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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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dr. vidushi sharma articles

खजुराहो यात्रा: एक अविस्मरणीय दैवीय अनुभव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ खजुराहो यात्रा: एक अविस्मरणीय दैवीय अनुभव। ♦

यात्रा…….
जिसका नाम आते ही मन में अजीब सी तरंगे उठने लगती है। एक उत्साह, एक जोश उत्पन्न हो जाता है कि लगातार एक ही तरह की दैनिक जीवन से नया कुछ हटकर देखने को, घूमने को, सीखने को मिलेगा। जहां हम स्वच्छंद होंगे, पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ शायद कुछ कम होगा। जहां अपनी भावनाओं को, अपने सपनों को, आपकी इच्छाओं को जीने का एक अवसर मिलेगा। इसी के साथ-साथ अपने अनुभवों को, अपनी यादों को, अपने आनंद को हम कैमरे के माध्यम से एक अनंत ख़ज़ाने के रूप में अपने साथ लेकर आएंगे। यही है एक यात्रा की सुखद अनुभूति।

इन यात्राओं के स्मृति चित्रों को दोबारा जब भी हम देखते हैं तो जैसे एक फिल्म की भांति पूरी यात्रा हमारी आंखों के सामने से गुजर जाती है और हमें एक नई ताज़गी, जीने की प्रेरणा फिर से दे जाती है और यदि यह यात्रा किसी धार्मिक स्थल, तीर्थ स्थल और ऐतिहासिक होने के साथ-साथ प्रकृति से भी जुड़ी हो तो क्या बात है।

हम हमेशा से ही सपने देखते हैं। पर यह सपने ऐसे होते हैं जिन्हें किसी के साथ शायद ही साझा कर पाएं। कोई भी चित्र देखकर, कोई फिल्म देखकर, कोई दृश्य देखकर या किसी की बातें सुनकर, वृत्तांत सुनकर हमारे मन में भी कहीं ना कहीं एक इच्छा, एक हूक सी उठती है कि हमें भी उस विशेष स्थान को देखना है, उसकी यात्रा करनी है जीवन में कभी न कभी तो ऐसा मौका जरूर मिलेगा। हम सभी के जीवन में यह पल जरूर आते हैं जब हमारी दबी हुई इच्छाएं साकार रूप ले लेती है। जब हमें उनको पूरा करने का कोई कारण कोई, हेतु प्राप्त होता है।

यात्रा अपने आप में अनोखी ही होती है…

कोई भी यात्रा अपने आप में अनोखी ही होती है और इसके साथ यह भी उसके चित्र भी पास में हो तो वह अविस्मरणीय बन जाती है। यदि इस यात्रा के अनुभव चित्र सहित हम दूसरों के साथ साझा करते हैं तो वह संस्मरण बन जाती है। वैसे तो जीवन भी एक लंबी यात्रा ही है जिसमें विभिन्न प्रकार के पड़ाव आते हैं सुख-दु:ख, हानि-लाभ, मिलन – जुदाई जीवन की यात्रा के कुछ अविस्मरणीय, अवश्यम्भावी पड़ाव होते हैं जो सभी के जीवन में एक अलग अनुभव और सीख ले कर आते हैं। जब इन्हीं अनुभवों को यदि शब्द प्रदान कर दिए जाते हैं तो वह ‘रचना’ बन जाती और शब्द ब्रह्म है इसलिए वह अमर हो जाती है।

बचपन में से लेकर मैं कभी भी खजुराहो के बारे में, उसके मंदिरों इत्यादि के बारे में कोई भी कार्यक्रम, मैगजीन इत्यादि में देखती थी तो मन में इच्छा जरूर होती थी कि जीवन में एक बार तो यहां की यात्रा करनी है। न जाने कब ये इच्छा पूरी होगी।

ये अवसर मुझे 1 फरवरी 2020 को खजुराहो में ESW ( Environment and Social Welfare Society) सोसाइटी की तरफ से 2 दिवसीय अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी में जाने का सुवसर प्राप्त हुआ।

मेरी खजुराहो की यात्रा के पीछे की एक महत्वपूर्ण कारण था।

मेरा मन अति प्रसन्न हुआ और मैंने जल्द से जल्द ट्रेन की टिकट रिज़र्व करवा लिए कि मुझे समय पर खजुराहो पहुंचना है। निश्चित समय पर मैं खजुराहो पहुंच गई। मन में बहुत उत्साह था कि आज बचपन का सपना सच होने जा रहा था। सबसे पहले संगोष्ठी में उपस्थित रहना भी आवश्यक था इसीलिए नियत समय पर संगोष्ठी प्रारंभ हो गई।

वहाँ पर मेरे द्वारा डॉ देवी शंकर सुमन जी, साइंटिस्ट मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरमेंट फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, डॉ उलरिच वर्क, प्रेसिडेंट जर्मन एसोसिएशन ऑफ होम थेरेपी का विधिवत स्वागत किया गया।

बहुत ही सुंदर संगोष्ठी और पर्यावरण…

बहुत ही सुंदर संगोष्ठी और पर्यावरण पर आधारित विषयों के साथ सभी ने अपने रिसर्च पेपर (पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन) प्रस्तुत किए जिनसे बहुत कुछ सीखने, जानने का मौका मिला। डॉ उलरिच जो कि जर्मनी से थे उन्होंने हवन थेरेपी पर बहुत सुंदर प्रेजेंटेशन प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार से हवन हमारे पर्यावरण के लिए, हमारे अस्तित्व के लिए, हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। यह विडंबना ही कहेंगे कि हम अपनी सभ्यता, संस्कृति को भूलते जा रहे हैं जो कि हम पश्चिमीकरण की तरफ बढ़ते जा रहे हैं, कुछ समय की मांग है और कुछ मजबूरी कही जा सकती है। जबकि प्राचीन काल से हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा कोई भी शुभ कार्य हवन, यज्ञ इत्यादि से प्रारंभ किया जाता था जिससे न केवल वातावरण शुद्ध होता था बल्कि हर तरफ एक आध्यात्मिक, सात्विक ऊर्जा का संचार होता था जो हमारे मन मस्तिष्क तथा विचारों को भी सात्विकता प्रदान करती थी। परंतु आज जहां हर तरफ प्रदूषण का ही बोलबाला है तो इस तरह का कार्य बहुत सही दिशा में काम करेगा।

कुल मिलाकर संगोष्ठी का अनुभव बहुत ही अच्छा रहा, स्मरणीय रहा। ये तो संगोष्ठी से संबंधित कुछ अनुभव थे।

फिर मैंने अपना शोधपत्र वाचन किया। इसके पश्चात मैं निकल गई अपनी खजुराहो की यात्रा पर। इसके लिए मैंने एक टैक्सी किराए पर ली ताकि कम समय में मैं अपनी यात्रा पूरी कर सकूं।

खजुराहो के मंदिर अपने आप में ही अपनी मिसाल हैं। खजुराहो के मंदिरों को चंदेल वंश के राजाओं ने बनवाया था। यहां 85 मंदिर थे, जिनमें से सिर्फ़ 20 ही बचे हैं। खजुराहो के मंदिरों की बाहरी दीवारों की कामुक मूर्तियां विश्वप्रसिद्ध हैं और यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स की लिस्ट में शामिल हैं।

सभी मंदिरों के बारे में एक साथ बताने की बजाय मैं एक-एक मंदिर की विशेषता और उसके बारे में कुछ स्मृतियां आपके साथ बांटना चाहती हूं।

