• Skip to main content
  • Skip to primary sidebar
  • Skip to footer
  • HOME
  • ABOUT
    • Authors Intro
  • QUOTES
  • POETRY
    • ग़ज़ल व शायरी
  • STORIES
  • निबंध व जीवनी
  • Health Tips
  • CAREER DEVELOPMENT
  • EXAM TIPS
  • योग व ध्यान
  • Privacy Policy
  • CONTACT US
  • Disclaimer

KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

Check out Namecheap’s best Promotions!

You are here: Home / Archives for डॉ विदुषी शर्मा

डॉ विदुषी शर्मा

मंत्र को गुप्त क्यों रखा जाता है?

Kmsraj51 की कलम से…..

Mantra Ko Gupt Kyon Rakha Jata Hai | मंत्र को गुप्त क्यों रखा जाता है।

मंत्र दीक्षा का अर्थ है कि जब तुम समर्पण करते हो, तो गुरु तुममें प्रवेश कर जाता है, वह तुम्हारे शरीर, मन, आत्मा में प्रविष्ट हो जाता है। गुरु तुम्हारे अंतस में जाकर तुम्हारे अनुकूल ध्वनि की खोज करेगा। वह तुम्हारा मंत्र होगा। और जब तुम उसका उच्चारण करोगे तो तुम एक भिन्न आयाम में एक भिन्न व्यक्ति होओगे।

जब तक समर्पण नहीं होता, मंत्र नहीं दिया जा सकता है। मंत्र देने का अर्थ है कि गुरु ने तुममें प्रवेश किया है, गुरु ने तुम्हारी गहरी लयबद्धता को, तुम्हारे प्राणों के संगीत को अनुभव किया है। और फिर वह तुम्हें प्रतीक रूप में एक मंत्र देता है जो तुम्हारे अंतस के संगीत से मेल खाता हो। और जब तुम उस मंत्र का उच्चार करते हो तो तुम आंतरिक संगीत के जगत में प्रवेश कर जाते हो, तब आंतरिक लयबद्धता उपलब्ध होती है।

मंत्र तो सिर्फ चाबी है। और चाबी तब तक नहीं दी जा सकती जब तक ताले को न जान लिया जाए। मैं तुम्हें तभी चाबी दे सकता हूं जब तुम्हारे ताले को समझ लूं। चाबी तभी सार्थक है जब वह ताले को खोले। किसी भी चाबी से काम नहीं चलेगा। प्रत्येक आदमी विशेष ढंग का ताला है, उसके लिए विशेष ढंग की चाबी जरूरी है।

यही कारण है कि मंत्रों को गुप्त रखा जाता है। अगर तुम अपना मंत्र किसी और को बताते हो तो वह उसका प्रयोग कर सकता है। यही कारण है कि लोगों को अपने—अपने मंत्र गुप्त रखने चाहिए, उन्हें सार्वजनिक बनाना ठीक नहीं है। वह खतरनाक है। तुम दीक्षित हुए हो तो तुम जानते हो, तुम उसका मूल्य जानते हो, तुम उसे बांटते नहीं फिर सकते। यह दूसरों के लिए हानिकर हो सकता है। यह तुम्हारे लिए भी हानिकर हो सकता है। इसके कई कारण हैं।

पहली बात कि तुम वचन तोड़ रहे हो। और जैसे ही वचन टूटता है, गुरु के साथ तुम्हारा संपर्क टूट जाता है। फिर तुम गुरु के संपर्क में नहीं रहोगे। वचन पालन करने से ही सतत संपर्क कायम रहता है। दूसरी बात, दूसरे को बताने से, दूसरे के साथ उसके संबंध में बातचीत करने से मंत्र मन की सतह पर चला आता है और उसकी गहरी जड़ें टूट जाती हैं। तब मंत्र गपशप का हिस्सा बन जाता है। और तीसरा कारण है कि गुप्त रखने से मंत्र गहराता है। जितना गुप्त रखोगे वह उतना ही गहरे जाएगा; उसे गहरे में जाना ही होगा।

