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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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भोला शरण प्रसाद जी की रचनाएँ

संस्कार और विनम्रता।

Kmsraj51 की कलम से…..

Sanskaar Aur Vinamrata | संस्कार और विनम्रता।

Humility is the quality of being humble. Manners are the proper or polite way to behave in public. kmsraj51संस्कार और विनम्रता का अटूट संबंध है, संस्कार ही विनम्रता की जननी है। संस्कार के बिना जीवन मरूस्थल की तरह है, जहाँ संस्कार नहीं वहाँ अहंकार ही उत्पन्न होता है। संस्कार के भूलते ही अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है, नदी कभी सूख जाती है, कभी विकराल रूप धारण कर लेती है, गाँव के गाँव नदी में समा जाती है। नदी को अपने प्रचंड प्रवाह पर घमंड हो जाना स्वाभाविक है, नदी मर्यादा भूल जाती है, यह भी भूल जाती है कि कभी उसकी सुखी रेत पर बच्चे गेंद खेलते हैं। नदी को अपने ताकत का अहंकार हो गया, वह सोचने लगा मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु और मानव को बहा कर कहीं भी ले जा सकता हूँ। बर्बाद करने की ताकत है मुझमे, एक दिन समुद से उसकी बहस हो गई क्योंकि अहंकार के कारण विनम्रता जा चुकी थी। गर्वीले अंदाज में मुस्कराते हुए समुद से कहा, बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या-क्या लाऊँ, मैं सर्व शक्तिमान हूं, मैं मकान, पेड़, पशु. मानव – जो तुम्हारी इच्छा हो, उसे लाकर तुम्हें समर्पित कर दूंगी।

संस्कार और विनम्रता समुद्र में कूट-कूट कर भरा था….. वह समझ गया, अहंकार के नशे में चूर है नदी, समुद ने बड़ी विनम्रता से बोला- अगर कुछ लाना ही चाहते हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आओ… मैं भी तो देखूँ – नदी ने हाँ कह दी। नदी पूरा जोर (शक्ति) लगाया पर छोटे-छोटे घास को उखाड़ न पाया, उसकी सारी जल शक्ति विफल हो गई। अंत में नदी मायूस होकर समुद्र के पास गया और बोला – मैं सब कुछ ला सकता, लेकिन घास नहीं क्योंकि घास झुक जाती है और मैं ऊपर से गुजर जाती हूँ। समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा- पहाड़, पेड़, कठोर होते हैं, आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन घास विनम्र होता है, वह झुकना जानता है, उसे प्रचंड आँधी, तूफान या जल का प्रचंड वेग कुछ नहीं बिगाड़ सकते। जिह्वा अंत तक साथ रहती है लेकिन दांत टूट जाते हैं, अभिमान फरिश्तों को भी शैतान बना देती है और विनम्रता इंसान को फरिश्ता बना देती है।

बीज़ की यात्रा पेड़ तक है, नदी की यात्रा सागर तक और मनुष्य की यात्रा परमात्मा तक, अहंकार एवं अभिमान विनाश की जननी है। प्रभु भक्ति से संस्कार जागृत होती है, जो लोग धर्म को मज़ाक समझते हैं उन्हें क्या मालूम प्रभु भक्ति कितना कठिन है। प्रभु चित्रगुप्त की नज़र से न कोई बचा है न कोई बच सकता है। उचित फल उचित समय पर अवश्य मिलता है, सदा वासना में लीन रहने वाले, दूसरों का अहित करने वाले और भगवान को न मानने वाले, दुष्कर्म में लिप्त रहने वाले, भले कुछ समय के लिए (पिछले जन्म के) कर्म के कारण सुखमय जीवन व्यतित कर लें, लेकिन उनके पापों का परिणाम अवश्य भोगना पड़ेगा।

सच्चे मन से भगवान का नाम लेने का कोई मुल्य नहीं होता, कलयुग में नाम ही जप लेना मोक्ष का द्वार खोल देता है। इंसान को विनम्र एवं संस्कारी बना देता है। एक बालक बड़ा ही जिद्दी स्वभाव का था, भगवान का नाम लेने में कोई दिलचस्पी नहीं। एक बार उसके पिताजी ने यज्ञ किया, वह बालक अपने को एक कमरे में बंद कर लिया, सभी पुजारी एवं अन्य विद्वान जन प्रयास करके थक गए, सभी असफल रहे। जब बालक स्वयं घर के बाहर निकला तो पुजारी जी ने कस कर उसकी कलाई पकड़ ली, असहनीय दर्द के कारण अनायास ही बालक के मुख से निकला- हे राम मुझे बचाओ, ये कैसी जबरदस्ती…….

