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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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प्रेरक लघु कथाएं

सोच।

Kmsraj51 की कलम से…..

Thinking | सोच।

उस दिन राम किसी लंबी यात्रा से अपने घर लौटा था। राम ने जैसे ही दरवाजा खटखटाया बेटा जल्दी से दरवाजा खोलने आया और एकदम से अपने पापा के बैग से अपने लिए मिठाई ढूंढने लगा। बेटे ने ना तो पापा के चरण स्पर्श किए और ना ही हाल-चाल पूछा। क्योंकि बेटा अभी 5 साल का है इसलिए पापा ने भी ज्यादा परवाह न की। घर के अंदर बेटी ने भी पापा को नमस्ते की और कहा पापा मेरे लिए क्या लाए हैं? पापा ने भी बैग खोलते हुए उसको बताया कि उसके लिए कपड़े लाए हैं। पापा ने अपनी मां के चरण स्पर्श किए और मां ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि शाबाश मुझे तुम पर गर्व है।

इसके बाद राम की धर्मपत्नी ने ना तो राम को पानी के लिए पूछा, ना चाय के लिए पूछा, क्योंकि शाम को लगभग 8:00 का समय था, राम अभी अपने कपड़े बदल ही रहा था कि उसकी पत्नी ने उसे कहा थोड़ी सी सब्जी बची है, बाकी अगर खाना, खाना है तो खाना बना लो, बाकियों के लिए भी खाना बना लो, मैं खाना नहीं बनाऊंगी। राम को एकदम से गुस्सा आया और उसने कहा कि मैं इतनी दूर से आया हूं ना तो तुम मेरे लिए चाय के लिए पूछ रही हो, ना पानी के लिए। सीधे ही हुक्म लगा रही हो कि अपने लिए खाना बना लो, बाकी के लिए भी खाना बना लो, यह कहां का न्याय है?

राम की पत्नी तपाक से बोली तुमने कहा मेरा हाल चाल पूछ लिया मैं बीमार हूं, मेरे बारे में कोई नहीं सोचता है, जबकि ऐसा नहीं था वह पता नहीं किस बात के लिए नाराज थी। राम ने कपड़े बदल कर कुर्सी पर बैठकर सोचा कि आखिर आदमी किसके लिए कमाता है, किसके लिए वह दिन भर इधर-उधर दौड़ भाग करता है और अगर आदमी कमा भी लेता है तो अपने साथ क्या लेकर जाएगा?

आखिरकार राम ने अपने मन को शांत किया और चुपचाप रसोई घर में जाकर बहुत सारे प्रश्न लेकर खाना बनाने की तैयारी करने लग पड़ा। तभी राम की बीवी रसोई में आती है और अपनी आंखों से आंसू टपकाते हुए आटा गूंथने में लग जाती है जबकि राम ने कहा कि कोई बात नहीं, तुम अगर बीमार हो तो तुम आराम करो, मैं खाना बना लूंगा। लेकिन राम की बीवी ने आनन-फानन में आटा गूथ ली और चपाती भी बना दी। उधर राम ने सब्जी बना दी और सबने खाना खाया और थोड़ा माहौल शांत हुआ लेकिन राम के मन में उठे प्रश्नों का जवाब राम को कहीं नहीं मिल पाया?

एक तरफ राम की मां थी जो राम को आशीर्वाद देते हुए कहा कि शाबाश बेटा मुझे तुम पर गर्व है और दूसरी तरफ राम की धर्मपत्नी थी जिसने मुबारकबाद देने की बजाय हुकुम चलाना शुरु कर दिया कि तुम यह करो, तुम वह करो, तुम ऐसा नहीं करते हो, तुम वैसा नहीं करते हो? या औरत ही है जो मन भी है और बीवी भी है लेकिन सच में दिन-रात का फर्क है। कोई मां अपने परिवार के लिए दिन रात ही सोचती रहती है तो कोई मां ऐसी भी है जो सिर्फ और सिर्फ अपने तक ही सीमित है? सब सोच-सोच का फर्क है।