“एक शिष्य के संबंध में खबर है कि जब उसके गुरु ने उसे गुह्य मंत्र दिया तो उससे वचन ले लिया कि वह उसे बिलकुल गुप्त रखेगा। उसे कहा गया कि तुम इसे किसी को भी नहीं बताओगे। फिर शिष्य का गुरु उसके स्वप्न में प्रकट हुआ और उसने पूछा कि तुम्हारा मंत्र क्या है? और स्‍वप्‍न में भी शिष्य ने वचन का पालन किया; उसने बताने से इनकार कर दिया। और कहा जाता है कि इस भय से कि कहीं स्वप्न में गुरु फिर प्रकट हों या किसी को भेजें और वह इतनी नींद में हो कि गुप्त मंत्र को प्रकट कर दे और वचन टूट जाए, शिष्य ने बिलकुल सोना ही छोड़ दिया। वह सोता ही नहीं था।

ऐसे सोए बिना शिष्य को सात आठ दिन हो गए थे। फिर जब उसके गुरु ने पूछा कि तुम सोते क्यों नहीं हो? मैं देखता हूं कि तुमने सोना छोड़ दिया है। बात क्या है? शिष्य ने गुरु से कहा : आप मेरे साथ चालबाजी कर रहे हैं। आपने स्वप्न में आकर मुझसे मेरा मंत्र पूछा था। मैं आपको भी नहीं बताने वाला हूं। जब वचन दे दिया तो मैं उसका स्‍वप्‍न में भी पालन करूंगा। लेकिन फिर मैं डर गया। नींद में, कौन जाने, किसी दिन मैं भूल भी सकता हूं!”

अगर तुम अपने वचन के प्रति इतने सावधान हो कि स्‍वप्‍न में भी उसका स्मरण रहता है तो उसका अर्थ है कि वह गहराई में उतर रहा है। वह अंतस में उतर रहा है; वह अंतरस्थ प्रदेश में प्रवेश कर रहा है। और वह जितनी गहराई को छुएगा, वह उतना ही तुम्हारे लिए चाबी बनता जाएगा। क्योंकि ताला तो अंतर्तम में है।

किसी चीज के साथ भी प्रयोग करो। अगर तुम उसे गुप्त रख सके तो वह गहराई प्राप्त करेगा। और अगर तुम उसे गुप्त न रख सके तो वह बाहर निकल आएगा। तुम क्यों कोई बात दूसरे से कहना चाहते हो? तुम क्यों बातें करते रहते हो?

  • सच तो यह है कि जिस चीज को तुम कह देते हो, उससे मुक्त हो जाते हो। एक बार तुमने किसी से कह दिया, तुम्हारा उससे छुटकारा हो जाता है। वह चीज बाहर निकल गई। मनोविश्लेषण का पूरा धंधा इसी पर खड़ा है। रोगी बोलता रहता है और मनोविश्लेषक सुनता रहता है। इससे रोगी को राहत मिलती है। वह अपनी समस्याओं के बारे में, अपने दुख के बारे में जितना ही बोलता है, वह उनसे उतनी ही छुट्टी पा लेता है।
  • और इसके ठीक विपरीत घटित होता है जब तुम किसी चीज को छिपाकर रखते हो, गुप्त रखते हो। इसीलिए तुम्हें कहा जाता है कि मंत्र को किसी से कभी मत कहो। तब वह गहरे से गहरे तल पर उतरता जाता है और किसी दिन ताले को खोल देता है।

इति शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — अगर तुम अपने वचन के प्रति इतने सावधान हो कि स्‍वप्‍न में भी उसका स्मरण रहता है तो उसका अर्थ है कि वह गहराई में उतर रहा है। वह अंतस में उतर रहा है; वह अंतरस्थ प्रदेश में प्रवेश कर रहा है। और वह जितनी गहराई को छुएगा, वह उतना ही तुम्हारे लिए चाबी बनता जाएगा। क्योंकि ताला तो अंतर्तम में है। किसी मंत्र को या विचार को तुम गुप्त रख सके तो वह गहराई प्राप्त करेगा। और अगर तुम उसे गुप्त न रख सके तो वह बाहर निकल आएगा। तुम क्यों कोई बात दूसरे से कहना चाहते हो? तुम क्यों बातें करते रहते हो? जब तुम किसी चीज को छिपाकर रखते हो, गुप्त रखते हो। इसीलिए तुम्हें कहा जाता है कि मंत्र को किसी से कभी मत कहो। तब वह गहरे से गहरे तल पर उतरता जाता है और किसी दिन ताले को खोल देता है।