……. पुजारी जी ने मुस्कुराते हुए कहा आज जो नाम लिए हो, इसकी कभी कीमत मत लगाना। कुछ समय बाद बालक की मृत्यु हो गई, यमराज ने भगवान चित्रगुप्त से पूछा… इसका पाप – पुण्य क्या है? प्रभु चित्रगुप्त ने कहा, यह कभी प्रभु का नाम नहीं लिया, किन्तु विपत्ति में एक बार राम का नाम लिया है। इसे क्या फल दिया जाए? बालक से ही पूछा गया,..वह मौन रहा। अब यमराज और प्रभु चित्रगुप्त व्याकुल हो कर उस बालक को ब्रह्मा जी के पास ले गए, ब्रह्मा जी भी कुछ नहीं बोले, फिर यमराज और भगवान चित्रगुप्त उस बालक को भगवान शिव के पास ले गए, वह भी कुछ नहीं बोले, फिर सभी विष्णु जी के पास गए… विष्णुजी मुस्करा दिए। एक बार नाम लेने का फल इस बालक को मिल गया, ब्रह्मा, विष्णु, महेश- तीनों का दर्शन हो गया।

झूठे आडंबर में न फंसकर केवल अपने इष्टदेव का नाम लेना ही सच्ची भक्ति है। पापकर्म से दूर रहना, किसी का अहित न करना, सदा दूसरों की मदद करना, नारी सम्मान करना, झूठ न बोलना, सत्कर्म करना ही सच्ची भक्ति है। ईर्ष्या, जलन, द्वेष से मुक्त रखना, विनम्र होना, संस्कार नहीं भूलना, पाखंड से दूर रहना ही मोक्ष का द्वार खोलता है। हर आदमी विद्वान नहीं हो सकता लेकिन विद्वान की संगत में रहकर, सत्य की राह पर चल कर, प्रभु को प्राप्त कर सकता है “मैं” से मुक्त होना ही मोक्ष है।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150 / नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस Article के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह लेख संस्कार और विनम्रता के महत्व पर ध्यान केंद्रित करता है। संस्कार को विनम्रता की जननी माना गया है। बिना संस्कार के जीवन की तुलना मरुस्थल की होती है, जहां अहंकार ही उभरता है। अहंकार संस्कार भूलने के परिणाम से उत्पन्न होता है। यह लेख एक कहानी के माध्यम से इस विषय को प्रकट करता है, जिसमें नदी और समुद्र के बीच की बहस दर्शाई गई है। समुद्र ने विनम्रता की महत्वता को समझाया और अहंकार का त्याग किया। इससे पाठक को समझाया गया है कि विनम्रता और संस्कार की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेखक ने भगवान के नाम लेने के महत्व को भी उजागर किया है, जो अहंकार को दूर करके विनम्रता को विकसित करता है। लेखक द्वारा बताए गए सिद्धांतों के माध्यम से पाठक को सच्ची भक्ति और मोक्ष की ओर प्रेरित किया जाता है।

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यह Article (संस्कार और विनम्रता।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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अहंकार विनाश की जननी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अहंकार विनाश की जननी। ♦

पद, प्रतिष्ठा, दौलत, शक्ति, अहंकार की जननी है। अहंकार विनाश की पहली सीढ़ी है। रावण बहुत ज्ञानी था, अगर वास्तव में ज्ञानी होता तो आज पूज्य होता। ज्ञानी का अहंकारी होना, दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं अपितु, उसे विनाशकारी बना देता है। इतिहास गवाह है- सुन्दर स्त्री बाद में शूर्पनखा निकली, सोने का हिरण बाद में मारीच निकला और भिक्षा मांगने वाला साधु रावण निकला, सभी रुप बदलने की कला में निपुण थे। कला-ज्ञान का गलत उद्देश्य एंव उपयोग करने के कारण समाज में नफरत की दृष्टि से देखे जाते हैं- हर जगह भ्रम, शंका और अविश्वास पैदा करने वाले कभी सम्मान नहीं पा सकते।

