh in hindi, hemraj thakur, hemraj thakur articles, आजादी का अमृत महोत्सव और जिला मण्डी के स्वतंत्रता सेनानी, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर की रचनाएँ

गुरु गुण और शिक्षा प्रणाली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गुरु, गुण और शिक्षा प्रणाली। ♦

गुरु बिन गुण असम्भव।

गुरु शब्द अपने आप में एक पूर्ण शब्द है जो मानवता के कल्याण एवं उत्थान के लिए एक सर्वोपरि दायित्व है। भारतीय शिक्षा जगत में जहां गुरु पद की महिमा को विभिन्न उपाधियों से अलंकृत किया है वहीं अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी गुरु के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।

प्राचीनतम इतिहास में यदि हम देखें तो गुरु अध्यात्म विद्या से संबंधित ज्ञान को देने वाले एक विशिष्ट धर्मात्मा को कहा जाता था। लेकिन कालांतर में व्यवस्था बदलती गई और गुरु का वह स्थान वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शिक्षक ने दे दिया है। जिसे आमतौर पर अध्यापक भी कहा जाता है।

• गुरुकुल शिक्षा प्रणाली •

यह भी एक पूर्ण सत्य है कि पुरातन समय में गुरु गुरुकुल व्यवस्था को संचालित करता था और वह उस कार्य के लिए किसी राज्य सरकार से कोई वेतन विशेष नहीं बल्कि अनुग्रहित अंशदान प्राप्त जरूर करता था।

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली जहां सामाजिक निर्माण के साथ-साथ मानसिक निर्माण का बीड़ा उठाती थी वही वह अध्यात्म विद्या के साथ – साथ चरित्र निर्माण का बोध कराने वाली शिक्षा का भी प्रावधान करती थी। मानसिक, बौद्धिक, काल्पनिक, आध्यात्मिक, चारित्रिक और राष्ट्र निर्माण के साथ-साथ आत्मा सुरक्षा और राष्ट्र सुरक्षा के भावों से ओतप्रोत शिक्षा प्रणाली में निरंतर भारतवर्ष में दी जाती रही।

यहां इस बात को स्पष्ट करना अति आवश्यक हो जाता है कि इस प्रणाली में गुरु का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव था, वह अपने आप में महत्वपूर्ण था। मानव के भीतर मानवता, इंसान के भीतर इंसानियत, हुकमाराम के भीतर हुकूमत और आवाम के भीतर राज भक्ति और राष्ट्रभक्ति की भावना अगर कोई भरता था तो वह गुरु ही होता था।

इन सभी गुणों के साथ – साथ अध्यात्म का परम लक्ष्य युक्त भावबोध अपने शिष्यों के अंदर जागृत करना इन गुरुओं का परम कर्तव्य और दायित्व होता था। इस दायित्व का निर्वहन करने के लिए ये गुरु लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। शायद यही वह कारण था जिस कारण से वे गुरु के पद पर विराजमान थे और समाज इन्हें आदर की दृष्टि से पूर्ण सम्मान के साथ देखता था।

• वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली •

वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली में जो मैकाले शिक्षा पद्धति चली। उसमें गुरुकुल व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया तथा उसके स्थान पर स्कूल शिक्षा प्रणाली को लागू किया गया। स्कूलों में अध्यापक प्रतिनियुक्त किए गए। इससे धीरे-धीरे गुरु पद की मर्यादा और गरिमा हीन होती गई। इसके पीछे अध्यापकों का वेतन भोगी होना भी एक कारण हो सकता है और उसके साथ – साथ समाज का पाश्चात्य शैक्षिक रवैया भी एक कारण हो सकता है।

• भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा •

परंतु इस सत्य को किसी भी तरह से नहीं चलाया जा सकता कि मनुष्य के जीवन में गुरु के बिना गुणों का प्रादुर्भाव संभव ही नहीं है। यही वह कारण है जिसके चलते भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु का दर्जा दिया गया और उसके पश्चात तो निरंतर हमारे जीवन में कई गुरु विभिन्न क्षेत्रों में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

इस बात का स्पष्ट उदाहरण भारतीय पौराणिक आख्यानों में दत्तात्रेय के जीवन चरित्र से हमारे सामने आता है। गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और सहजता ही इन गुणों को ग्रहण करने का एक मुख्य माध्यम होता है।