—————

यह लेख (मंत्र को गुप्त क्यों रखा जाता है।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari, etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: हिन्दी साहित्य Tagged With: Dr. Vidushi Sharma, dr. vidushi sharma article, mantra ko gupt kyon rakha jata hai, Why is the mantra kept secret?, गुरु मंत्र को गुप्त क्यों रखना चाहिए, गुरुमंत्र किसे कहते हैं ?, डॉ विदुषी शर्मा, डॉ विदुषी शर्मा जी की रचनाएँ, मंत्र कैसे काम करता है?, मंत्र को गुप्त क्यों रखा जाता है - डॉ विदुषी शर्मा, मंत्र से क्या फायदा होता है?

खजुराहो यात्रा: एक अविस्मरणीय दैवीय अनुभव।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ खजुराहो यात्रा: एक अविस्मरणीय दैवीय अनुभव। ♦

यात्रा…….
जिसका नाम आते ही मन में अजीब सी तरंगे उठने लगती है। एक उत्साह, एक जोश उत्पन्न हो जाता है कि लगातार एक ही तरह की दैनिक जीवन से नया कुछ हटकर देखने को, घूमने को, सीखने को मिलेगा। जहां हम स्वच्छंद होंगे, पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ शायद कुछ कम होगा। जहां अपनी भावनाओं को, अपने सपनों को, आपकी इच्छाओं को जीने का एक अवसर मिलेगा। इसी के साथ-साथ अपने अनुभवों को, अपनी यादों को, अपने आनंद को हम कैमरे के माध्यम से एक अनंत ख़ज़ाने के रूप में अपने साथ लेकर आएंगे। यही है एक यात्रा की सुखद अनुभूति।

इन यात्राओं के स्मृति चित्रों को दोबारा जब भी हम देखते हैं तो जैसे एक फिल्म की भांति पूरी यात्रा हमारी आंखों के सामने से गुजर जाती है और हमें एक नई ताज़गी, जीने की प्रेरणा फिर से दे जाती है और यदि यह यात्रा किसी धार्मिक स्थल, तीर्थ स्थल और ऐतिहासिक होने के साथ-साथ प्रकृति से भी जुड़ी हो तो क्या बात है।

हम हमेशा से ही सपने देखते हैं। पर यह सपने ऐसे होते हैं जिन्हें किसी के साथ शायद ही साझा कर पाएं। कोई भी चित्र देखकर, कोई फिल्म देखकर, कोई दृश्य देखकर या किसी की बातें सुनकर, वृत्तांत सुनकर हमारे मन में भी कहीं ना कहीं एक इच्छा, एक हूक सी उठती है कि हमें भी उस विशेष स्थान को देखना है, उसकी यात्रा करनी है जीवन में कभी न कभी तो ऐसा मौका जरूर मिलेगा। हम सभी के जीवन में यह पल जरूर आते हैं जब हमारी दबी हुई इच्छाएं साकार रूप ले लेती है। जब हमें उनको पूरा करने का कोई कारण कोई, हेतु प्राप्त होता है।

यात्रा अपने आप में अनोखी ही होती है…

कोई भी यात्रा अपने आप में अनोखी ही होती है और इसके साथ यह भी उसके चित्र भी पास में हो तो वह अविस्मरणीय बन जाती है। यदि इस यात्रा के अनुभव चित्र सहित हम दूसरों के साथ साझा करते हैं तो वह संस्मरण बन जाती है। वैसे तो जीवन भी एक लंबी यात्रा ही है जिसमें विभिन्न प्रकार के पड़ाव आते हैं सुख-दु:ख, हानि-लाभ, मिलन – जुदाई जीवन की यात्रा के कुछ अविस्मरणीय, अवश्यम्भावी पड़ाव होते हैं जो सभी के जीवन में एक अलग अनुभव और सीख ले कर आते हैं। जब इन्हीं अनुभवों को यदि शब्द प्रदान कर दिए जाते हैं तो वह ‘रचना’ बन जाती और शब्द ब्रह्म है इसलिए वह अमर हो जाती है।

