• Skip to main content
  • Skip to primary sidebar
  • Skip to footer
  • HOME
  • ABOUT
    • Authors Intro
  • QUOTES
  • POETRY
    • ग़ज़ल व शायरी
  • STORIES
  • निबंध व जीवनी
  • Health Tips
  • CAREER DEVELOPMENT
  • EXAM TIPS
  • योग व ध्यान
  • Privacy Policy
  • CONTACT US
  • Disclaimer

KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

Check out Namecheap’s best Promotions!

You are here: Home / Archives for कैसे संभव है देश का विकास?

कैसे संभव है देश का विकास?

कैसे संभव है देश का विकास?

Kmsraj51 की कलम से…..

Kaise Sambhav Hai Desh Ka Vikas | कैसे संभव है देश का विकास?

⇒ चिन्तित और उद्विग्न मानस ने…

सामाजिक विषमताओं और विकृतियों को लेकर चिन्तित और उद्विग्न मानस ने जब मुझे रात्रि के तीसरे पहर कचोटा तो मुझसे रहा नहीं गया। एकाएक आंखें खुली और मैं जाग उठा। बुद्धि के दर्पण में मानस की विकल शक्ल को झांका तो एक अजीब सी छटपटाहट और बेचैनी सी देखी। अंतःकरण में अनायास ही कई सारे प्रश्न एक साथ आसमानी बिजली की तरह कौंधे, जिन्हे व्यवस्थित करना मेरे लिए किसी जंग जीतने से कम नहीं था। फिर भी बिस्तर पर लेटे – लेटे हर एक उमड़ते हुए विचार से मानसिक युद्ध करता रहा और जैसा भी हुआ वैसा व्यवस्थापन अपने विचारों का करता रहा। अब इस मानसिक युद्ध में कौन जीता? मैं या मेरे अन्दर उमड़ी बदलते समाज की मान्यताएं? मेरे लिए कहना बहुत ही मुश्किल है पर जैसा भी हुआ, वह तुरन्त एक लेख लिख कर अपने आंतरिक द्वंद्व से मुक्ति पाने के लिए प्रयास करना ही मेरे पास एकमात्र उपाय था।

⇒ शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए … ‘या’ … आज की शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन…

प्रश्न समाज के बदलते विचारों और नवीन भावबोधों को लेकर खड़े हुए थे और खत्म एक लेख का रूप ले कर हुए। अचानक रात्रि के तृतीय पहर में निद्रा में विचार कौंधा कि आज समाज क्यों इतना खुदगर्ज और असंस्कृत होता जा रहा है? एक शिक्षक हूं तो जाहिर सी बात है कि पहले पहल तो सोच शिक्षा और शिक्षक के इर्द गिर्द ही इस मामले को ले कर दौड़ेगी। इसी दिशा में पहला विचार आया कि हमारे यहां तो शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए दी जाती थी और आज शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन बनती जा रही है। कहीं यह तो सामाजिक मान्यताओं के विकृतिकरण का कारण नहीं है?

⇒ आज स्कूलों – कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में…

आज स्कूलों कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में आ गए हैं, जो पुस्तकों को पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। जो थोड़े बहुत पढ़ते भी हैं, वे भी मात्र परीक्षा पास करने के लिए और अच्छे अंक लेने के लिए या फिर सरकारी नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं।

बाकी पुस्तकों को विद्या अध्ययन के लिए पढ़ने का चलन आज पूर्ण रूप से खत्म ही हो गया है। खैर विद्यार्थियों की छोड़िए। वे तो नादान होते हैं। उन्हें तो अभी शिक्षा, विद्या, अविद्या, पारा विद्या, महा विद्या और साक्षरता आदि शब्दों का शब्दार्थ भी ठीक से ज्ञात नहीं है शायद। पर बड़े – बड़े स्कूलों और कॉलेजों में तैनात अध्यापकों और प्रवक्ताओं तथा प्राध्यापकों का भी इस सन्दर्भ में मिजाज कुछ अच्छा नहीं है। इनमें से अधिकांश कभी कृपटो करेंसी तो कभी ऑन लाइन आई पी एल मैच में अपनी टीम लगा कर पैसों के पीछे स्कूलों – कालेजों के कर्तव्य काल में भी भागे हैं तो बाकी शेष बचे सुबह – शाम के समय में अपनी मस्ती में आमादा है।