खजुराहो के मंदिर अपने आप में अद्वितीय…

खजुराहो के मंदिर अपने आप में अद्वितीय हैं। यहां हर पत्थर पर जीवन दिखाई देता है। प्रत्येक मंदिर अपने आप में भव्यता का सबसे बड़ा नमूना कहा जा सकता है। यहां की स्थापत्य कला, शिल्प कला देखते ही बनती है। प्रत्येक मंदिर के द्वार पर अर्ध चंद्र या सूर्य के चित्र बने हुए हैं जिसके दोनों ओर शंख दिखाई देते हैं। सभी मंदिर अपने आप में भव्यता लिए हुए हैं जिनका अलग-अलग महत्व है। यहां पर सभी मंदिर सूर्योदय पर खुलते हैं और सूर्यास्त पर बंद हो जाते हैं। यही सिस्टम रखा हुआ है यहां पर जिसका पालन बहुत ही सख्ती से किया जाता है।

एक मंदिर में रात को लाइट एंड साउंड शो होता है जिसकी टिकट ढाई सौ रुपए रखी गई है। यह लगभग सवा घंटे का शो होता है जिसमें मंदिरों के बारे में बहुत विस्तार से बताया जाता है साथ में उनके इतिहास तथा इन मंदिरों के निर्माण के पीछे जो कथाएं किवदंतियां हैं उनके बारे में विस्तार से सूचना दी जाती है।

खजुराहो के मंदिर चंदेल वंश के द्वारा बनाए गए हैं…

खजुराहो के मंदिर चंदेल वंश के द्वारा बनाए गए हैं। इन सभी मंदिरों में जीवन के सभी पड़ावों पर प्रकाश डाला गया है। मंदिर में जाने से पहले वहां पर अप्सराओं की मूर्तियां है जो नारी सौंदर्य को उजागर करती हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि हमें जीवन में इस तरह के अवसर मिलते रहेंगे जब विषय वासनाएं हमें अपनी और आकृष्ट करती हैं। हमें फिर भी स्वयं पर संयम रखते हुए अपना कर्म करते रहना है। यह अप्सराएं विभिन्न मुद्राओं में दिखाई देती हैं जिनमें दैनिक जीवन से संबंधित कार्यकलाप भी सम्मिलित हैं। इसके बाद गृहस्थ धर्म, प्रेम, समर्पण भाव भी दिखाया गया है।

अभी तक हम लोग यह सोचते थे कि खजुराहो के मंदिर केवल स्त्री पुरुष के मिलन, कामशास्त्र की गाथा का वर्णन करते हैं। वहां पर अंतरंग चित्र अधिक दिखाई देते हैं। प्रेम संबंधों को बहुत सूक्ष्मता से दिखाया गया है। परंतु इनके पीछे जो इतिहास है और जो भावनाएं हैं वह अलग है। यहां पर प्रेम प्रदर्शन के साथ इन मूर्तियों के चेहरों के भावों पर कहीं भी वासना या उत्तेजना नहीं दिखाई देती है। उनके चेहरों पर एक दिव्यता, एक समर्पण, एक संतुष्टि, एक तेज दिखाई देता है जो गृहस्थ धर्म के स्तंभ माने गए हैं। यही प्रेम संबंध, समर्पण सृष्टि चक्र का आधार है। यहीं से एक औरत मां बनने का सौभाग्य प्राप्त करती है और मां बनना पूर्णता को प्राप्त करना है। प्रसव पीड़ा का आनंद और उसके बाद का फल क्या होता है इसके बारे में शब्दों में बता पाना संभव नहीं है।

ईश्वर की प्राप्ति का हेतु हमारा शरीर और मन ही है। हम अपने शरीर, अपने मन के द्वारा संतुष्टि को प्राप्त करने के बाद ईश्वर की ओर अधिक दृढ़ता पूर्वक कदम बढ़ाते हैं। तृप्ति भी हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है। शरीर और आत्मा तृप्त होने के बाद हम एक दूसरे पायदान पर चलते हैं जहां पर हमें दिव्यता, भव्यता और स्वार्गिक आनंद की प्राप्ति हो सकती है क्योंकि इन सब के लिए हमारे चरित्र में बहुत सी चीजों की आवश्यकता है। कुल मिलाकर आज मेरा भ्रम भी दूर हो क्या कि खजुराहो के मंदिर केवल प्रेम, संबंधों पर ही आधारित नहीं है। यहां पर बहुत कुछ देखने, बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जैन धर्म के मंदिर में जहां बहुत से पुराने चित्र दिखाई दिए जिनमें शोध की बहुत से संभावनाएं नजर आई।

खजुराहो के दूल्हा देव मंदिर के कुछ चित्र।

यहां पर एक शिवलिंग है जिसमें 108 छोटे-छोटे शिवलिंग बने हुए हैं। यह शिवलिंग केवल शिवरात्रि पर ही पूजा के लिए उपलब्ध हो पाता है यानि इसके कपाट केवल शिवरात्रि पर ही खुलते हैं। कहा जाता है यहां पर सुहागिने अपने पति की लंबी आयु के लिए वर मांगती हैं। इस मंदिर का नाम दुल्हादेव मंदिर इसलिए पड़ा है कि एक बार एक बारात जा रही थी तो दूल्हे की तबीयत अचानक से खराब हो गई और वह परलोक सिधार गया तो इसी मंदिर में उसकी पत्नी ने आकर पूजा की तो उसे पुनः जीवनदान मिल गया। इसलिए इस मंदिर का नाम दुल्हादेव मंदिर है। बहुत ही शांत तथा स्वच्छ निर्मल वातावरण। अविस्मरणीय अनुभव।

प्रस्तुत चित्र खजुराहो मतंगेश्वर महादेव मंदिर का है। यहां पर प्रात:काल सभी भक्तजन पूजा करने आते हैं जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि खजुराहो में मंदिर सूर्योदय के समय खुलते हैं और सूर्यास्त पर बंद हो जाते हैं। प्रस्तुत मंदिर में लगभग 18 फुट लंबा शिवलिंग एक बहुत बड़े चबूतरे पर स्थित है। मैंने अभी तक कि अपनी जिंदगी में इतना बड़ा शिवलिंग नहीं देखा है। अद्भुत, अद्वितीय और आकर्षक भगवान शिव का प्रतीक शिवलिंग अनंतता, विशालता लिए हुए हैं जिसे देख कर आत्मिक शांति और एक सात्विक ऊर्जा का संचार हुआ। वहां पर पंडित जी ने बताया कि यह शिवलिंग फुट कुल 18 फुट का है, जिसमें 9 फुट ऊपर और 9 फुट नीचे है। शिवलिंग के नीचे एक बहुमूल्य मणि चंदेल वंश के राजाओं के द्वारा दबाई गई है कि वह मणि सुरक्षित रह सके। शायद उस मणि का यह प्रभाव है कि अभी तक यह शिवलिंग कहीं से खंडित नहीं नजर आता। बहुत ही सुंदर नजारा। मैं अपने आप को भाग्यशाली समझती हूं कि मैं यहां पहुंचकर इस शिवलिंग के दर्शन कर पाई।