बचपन में से लेकर मैं कभी भी खजुराहो के बारे में, उसके मंदिरों इत्यादि के बारे में कोई भी कार्यक्रम, मैगजीन इत्यादि में देखती थी तो मन में इच्छा जरूर होती थी कि जीवन में एक बार तो यहां की यात्रा करनी है। न जाने कब ये इच्छा पूरी होगी।

ये अवसर मुझे 1 फरवरी 2020 को खजुराहो में ESW ( Environment and Social Welfare Society) सोसाइटी की तरफ से 2 दिवसीय अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी में जाने का सुवसर प्राप्त हुआ।

मेरी खजुराहो की यात्रा के पीछे की एक महत्वपूर्ण कारण था।

मेरा मन अति प्रसन्न हुआ और मैंने जल्द से जल्द ट्रेन की टिकट रिज़र्व करवा लिए कि मुझे समय पर खजुराहो पहुंचना है। निश्चित समय पर मैं खजुराहो पहुंच गई। मन में बहुत उत्साह था कि आज बचपन का सपना सच होने जा रहा था। सबसे पहले संगोष्ठी में उपस्थित रहना भी आवश्यक था इसीलिए नियत समय पर संगोष्ठी प्रारंभ हो गई।

वहाँ पर मेरे द्वारा डॉ देवी शंकर सुमन जी, साइंटिस्ट मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरमेंट फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, डॉ उलरिच वर्क, प्रेसिडेंट जर्मन एसोसिएशन ऑफ होम थेरेपी का विधिवत स्वागत किया गया।

बहुत ही सुंदर संगोष्ठी और पर्यावरण…

बहुत ही सुंदर संगोष्ठी और पर्यावरण पर आधारित विषयों के साथ सभी ने अपने रिसर्च पेपर (पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन) प्रस्तुत किए जिनसे बहुत कुछ सीखने, जानने का मौका मिला। डॉ उलरिच जो कि जर्मनी से थे उन्होंने हवन थेरेपी पर बहुत सुंदर प्रेजेंटेशन प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार से हवन हमारे पर्यावरण के लिए, हमारे अस्तित्व के लिए, हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। यह विडंबना ही कहेंगे कि हम अपनी सभ्यता, संस्कृति को भूलते जा रहे हैं जो कि हम पश्चिमीकरण की तरफ बढ़ते जा रहे हैं, कुछ समय की मांग है और कुछ मजबूरी कही जा सकती है। जबकि प्राचीन काल से हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा कोई भी शुभ कार्य हवन, यज्ञ इत्यादि से प्रारंभ किया जाता था जिससे न केवल वातावरण शुद्ध होता था बल्कि हर तरफ एक आध्यात्मिक, सात्विक ऊर्जा का संचार होता था जो हमारे मन मस्तिष्क तथा विचारों को भी सात्विकता प्रदान करती थी। परंतु आज जहां हर तरफ प्रदूषण का ही बोलबाला है तो इस तरह का कार्य बहुत सही दिशा में काम करेगा।

कुल मिलाकर संगोष्ठी का अनुभव बहुत ही अच्छा रहा, स्मरणीय रहा। ये तो संगोष्ठी से संबंधित कुछ अनुभव थे।

फिर मैंने अपना शोधपत्र वाचन किया। इसके पश्चात मैं निकल गई अपनी खजुराहो की यात्रा पर। इसके लिए मैंने एक टैक्सी किराए पर ली ताकि कम समय में मैं अपनी यात्रा पूरी कर सकूं।

खजुराहो के मंदिर अपने आप में ही अपनी मिसाल हैं। खजुराहो के मंदिरों को चंदेल वंश के राजाओं ने बनवाया था। यहां 85 मंदिर थे, जिनमें से सिर्फ़ 20 ही बचे हैं। खजुराहो के मंदिरों की बाहरी दीवारों की कामुक मूर्तियां विश्वप्रसिद्ध हैं और यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स की लिस्ट में शामिल हैं।

सभी मंदिरों के बारे में एक साथ बताने की बजाय मैं एक-एक मंदिर की विशेषता और उसके बारे में कुछ स्मृतियां आपके साथ बांटना चाहती हूं।