परंतु बड़े खेद की बात है कि आज के वर्तमान समाज में इन्हीं सब प्रारंभिक भावों का ही मनुष्य में पतन होता जा रहा है। गुरु शब्द का एक अर्थ बड़ा भी होता है। अर्थात अपने घर के, परिवार के और समाज के बड़ों के प्रति आदर, सम्मान, श्रद्धा और विश्वास रखना ही हम सब लोगों का दायित्व बनता है और वही दायित्व एक सद चरित्र व संतुलित – पुष्ट समाज का निर्माण करता है।

• बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है •

विडंबना यह है कि आज अपने बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाव घटता ही जा रहा है परंतु जो शिक्षक हमारी तोतली आवाज को सुधार कर एक पहलवानी का रूप प्रदान करता है और समाज को दशा और दिशा देता है। “छोटे से लेकर बड़े हो दीदार तक की मानस पटल को निखार करो” उसे देश और समाज का संचालन करने के लिए योग्य बनाता है। उसी गुरु के प्रति निरंतर श्रद्धा भाव घटता जा रहा है। शायद यही वह कारण है कि आज समाज में अनायास मानवीय घटनाएं हो रही है। अप्रिय वातावरण बढ़ता जा रहा है। चरित्र हीनता बढ़ती जा रही है। भ्रष्टाचार और लूट घसीट बढ़ती जा रही है।

मैं यह कतई नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह से समाज ही जिम्मेवार है। मैं यह भी नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह राजनेता और सरकारें ही जिम्मेवार है। हां इतना जरूर कहना चाहूंगा जो सरकार सत्ता में रह करके शिक्षकों के मान-सम्मान के प्रति इस समाज को जागृत करने का काम करेगी और शिक्षक वर्गों को चरित्रवान समाज के निर्माण के लिए प्रोत्साहित करेगी तथा शिक्षा प्रणाली में वह वातावरण तैयार करेगी। वह सरकार वास्तव में अपने दायित्व का पालन करने वाली राजनीतिक शक्ति कहलाएगी और इतिहास के पन्नों में अपना नया अध्याय अंकित करेगी।

ठीक इसी तरह समाज को भी अपने दायित्व का निर्वहन करने के लिए गुरु की मर्यादा का सम्मान करने वाले भावबोध को पुनः अपने भीतर जागृत करना होगा तथा सेवा, सत्कार और सत्संग जैसी महत्वपूर्ण गुणों को अपने भीतर पुनः समाहित करना होगा।

परंतु इस बात से भी मैं कभी गुरेज नहीं करता इसके लिए एक सद चरित्रवान गुरु का होना भी अनिवार्य है।

“आज के वर्तमान वातावरण में गुरु ने भी अपना चरित्र इस कारण से बिगाड़ दिया है, क्योंकि वह अपने आप को एक शिक्षक मान बैठा है। मैं यहां स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूंगा कि मैकाले की जो मंशा थी। आज पूरे शिक्षक वर्ग को उस मंशा से बाहर निकलने की जरूरत है।”

• राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में •

भले ही हम वेतनभोगी हो। परंतु राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने।

हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है।

भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमे पुनः अपने आप को शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा की सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बने। हमें सेवा, साधना, सत्संग और सद चरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। एक शिक्षक के जीवन में यह गुण होना अति अनिवार्य है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है तो एक समृद्ध समाज का निर्माण होता है। भारत की यही गुरु शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर जब विराजमान कर सकती है तो क्या वर्तमान समाज में हम सबको भारत को पुनः उस उत्कर्ष तक ले जाने के लिए कटिबद्ध नहीं हो जाना चाहिए ?