अब बताइए कि वह भी पुस्तकालयों की बड़ी – बड़ी अलमारियों में पड़ी और धूल फांक रही अच्छे से अच्छी पुस्तकों को कब पढ़ेगा? जिनमें सामाजिक व्यवस्थापन के अनेकानेक मानवीय पहलू लिखे पड़े हैं। उनमें लिखा पड़ा है मानवीय मूल्यों का विवरण, जो मानव को पशु पक्षी – जगत से अलग प्राणी बने रहने की सीख देता है। उनमें लिखा पड़ा है हर विषय का बारीक से बारीक ज्ञान, जो हर अध्यापक को उसके अध्यापन के लिए और मजबूत और तर्कसंगत करता है। पर नहीं, आज के अध्यापकों और छात्रों ने कसम खा रखी है कि पुस्तकालय का दरवाजा तक नहीं देखेंगे। उन्होंने बुद्धि के विलास के लिए गूगल को गुरु जरूर बनाया है पर बुद्धि के विकास के सारे दरवाजे बन्द करने पर तुले हैं। हम सब जानते हैं कि इंटरनेट में आजकल क्या – क्या चलता है और उसके परिणाम क्या हो रहे हैं? बच्चे भी सच्चे हैं।

⇒ गुड में जहर से कम नहीं …

जब गुरु जी हर बात गूगल से देखते हैं तो बच्चे क्यों न देखें? बच्चे तो अध्यापकों को ही अपना आदर्श मानते हैं। और तो और परीक्षा तथा परिणाम के समय में देखे तो ये गुरु चेले अब्बल करते हुए पाए जाते हैं। सौ में से नब्बे किसी के छियानवे फ़ीसदी अंक आते हैं। पूछे तो ज्ञान धेला भी नहीं। गुरु जी को रिजल्ट देना होता है। वह ऑप्शनल प्रश्न गूगल से देख कर परीक्षा में बच्चों को करवा देता है और बच्चे बिन पढ़े ही गुरु जी की कृपा से अच्छे अंकों से पास हो जाते हैं। वे भी गुरु जी के कायल हो जाते हैं। वाह! क्या अच्छे गुरु जी या मैडम जी है हमारे?

बेचारे नादान ये नहीं समझते हैं कि यह सब गुड में जहर से कम नहीं है। गुरु जी काम चोरी के चलते या रिजल्ट देने के चलते और छात्र अच्छे अंक प्राप्त करने के चलते साल के अन्त में इन्ही हथकंडों को अपनाते हैं। अपनाए भी कैसे न? जब साल भर दोनों ने मस्ती ही मारी है और बौद्धिक विलास ही किया है तो फिर समाज में दोनों को अच्छा भी तो अपने को दिखाना है।

अच्छे अंक जब आते हैं तो मां – बाप भी बच्चे से खुश हो जाते हैं तथा गुरु जी के भी कायल हो जाते हैं। वाह! क्या कमाल का पढ़ाते हैं गुरु जी? मेरे बच्चे ने सौ में से छियानवे फ़ीसदी अंक प्राप्त किए हैं। बच्चे की प्रशंसा करते – करते भी नहीं थकते। हमारा बेटा – बेटी भी तो पढ़ाई में तेज है जी। आधी – आधी रात तक नेट में तैयारी कर रहा होता है। अब वह क्या दिखता है ? इसका किसी को कोई खबर नहीं। बस इसी बिगाड़ के चलते बच्चों को और प्रोत्साहन मिलता है। वह अपनी एक दो जिद्दें मां – बाप से और पूरी करवाता है।

फिर एक दिन जब वह बच्चा स्कूल – कालेजों से बाहर आता है तो वह संस्कार हीन और दिशाहीन हो कर समाज में आता है। यदि कहीं जुगाड़बाजी से वह सरकारी सेवा में फिट हो भी जाता है तो समझ लो कि वह किस स्तर की सरकारी सेवा देगा? अब जब प्राप्तांको के आधार पर ही सरकारी नौकरियां दी जाएगी तो नौकरी तो मिल ही जाएगी। फिर बोलो कि भ्रष्टाचार की जड़ कहां है? मैं इन्टरनेट का विरोधी नहीं हूं। विरोधी हूं उसके गलत इस्तेमाल का। यदि सच में शिक्षा के लिए अध्यापकों और बच्चों द्वारा उसका प्रयोग किया जाए तो वह शिक्षा की दशा और दिशा ही बदल देगा।

इधर सरकारें और सरकारों के नीतिकार हैं कि बच्चों को प्रताड़ित करने के अधिकार से अध्यापकों को वंचित करने पर तुले हैं। इससे जो थोड़े बहुत अध्यापक संस्कार और व्यवहार की शिक्षा के पक्षधर है भी, उनके हाथ – पांव भी बंधे पड़े हैं। वे भी देखा देखी में खुद को कुढ़ा हुआ महसूस करते हैं और व्यवस्था का हिस्सा बना लेते हैं। बस अब तो अध्यापक ने अपना मक़सद स्कूल जाना, हाजरी लगाना तथा अपने विषय का पीरियड लगाना ही तय किया है। खाली पीरियड में वह भी नेट में या तो गेम खेलता हुआ मिलेगा या फिर कुछ और देखता हुआ मस्त रहता है।