खजुराहो के मंदिर अपने आप में अद्वितीय…

खजुराहो के मंदिर अपने आप में अद्वितीय हैं। यहां हर पत्थर पर जीवन दिखाई देता है। प्रत्येक मंदिर अपने आप में भव्यता का सबसे बड़ा नमूना कहा जा सकता है। यहां की स्थापत्य कला, शिल्प कला देखते ही बनती है। प्रत्येक मंदिर के द्वार पर अर्ध चंद्र या सूर्य के चित्र बने हुए हैं जिसके दोनों ओर शंख दिखाई देते हैं। सभी मंदिर अपने आप में भव्यता लिए हुए हैं जिनका अलग-अलग महत्व है। यहां पर सभी मंदिर सूर्योदय पर खुलते हैं और सूर्यास्त पर बंद हो जाते हैं। यही सिस्टम रखा हुआ है यहां पर जिसका पालन बहुत ही सख्ती से किया जाता है।

एक मंदिर में रात को लाइट एंड साउंड शो होता है जिसकी टिकट ढाई सौ रुपए रखी गई है। यह लगभग सवा घंटे का शो होता है जिसमें मंदिरों के बारे में बहुत विस्तार से बताया जाता है साथ में उनके इतिहास तथा इन मंदिरों के निर्माण के पीछे जो कथाएं किवदंतियां हैं उनके बारे में विस्तार से सूचना दी जाती है।

खजुराहो के मंदिर चंदेल वंश के द्वारा बनाए गए हैं…

खजुराहो के मंदिर चंदेल वंश के द्वारा बनाए गए हैं। इन सभी मंदिरों में जीवन के सभी पड़ावों पर प्रकाश डाला गया है। मंदिर में जाने से पहले वहां पर अप्सराओं की मूर्तियां है जो नारी सौंदर्य को उजागर करती हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि हमें जीवन में इस तरह के अवसर मिलते रहेंगे जब विषय वासनाएं हमें अपनी और आकृष्ट करती हैं। हमें फिर भी स्वयं पर संयम रखते हुए अपना कर्म करते रहना है। यह अप्सराएं विभिन्न मुद्राओं में दिखाई देती हैं जिनमें दैनिक जीवन से संबंधित कार्यकलाप भी सम्मिलित हैं। इसके बाद गृहस्थ धर्म, प्रेम, समर्पण भाव भी दिखाया गया है।

अभी तक हम लोग यह सोचते थे कि खजुराहो के मंदिर केवल स्त्री पुरुष के मिलन, कामशास्त्र की गाथा का वर्णन करते हैं। वहां पर अंतरंग चित्र अधिक दिखाई देते हैं। प्रेम संबंधों को बहुत सूक्ष्मता से दिखाया गया है। परंतु इनके पीछे जो इतिहास है और जो भावनाएं हैं वह अलग है। यहां पर प्रेम प्रदर्शन के साथ इन मूर्तियों के चेहरों के भावों पर कहीं भी वासना या उत्तेजना नहीं दिखाई देती है। उनके चेहरों पर एक दिव्यता, एक समर्पण, एक संतुष्टि, एक तेज दिखाई देता है जो गृहस्थ धर्म के स्तंभ माने गए हैं। यही प्रेम संबंध, समर्पण सृष्टि चक्र का आधार है। यहीं से एक औरत मां बनने का सौभाग्य प्राप्त करती है और मां बनना पूर्णता को प्राप्त करना है। प्रसव पीड़ा का आनंद और उसके बाद का फल क्या होता है इसके बारे में शब्दों में बता पाना संभव नहीं है।