खजुराहो के जैन मंदिर…

खजुराहो के जैन मंदिर के कुछ चित्र जहां पर शाकाहार परोपकार, पर्यावरण संरक्षण इत्यादि के बारे में कितने सुंदर संदेश दिए हुए हैं। इसी के साथ यहां पर पौराणिक भारतीय सभ्यता के बारे में बहुत सुंदर वर्णित चित्र भी प्रस्तुत थे जिन्हें मैं सहेज कर अपने पास ले आई तथा आप सबके साथ साझा करना चाहती हूं। कृपया आप भी देखिए कितना विशाल है हमारा भारत देश और उसका धर्म, उसकी संस्कृति, उसकी विरासत। गर्व है हमें हमारे भारतीय होने पर। जय मां भारती।

कंदरिया महादेव मंदिर…

खजुराहो के मंदिरों की श्रृंखला में आज हम बात करते हैं ‘कंदरिया महादेव’ मंदिर की। सभी मंदिरों की तरह यह मंदिर भी बहुत भव्य तथा मनमोहक है। यहां की शांति और सौम्यता में तो देखते ही बनती है।

कंदरिया महादेव मंदिर पश्चिमी समूह के मंदिरों में विशालतम है। यह अपनी भव्यता और संगीतमयता के कारण प्रसिद्ध है। इस विशाल मंदिर का निर्माण महान चन्देल राजा विद्याधर ने महमूद गजनवी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में किया था। लगभग 1050 ईसवीं में इस मंदिर को बनवाया गया। यह एक शैव मंदिर है। तांत्रिक समुदाय को प्रसन्न करने के लिए इसका निर्माण किया गया था। कंदरिया महादेव मंदिर लगभग 107 फुट ऊंचा है। मकर तोरण इसकी मुख्य विशेषता है। मंदिर के संगमरमरी लिंगम में अत्यधिक ऊर्जावान मिथुन हैं। अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार यहां सर्वाधिक मिथुनों की आकृतियां हैं। उन्होंने मंदिर के बाहर 646 आकृतियां और भीतर 246 आकृतियों की गणना की थीं।

अंदर मंडप में जाने के लिए प्रवेश द्वार पर अर्धचंद्र तथा शंख के चित्र बनाए गए हैं।उसके बाद अंदर रोशनी का प्रबंध इस प्रकार से किया गया है कि आर पार आने वाली रोशनी का केंद्र सामने पड़ी मूर्ति पर बिल्कुल स्पष्ट रूप से दिखाई दे। यह जो चित्र दिखाई दे रहे हैं यहां पर कोई भी कृत्रिम रोशनी का प्रबंध नहीं है क्योंकि जैसा भी कि मैंने पहले भी कहा है कि यहां मंदिर सूर्य उदय पर खुलते हैं और सूर्यास्त पर बंद हो जाते हैं तो अधिकतर कृत्रिम रोशनी की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। परंतु मंदिरों के अंदर भी वास्तु कुछ इस प्रकार से है कि रोशनी को मुख्य मंदिर की मूर्ति तक केंद्रित किया गया है ताकि भगवान के दर्शन बहुत स्पष्ट और सुंदर तरीके से हो सके।

यह जो चित्र लिए गए हैं मोबाइल के कैमरे से लिए गए हैं और देखिए कितने स्पष्ट, सुंदर हैं। इसी के साथ मंदिर के मंडप में जाने से पहले दाएं तरफ एक लिपि अंकित की गई है जिसमें प्रथम “ओम नमः शिवाय” बिल्कुल स्पष्ट दिखाई दे रहा है उसके बाद शायद हम पढ़ पाने में संभव नहीं हो पाए। परंतु इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय भी यह सब कुछ इतना उन्नत था और लिपियां आसानी से पढ़ी और समझी जा रही थी तभी तो वह पत्थरों पर उकेरी गई। यहां की शिल्प कला बहुत ही अद्वितीय है। पत्थरों पर अंकित मूर्तियां अपने आप में इतनी सौम्य और सुंदर है कि उनको शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना शायद मेरे बस में नहीं है।

खजुराहो के मंदिर की श्रृंखला में दूसरा मंदिर है विश्वनाथ मंदिर। इसमें भगवान विश्वनाथ यानी शिवलिंग रूप में विराजमान है। प्रत्येक मंडप में यहां बहुत सुंदर चित्रकारी और शिल्प कला, नक्काशी देखने को मिलती है। नंदी मंडप में जब मैंने देखा तो नंदी जी की इतनी विशाल प्रतिमा कि मन गदगद हो गया। बहुत सुंदर शांत वातावरण ऐसा लगता है जैसे ईश्वर का साक्षात्कार हो गया हो। यहां के मंदिरों की विशेषता यह है कि एक ही पत्थर के बनाए गए हैं और पता नहीं उन में कौन सी धातु मिलाई गई है कि अभी तक इतने मजबूत और चिकने है के सभी लोग, पर्यटक दांतो तले उंगली दबा लेते हैं।

यहां की भव्यता सुंदरता देखते ही बनती है। मंदिर के कक्ष में जहां विश्वनाथ जी, की शिवलिंग की स्थापना है वहां पर रोशनी का इस तरह से प्रबंध किया गया है कि क्रॉस वेंटीलेशन के तहत बिना किसी रोशनी के अंदर आते ही शिवलिंग के दर्शन बहुत ही सुंदर प्रकार से हो जाते हैं। क्योंकि दोनों तरफ की रोशनी शिवलिंग पर दिखाई देती है। हर प्रकार के मंदिर के दरवाजे के बाहर अर्धचंद्र या सूर्य का बिंब पूर्ण गोला बनाया गया है। उसके दोनों तरफ शंख हैं। विश्वनाथ मंदिर के मंडप के बाहर एक लिपि का चित्र भी दिखाई दिया जहां पर ओम नमः शिवाय बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा है। यानी तब तक हम यह लिपियां और भाषा बिल्कुल सही से पढ़ने और लिखना सीख गए थे। अनुसंधान का विषय है।

देवी जगदम्बा मंदिर…

कंदरिया महादेव मंदिर के चबूतरे के उत्तर में जगदम्बा देवी का मंदिर है। जगदम्बा देवी का मंदिर पहले भगवान विष्णु को समर्पित था और इसका निर्माण 1000 से 1025 ईसवीं के बीच किया गया था। सैकड़ों वर्षों पश्चात यहां छतरपुर के महाराजा ने देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित करवाई थी इसी कारण इसे देवी जगदम्बा मंदिर कहते हैं। यहां पर उत्कीर्ण मैथुन मूर्तियों में भावों की गहरी संवेदनशीलता शिल्प की विशेषता है। यह मंदिर शार्दूलों के काल्पनिक चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। शार्दूल वह पौराणिक पशु था जिसका शरीर शेर का और सिर तोते, हाथी या वराह का होता था।