—————

यह लेख (गुरु, गुण और शिक्षा प्रणाली।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, गुण और शिक्षा प्रणाली।, गुरु, गुरु गुण और शिक्षा प्रणाली।, हिन्दी साहित्य, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ। Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur articles, गुरु गुण और शिक्षा प्रणाली - हेमराज ठाकुर, गुरु-शिष्य परम्परा, गुरुकुल शिक्षा पद्धति, गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था के गुण-दोष, जानें कैसे गुरुकुल शिक्षा प्रणाली आधुनिक शिक्षा प्रणाली से अलग है?, नई शिक्षा नीति पर निबंध हिंदी में, निबंध हिंदी में, प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली, वैदिककालीन शिक्षा के गुण व दोष, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर की रचनाएँ

साहित्य का प्रदेय।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ साहित्य का प्रदेय। ♦

“साहित्य समाज का दर्पण होता है” इस पंक्ति से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। किसी भी काल – खंड की तस्वीर जब हम देखना चाहते हैं तो उस दौर का साहित्य उठाते हैं और शोधों – परिशोधों के शिकंजे पर कस कर साहित्य – आइने में उस काल – खंड का अवलोकन करते हैं। इस शीशे को फ्रेम बद्ध करना एक सजग साहित्यकार का काम होता है। यानी संक्षेप में कहें तो इन तीनों का आपस में एक गहरा नाता है।भविष्य के फलक पर वर्तमान का यथार्थ अपनी कलम छेनी और कल्पना मिश्रित अनुभूति के हथौड़े से चित्रित करना जहां साहित्यकार का काम है, वहीं समाज की पीड़ाओं के आत्मसात भावबोध के उस उद्घाटन का नाम ही साहित्य है। स्पष्ट है कि साहित्य और साहित्यकार के दरम्यान (बीच में) समाज ही केंद्र बन कर रहता है।

• साहित्य मौखिक और लिखित दोनों रूपों में अनादिकाल से विद्यमान •

साहित्य मौखिक और लिखित दोनों रूपों में अनादिकाल से विद्यमान होकर अपनी सेवाएं दे रहा है। इसके अनवरत प्रवाह के चलते, इसने अनेकों पड़ावों को पार कर घाट – घाट का पानी पीया है। जहां साहित्य का प्रारंभिक रूप पौराणिक दंत कथाओं के रूप में लंबे समय तक मौखिक चलता रहा, वहीं श्रुतियों – स्मृतियों ने इस कड़ी को बनाए रखने की अपार भूमिका अदा की। समय बदला, परिस्थितियां बदली। इसी मौखिक रूप ने लिखित रूप धारण किया और अपने समय के साक्ष्य देने का जिम्मा उठाया। वेदों – वेदांतों से गुजरते हुए यह रामायण – महाभारत जैसी महा लोक कथाओं को पार कर जब हिन्दी साहित्य के आदिकाल में प्रवेश हुआ तो इसने अपना मिजाज सिद्धों – नाथों की चमत्कृत अनुभूतियों के साथ बदल दिया।

यह सच है कि उस दौर में भी इसने वीर रस का पान करते हुए श्रृंगारित अनुभूतियों और युद्घिय वातावरण का चित्रण करने में कोई कोर – कसर न छोड़ी। जहां – जहां इसे वात्सल्य, वीभत्स, आदि दृश्यों को उद्घाटित करना था, सो भी कुल मिलाकर बखूबी किया। यानी इस काल में भी साहित्य की मूलभूत योग्यताओं और क्षमताओं का प्रदर्शन साहित्यकारों ने संतुलित किया।

• हिंदी साहित्य का यौवन ही निखर आया •

अब भक्ति काल या मध्यकाल में तो विशेष कर हिंदी साहित्य का यौवन ही निखर आया था। साहित्यिक रसों, गुणों, शब्द शक्तियों और छंद – अलंकारों के साथ – साथ साहित्य लेखन की महा विधाओं का उत्कर्ष ही निखर आया। इस काल – खंड के साहित्यकारों ने समाज की स्थिति को अपनी लेखनी की नोक से जिस क़दर साहित्य में उतारा, वह सच में काबिले तारीफ है। यह तो हिन्दी साहित्य का वह काल है, जिसे कोई चाह कर भी भूला नहीं सकता।

रीति काल में जहां दरबारी साहित्य की झलक के साथ – साथ शृंगारिकता का दर्शन होता है तो वहां आधुनिक काल में छायावादी कवियों का प्रकृति प्रेम दिखता है। आधुनिक काव्य साहित्य साहित्यिक परंपराओं को तोड़ता हुआ छंद मुक्त हो गया और इधर काव्य रचना की परिपाटी को तोड़ता हुआ गद्य साहित्य के क्षेत्र में उद्भूत हुआ।