ईश्वर की प्राप्ति का हेतु हमारा शरीर और मन ही है। हम अपने शरीर, अपने मन के द्वारा संतुष्टि को प्राप्त करने के बाद ईश्वर की ओर अधिक दृढ़ता पूर्वक कदम बढ़ाते हैं। तृप्ति भी हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है। शरीर और आत्मा तृप्त होने के बाद हम एक दूसरे पायदान पर चलते हैं जहां पर हमें दिव्यता, भव्यता और स्वार्गिक आनंद की प्राप्ति हो सकती है क्योंकि इन सब के लिए हमारे चरित्र में बहुत सी चीजों की आवश्यकता है। कुल मिलाकर आज मेरा भ्रम भी दूर हो क्या कि खजुराहो के मंदिर केवल प्रेम, संबंधों पर ही आधारित नहीं है। यहां पर बहुत कुछ देखने, बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जैन धर्म के मंदिर में जहां बहुत से पुराने चित्र दिखाई दिए जिनमें शोध की बहुत से संभावनाएं नजर आई।

खजुराहो के दूल्हा देव मंदिर के कुछ चित्र।

यहां पर एक शिवलिंग है जिसमें 108 छोटे-छोटे शिवलिंग बने हुए हैं। यह शिवलिंग केवल शिवरात्रि पर ही पूजा के लिए उपलब्ध हो पाता है यानि इसके कपाट केवल शिवरात्रि पर ही खुलते हैं। कहा जाता है यहां पर सुहागिने अपने पति की लंबी आयु के लिए वर मांगती हैं। इस मंदिर का नाम दुल्हादेव मंदिर इसलिए पड़ा है कि एक बार एक बारात जा रही थी तो दूल्हे की तबीयत अचानक से खराब हो गई और वह परलोक सिधार गया तो इसी मंदिर में उसकी पत्नी ने आकर पूजा की तो उसे पुनः जीवनदान मिल गया। इसलिए इस मंदिर का नाम दुल्हादेव मंदिर है। बहुत ही शांत तथा स्वच्छ निर्मल वातावरण। अविस्मरणीय अनुभव।

प्रस्तुत चित्र खजुराहो मतंगेश्वर महादेव मंदिर का है। यहां पर प्रात:काल सभी भक्तजन पूजा करने आते हैं जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि खजुराहो में मंदिर सूर्योदय के समय खुलते हैं और सूर्यास्त पर बंद हो जाते हैं। प्रस्तुत मंदिर में लगभग 18 फुट लंबा शिवलिंग एक बहुत बड़े चबूतरे पर स्थित है। मैंने अभी तक कि अपनी जिंदगी में इतना बड़ा शिवलिंग नहीं देखा है। अद्भुत, अद्वितीय और आकर्षक भगवान शिव का प्रतीक शिवलिंग अनंतता, विशालता लिए हुए हैं जिसे देख कर आत्मिक शांति और एक सात्विक ऊर्जा का संचार हुआ। वहां पर पंडित जी ने बताया कि यह शिवलिंग फुट कुल 18 फुट का है, जिसमें 9 फुट ऊपर और 9 फुट नीचे है। शिवलिंग के नीचे एक बहुमूल्य मणि चंदेल वंश के राजाओं के द्वारा दबाई गई है कि वह मणि सुरक्षित रह सके। शायद उस मणि का यह प्रभाव है कि अभी तक यह शिवलिंग कहीं से खंडित नहीं नजर आता। बहुत ही सुंदर नजारा। मैं अपने आप को भाग्यशाली समझती हूं कि मैं यहां पहुंचकर इस शिवलिंग के दर्शन कर पाई।

खजुराहो के जैन मंदिर…

खजुराहो के जैन मंदिर के कुछ चित्र जहां पर शाकाहार परोपकार, पर्यावरण संरक्षण इत्यादि के बारे में कितने सुंदर संदेश दिए हुए हैं। इसी के साथ यहां पर पौराणिक भारतीय सभ्यता के बारे में बहुत सुंदर वर्णित चित्र भी प्रस्तुत थे जिन्हें मैं सहेज कर अपने पास ले आई तथा आप सबके साथ साझा करना चाहती हूं। कृपया आप भी देखिए कितना विशाल है हमारा भारत देश और उसका धर्म, उसकी संस्कृति, उसकी विरासत। गर्व है हमें हमारे भारतीय होने पर। जय मां भारती।

कंदरिया महादेव मंदिर…

खजुराहो के मंदिरों की श्रृंखला में आज हम बात करते हैं ‘कंदरिया महादेव’ मंदिर की। सभी मंदिरों की तरह यह मंदिर भी बहुत भव्य तथा मनमोहक है। यहां की शांति और सौम्यता में तो देखते ही बनती है।