⇒ प्रेम और सम्मान का आधार विश्वास है।

प्रेम और सम्मान का आधार विश्वास है, अशोक वाटिका में सीता मां राम नाम की मुद्रिका मिलने पर विश्वास कर लेती है। उन्हें प्रभु राम पर इतना विश्वास है। रामायण विश्वास करना ही तो सिखाती है। माँ कठोर हुई लेकिन विश्वास नहीं छूटा, परिस्थितियाँ विषम हुई लेकिन विश्वास बना रहा, लक्ष्मण को मरणासन्न देखा लेकिन धैर्य और विश्वास बना रहा, वानर और रीछ की सेना थी लेकिन विजय अवश्य मिलेगी, ये विश्वास बना रहा, प्रेम की परीक्षा हुई लेकिन विश्वास नहीं टूटा चाहे भरत का विश्वास हो, शबरी का हो, विभीषण का हो, जामवंत का हो, या किसी भी सहयोगी का हो-विश्वास ही नहीं, अगाध विश्वास था। हर इंसान का जीवन शंका भ्रम, निराशा असफलता, दुःख और रावण जैसे पापियों से भरा है, केवल विश्वास की नौका ही इस भवसागर से पार कर सकती है।

⇒ ज्ञान और ज्ञानी के कारण ही मानव सर्वश्रेष्ठ प्राणी।

आज ज्ञान और ज्ञानी के कारण ही मानव सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना जाता है। महर्षि वाल्मिकी, महर्षि वेद व्यास, महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, गुरु नानक जी, गौतम बुद्ध, महर्षि महेश योगी, महर्षि योगानन्द अपने ज्ञान एंव अनुभव से प्रभु से निकटता का मार्ग बताकर मानव समाज को सुखशांति से जीने का रास्ता दिखाया। अंधविश्वास के पर्द को हटाया। किसी गुरु ने स्वंय की पूजा करने की वकालत नहीं की। श्रद्धा और प्रेम से उनके बताए मार्ग पर चलना ही उनकी भक्ति एंव उनके प्रति सम्मान है।

⇒ हर मुसीबत में अन्तरात्मा की आवाज सुनने वाले।

जब उल्टी दृष्टि से कोई दुनिया को देखेगा तो हर वस्तु उल्टी दिखाई देगी। यदि अंधेरे कमरे में अपने को बन्द कर लें तो समस्त ब्रह्माण्ड अंन्धकार से भरा दिखाई देगा और प्रकाश में हर चीज स्पष्ट एंव चमकती हुई दिखाई देगी, हर इन्सान ईश्वर के हाथ का खिलौना है जो खुद ईश्वर बन बैठेगा उसकी हालत रावण और कंश जैसी होगी, संसार के सभी जीव जन्तुओं को परमात्मा भाव से देखो, अपने को सेवक समझ कर, स्वामी बनकर नहीं। हर मुसीबत में अन्तरात्मा की आवाज सुनने वाले, परमात्मा के करीब होने का अनुभव करते हैं, पूर्ण शांति उनके कदमों को चूमती है।

⇒ ईर्ष्या का भूत।

ईर्ष्या का भूत मानसिक तनाव उत्पन्न करने में मुख्यरुप से अपनी भूमिका अदा करता है। पराई उन्नति देखकर जलना ज्ञानी का नहीं, अज्ञानी का स्वभाव है। सीख ग्रहण करना ज्ञानी को महाज्ञानी बना देता है। शिष्ट, सहृदय, निष्कपट और मित्रता पूर्ण व्यवहार ही प्रसन्न बने रहने, तनाव मुक्त होने के लिए पर्याप्त है। महाज्ञानी वैज्ञानिक, चिकित्सक, इंजिनियर, शिक्षक संयमित रहते हुए मानव समाज के कल्याण के लिए सदा तत्पर रहते है। क्रोध और अभिमान से कोसों दूर, मानसिक शक्ति की कमी हो जाने पर क्रोध का वेग विवेक से नहीं रुकता। क्रोध आने पर विवेक दूर भाग जाता है।