कुल मिलाकर इस मंदिर की यात्रा भी अविस्मरणीय रही। खजुराहो में जो बात सबसे अच्छी लगी वह यह कि यहां पर किसी भी प्रकार के किसी पुजारी के दर्शन बहुत कम हुए और कहीं भी किसी ने दान-दक्षिणा के लिए मजबूर नहीं किया जैसा कि ज्यादातर हिंदू तीर्थों पर आजकल होता है कि आप को दान-दक्षिणा के लिए मजबूर किया जाता है। यदि हम ऐसा नहीं करते तो तरह-तरह की बातें बनाई जाती हैं और हमारी श्रद्धा और आस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है। मैं यह पूछना चाहती हूं कि यदि जो लोग पैसा नहीं दे सकते या नहीं देते हैं क्या उनमें श्रद्धा नहीं है, ईश्वर में आस्था नहीं है? वे लोग इतनी दूर यदि इतना सब कुछ खर्च करके, अपने पीछे से हर तरह से व्यवस्था करके आए हैं तो क्या बिना आस्था, बिना श्रद्धा के आए हैं? और यदि हम 50 ₹100 चढ़ा दे तो क्या वह श्रद्धा जाग जाएगी ? इस तरह के कार्यकलापों से मन दु:खी हो जाता है। पर यहां ऐसा कुछ नहीं था जिसे देख कर मन को सुकून मिला।

बस इसके बाद वापसी का समय हो गया और वैसे भी खजुराहो के सभी मंदिरों के दर्शन ईश्वर की असीम कृपा से मैंने कर ही लिए थे। यह एक ऐसा वृतांत है जो मन में बहुत शांति, श्रद्धा और एक नई चेतना लेकर आया था। ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद इतने पवित्र स्थल के दर्शन मैं कर पाई। बहुत ही अविस्मरणीय यात्रा। इस यात्रा के लिए मैं उस असीम शक्ति का हृदय से धन्यवाद देती हूं। इसी के साथ-साथ मन में बहुत कुछ और भी जागृत हो गया है कि काश कभी, मदुरै, तमिलनाडु, तिरुचिरापल्ली के भी मंदिर एक बार देखने का सौभाग्य प्राप्त हो? देखते हैं यह इच्छा कब पूरी हो पाती है, सब कुछ प्रभु के हाथ है। जब प्रभु इच्छा……… जितना मिला है उसमें भी संतोष करना चाहिए। बस इससे अधिक और क्या लिखना है।
इति शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — अभी तक हम लोग यह सोचते थे कि खजुराहो के मंदिर केवल स्त्री पुरुष के मिलन, कामशास्त्र की गाथा का वर्णन करते हैं। वहां पर अंतरंग चित्र अधिक दिखाई देते हैं। प्रेम संबंधों को बहुत सूक्ष्मता से दिखाया गया है। परंतु इनके पीछे जो इतिहास है और जो भावनाएं हैं वह अलग है। यहां पर प्रेम प्रदर्शन के साथ इन मूर्तियों के चेहरों के भावों पर कहीं भी वासना या उत्तेजना नहीं दिखाई देती है। उनके चेहरों पर एक दिव्यता, एक समर्पण, एक संतुष्टि, एक तेज दिखाई देता है जो गृहस्थ धर्म के स्तंभ माने गए हैं। यही प्रेम संबंध, समर्पण सृष्टि चक्र का आधार है। यहीं से एक औरत मां बनने का सौभाग्य प्राप्त करती है और मां बनना पूर्णता को प्राप्त करना है। प्रसव पीड़ा का आनंद और उसके बाद का फल क्या होता है इसके बारे में शब्दों में बता पाना संभव नहीं है।

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यह लेख (खजुराहो यात्रा: एक अविस्मरणीय दैवीय अनुभव।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

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माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा। ♦

“नवरात्र” शब्द से ‘नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध’ होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि ‘रात्रि’ शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। जैसे- नवदिन या शिवदिन। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते।

नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम नवरात्र को समझ लेते हैं। मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है- विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र मनाया जाता है। लेकिन, फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।

हालांकि आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। यहां तक कि सामान्य भक्त ही नहीं अपितु, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। आज कल बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं।

• वैज्ञानिक आधार •

नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है।

प्रेम से बोलो – जय माता दी! सारे मिलकर बोलो जय माता दी!

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

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यह लेख (माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नारी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नारी। ♦

भारतीय नारी का यहां कोई नही सानी है,
है सब पर भारी क्योंकि वह आत्माभिमानी है।

हो सौंदर्य, वैदुष्य या सहनशीलता हो,
गार्गी, विद्योत्तमा, रंभा या शकुंतला हो।

अपने गुणों से वो सदा सम्मान पाती आई है।
हो भी क्यों ना वह अपने गुणों का लोहा मनवाती आई है।

सृष्टि का आधार है नारी, प्रकृति का श्रृंगार है नारी,
नारी है तो प्रेम है, बंधन है, हर रिश्ते की डोर है नारी।

बचपन की अल्हड़ता में भी, भाव का भंडार हैं नारी,
यौवन में लज्जा संयम का, सुंदरता का संगम है नारी।

होती विदा जब बाबुल के घर से, दो घरों की लाज है नारी,
अपने तन, मन, निष्ठा से, नव जीवन को अपनाती नारी।

माँ बन कर जीवन में, पूर्णता पा लेती है नारी,
सर्वस्व अपना सौंप कर, बच्चों को बनाती हैं नारी।

प्रकृति धरती की तरह, बस देना ही जानती है नारी,
प्रेम, भाव, इज्जत, बस यही तो मांगती हैं नारी।

जीवन के हर पड़ाव में, बस आलंबन चाहती है नारी,
वरना तो वो स्वयं शक्ति है, और हर किसी पर भारी है नारी।

नारी को सरल न समझो, ईश्वरत्व का मिश्रण है नारी,
हम खुद अपना सम्मान करें, और मान करें हम हैं नारी।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस कविता से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — माँ बन कर जीवन में पूर्णता पा लेती है नारी, सर्वस्व अपना सौंप कर, बच्चों को महान बनाती हैं नारी। जैसे प्रकृति धरती सदैव ही देना जानती है, उसी की तरह, बस देना ही जानती है नारी, प्रेम, भाव, इज्जत, बस यही तो मांगती हैं नारी। जीवन के हर पड़ाव में, बस आलंबन चाहती है नारी, वरना तो वो स्वयं शक्ति है, और हर किसी पर भारी है नारी। नारी को सरल समझने की भूल न करो, ईश्वरत्व का मिश्रण है नारी, हम खुद अपना सम्मान करें, और मान करें हम हैं नारी। ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ पर साहस व शौर्य की प्रतिमूर्ति नारी शक्ति को नमन। नारी सशक्तिकरण के बिना मानवता का विकास अधूरा है।

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यह कविता (नारी।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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एक पाती : अपने आराध्य के नाम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ एक पाती : अपने आराध्य के नाम। ♦

एक कवि की कल्पना, एक लेखक की उड़ान की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए वह अपनी कल्पना में क्या सोचता है, किसका सृजन करता है इसके बारे में कई बार वो स्वयं भी नहीं जान पाता। इसलिए मैं अपने वादे के लिए किसी इंसान के बजाय उस सृष्टि के रचयिता से ही अपनी बात कहना चाहती हूं, क्योंकि मेरा सोचना थोड़ा अलग है कि क्यों ना हम अपनी इच्छाएं,अपनी आकांक्षाएं, अपना दु:ख, अपनी संवेदनाएं उस ईश्वर से ही साझा करें जो बदले में केवल शांति, सुकून, आलंबन और आशीर्वाद ही प्रदान करता है। ना कि वक्त आने पर हमारा ही मजाक उड़ा देता है जो कि इंसानी फितरत है।