कंदरिया महादेव मंदिर पश्चिमी समूह के मंदिरों में विशालतम है। यह अपनी भव्यता और संगीतमयता के कारण प्रसिद्ध है। इस विशाल मंदिर का निर्माण महान चन्देल राजा विद्याधर ने महमूद गजनवी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में किया था। लगभग 1050 ईसवीं में इस मंदिर को बनवाया गया। यह एक शैव मंदिर है। तांत्रिक समुदाय को प्रसन्न करने के लिए इसका निर्माण किया गया था। कंदरिया महादेव मंदिर लगभग 107 फुट ऊंचा है। मकर तोरण इसकी मुख्य विशेषता है। मंदिर के संगमरमरी लिंगम में अत्यधिक ऊर्जावान मिथुन हैं। अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार यहां सर्वाधिक मिथुनों की आकृतियां हैं। उन्होंने मंदिर के बाहर 646 आकृतियां और भीतर 246 आकृतियों की गणना की थीं।

अंदर मंडप में जाने के लिए प्रवेश द्वार पर अर्धचंद्र तथा शंख के चित्र बनाए गए हैं।उसके बाद अंदर रोशनी का प्रबंध इस प्रकार से किया गया है कि आर पार आने वाली रोशनी का केंद्र सामने पड़ी मूर्ति पर बिल्कुल स्पष्ट रूप से दिखाई दे। यह जो चित्र दिखाई दे रहे हैं यहां पर कोई भी कृत्रिम रोशनी का प्रबंध नहीं है क्योंकि जैसा भी कि मैंने पहले भी कहा है कि यहां मंदिर सूर्य उदय पर खुलते हैं और सूर्यास्त पर बंद हो जाते हैं तो अधिकतर कृत्रिम रोशनी की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। परंतु मंदिरों के अंदर भी वास्तु कुछ इस प्रकार से है कि रोशनी को मुख्य मंदिर की मूर्ति तक केंद्रित किया गया है ताकि भगवान के दर्शन बहुत स्पष्ट और सुंदर तरीके से हो सके।

यह जो चित्र लिए गए हैं मोबाइल के कैमरे से लिए गए हैं और देखिए कितने स्पष्ट, सुंदर हैं। इसी के साथ मंदिर के मंडप में जाने से पहले दाएं तरफ एक लिपि अंकित की गई है जिसमें प्रथम “ओम नमः शिवाय” बिल्कुल स्पष्ट दिखाई दे रहा है उसके बाद शायद हम पढ़ पाने में संभव नहीं हो पाए। परंतु इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय भी यह सब कुछ इतना उन्नत था और लिपियां आसानी से पढ़ी और समझी जा रही थी तभी तो वह पत्थरों पर उकेरी गई। यहां की शिल्प कला बहुत ही अद्वितीय है। पत्थरों पर अंकित मूर्तियां अपने आप में इतनी सौम्य और सुंदर है कि उनको शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना शायद मेरे बस में नहीं है।

खजुराहो के मंदिर की श्रृंखला में दूसरा मंदिर है विश्वनाथ मंदिर। इसमें भगवान विश्वनाथ यानी शिवलिंग रूप में विराजमान है। प्रत्येक मंडप में यहां बहुत सुंदर चित्रकारी और शिल्प कला, नक्काशी देखने को मिलती है। नंदी मंडप में जब मैंने देखा तो नंदी जी की इतनी विशाल प्रतिमा कि मन गदगद हो गया। बहुत सुंदर शांत वातावरण ऐसा लगता है जैसे ईश्वर का साक्षात्कार हो गया हो। यहां के मंदिरों की विशेषता यह है कि एक ही पत्थर के बनाए गए हैं और पता नहीं उन में कौन सी धातु मिलाई गई है कि अभी तक इतने मजबूत और चिकने है के सभी लोग, पर्यटक दांतो तले उंगली दबा लेते हैं।