⇒ क्रोध का लक्ष्य हानी करना होता है।

जब उन्मत्त हाथी जंजीर तोड़ लेता है तो महावत दूर भाग जाता है। क्रोध का लक्ष्य हानी करना होता है। हानी होने के बाद मनुष्य अपने को कोसने लगता है, निराशावादी बन जाता है। चतुराई स्वंय खत्म हो जाती है। क्रोध का निराकरण विरक्ति और प्रेम से होता है। संसार के प्रति अमोह का व्यवहार तथा सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भावना रखने पर, क्रोध की स्थिति में अविवेक युक्त काम करने से रोक देता है।

अगर दुर्योधन मैत्री भाव रखता तो “महाभारत” नहीं होता, युद्ध से केवल विनाश होता है। प्रेम से निर्माण होता है। स्वार्थ और सर्वोच्च होने का अभिमान मानव समाज को खोखला कर देता है। सेवाभाव, “वसुधैव कुटुम्बकम” का भाव ही मानव समाज की रक्षा कर सकता है। अगर प्राचीन काल में सभी विद्यायों को गुप्त न रखकर सार्वनिक किया जाता तो, प्राचीन भारत का ज्ञान जो अद्धितीय था, वह आज भी होता, गुप्त रखने के कारण आज लुप्त हो गया।

“कद्रदानों के लिए कद्रदान हूँ मैं,
बेरहम नहीं, मेहरबान हूँ मैं।
भरोसा है जिहें मुझ पर
उनके के लिए कभी दोस्त, कभी इन्सान हूँ मैं॥”

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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यह लेख (अहंकार विनाश की जननी।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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नैतिक शिक्षा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नैतिक शिक्षा। ♦

नैतिक मूल्यों का ह्रास —

सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता जीवन के हर क्षेत्र में नैतिक मूल्यों का ह्रास दृष्टिगोचर हो रहा है। राजनीति हो, व्यव्साय हो, समाज हो, कार्यालय हो या विद्यालय, हर जगह मानवीय मूल्यों में गिरावट परिलक्षित हो रही है वर्त्तमान समय में मानव इतना स्वार्थान्ध हो गया है कि उसे अपने स्वार्थ के अलावा, कुछ दिखाई नहीं देता। सिध्दान्तों, आदर्शों एंव मान्यताओं का विचार केवल किताब के पन्नों में सिमट कर रह गया है।

परमार्थ का चिन्तन व्यर्थ समझा जाने लगा हर इन्सान यह साबित करने में लगा है कि उससे अच्छा, ईमानदार कोई नहीं, फिर इतना अपराध, अन्याय कौन कर रहा है। समाज एंव देश का चारित्रिक पतन क्यों हो रहा है। हर आदमी दूसरे को दोषी मानता है, सुधार चाहता है लेकिन स्वंय को छोड़कर, यह उत्तरदायित्व केवल विद्यालय का
नहीं है। कोई भी विघालय व्देष, घृणा, हिंसा, धूसखोरी, मिलावट, धोखा एंव भ्रष्टाचार की शिक्षा नहीं देता है।

चारित्रिक पतन को रोकने के लिए…

गाय हमेशा शुध्द दूध देती है लेकिन पानी मिलाने वालों की कमी नहीं है। सुगन्धित फूलों को बचाने के लिए जहरीले पौधों को हटाना ही होगा। जब तक नैतिक शिक्षा, ईमानदारी, भाईचारा, देश प्रेम का भाव नहीं होगा तब तक भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। नैतिक शिक्षा द्वारा मनुष्य के जीवन में सुख, शांति, प्रेम, भाईचारा, त्याग, सौहार्द एंव विश्ववंधुत्व की भावना जागृत होती है। जब तक चारित्रिक उत्थान न हो तब तक सामजिक, राजनीतिक, आर्थिक एंव वैज्ञानिक प्रगति व्यर्थ है। इच्छा शक्ति, दृढ संकल्य एंव ईमानदारी ही सभी कार्यों को सफल बनाता है। नैतिक शिक्षा-धर्म, भाषा, वर्ण, लिंग, जाति, ऊँच-नीच आदि की भावना समाप्त कर निष्पक्ष रुप से विचार करने
एंव व्यव्हार करने की प्रवृति जागृत करता है। चारित्रिक पतन को रोकने के लिए समाज का शिक्षित होना अति आवश्यक है।