• सर्वशक्तिमान ईश्वर कण-कण में विराजमान है। •

हम जानते हैं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर कण-कण में विराजमान है। ईश्वर का साकार, साक्षात रुप है यह अथाह समुद्र, यह विशालकाय पर्वत श्रृंखला, यह अविचल, अविरल धारा, ये अनन्त क्षितिज यह सब उसी का ही तो प्रमाण है, और सबसे जीवंत प्रमाण तो हम स्वयं है कि जिस में इतना कुछ उस ईश्वर ने डाला है कि एक जीवन भी उसके बारे मे समझने के लिए कम है। यदि हम यह महसूस करें कि जब हम बहुत प्रसन्न होते हैं तो हमारा मन हिलोरे लेता है कि हम अपनी खुशी को अधिक से अधिक उसके साथ बैठे जो हमारी खुशी को दुगना करें तो इस अवस्था में प्रकृति हमारे साथ हमारी खुशी को दुगना कर के हमें लौटाती है।

• आपने कभी सागर की लहरों को देखा है? •

आपने कभी सागर की लहरों को देखा है? यदि हम खुश हैं तो वह और उफन- उफन कर हमारी खुशी में लहरा कर नाचने का एहसास कराती हैं और हमें यह बताती हैं कि देखो; ….. हम तुम्हारी खुशी से कितने प्रसन्न है।

इसके विपरीत यदि हम दुखी हैं, खिन्न है, अकेले हैं तो मानो बार-बार आकर हमें आलिंगन करते हुए सांत्वना प्रदान करती हैं कि….. कोई बात नहीं यही दुनियां है, ये इसी तरह ही चलती है। मेरे (समुद्र के) मेरे पानी को ही देखो न…. न जाने कितने के आंसुओं को पी कर ही नमकीन हुआ है। इसलिए धैर्य रखो…… सब ठीक हो जाएगा… और थोड़ी देर में ही हम इन लहरों का सानिध्य पाकर अपने आप को शांत पाते हैं।

आप कितने ही लोगों के बारे में जानते होंगे जो दोनों ही अवस्थाओं में प्रकृति के सानिध्य में रहना पसंद करते हैं क्योंकि एक ईश्वर ही सत्य है, प्रामाणिक है, आदि अनंत है, यह हम सबका है और यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम सब ही उसके ना आज तक हुए हैं ना भविष्य में हो सकेंगे, क्योंकि पूर्ण समर्पण जिन्होंने भी किया है वह बहुत कम है।

• कुछ लोग ईश्वरीय सत्ता को मानते ही नहीं •

कुछ लोग ईश्वरीय सत्ता को मानते ही नहीं और कुछ ऐसे हैं जो अपने जन्म, अपनी क्षमताओं, को अपनी उपलब्धियों को केवल अपने से ही संबंधित मानते हैं और इसका श्रेय केवल स्वयं को देते हैं। इसमें उन्हें किसी का सहयोग, किसी का आशीर्वाद, किसी की तपस्या, किसी का देवत्व नजर ही नहीं आता है।
खैर… जाने दो।

यहां बात सिर्फ मेरी और मेरे परम मित्र ईश्वर की है। जहां वह मेरे इतने निकट है कि मैं उनसे अधिकार से भी बहुत कुछ कह सकती हूं। वह मेरे अपने हैं जिनसे लिपट कर मैं रो सकती हूं। जिनको मैं अपने आसपास महसूस कर सकती हूं। यह एक भाव है, एक पागलपन है जिसे समझने के लिए उच्च कोटि की संवेदना, सुकोमल हृदय, पवित्र भावनाएं, निष्ठा, भक्ति और समर्पण चाहिए।
..… तो मैं अपनी बात कहना चाहती हूं अपने परम मित्र ईश्वर से कि सुनो; तुम करो वादा ….…

तुम तो सर्वशक्तिमान हो, तो आज मुझसे यह वादा करो कि तुम जब भी नई सृष्टि की रचना करो तो उसमें इंसान को इतना ज़हरीला ना बनाना जितना वह बन चुका है। तुम वादा करो मुझसे कि ऐसे इंसानों को इस धरती पर जन्म ही नहीं दोगे जो केवल स्वार्थी हैं, केवल अपने ही बातें करते हैं, अपने ही कामों के प्रति सचेत हैं, आत्म प्रशंसा के अतिरिक्त उन्हें कुछ आता ही नहीं। वे इतने निष्ठुर हैं कि किसी इंसान की भावनाएं, उसकी सेवा, उसकी निष्ठा, उसका भोलापन, उसकी निश्चल संवेदनाओं को एक पल में कुचल कर रख देते हैं वह भी इतने नुकीले कीलों से कि लहूलुहान कर के रख देते हैं।
तुम वादा करो….. मुझसे अपनी इस नई सृष्टि में उन इंसानों को जन्म नहीं दोगे जो दरिंदे हैं, छोटी बच्चियों को नोच खाते हैं, विक्षिप्त मानसिकता के शिकार हैं।

• तुम वादा करो…… •

तुम वादा करो….. अपनी नई दुनिया में उन लोगों को जगह नहीं दोगे तो अपनी वासना के लिए, क्षणिक शारीरिक आनंद के लिए अपनी संतान को प्लास्टिक की थैली में जिंदा ही फेंक देते हैं। तुम्हारी इस अनूठी, अप्रितम, अतुलनीय सृजन शक्ति का इतना घिनौना रूप सामने लाते हैं। एक जीव को, एक जीवन को इस दुनिया में लाकर कुत्तों के खाने के हवाले कर देते हैं। कूड़े के ढेर में तुम्हारे ही स्वरूप को फेंक देते हैं, क्योंकि बच्चे तो साक्षात भगवान का ही स्वरूप होते हैं। अपने जिगर के टुकड़े को स्वयं से ही दूर कैसे कर लेते हैं ये लोग?
तुम वादा करो मुझसे….. अपनी इस नई दुनिया में कहीं भी धोखा, फरेब नहीं होगा। इंसान को इंसान समझा जाएगा क्योंकि आज के हालात तो ऐसे हैं कि….

“कहीं गीता में ज्ञान नहीं मिलता,
कहीं कुरान में ईमान नहीं मिलता,
अफसोस तो है कि इस दुनियां में
इंसान को,
इंसान में,
इंसान नहीं मिलता”।

उस दुनियां में जहां रिश्तों की, भावनाओं की कद्र होगी। जहां कान खजूरे की टांगों की तरह उतने ही लोगों के दंश नहीं होंगे, क्योंकि सांप और बिच्छू के डंक और जहर से तो बचा जा सकता है क्योंकि उनका ज़हर दिखाई देता है परंतु इंसानी ज़हर आत्मा को छलनी कर देता है। मैं बहुत परेशान हूं तुम्हारी इस दुनियां से जहां इतना पाप, इतना धोखा, इतना छल भरा हुआ है कि हिंसक जानवरों से तो बचा जा सकता है परंतु जो इंसानों का ही शिकार करें उनसे कैसे बचा जाए? तुम ही बताओ …..

