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aakhir hansi laut hee aai

आखिर हँसी लौट ही आई!

Kmsraj51 की कलम से…..

Aakhir Hansi Laut Hee Aai | आखिर हँसी लौट ही आई!

हर समय चेहरे पर मुस्कान लिए वो सभी को खुशी बांटती फिरती।
पर ये क्या? आज उसकी हँसी पर किसने ग्रहण लगाया?

वो काम तो सब कर रही थी पर उसकी आवाज़ की खनक कुछ ऐसे गायब थी जैसे किसी ने पायल से घुंघरुओं की छम-छम छीन ली हो। घर में किसी सदस्य से भी उसकी अनबन हुई क्या? पर नही ऐसा नही लगता क्योंकि सभी सदस्यों के सामने तो वो प्यार व अपनेपन से पेश आ रही थी। लेकिन उसकी निगाहें हर वक्त किसी चीज को तलाश करती नज़र आ रही थी।जब देखो तभी वो अपने काम को निबटा कर ऐसे कुछ ढूंढती नजर आती जैसे कोई बहुत ही कीमती चीज उसकी आँखों से ओझल हो गयी हो, पर समझ नही आ रहा था क्या…..?

अब उसका हर रोज का काम हो गया था कि समय मिलते ही कभी अलमारी, कभी बेड, कभी दराज में तो कभी ड्रैसिंग को खोलकर सारा सामान बार-बार करीने से सजा रही थी। पता नही ? ऐसा क्या कीमती सामान खो गया? जो उसकी होठों की हँसी ले गया और उसकी आँखों की चमक भी।

दिन पर दिन बीते जा रहे थे और ऐसा लग रहा था कि उसकी आशा भी उसे हर बार निराशा का ही जवाब दे रही थी। अब उसकी शारीरिक हालत में बुखार ने भी सोने पर सुहागा कर दिया था। एक बात और परिवार का कोई भी सदस्य उसको कुछ नही कह रहा था बस हँसी में इतनी बात जरूर कह देते याद करो कहाँ पर रखा था? तुमने उस वस्तु को। और इस प्रकार की बात भी उसके सीने में तीर की तरह लगती…… वह सोचने पर विवश हो जाती कि अब उसकी याददाश्त (स्मरण-शक्ति) धीरे-धीरे मध्यम हो गयी क्या? और हो भी क्यूँ ना, सबकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसने खुद को काम की रेल जो बनाया था!

पर उसको तो पता था कि उम्मीद पर दुनिया कायम है, इसलिए हर रोज वो घर के मंदिर में दिल की खुशी के लिए नतमस्तक होती। कई दिनों के बाद एक बार फिर उसने आशा का दामन थामे अपनी अर्जी अपने इष्टदेव को लगा ही दी। पर अब उसको लगाए हुए भी तीन दिन बीत ही गए थे। घर में तो सब सामान्य व्यवहार था क्योंकि वो तो अपना हर फर्ज लग्न से निभा रही थी।

चौथे दिन इसी उधेड़बुन में उसने फिर एक बार अपनी अलमारी को टटोलना शुरू किया तब सामान को इधर-उधर करते हुए अचानक ही उसकी आवाज़ से घर में वो खुशी की खनक पैदा हुई जो कितने दिनों से खो गयी थी, क्योंकि उसको वो अपने सोने के कंगनों का बॉक्स मिल चुका था, जिसने उसकी रात की नींद और दिन का चैन गायब कर दिया था। वो खुशी का बॉक्स जिसे अलमारी ने चुपके से अपने कोने में छिपाकर उसका हरपल इम्तिहान लिया था और ऐसा लग रहा था जैसे आज उसने ही उसको पास कर दिया हो।

कितने कीमती होते हैं एक औरत के लिए उसके आभूषण बिल्कुल उसके गुणों की ही तरह। आज वो अपने परिवार के सदस्यों के साथ इतनी ही प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी जितना कि उन आभूषणों के घर आने पर थी।

उसकी आध्यात्मिकता ने एकदम से उसका सिर भगवान के सजदे में झुका दिया। ऐसा लग रहा था जैसे आँखों में वही चमक लिए उसकी आवाज की खनक से घर का हर कोना-कोना खुशी से भर गया हो।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लघुकथा के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — क्योंकि उसको वो अपने सोने के कंगनों का बॉक्स मिल चुका था, जिसने उसकी रात की नींद और दिन का चैन गायब कर दिया था। कितने कीमती होते हैं एक औरत के लिए उसके आभूषण बिल्कुल उसके गुणों की ही तरह। आज वो अपने परिवार के सदस्यों के साथ इतनी ही प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी जितना कि उन आभूषणों के घर आने पर थी। उसकी आध्यात्मिकता ने एकदम से उसका सिर भगवान के सजदे में झुका दिया। ऐसा लग रहा था जैसे आँखों में वही चमक लिए उसकी आवाज की खनक से घर का हर कोना-कोना खुशी से भर गया हो।

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यह लघुकथा (आखिर हँसी लौट ही आई!) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लघुकथा सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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