सही शिक्षा-योग्य, कुलीन, अनुभवी, चरित्रवान, शिक्षक ही दे सकते हैं हर क्षेत्र में, हर व्यक्ति में, हर संस्था में सुधार की जरुरत है- नए समाज एंव देश के निर्माण के लिए।
भ्रष्टाचार तभी खत्म होगा जब कोई भ्रष्ट न हो।

“येंषा न विघा न तपो न दान
झानं न शीलं न गुणो न धर्म ।
ते मर्त्यलोके भूवि भारभूतां
मनुष्य रुपेण मृगाश्चरन्ति ।।”

शिक्षा ही अस्त्र एंव शस्त्र दोनों है। सर्प को देखकर मनुष्य खौफ खाता है लेकिन चन्दन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। शिक्षा और योग्य शिक्षक ही इन्सान को चन्दन बनाते है। जो अपनी सुगन्ध, त्याग, नम्रता, बुद्धि, से देश का नाम रौशन करते हैं। इन्सान किसी को दोषी ठहराने के लिए अंगुली उठाता है तो तीन अंगुली उसके स्वंय के तरफ इशारा करती है।

“प्रेम की मीनार उठाएं,
नफरत की दीवार गिराएं।
झूठ की बाढ़ को बांध न सकें तो,
सच की राह में रोड़ा भी न बने॥”

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — सही शिक्षा-योग्य, कुलीन, अनुभवी, चरित्रवान, शिक्षक ही दे सकते हैं हर क्षेत्र में, हर व्यक्ति में, हर संस्था में सुधार की जरुरत है- नए समाज एंव देश के निर्माण के लिए। भ्रष्टाचार तभी खत्म होगा जब कोई भ्रष्ट न हो। नैतिक शिक्षा। शिक्षा ही अस्त्र एंव शस्त्र दोनों है। सर्प को देखकर मनुष्य खौफ खाता है लेकिन चन्दन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। शिक्षा और योग्य शिक्षक ही इन्सान को चन्दन बनाते है। जो अपनी सुगन्ध, त्याग, नम्रता, बुद्धि, से देश का नाम रौशन करते हैं। इन्सान किसी को दोषी ठहराने के लिए अंगुली उठाता है तो तीन अंगुली उसके स्वंय के तरफ इशारा करती है।

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यह लेख (नैतिक शिक्षा।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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दीक्षा बिना अधूरी शिक्षा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दीक्षा बिना अधूरी शिक्षा। ♦

जिस तरह जीवन के लिए जल, वायु एंव भोजन आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार सुखमय एंव तृप्त जीवन हेतु शिक्षा, दीक्षा एंव संस्कार का संबंध अटूट है, अकल्पनीय है। प्राचीन समय से शिक्षित, ज्ञानी, परमात्मा को जानने वाले, कलम एंव बुद्धि के धनी, समाज को सत्य के मार्ग पर अग्रसर करने वाले, रक्षा करने वाले, अंधकार से प्रकाश में लाने वाले गुरु शिक्षा एंव दीक्षा पर समान बल देते हुए मनुष्य को ज्ञान देकर शिक्षा के माध्यम से परमात्मा से जुड़ने का मार्ग बताया, बिना गुरु ज्ञान कहाँ-जहाँ गुरु हर धाम वहाँ।

शिक्षा का अर्थ सिखना है। प्राचीनकाल में जब विनीत भाव से गुरु चरणों में बैठकर ज्ञान ग्रहण किया जाता था उसे ही दीक्षा कहा जाता था। राम- कृष्ण जिन्हें भगवान मानते हैं वे भी गुरु से शिक्षा एंव दीक्षा लिए, गोत्र गुरु की पहचान हैः

गुरु गृह गए पढ़न रघुराई।
अल्पकाल विद्या सब पाई॥

गुरु वशिष्ठ एवं गुरु शांडिल्य — राम और कृष्ण के गुरु थे समय के साथ दीक्षा की परम्परा ही लुप्त हो गई। वर्तमान परिवेश में गुरु की परिभाषा ही बदल गई। किसी भी व्यक्ति के जीवन को बनाने में, चरित्र निर्माण में गुरु का अहम योगदान होता है लेकिन आज गुरु का महत्व ही खत्म हो गया। अब तो दीक्षांत समारोह में डिग्री प्रदान की जाती है अगर उच्च शिक्षा, उज्ज्वल भविष्य की जननी है तो दीक्षा जीवन मूल्यों का आधार प्रदान करती है।