⇒ पुस्तकालयों का सदुपयोग नहीं हो रहा है…

पुस्तकालयों की स्थापना स्कूलों में यूं ही जाया जा रही है। न अध्यापक पढ़ता है और न छात्र। विषय विशेषज्ञ होने के बावजूद भी कई ऐसे मद होते हैं, जो पुस्तकों को पढ़ने और सामूहिक चर्चा – परिचर्चा से और स्पष्ट होते हैं। पर आज ऐसी बात करना ही मूर्खता की निशानी हो गई है। किताबे यदि पढ़ी जाती है तो मात्र नौकरी लगने के लिए।बस एक बार नौकरी मिल गई तो फिर तो हर व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। नौकरी सरकारी हो या निजी। हर व्यक्ति आज वेतन तो पूरा चाहता है पर काम करना ही नहीं चाहता है। इस नकारात्मकता का कारण आखिर क्या है?

तभी तो कहता हूं कि — “शिक्षा योग का विषय है भोग का नहीं।”
“शिक्षा बौद्धिक विकास का विषय है बौद्धिक विलास का नहीं।”
“शिक्षा आत्मरंजन का साधन है मनोरंजन का नहीं।”
“शिक्षा नैतिकता और चरित्र निर्माण का साधन है विकृतता का नहीं।”
“शिक्षा अनुशासन का विषय है शासन – प्रशासन का नहीं।”
यह बात समूचे विश्व को समझनी चाहिए।

मेरा मानना है कि स्कूल वह निर्माण संस्थान है, जहां भविष्य के समाज के निर्माण के लिए शिक्षार्थी रूपी सामग्री तैयार की जाती है। यदि उस सामग्री के निर्माण में ही गड़बड़ हो जाएगी, तो समाज रूपी इमारत की मजबूती का भी प्रश्न ही पैदा नहीं होता है। यानी सामग्री निर्माता गुरु का नैतिक और चारित्रिक रूप से उन्नत होना और अत्यधिक भौतिकता से दूर रहना जरूरी है।

⇒ शिक्षा व्यवस्था में संस्कार जरूरी है…

“शिक्षा व्यवस्था में संस्कार शिक्षा का जोड़ना जरूरी है। शिक्षकों को छात्रों को रोकने – टोकने के अधिकार देना जरूरी है। अभिभावकों को अंकों के आंकड़ों से बाहर ला कर विद्या और शिक्षा के साथ – साथ राष्ट्रीयता और सामाजिकता का बोध कराना जरूरी है।” “वरना भविष्य का समाज पशु समाज से भी भयानक होगा।” रिश्तों की अहमियत नहीं होगी। पिता – पुत्र में, मां – बेटी में, भाई – बहन में, पति -पत्नी में और पड़ोसी – पड़ोसी में आत्मीयता नहीं रहेगी। सभी अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए और अपनी भौतिक चाह को पूरा करने के लिए कभी भी कुछ भी करने को आमादा रहेगें। कोई मरने मारने से नहीं डरेगा।

इसलिए देश की शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने की आवश्यकता वर्तमान में बहुत ज्यादा हो गई है। इसके चलते सरकारों को भी स्कूलों कालेजों में राजनीति से नहीं बल्कि समाज नीति से मनोयोग पूर्ण तरीके से काम करना चाहिए। शिक्षा के स्तर को शिक्षक ही उन्नत करेगा। बस सरकारों को यह तय करना है कि शिक्षकों को बिना डराए धमकाए एक उचित व्यवस्था दे कर सामाजिक और राजनीतिक मान – सम्मान दे कर कैसे शिक्षा का उत्थान करने के लिए स्वतन्त्र दायित्व देना है?

प्रश्न यह भी है कि यह दायित्व नकारात्मक, आलसी और लोलुप लोगों के हाथों में भी नहीं जाना चाहिए। “अर्थात — शिक्षा धनार्जन का विषय न बने बल्कि ज्ञानार्जन और संस्कृति तथा सभ्यता की सम्बाहक बनकर सामने आए।” जिस व्यवस्था में रोजगार प्राप्ति की राह के साथ – साथ व्यक्ति विद्या तथा परा ज्ञान की प्राप्ति भी करे। ताकि कल जब वह विद्यार्थी समाज में जाएगा तो एक नेक और संस्कारवान व्यक्ति की भूमिका में जाए।

खैर मैं जानता हूं इस बात को कोई नहीं मानेगा। सभी यही कहेंगे कि हम अपना शत प्रतिशत देते हैं। जो शिक्षा व्यवस्था बनी है वह बिलकुल ठीक है। मुझे ही फटकारेंगे। पर अंदर से सभी यह जानते हैं कि असलियत क्या है? सरकारी नौकरी का वर्तमान में यह हाल हो गया है कि एक बार मिलनी चाहिए बस। फिर तो वह व्यक्ति काम करने को राजी नहीं है। निजी क्षेत्रों में भी डर के चलते काम करते हैं वरना हाल वहां भी कुछ खास अच्छे नहीं है। नैतिकता से काम करने को कोई राजी नहीं है।