• वह सब साहित्य का ही प्रदेय है •

यह तो भारतीय साहित्य परंपरा की एक संक्षिप्त गाथा है। परंतु साहित्य मात्र भारत में ही नहीं रचा गया। साहित्य तो विश्व के हर कोने – कोने में और हर जाति – धर्म में अपनी – अपनी भाषाओं में और अपनी – अपनी तहजीब में रचा गया। इधर यहूदी धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबल से क्रिश्चियन धर्म का साहित्य शुरू हुआ और आधुनिक ईसाई मिशनरियों और इलियट जैसे प्रसिद्ध कवियों की कृतियों के साथ पल्लवित एवं संवर्धित हुआ।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद यदि हिन्दुओं के पवित्र और पुरातन ग्रंथ है तो इंजल, जबूर, तोरात और कुरान मजीद या कुरान शरीफ इस्लाम के पवित्र और पुरातन ग्रंथ है। अब चाहे पारसियों का साहित्य उठाओ या फिर बौद्धों, जैनों या सिखों का साहित्य उठाओ। धम्मपद, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब जैसी पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करने पर या फिर किसी भी धर्म या संप्रदाय के साहित्य का अवलोकन करने पर जो कुछ हमें प्राप्त होता है वह सब साहित्य का ही प्रदेय है।

• भाषा के आधार पर साहित्य •

जाति, धर्म और संप्रदाय को छोड़कर यदि हम भाषा के आधार पर भी साहित्य को देखने की कोशिश करेंगे तो वह भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अब चाहे संस्कृत का साहित्य हो या फिर हिंदी का। उधर अंग्रेजी, अरबी, फारसी या उर्दू का साहित्य हो चाहे फिर पाली, प्राकृत भाषा में रचित। पंजाबी, चीनी आदि विभिन्न भाषाओं में विपुल साहित्य की रचना हमें पढ़ने के लिए मिलती है। बात यहीं खत्म नहीं होती। बात तो यहां से शुरू होती है की साहित्य का प्रदेय क्या है?

• साहित्य के दो रूप •

यह प्रश्न जितना सरल है उतना ही इसका उत्तर भी सरल है। सीधी सी बात है कि विश्व के मानव मात्र के मन – मस्तिष्क में आज जो कुछ भी ज्ञान भरा पड़ा है, वह सब संसार के विविध साहित्य की ही देन है। इस संसार में साहित्य विद्यमान नहीं होता तो न ही तो संस्कृति और सभ्यता ही विकसित होती और न ही तो मनुष्य के पास मानव कल्याण एवं समाज उत्थान सम्बन्धी ज्ञान – विज्ञान होता। साहित्य ने हमें क्या नहीं दिया? साहित्य की देन को समझने के लिए हमें अनादि काल के उस परिप्रेक्ष्य में जाना होगा जहां से मौखिक साहित्य का उदय हुआ था। हम भलीभांति जानते हैं कि साहित्य के दो रूप हमें देखने को मिलते हैं : —

  1. मौखिक साहित्य। — Oral literature

  2. लिखित साहित्य। — Written literature

संसार की हर भाषा का साहित्य इन दो विभागों में बंटा हुआ है। जब मनुष्य को पढ़ना – लिखना नहीं आता था तो अवश्य ही उस काल खण्ड में हर भाषा का साहित्य मौखिक रूप से लंबे समय तक लोक में प्रचलित रहा। इन दोनों साहित्यिक विभागों के प्रदेय को समझने के लिए हमें इन्हें अलग – अलग तरीके से समझना होगा।

1. मौखिक साहित्य का प्रदेय : —

मौखिक साहित्य हर भाषा में श्रुति – स्मृति परंपरा में ही विद्यमान रहा। इस साहित्य ने जहां मानव मस्तिष्क और हृदय में भावनाओं एवं कल्पनाओं का विकास किया, वहीं दूसरी ओर मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता को पाशविक संस्कृति एवं सभ्यता से पृथक करने में भी अपनी अहम भूमिका अदा की।