♦ लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी  – बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लघु कथा के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “एक मां ही है जो अपने परिवार के लिए दिन रात ही सोचती रहती है” तो कोई मां ऐसी भी है जो सिर्फ और सिर्फ अपने तक ही सीमित है? ये सब सोच-सोच का फर्क है। भारतीय संस्कृति में माँ सदैव ही अपनों का हित चाहती है, और एक माँ ही है जो बिना किसी स्वार्थ के सबका ध्यान रखती है, भले ही खुद कितना भी कष्ट झेलती है फिर भी गुस्सा नही करती है, लेकिन आजकल की कुछ लड़कियों को क्या हो गया है जो अपनी निज संस्कार व फर्ज को भूलती जा रही है, ये कैसी सोच है इनकी? खैर एक बात याद रखे की मानव जीवन की तीन मुख्य जरूरतें है, अच्छा खाना, अच्छा पहनने को कपडा और रहने के लिए मकान, इन्हीं जरूरतों के लिए आदमी कार्य करता है जिससे उसके परिवार का जरुरत पूर्ण होता रहे। इसके बदले वह सिर्फ दिल का प्रेम व सहानुभूति के दो शब्द चाहता है अपनों से।

—————

यह लघु कथा (सोच।) “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, लघु कथा, सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल है। साहित्यिक नाम — डॉ• जय अनजान है। माता का नाम — श्रीमती कमला देवी महलवाल और पिता का नाम — श्री सुंदर राम महलवाल है। शिक्षा — पी• एच• डी•(गणित), एम• फिल•, बी• एड•। व्यवसाय — सहायक प्रोफेसर। धर्म पत्नी — श्रीमती संतोष महलवाल और संतान – शानवी एवम् रिशित।

  • रुचियां — लेखक, समीक्षक, आलोचक, लघुकथा, फीचर डेस्क, भ्रमण, कथाकार, व्यंग्यात्मक लेख।
  • लेखन भाषाएं — हिंदी, पहाड़ी (कहलूरी, कांगड़ी, मंडयाली) अंग्रेजी।
  • लिखित रचनाएं — हिंदी(50), पहाड़ी(50), अंग्रेजी(10)।
  • प्रेरणा स्त्रोत — माता एवम हालात।
  • पदभार निर्वहन — कार्यकारिणी सदस्य कल्याण कला मंच बिलासपुर, लेखक संघ बिलासपुर, सह सचिव राष्ट्रीय कवि संगम बिलासपुर इकाई, ज्वाइंट फाइनेंस सेक्रेटरी हिमाचल मलखंभ एसोसिएशन, सदस्य मंजूषा सहायता केंद्र।
  • सम्मान प्राप्त — श्रेष्ठ रचनाकार(देवभूमि हिम साहित्य मंच) — 2022
  • कल्याण शरद शिरोमणि सम्मान(कल्याण कला मंच) — 2022
  • काले बाबा उत्कृष्ट लेखक सम्मान — 2022
  • व्यास गौरव सम्मान — 2022
  • रक्त सेवा सम्मान (नेहा मानव सोसायटी)।
  • शारदा साहित्य संगम सम्मान — 2022
  • विशेष — 17 बार रक्तदान।
  • देश, प्रदेश के अग्रणी समाचार पत्रों एवम पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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आखिर हँसी लौट ही आई!

Kmsraj51 की कलम से…..

Aakhir Hansi Laut Hee Aai | आखिर हँसी लौट ही आई!

हर समय चेहरे पर मुस्कान लिए वो सभी को खुशी बांटती फिरती।
पर ये क्या? आज उसकी हँसी पर किसने ग्रहण लगाया?

वो काम तो सब कर रही थी पर उसकी आवाज़ की खनक कुछ ऐसे गायब थी जैसे किसी ने पायल से घुंघरुओं की छम-छम छीन ली हो। घर में किसी सदस्य से भी उसकी अनबन हुई क्या? पर नही ऐसा नही लगता क्योंकि सभी सदस्यों के सामने तो वो प्यार व अपनेपन से पेश आ रही थी। लेकिन उसकी निगाहें हर वक्त किसी चीज को तलाश करती नज़र आ रही थी।जब देखो तभी वो अपने काम को निबटा कर ऐसे कुछ ढूंढती नजर आती जैसे कोई बहुत ही कीमती चीज उसकी आँखों से ओझल हो गयी हो, पर समझ नही आ रहा था क्या…..?