रावण प्रकांड पंडित जरुर था अंहकार और गुरुर चरम सीमा पर था क्योंकि दीक्षा मनुष्य को आत्मसंयमी, त्यागी एंव अंहकार रहित बना देता है। रावण के विनाश का कारण दीक्षा का अभाव होना ही था। जब से दीक्षा की परम्परा लुप्त हुई, मनुष्य का जीवन कष्टों से घिर गया। खुशी – शांति लुप्त हो गई आज मनुष्य के भीतर संवेदना, प्रेम, भाईचारे की कमी देखी जाती है अमानवीय कार्य करने में थोड़ी भी झिझक नहीं। चश्मे से वही देख सकता है जिसके ऑंख में क्षमता है – कोई ऐसी चश्मा नहीं है जिससे अंधो को दिखाई दे।

अंधा भी देख सकता है अगर प्रभु कृपा से षष्टी इंद्रिय जागृत हो जाए – यह वगैर गुरु – दीक्षा संभव नहीं है अगर नरेंद्र दत्त श्री रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में नहीं आते तो वह स्वामी विवेकानंद नहीं बनते। स्वामी विवेकानंद ने गुरु के बताए रास्ते पर चलकर जो उन्होंने मान – सम्मान, नाम – शोहरत दिया, वह एक सच्चा शिक्षित एंव दीक्षा प्राप्त शिष्य ही कर सकता है।

श्री केशवचन्द सेन बहुत बड़े विद्वान थे लेकिन आज उनको कितने लोग जानते है। उन्हें गुरु का आशीर्वाद प्राप्त नहीं था। श्री रामकृष्ण परमहंस ने पहले ही कह दिया था तुम बहुत बड़े विद्वान हो लेकिन स्वामी विवेकानंद की जगह तुम कभी नहीं ले सकते। दीक्षा इंसान को अंहकार मुक्त, जाति के बंधन से मुक्त कर देता है।

मनुष्य जन्म लेते ही स्वतः जाति एंव धर्म से जुड़ जाता है। लेकिन दीक्षा प्राप्त करने के बाद मनुष्य हर बंधन से मुक्त होकर पूरे विश्व एंव मानव समाज के कल्याण हेतु अपने को समर्पित कर देता है। जब स्वामी विवेकानंद से उनकी जाति पूछी गई तो उन्होने बड़ा ही हदय स्पर्शी जबाव दिया “मेरा तन जन्म से कायस्थ है लेकिन यह तो नश्वर है, दिल – दिमाग दीक्षा लेने के बाद गुरु कृपा से पूरे ब्रह्मांड की धरोहर है।”

मानव कल्याण ही मेरे जीवन का उद्देश्य है, दीक्षा ने उन्हें अमर बना दिया। एक ऐसी ज्योति जो कभी नहीं बुझेगी। इस धरती पर बहुत सारे गुरु हैं, जब योग्य एंव कुलीन गुरु – योग्य शिष्य को दीक्षा देता है तभी फलीभूत होता है। कोई किसी गुरु का अनुयायी हो, उनके बताए मार्ग पर चलने से परमात्मा की प्राति होगी – दिखावा करना स्वंय को ठगना है और गुरु का अनादर है।

आज श्री ठाकुर अनुकूलचन्द्र जी (देवघर), श्री महर्षि मेंही (भागलपुर) श्री रामचन्द्र जी महाराज (शाहजहॉंपुर), श्री लाला चतुर्मुज सहाय (टूण्डला), महर्षि महेश योगी, श्री अरविन्दधोष, श्री परमहंस योगानन्द जी, के लाखों शिष्य हैं – श्री रामकृष्ण मिशन की शाखाऍं पूरे विश्व में है – केवल स्वामी विवेकानंद जैसे शिष्य के कारण – गुरु के आशीर्वाद के कारण, दीक्षा में जितने शब्द हैं उसे तो जान लें …….