अब तुम जो कहोगे मैं जानती हूं ……
तुम कहोगे कि मैंने तो यह सृष्टि बहुत सुंदर, निर्मल, निश्चल ही बनाई थी। परंतु तुम इंसानों ने ही इसे अपने कर्मों के द्वारा ऐसा बनाया है। जहां मेरा कीर्तन, मेरा नाम लेकर कितने गलत काम किए जाते हैं। मुझे ‘बनाते’ हो, मुझे ही सजाकर बाजार में बेचते हो, भला कौन ऐसा है जो मुझे ‘बना’ सके? मेरा ‘निर्माण’ कर सके? मेरी बोली लगा सके? और मेरी कीमत में भी मोल – भाव करते हो।

• मैं तो केवल श्रद्धा, भक्ति, भाव और प्रेम से ही बिक जाता हूं। •

किसमें इतनी हिम्मत है कि मुझे पैसों में खरीद सके ? अरे मैं तो केवल श्रद्धा, भक्ति, भाव और प्रेम से ही बिक जाता हूं। परंतु इन सब केआभाव में तुम कलयुगी मानवों ने मेरा कितना मजाक उड़ाया है?…… तुम अपराधी होकर भी मेरा स्वरूप होने की घोषणा करते हो…….. और स्वयं भगवान होने के दावे करते हो……. क्या मैं ऐसा हूं? ……. तुम मेरी शक्तियों का इतना दुरुपयोग करते हो, मेरा कितना दोहन करते हो। मुझ पर पत्थर फेंकते हो। परंतु मैं तो फिर भी तुम्हें मधुर फल ही देता हूं, और क्या – क्या बताऊं तुम्हें। यदि मैं बोलने पर आया तो तुम कोई भी नहीं सुन पाओगे …….।
इसलिए सिर्फ इतना ही कि यह सब तुम्हारे कर्मों का फल है और इस धरती को तुमने ही ऐसा बनाया है, मैंने नहीं।

मैं जानती हूं तुमने जो कहा है, सब सत्य है। पर मेरे परम मित्र, मेरे आधार, मेरे आराध्य…. इसलिए इतना होने के बाद भी तो सिर्फ तुमसे….. और सिर्फ तुमसे ही तो यह कह सकती हूं कि अगली सृष्टि में इंसान बनाना ही नहीं क्योंकि केवल वही ऐसे हैं जो सब दूषित करते हैं। मैं यह भी जानती हूं कि बहुत से अच्छे लोग भी हैं जो अपना जीवन मानवता, वैश्विक मूल्यों पर, प्रकृति प्रेम, भाईचारे पर ही, न्यौछावर कर देते हैं। पर इनकी संख्या बहुत कम है क्योंकि यही तो पृथ्वी की धुरी कहे जा सकते हैं। तभी तो पृथ्वी निराधार, निरंतर घूम रही है।
पर तुम वादा करो….. यदि ऐसे ही दुनिया बनाओगे तो ठीक है वरना फिर उसमें भी यही सब व्याप्त हो जाएगा और जितनी तकलीफ मुझे हो रही है उससे ज्यादा तुम्हें होगी। पर तुम तो बर्दाश्त कर लोगे पर शायद मैं ना कर पाऊं…. क्योंकि मैं थक चुकी हूं दोगले इंसानों से, इस नकली हंसी से, इस झूठी शख्सियतों से।
मैं नहीं चाहती इस दुनिया में रहना……

तुम वादा करो मुझसे…. मुझे अपने साथ ही रखोगे, अपने पास ही रखोगे, जब भी मैं आऊंगी तुम्हारे पास मुझे अपनी बाहों में भर कर अपने अनंत वक्षस्थल से जुदा मत करना। मुझे अपने पास ही रखना और नई दुनियां में इंसान मत बनाना और बनाना तुम्हारी मजबूरी हो तो कृपया मुझे इंसान नहीं बनाना। कुछ भी बनाना पर इंसान नहीं।

• मीरा की तरह…… •

नहीं झेल पाऊंगी दोबारा से यह सब। मैं टूट जाऊंगी, बिखर जाऊंगी। तुम तो सब समझते हो ना….. तुम तो मेरे अपने हो ना….. फिर तुम ऐसा नहीं करना….. तुम करो वादा कि मुझे फिर छलने के लिए नहीं छोड़ोगे। खुश रखने के झूठे वादे करने वालों से तुम मुझे बचाओगे। तुम अपने पास ही मुझे रखना… वहीं जहां झूठ फरेब, धोखे यह सब ना हो।

जहां अनंत, अगाध प्रेम हो…. निष्कपटता हो….. निश्छलता हो….. मासूमियत हो….. भावनाएं हो…..आलिंगन हो….. स्पंदन हो…. खुशी हो…. आत्मा हो….. चेतना हो……. स्पर्श हो…. समर्पण हो….. भाव हो….. एकैक्य हो….. सरलता हो…… सहजता हो……साम्य हो…… अनंतता हो….. और वो सब सिर्फ तुम्हारे पास है….. तुम्हारे साथ है….. इसलिए तुम करो वादा .. कि……

बस मीरा की तरह तुम में ही समा जाऊं….. तुम में खो कर, तुमको ही पा जाऊं….
बस तुम करो वादा…. तुम करो वादा……

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

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  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा अगर गंदगी किसी प्राणी ने किया है तो वो प्राणी इंसान ही है। चाहे बात प्रकृति को गन्दा करने की हो या अन्य गंदगी की वो सब इंसान ने ही किया है। पूरी पृथ्वी को नर्क बना दिया है इंसानो ने। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार के वशीभूत हो, विकर्म पर विकर्म करता चला जा रहा है आज का इंसान। सत्य व अच्छे कार्यों से दूर होता जा रहा है। अभी भी समय है तू संभल जा इंसान वर्ना सिर्फ पछताता रह जायेगा बाकि बचे हुए जीवन भर। तुम वादा करो मुझसे…. मुझे अपने साथ ही रखोगे, अपने पास ही रखोगे, जब भी मैं आऊंगी तुम्हारे पास मुझे अपनी बाहों में भर कर अपने अनंत वक्षस्थल से जुदा मत करना। मुझे अपने पास ही रखना और नई दुनियां में इंसान मत बनाना और बनाना तुम्हारी मजबूरी हो तो कृपया मुझे इंसान नहीं बनाना। कुछ भी बनाना पर इंसान नहीं।

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  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
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रामायण और जीवन मूल्य।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ रामायण और जीवन मूल्य। ♦

राम कथा में वैश्विक मूल्य।

भारतवर्ष में सत्य सनातन धर्म की पहचान है रामायण। युगों – युगों से इस धरा पर श्री रामचंद्र जी का नाम सदैव ही लिया जाता रहा है और आने वाले युगों तक भी लिया जाता रहेगा क्योंकि —

“कलयुग केवल नाम अधारा
सुमिर सुमिर नर उतरहीं पारा”॥

यह चौपाई केवल एक उदाहरण ही नहीं है अपितु इसमें सोलह आने सही बात कही गई है। राम कथा और रामायण ऐसे विषय हैं जिन पर कितने ही शोध हो चुके हैं, हो रहे हैं और आगे भी होते ही रहेंगे क्योंकि हमारे ऋषि – मुनियों द्वारा जो भी ग्रंथ लिखे गए हैं वह इतने सत्य, इतने प्रामाणिक और इतने प्रासंगिक है, इतने सार्वकालिक हैं कि उन्हें जिस भी युग में, जिस भी काल में पढ़ा जाएगा या पढ़ा जाता रहा है उनमें से कुछ नए तथ्य ही निकल कर सामने आते हैं।

जीवंत रूप में — रामायण व रामचरितमानस का पाठ।

वह एक ऐसे अथाह सागर के समान है जिसमें मंथन करने पर केवल अमृत ही प्राप्त होता है और यह हमारी निष्ठा है, परिश्रम है, साधना है, श्रद्धा है, विश्वास है, आस्था है, भक्ति है, धर्म है कि हम उस में से कितना अमृत निकाल पाते हैं। राम कथा और कृष्ण कथा भारतवर्ष में सदैव ही चलती रहती है। यह इस बात का जीवंत उदाहरण है कि वे जीवंत रूप में इन कथाओं के माध्यम से प्रत्येक भारतवासी के हृदय में निवास करते हैं। वरना हर साल वही रामायण हर साल वही कथा हर समय वही रामचरितमानस का गान ….. फिर भी लोग सुनते हैं, समझते हैं, भावविभोर हो जाते हैं, क्यों ?