धर्मों के आधार पर यदि हम मानव परंपराओं को समझने की कोशिश करेंगे तो उसमें कई गतिरोध पैदा हो जाते हैं। इधर हिंदू मतानुसार यदि पुनर्जन्म की परिकल्पना की गई है तो इस्लामिक धर्म इसके विपरीत चलता है। इस कड़ी को ठीक से समझने के लिए यदि हम प्रागैतिहासिक घटनाओं और पुरातत्वविदों की परिकल्पना को ही वैज्ञानिक पृष्ठभूमि से जोड़कर आधार माने तो मौखिक साहित्य की देन का ठीक – ठीक विश्लेषण कर पाएंगे।

इस दृष्टि से माना जाता है कि मनुष्य का विकास पशु योनि से धीरे – धीरे विकसित होकर आदिमानव के रूप में हुआ। वह मौखिक ज्ञान – विज्ञान के आश्रय से बौद्धिक रूप से विकसित होता गया और उसी बौद्धिक ज्ञान – विज्ञान के आधार पर उसने अपने बाह्य वातावरण को और अपने शरीर को निरंतर परिष्कृत करके नवीन ढर्रे में ढालने की कोशिश की। आज का सभ्य मानुष उस आदिमानव का परिवर्धित एवं परिष्कृत रूप है।

यदि इस बात को आधार माना जाए तो यह स्पष्ट हैं कि मौखिक साहित्य ने सचमुच समाज के लिए बहुत कुछ दिया है। यह वह काल था जब मनुष्य ने धीरे-धीरे सोचना शुरू किया था। सोची हुई बातों को वैचारिक ताने-बाने में गूंथना शुरू किया था। इतना ही नहीं उन गुंथी हुई बातों को, कथा और कहानियों का रूप देकर के उन्हें स्मरण रखने की कला सीख ली थी। यह मौखिक साहित्य जितना प्रासंगिक उस काल खण्ड में था, उतना ही प्रासंगिक आज के दौर में भी है। यही साहित्य की वह विधा है जो पुरानी पीढ़ी का ज्ञान एवं अनुभव नई पीढ़ी में संप्रेषित करती है और नई पीढ़ी को उसके आगे आने वाली नई पीढ़ी के लिए ज्ञान – विज्ञान संप्रेषित करने के काबिल बनाती है।

हमें याद है कि हमारे घरों में हमारी दादियां और नानियां हमें ढेरों कहानियां मौखिक रूप से सुनाया करती थी और उन्हें वे कथाएं व कहानियां हमेशा के लिए सैकड़ों की तादात में जुबानी ही याद थी। उन कहानियों में मानवीय मूल्य, सामाजिक प्रेरणा और उदात्त भावनाओं के साथ – साथ मानवीय संबंधों को सुदृढ़ करने की एक विशेष परिकल्पना विद्यमान रहती थी। अतः कहना न होगा कि मौखिक साहित्य ने वैश्विक धरातल पर अपना जो योगदान समूची मानव जाति को दिया है, वह सचमुच अविस्मरणीय है।

दया, करुणा, मानवता, जिजीविषा, प्रेम, सामाजिकता, सहनशीलता, सहानुभूति, विश्वसनीयता, विनम्रता, मेहनत, धार्मिकता, आध्यात्मिकता और खोजबीन जैसे गुण यदि मनुष्य में विद्यमान हुए हैं तो इसका मुख्य साधन मौखिक साहित्य ही रहा है। मानव जाति को यदि सामाजिकता और निरन्तर खोजबीन का गुण मौखिक साहित्य न सिखाता तो आज के पढ़े लिखे एवं तर्क से परिपूर्ण समाज में अव्यवस्था फैल जाती।

कहना न होगा कि हम लोग पढ़े – लिखे आदिमानव कहलाते। यह बात जरूर है कि हर समाज एवं धर्म में अपनी-अपनी सृष्टि रचना का क्रम धार्मिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है, परंतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मनुष्य प्रकृति का एक अभिन्न अंग है और उसने अवश्य ही मौखिक साहित्य का सहारा लेकर के आज तक के समाज तक पहुंचते-पहचते बहुत प्रगति की है।

सेवा, साधना और समर्पण की भावनाएं यदि मनुष्य के भीतर किसी ने भरी है तो वह मौखिक साहित्य ने ही भरी है। वरना आज की पढ़ी – लिखी पीढ़ी में ये गुण दूर – दूर तक देखने को नजर नहीं आते। कारण यही है कि आज का बालक दादियों और नानियों की उन मौखिक कथा कहानियों को नहीं सुनता है। इसलिए उसके व्यवहार में प्यार कम और विकार ज्यादा प्रभावी हो रहे हैं। यह भी सत्य है कि विकार पाशविक प्रवृत्ति के द्योतक है।