—

  • द – का अर्थ दमन अर्थात इंद्रिय, निग्रह
  • ई – का अर्थ ईश्वर की उपासना
  • क्ष – का अर्थ वासनाओं का क्षय
  • आ – का अर्थ आनन्द

दीक्षा का मतलब अपने अंदर परमात्मा का दर्शन कर लेना। जैसे दिव्य चेतना का प्रकाश उभरता है, ब्रह्म के साथ तारतम्य स्थापित होने लगता है। बिना दीक्षा, संस्कार सम्भव नहीं है गुरु नानक देव महाराज, भगवान महावीर, स्वामी दयानन्द सरस्वती मनुष्यों के लिए प्रेरणा के श्रोत हैं। दीक्षा की शुरुआत ही इंद्रिय निग्रह से है। मन को मारना नहीं है अपितु लगाम लगाना जरुरी है, नहीं तो मन भटकता रहेगा।

जब शिष्य गुरु के साथ मन के तार जोड़कर गुरु के बताए रास्ते पर शुद्ध मन से चलता है, विघा ग्रहण करता है तो स्वतः संस्कार एंव आस्था का उदय होने लगता है। खारे जल से कभी प्यास नहीं बुझती। गुरुओं ने बड़े ही सरल तरीके से अपने शिष्यों को दीक्षा, जप, तप एंव इष्टवृति (दान) का महत्व समझा दिया है। बिना जप, तप एंव दान का दीक्षा पूर्ण नहीं हो सकता।

जप तीन प्रकार से होता है जिह्वा से, होठ से और कंठ से। सबसे उत्तम कंठ से माना गया है। गुरु मंत्र का जप हमेशा कंठ से ही करना चाहिए। शरीर के सारे तंत्र (स्नायु) सक्रिय हो जाते है जो आध्यात्मिक उर्जा पैदा करते हैं, तप का मतलब इच्छाओं, भावनाओं, द्वेष, जलन, ईर्ष्या को समाप्त कर, अहंकार मुक्त होकर ध्यान करना ही तप है।

जब तक मन केन्द्रित नहीं होगा तब तक कुछ की सम्भव नहीं है। इष्टवृति (दान) के बिना दीक्षा अधूरी है। दान का मतलब – गुप्त दान, दान अहंकार की जननी है। किसने दान किया, किसको दिया, कितना दिया – यह किसी को पता नहीं होना चाहिए।

पुस्तकालय में बैठने से कोई ज्ञानी नहीं हो सकता, जब तक की वह किताबों का अध्ययन न करे। ठीक उसी तरह किसी गुरु का शिष्य बनने से कुछ नहीं होगा, जब तक पूरी आस्था के साथ, समर्पण के साथ उनके बताए मार्ग पर न चले। जप, तप, ध्यान, दान (ईष्टवृति) को पूर्णतः अपने जीवन में उतारने, नियमानुसार अनुकरण करने के बाद ही – गुरु कृपा की बरसात होगी।

पहले “कृ” यानी कर्म तब “पा”। संत्संग से जुड़ जाना, स्वामी विवेकानंद, महर्षि महेश योगी, श्री परमंहस योगानन्द जी महाराज, श्री अरविन्द घोष, श्री ठाकुर अनुकूल चन्द्र जैसे गुरु की छत्रछाया में नए जीवन की शुरुआत ही मुक्ति का मार्ग है। माया मोह, अहंकार, लोभ स्वतः गायब हो जाएगा। गुरु वंदना में एक छोटी सी मेरी कविताः …….

गुरु – शिष्य का नाता देखो।
पिता – पुत्र से कहीं महान।
कली से जब फूल बनोगे।
महक उठेगा हिन्दुस्तान॥

गुरु का आदर करना सीखो।
ग़र बनना है तुझे महान।
इक दिन शीश झुकाएगा।
तुझपे सारा हिन्दुस्तान॥

घोषणा: ये मेरी अप्रकाशित रचना है।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — शिक्षा अर्थात इस संसार का व सभी सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं, जीवों का ज्ञान, जबकि दीक्षा का मतलब है संस्कार, क्योकि संस्कार के बिना ज्ञान अधूरा हैं, संस्कार विहीन ज्ञान सदैव ही विनाश का कारण बनता है। इसी कारण दीक्षा बिना अधूरी होती हैं शिक्षा। आजकल ना ही पहले जैसा गुरु शिष्य का रिश्ता है और ना ही वैसी शिक्षा – दीक्षा है, जिस कारण आजकल के बच्चें संस्कार विहीन हैं और अपना विनाश खुद ही कर रहे हैं।

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यह लेख (दीक्षा बिना अधूरी शिक्षा।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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