हिंदू धर्म में अभिवादन का एक स्वरूप ‘राम-राम’।

यह इसलिए कि इन कथाओं के माध्यम से हम सदैव ही उनके चरित्र का स्मरण करते हैं। उन्हें अपने पास समझते हैं, मानते हैं, उनकी भक्ति में लीन हो जाते हैं, नतमस्तक होते हैं। यह हमारे सत्यता का प्रमाण है और प्रभु भक्ति का एक सरल उपाय है। हिंदू धर्म में अभिवादन का एक स्वरूप ‘राम-राम’ भी कहा जाता है।

ऐसा क्यों इसके पीछे भी एक वैज्ञानिक कारण है। जितने भी परंपराएं, रीति रिवाज,16 संस्कार हमारे सत्य सनातन धर्म में बनाए गए हैं उन सब के पीछे वैज्ञानिक कारण उपलब्ध है। हमारे ऋषि मुनि बहुत ही दूर दृष्टा थे। उन्होंने आस्था और विश्वास को वैज्ञानिकता को धर्म के साथ जोड़ दिया ताकि लोग इनका प्रयोग करने में थोड़ा सा भय भी समझे ताकि यह धर्म उन्हें हर प्रकार के विकारों से दूर रखें।

और रामायण में भी कहा गया है कि —

‘भय बिन होय न प्रीति’॥

रामचरितमानस के कुछ अद्वितीय उदाहरण।

श्री रामचरित मानस में शिव भक्त श्री रावण के मन की बात जो उन्होंने न केवल स्वयं के मोक्ष के लिए सोची अपितु सारी राक्षस जाति के शुभ कल्याण के लिए भी इस पर विचार किया।

यथा …

सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥
तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥

भावार्थ: रावण ने विचार किया कि देवताओं को आनंद देने वाले और पृथ्वी का भार हरण करने वाले भगवान ने ही यदि अवतार लिया है, तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा और प्रभु के बाण (के आघात) से प्राण छोड़कर भवसागर से तर जाऊँगा॥

मानस प्रेमी ही जान पायेगें कि तुलसीदास जी ने कितना परिश्रम किया होगा, इस प्रस्तुति को संकलित करने में, हम कलयुगी जीव केवल इन्हें पढ़कर ही अपना जीवन सफल कर सकते हैं क्योंकि इन सब में “राम” है और जहाँ “राम” हैं वहां प्रेम है, भक्ति है, समर्पण है, विश्वास है, श्रद्धा है, त्याग है, मर्यादा है, करूणा है, और जब इतने सकारात्मक गुण हमारे जीवन में एक साथ आ जाते हैं तो फिर वह जीवन वास्तव में ही सार्थक हो जाता है क्योंकि इन सब का किसी के भी जीवन में आना एक विशुद्ध चरित्र को जन्म देता है, यानी किसी भी मनुष्य के जीवन में यह सब गुण जब आ जाते हैं तो वह चरित्र निश्चल, विनम्र, और विशुद्ध, आत्मीय तथा प्रभु के सामिप्य को प्राप्त करने वाला हो जाता है, और कहते भी है ना —

‘राम से बड़ा राम का नाम’ और जहां “राम” हैं वहां सब कुछ है।

इसलिए यदि इन चौपाइयों के अर्थ हमें ना भी समझ में आए तो केवल पढ़ने भर से हमारे जीवन का उद्धार संभव है आवश्यकता है तो केवल विश्वास की, आस्था की, भक्ति की, प्रेम की और समर्पण की।

रामचरितमानस* की चौपाइयों में ऐसी क्षमता है कि इन चौपाइयों के जप से ही मनुष्य बड़े से बड़े संकट से भी मुक्त हो जाता है। जितना सरल राम का नाम है उतना ही सरल उनका भजन है उनका स्मरण है। इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग करने से जीवन में हर प्रकार से सुख – समृद्धि आती ही है। इसमें कोई भी संशय नहीं है क्योंकि “राम” का नाम सर्वकालिक TIMELESS है।

1. रक्षा के लिए —
मामभिरक्षक रघुकुल नायक ।
घृत वर चाप रुचिर कर सायक ॥

2. विपत्ति दूर करने के लिए —
राजिव नयन धरे धनु सायक ।
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक ॥

3. सहायता के लिए —
मोरे हित हरि सम नहि कोऊ ।
एहि अवसर सहाय सोई होऊ ॥

4. सब काम बनाने के लिए —
वंदौ बाल रुप सोई रामू ।
सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू ॥

5. वश मे करने के लिए —
सुमिर पवन सुत पावन नामू ।
अपने वश कर राखे राम ॥

6. संकट से बचने के लिए —
दीन दयालु विरद संभारी ।
हरहु नाथ मम संकट भारी ॥

7. विघ्न विनाश के लिए —
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही ।
राम सुकृपा बिलोकहि जेहि ॥

8. रोग विनाश के लिए —
राम कृपा नाशहि सव रोगा ।
जो यहि भाँति बनहि संयोगा ॥

9. ज्वार ताप दूर करने के लिए —
दैहिक दैविक भोतिक तापा ।
राम राज्य नहि काहुहि व्यापा ॥

10. दुःख नाश के लिए —
राम भक्ति मणि उर बस जाके ।
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके ॥

11. खोई चीज पाने के लिए —
गई बहोर गरीब नेवाजू ।
सरल सबल साहिब रघुराजू ॥

12. अनुराग बढाने के लिए —
सीता राम चरण रत मोरे ।
अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे ॥

13. घर मे सुख लाने के लिए —
जै सकाम नर सुनहि जे गावहि ।
सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं ॥

14. सुधार करने के लिए —
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती ।
जासु कृपा नहि कृपा अघाती ॥

15. विद्या पाने के लिए —
गुरू गृह पढन गए रघुराई ।
अल्प काल विधा सब आई ॥

16. सरस्वती निवास के लिए —
जेहि पर कृपा करहि जन जानी ।
कवि उर अजिर नचावहि बानी ॥

17. निर्मल बुद्धि के लिए —
ताके युग पद कमल मनाऊँ ।
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ ॥

18. मोह नाश के लिए —
होय विवेक मोह भ्रम भागा ।
तब रघुनाथ चरण अनुरागा ॥

19. प्रेम बढाने के लिए —
सब नर करहिं परस्पर प्रीती ।
चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती ॥

20. प्रीति बढाने के लिए —
बैर न कर काह सन कोई ।
जासन बैर प्रीति कर सोई ॥

21. सुख प्रप्ति के लिए —
अनुजन संयुत भोजन करही ।
देखि सकल जननी सुख भरहीं ॥

22. भाई का प्रेम पाने के लिए —
सेवाहि सानुकूल सब भाई ।
राम चरण रति अति अधिकाई ॥

23. बैर दूर करने के लिए —
बैर न कर काहू सन कोई ।
राम प्रताप विषमता खोई ॥

24. मेल कराने के लिए —
गरल सुधा रिपु करही मिलाई ।
गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥

25. शत्रु नाश के लिए —
जाके सुमिरन ते रिपु नासा ।
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा ॥

26. रोजगार पाने के लिए —
विश्व भरण पोषण करि जोई ।
ताकर नाम भरत अस होई ॥

27. इच्छा पूरी करने के लिए —
राम सदा सेवक रूचि राखी ।
वेद पुराण साधु सुर साखी ॥

28. पाप विनाश के लिए —
पापी जाकर नाम सुमिरहीं ।
अति अपार भव भवसागर तरहीं ॥

29. अल्प मृत्यु न होने के लिए —
अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा ।
सब सुन्दर सब निरूज शरीरा ॥

30. दरिद्रता दूर के लिए —
नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना ।
नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना ॥

31. प्रभु दर्शन पाने के लिए —
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा ।
प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा ॥

32. शोक दूर करने के लिए —
नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी ।
आए जन्म फल होहिं विशोकी ॥

33. क्षमा माँगने के लिए —
अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता ।
क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता ॥

श्री राम कथा अद्भुत है, अनोखी है, सुंदर है, रसिक है। इसके बारे में किसी कवि ने निम्न पंक्तियां कही है जो सर्वथा उचित जान पड़ती है —

ये है राम कथा, ये है राम कथा,
इसे पढ़ कर मिट जाती है,
जीवन की हर व्यथा।
ये है राम कथा, ये है राम कथा॥

श्री रामचरितमानस और नीति शिक्षा।

तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस नीति – शिक्षा का एक महत्मपूर्ण ग्रंथ है। इसमें बताई गई कई बातें और नीतियां मनुष्य के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती हैं, जिनका पालन करके मनुष्य कई दु:खों और परेशानियों से बच सकता है।

रामचरित मानस में चार ऐसी महिलाओं के बारे में बताया गया है, जिनका सम्मान हर हाल में करना ही चाहिए। इन चार का अपमान करने वाले या इन पर बुरी नजर डालने वाले मनुष्य महापापी होते हैं। ऐसे मनुष्य को जीवनभर किसी न किसी तरह से दुख भोगने पड़ते ही है।

“अनुज बधू भगिनी सुत नारी, सुनु सठ कन्या सम ए चारी ।
इन्हिह कुदृष्टि बिलोकइ जोई, ताहि बधें कछु पाप न होई” ॥

अर्थात: छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्र की पत्नी और अपनी पुत्री – ये चारों एक समान होती हैं। इन पर बुरी नजह डालने वाले या इनका सम्मान न करने वाले को मारने से कोई पाप नहीं लगता। वास्तव में रामचरितमानस में कोई भी उक्ति ऐसी नहीं है, कोई भी चौपाई ऐसी नहीं है जिसमें कोई शिक्षा ना हो। केवल आवश्यकता है तो हमें इनका अनुकरण करने की।

हमें निज धर्म पर चलना सिखाती रोज रामायण ।
सदा शुभ आचरण करना सिखाती रोज रामायण ॥
जिन्हें संसार सागर से उतरकर पार जाना है ।
उन्हें सुख से किनारे पर लगाती रोज रामायण ॥

कहीं छवि विष्णु की बाकी, कही शंकर की है झांकी,
हृदयानंद झूले पर झूलाती रोज रामायण ।
सरल कविता की कुंजों में बना मंदिर है हिंदी का,
जहां प्रभु प्रेम का दर्शन कराती रोज रामायण॥

कभी वेदों के सागर में, कभी गीता की गंगा में,
सभी रस बिंदुओं को मन में मिलाती रोज रामायण ॥

कही त्याग, कही प्रेम ,कहीं समर्पण का भाव है,
भक्ति, प्रेम का संदेश जन – जन को पहुंचाती रोज रामायण।
सत्य, निष्ठा ,मर्यादा का अनुपम संदेश है ये,
भारत की गरिमा में चार चांद लगाती रोज रामायण” ॥

यह भी कहा जाता है कि —

“जिन हिंदू परिवारों में रामचरितमानस की चौपाई के स्वर नहीं होते उन घरों में राग, शोक, दुख, दरिद्रता व क्लेश सैदेव चारपाई बिछाए स्थाई रूप से निवास करते हैं”।

अतः श्री रामचरितमानस का पाठ अत्यंत कल्याणकारी है। इसे हमे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।

निष्कर्ष — Conclusion

निष्कर्षत: यही कहा जा सकता है कि श्रीरामचरितमानस एक ऐसा महाकाव्य है जो प्रत्येक भारतीय के हृदय में बसा है। इसके नियम, मूल्य, मान्यताएं, रीति रिवाज हमारी रक्त धारा के साथ मिलकर हमारे शरीर में अनवरत चलाएमान है, गतिमान है, और जो रक्त धारा है, वह जीवनदायिनी शक्ति है, आधार है वह तो बहुमूल्य होगी ही।

श्री रामचरितमानस के बिना भारत की पहचान संभव नहीं हो सकती।
यह सर्वसाधारण भारतीय का अपना महाकाव्य है।

” सकल सुमंगल दायक, रघुनायक गुण गान ।
सादर सुनहिं ते तरही भव, सिंधु बिना जल जान” ॥
(सुंदरकांड, दोहा- 60)

अर्थात: रघुनायक श्री राम जी का गुणगान अति मंगलकारी है जो नर इसे आदर के साथ सुनते हैं, इस संसार सागर से पार उतर जाते हैं।

रामचरितमानस एक वृहद ग्रंथ है। इसको शब्द सीमा में बांधना असंभव कृत्य है, क्योंकि स्वयं देवताओं ने भी जिसके बारे में नेति – नेति कहा हो, तो हम जैसे अल्प बुद्धि व्यक्ति इसका वर्णन करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं। इसका कथानक, इसकी विशालता, इसकी विविधता को समझ पाना हमारे बस का काम नहीं है। फिर भी एक तुच्छ प्रयास है क्योंकि …

“जाति पाती पूछे नहीं कोई ।
हरि को भजे सो हरि का होई “॥

अतः हमने भी भक्ति भावना को समाहित करते हुए श्री रामचरितमानस के ऊपर अपने विचार व्यक्त किए है क्योंकि यह प्राकृतिक है, जहां श्री रामचरितमानस का नाम होगा वहां भक्ति अवश्य होगी।

अतः अंत में बस यही कहना चाहूंगी कि श्रीरामचरितमानस का जो स्थान भारतवर्ष में है या पूरे विश्व में है वो ऐसे ही आदरणीय बना रहे, और आगे भी यह ग्रंथ हमारे आने वाली पीढ़ियों के लिए भक्ति, संस्कार, चेतना, नैतिकता, मानवीय मूल्यों का संरक्षण, संवर्धन करता रहे इसी मंगल कामना के साथ — “जय श्री राम”।

1 — आचार्य तुलसीदास: रामचरित मानस

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — राम कथा (रामायण) – मंथन करने पर केवल अमृत ही प्राप्त होता है और यह हमारी निष्ठा है, परिश्रम है, साधना है, श्रद्धा है, विश्वास है, आस्था है, भक्ति है, धर्म है कि हम उस में से कितना अमृत निकाल पाते हैं।

—————

यह लेख (रामायण और जीवन मूल्य।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

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