2.लिखित साहित्य की देन : —

जहां मनुष्य के आंतरिक भावबोध और संस्कारों का निर्माण करना मौखिक साहित्य की देन रहा है, वहां मनुष्य के मन और मस्तिष्क के बाह्य सामाजिक और व्यवहारिक पक्ष को अधिक कलात्मक और रोचक बनाना लिखित साहित्य की देन है। यह बात जरूर है कि लिखित साहित्य बहुत लंबे समय के बाद अस्तित्व में आया। परंतु जो भूमिका लिखित साहित्य ने मनुष्य जाति के लिए अदा की है वह अपने आप में अभिन्न है। जब से लिखित साहित्य अस्तित्व में आया तब से मनुष्य ने अपनी छोटी-बड़ी सभी सामाजिक घटनाओं को लिखित रूप से संग्रहित करने की कला सीख ली और उसे अपने पास में संजो करके रखने का उपक्रम मनुष्य जान गया। यह साहित्य का वह पक्ष है जो किसी भी समाज विशेष की और किसी भी काल खण्ड की स्थिति को अपने में समेट कर भविष्य की पीढ़ी को आईने की तरह बीते समय का दिग्दर्शन करवाता है ।

जहां मनुष्य ने अपने व्यवहारिक पक्ष को इस साहित्यिक पक्ष के द्वारा मजबूत किया वहीं उसने अपने सामाजिक पक्ष को भी साहित्य के इस पक्ष से सुदृढ़ किया। यह साहित्य का वह पक्ष है, जिसने विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं का वैचारिक आदान – प्रदान सुनिश्चित किया। इसी ने अनेकों संस्कृतियों और सभ्यताओं को लिखित रूप देकर मानव समाज के लिए सुरक्षित रखा। यही वह पक्ष है, जिसने मनुष्य को योग्य एवम साक्षर बनाया। यही वह पक्ष है, जिसने मनुष्य में तर्क, विवेक, स्पर्धा और निरंतर संघर्ष करना सिखाया। अध्ययन और अध्यापन भी इसी पक्ष की देन है। आज के युग में अध्ययन एवं अध्यापन का जो महत्त्व बन गया है, वह किसी से नहीं छुपा है। अनुलेखन, प्रतिलेखन अभिलेखन, पत्राचार, शीला लेखन या फिर स्तंभ लेखन आदि सारे उपक्रम इसी कड़ी की देन है।

आज का मनुष्य यदि देश – विदेश में जा कर या फिर इंटरनेट के माध्यम से जो कुछ भी सीख रहा है या फिर अपना अनुभव वैश्विक धरातल पर संप्रेषित कर रहा है तो वह साहित्य की इसी कड़ी का सहारा लेकर सब कर रहा है। लिखित साहित्य के माध्यम से ही आज यह संभव हो पाया है कि प्राचीनतम से भी प्राचीनतम ज्ञान – विज्ञान से लेकर नवीनतम से भी नवीनतम ज्ञान – विज्ञान को हम आज तथ्यात्मक ढंग से खोजबीन करके पुष्ट कर सकते हैं और समझ सकते हैं। यह जब मर्जी तब कर सकते हैं। यही लिखित साहित्य की विशेष उपलब्धि है।

यदि यह आज तक भी मात्र मौखिक ही रहा होता तो निश्चित तौर पर इस के अधिकतम प्रमाणिक अंश का या तो कुछ जानकारों के संसार छोड़ने के साथ अन्त हो जाता या फिर इनमें स्वार्थ वश कई प्रक्षिप्त अंश जुड़ जाते, जो मानव समाज को पथ भ्रष्ट करते। यह सच है कि अभी भी मौखिक साहित्य का एक बहुत बड़ा भाग लोक किंवदंतियों और दंत कथाओं में ही प्रचलित है। उसका लिखित रूप अभी तक सामने नहीं आ पाया है। उसे शोध के साथ खोजबीन करके लिखित रूप में लाने की नितान्त आवश्यकता है। परन्तु फिर भी संसार भर की समस्त भाषाओं का विपुल लिखित साहित्य मानव समाज को बहुत कुछ दे रहा है और निरन्तर देता ही रहेगा।