अब उसका हर रोज का काम हो गया था कि समय मिलते ही कभी अलमारी, कभी बेड, कभी दराज में तो कभी ड्रैसिंग को खोलकर सारा सामान बार-बार करीने से सजा रही थी। पता नही ? ऐसा क्या कीमती सामान खो गया? जो उसकी होठों की हँसी ले गया और उसकी आँखों की चमक भी।

दिन पर दिन बीते जा रहे थे और ऐसा लग रहा था कि उसकी आशा भी उसे हर बार निराशा का ही जवाब दे रही थी। अब उसकी शारीरिक हालत में बुखार ने भी सोने पर सुहागा कर दिया था। एक बात और परिवार का कोई भी सदस्य उसको कुछ नही कह रहा था बस हँसी में इतनी बात जरूर कह देते याद करो कहाँ पर रखा था? तुमने उस वस्तु को। और इस प्रकार की बात भी उसके सीने में तीर की तरह लगती…… वह सोचने पर विवश हो जाती कि अब उसकी याददाश्त (स्मरण-शक्ति) धीरे-धीरे मध्यम हो गयी क्या? और हो भी क्यूँ ना, सबकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसने खुद को काम की रेल जो बनाया था!

पर उसको तो पता था कि उम्मीद पर दुनिया कायम है, इसलिए हर रोज वो घर के मंदिर में दिल की खुशी के लिए नतमस्तक होती। कई दिनों के बाद एक बार फिर उसने आशा का दामन थामे अपनी अर्जी अपने इष्टदेव को लगा ही दी। पर अब उसको लगाए हुए भी तीन दिन बीत ही गए थे। घर में तो सब सामान्य व्यवहार था क्योंकि वो तो अपना हर फर्ज लग्न से निभा रही थी।

चौथे दिन इसी उधेड़बुन में उसने फिर एक बार अपनी अलमारी को टटोलना शुरू किया तब सामान को इधर-उधर करते हुए अचानक ही उसकी आवाज़ से घर में वो खुशी की खनक पैदा हुई जो कितने दिनों से खो गयी थी, क्योंकि उसको वो अपने सोने के कंगनों का बॉक्स मिल चुका था, जिसने उसकी रात की नींद और दिन का चैन गायब कर दिया था। वो खुशी का बॉक्स जिसे अलमारी ने चुपके से अपने कोने में छिपाकर उसका हरपल इम्तिहान लिया था और ऐसा लग रहा था जैसे आज उसने ही उसको पास कर दिया हो।

कितने कीमती होते हैं एक औरत के लिए उसके आभूषण बिल्कुल उसके गुणों की ही तरह। आज वो अपने परिवार के सदस्यों के साथ इतनी ही प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी जितना कि उन आभूषणों के घर आने पर थी।

उसकी आध्यात्मिकता ने एकदम से उसका सिर भगवान के सजदे में झुका दिया। ऐसा लग रहा था जैसे आँखों में वही चमक लिए उसकी आवाज की खनक से घर का हर कोना-कोना खुशी से भर गया हो।

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लघुकथा के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — क्योंकि उसको वो अपने सोने के कंगनों का बॉक्स मिल चुका था, जिसने उसकी रात की नींद और दिन का चैन गायब कर दिया था। कितने कीमती होते हैं एक औरत के लिए उसके आभूषण बिल्कुल उसके गुणों की ही तरह। आज वो अपने परिवार के सदस्यों के साथ इतनी ही प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी जितना कि उन आभूषणों के घर आने पर थी। उसकी आध्यात्मिकता ने एकदम से उसका सिर भगवान के सजदे में झुका दिया। ऐसा लग रहा था जैसे आँखों में वही चमक लिए उसकी आवाज की खनक से घर का हर कोना-कोना खुशी से भर गया हो।

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यह लघुकथा (आखिर हँसी लौट ही आई!) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लघुकथा सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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