होना तो यह चाहिए कि नैतिकता के चलते व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करे, जिसकी उसे तनख्वाह मिलती है। तभी वह शिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य है। पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। आजकल सभ्यता और संस्कृति तथा शिक्षा की पहचान सुख-सुविधाएं, रसूख और पैसा हो गया है। शालीनता, विनम्रता, तथा नैतिकता नहीं। समाज की यह बदलती सोच बहुत बड़ी विडम्बना है। यहां पैसों के लिए अपना चरित्र तक बेचने को लोग तैयार है पर मेहनत करने को राजी नहीं है। ऐसे में कैसे संभव है देश का विकास? यह एक चिंतनीय प्रश्न है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हआज समाज क्यों इतना खुदगर्ज और असंस्कृत होता जा रहा है? एक शिक्षक हूं तो जाहिर सी बात है कि पहले पहल तो सोच शिक्षा और शिक्षक के इर्द गिर्द ही इस मामले को ले कर दौड़ेगी। इसी दिशा में पहला विचार आया कि हमारे यहां तो शिक्षा बौद्धिक विकास के लिए दी जाती थी और आज शिक्षा बौद्धिक विलास का साधन बनती जा रही है। कहीं यह तो सामाजिक मान्यताओं के विकृतिकरण का कारण नहीं है? आज स्कूलों कालेजों में छात्र नशे की जद में और इंटरनेट की गिरफत में आ गए हैं, जो पुस्तकों को पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। जो थोड़े बहुत पढ़ते भी हैं, वे भी मात्र परीक्षा पास करने के लिए और अच्छे अंक लेने के लिए या फिर सरकारी नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं। बाकी पुस्तकों को विद्या अध्ययन के लिए पढ़ने का चलन आज पूर्ण रूप से खत्म ही हो गया है। नैतिकता के चलते व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करे, जिसकी उसे तनख्वाह मिलती है। तभी वह शिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य है। पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। आजकल सभ्यता और संस्कृति तथा शिक्षा की पहचान सुख-सुविधाएं, रसूख और पैसा हो गया है। शालीनता, विनम्रता, तथा नैतिकता नहीं। समाज की यह बदलती सोच बहुत बड़ी विडम्बना है। यहां पैसों के लिए अपना चरित्र तक बेचने को लोग तैयार है पर मेहनत करने को राजी नहीं है। ऐसे में कैसे संभव है देश का विकास? यह एक चिंतनीय प्रश्न है। “शिक्षा धनार्जन का विषय न बने बल्कि ज्ञानार्जन और संस्कृति तथा सभ्यता की सम्बाहक बनकर सामने आए।”

—————

यह लेख (कैसे संभव है देश का विकास?) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं ____

Filed Under: 2023-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: hemraj thakur, hemraj thakur articles, आज के शिक्षक और छात्र पर निबंध हिंदी में, कैसे संभव है देश का विकास?, कैसे संभव है देश का विकास? - हेमराज ठाकुर, बच्चों के विकास में शिक्षक की भूमिका, वर्तमान समाज में शिक्षक की भूमिका, विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में शिक्षक की भूमिका, विद्यार्थी जीवन में शिक्षक का महत्व पर निबंध, व्यक्ति के विकास में शिक्षा की भूमिका, व्यक्तित्व का विकास एवं शिक्षा, शिक्षा की उपयोगिता, शिक्षा में शिक्षक का महत्व, समाज में शिक्षक की भूमिका पर निबंध, हेमराज ठाकुर, हेमराज ठाकुर जी की रचनाएँ

Primary Sidebar

Recent Posts

  • निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।
  • बात वक्त की।
  • तिरंगा का करें सम्मान।
  • एक सफर।
  • बाल विवाह – एक अभिशाप।
  • क्या बदलाव लायेगा नया साल।
  • है तो नववर्ष।
  • मोह।
  • अपना धर्म सबसे उत्तम।
  • ठंडी व्यार।
  • रिश्तों को निभाना सीखो।
  • तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।
  • मित्र।
  • आखिर क्यों।
  • समय।
  • काले बादल।
  • सुबह का संदेश।

KMSRAJ51: Motivational Speaker

https://www.youtube.com/watch?v=0XYeLGPGmII

BEST OF KMSRAJ51.COM

निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

ठंडी व्यार।

रिश्तों को निभाना सीखो।

Footer

Protected by Copyscape

KMSRAJ51

DMCA.com Protection Status

Disclaimer

Copyright © 2013 - 2026 KMSRAJ51.COM - All Rights Reserved. KMSRAJ51® is a registered trademark.