निष्कर्ष — Conclusion :

सार रूप से यदि कहा जाए तो इन दोनो साहित्यिक पक्षों ने मनुष्य जाति को बहुत कुछ दिया है। आज यदि मनुष्य के पास जो कुछ भी ज्ञान – विज्ञान है तो उसका मूल कारण साहित्य ही है। फिर वह चाहे लिखित हो या मौखिक। मानव ने जो कुछ भी भावात्मक या विचारात्मक सांस्कृतिक और सामाजिक विकास किया है, वह साहित्य के बल पर ही किया है। यह बात अलग है कि साहित्य के भी दो पहलू हैं। एक नकारात्मक साहित्य और एक सकारात्मक। आम तौर पर समाज का अधिकांश वर्ग साहित्य के सकारात्मक पक्ष को ही स्वीकार करता है और उसी के सहारे नई पीढ़ी को दशा और दिशा प्रदान करता है। यही साहित्य की असली प्रदेयता है और महता है।

अतः कहना न होगा कि साहित्य का सकारात्मक सृजन पुष्ट समाज के निर्माण के लिए निरन्तर होते रहना चाहिए और उसके पठन – पाठन का भी कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार चलता रहना चाहिए। साहित्य ही समाज की वह ताकत है जो किसी समुदाय और समाज को वैचारिक और व्यवहारिक रूप से समृद्ध बनाती है। यदि ऐसा न होता तो विदेशी आक्रांता हमारी भारतीय साहित्यिक कृतियों को लूट कर अपने देश नहीं ले जाते। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि साहित्य की प्रदेयता हर युग में विशेष रही है और रहेगी।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — हम सभी को मिलकर भारतीय साहित्य, संस्कृति और संस्कार को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण करने का कार्य कारण हैं। साहित्य का सकारात्मक सृजन पुष्ट समाज के निर्माण के लिए निरन्तर होते रहना चाहिए और उसके पठन – पाठन का भी कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार चलता रहना चाहिए। साहित्य ही समाज की वह ताकत है जो किसी समुदाय और समाज को वैचारिक और व्यवहारिक रूप से समृद्ध बनाती है। यदि ऐसा न होता तो विदेशी आक्रांता हमारी भारतीय साहित्यिक कृतियों को लूट कर अपने देश नहीं ले जाते। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि साहित्य की प्रदेयता हर युग में विशेष रही है और रहेगी।

—————

यह लेख (साहित्य का प्रदेय।) “हेमराज ठाकुर जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____Copyright ©Kmsraj51.com  All Rights Reserved.____

Filed Under: 2021-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ Tagged With: author hemraj thakur, hemraj thakur articles, poet hemraj thakur, sahitya ka pradey, साहित्य का प्रदेय, साहित्य के दो रूप, साहित्य मौखिक और लिखित, साहित्य मौखिक और लिखित दोनों रूपों में अनादिकाल से विद्यमान, साहित्य समाज का दर्पण होता है, सेवा साधना और समर्पण, हिंदी साहित्य का यौवन, हिन्दुओं के पवित्र और पुरातन ग्रंथ, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

Next Page »

Primary Sidebar

Recent Posts

  • निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।
  • बात वक्त की।
  • तिरंगा का करें सम्मान।
  • एक सफर।
  • बाल विवाह – एक अभिशाप।
  • क्या बदलाव लायेगा नया साल।
  • है तो नववर्ष।
  • मोह।
  • अपना धर्म सबसे उत्तम।
  • ठंडी व्यार।
  • रिश्तों को निभाना सीखो।
  • तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।
  • मित्र।
  • आखिर क्यों।
  • समय।
  • काले बादल।
  • सुबह का संदेश।

KMSRAJ51: Motivational Speaker

https://www.youtube.com/watch?v=0XYeLGPGmII

BEST OF KMSRAJ51.COM

निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

ठंडी व्यार।

रिश्तों को निभाना सीखो।

Footer

Protected by Copyscape

KMSRAJ51

DMCA.com Protection Status

Disclaimer

Copyright © 2013 - 2026 KMSRAJ51.COM - All Rights Reserved. KMSRAJ51® is a registered trademark.