यहां की भव्यता सुंदरता देखते ही बनती है। मंदिर के कक्ष में जहां विश्वनाथ जी, की शिवलिंग की स्थापना है वहां पर रोशनी का इस तरह से प्रबंध किया गया है कि क्रॉस वेंटीलेशन के तहत बिना किसी रोशनी के अंदर आते ही शिवलिंग के दर्शन बहुत ही सुंदर प्रकार से हो जाते हैं। क्योंकि दोनों तरफ की रोशनी शिवलिंग पर दिखाई देती है। हर प्रकार के मंदिर के दरवाजे के बाहर अर्धचंद्र या सूर्य का बिंब पूर्ण गोला बनाया गया है। उसके दोनों तरफ शंख हैं। विश्वनाथ मंदिर के मंडप के बाहर एक लिपि का चित्र भी दिखाई दिया जहां पर ओम नमः शिवाय बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा है। यानी तब तक हम यह लिपियां और भाषा बिल्कुल सही से पढ़ने और लिखना सीख गए थे। अनुसंधान का विषय है।

देवी जगदम्बा मंदिर…

कंदरिया महादेव मंदिर के चबूतरे के उत्तर में जगदम्बा देवी का मंदिर है। जगदम्बा देवी का मंदिर पहले भगवान विष्णु को समर्पित था और इसका निर्माण 1000 से 1025 ईसवीं के बीच किया गया था। सैकड़ों वर्षों पश्चात यहां छतरपुर के महाराजा ने देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित करवाई थी इसी कारण इसे देवी जगदम्बा मंदिर कहते हैं। यहां पर उत्कीर्ण मैथुन मूर्तियों में भावों की गहरी संवेदनशीलता शिल्प की विशेषता है। यह मंदिर शार्दूलों के काल्पनिक चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। शार्दूल वह पौराणिक पशु था जिसका शरीर शेर का और सिर तोते, हाथी या वराह का होता था।

कुल मिलाकर इस मंदिर की यात्रा भी अविस्मरणीय रही। खजुराहो में जो बात सबसे अच्छी लगी वह यह कि यहां पर किसी भी प्रकार के किसी पुजारी के दर्शन बहुत कम हुए और कहीं भी किसी ने दान-दक्षिणा के लिए मजबूर नहीं किया जैसा कि ज्यादातर हिंदू तीर्थों पर आजकल होता है कि आप को दान-दक्षिणा के लिए मजबूर किया जाता है। यदि हम ऐसा नहीं करते तो तरह-तरह की बातें बनाई जाती हैं और हमारी श्रद्धा और आस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है। मैं यह पूछना चाहती हूं कि यदि जो लोग पैसा नहीं दे सकते या नहीं देते हैं क्या उनमें श्रद्धा नहीं है, ईश्वर में आस्था नहीं है? वे लोग इतनी दूर यदि इतना सब कुछ खर्च करके, अपने पीछे से हर तरह से व्यवस्था करके आए हैं तो क्या बिना आस्था, बिना श्रद्धा के आए हैं? और यदि हम 50 ₹100 चढ़ा दे तो क्या वह श्रद्धा जाग जाएगी ? इस तरह के कार्यकलापों से मन दु:खी हो जाता है। पर यहां ऐसा कुछ नहीं था जिसे देख कर मन को सुकून मिला।

बस इसके बाद वापसी का समय हो गया और वैसे भी खजुराहो के सभी मंदिरों के दर्शन ईश्वर की असीम कृपा से मैंने कर ही लिए थे। यह एक ऐसा वृतांत है जो मन में बहुत शांति, श्रद्धा और एक नई चेतना लेकर आया था। ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद इतने पवित्र स्थल के दर्शन मैं कर पाई। बहुत ही अविस्मरणीय यात्रा। इस यात्रा के लिए मैं उस असीम शक्ति का हृदय से धन्यवाद देती हूं। इसी के साथ-साथ मन में बहुत कुछ और भी जागृत हो गया है कि काश कभी, मदुरै, तमिलनाडु, तिरुचिरापल्ली के भी मंदिर एक बार देखने का सौभाग्य प्राप्त हो? देखते हैं यह इच्छा कब पूरी हो पाती है, सब कुछ प्रभु के हाथ है। जब प्रभु इच्छा……… जितना मिला है उसमें भी संतोष करना चाहिए। बस इससे अधिक और क्या लिखना है।
इति शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — अभी तक हम लोग यह सोचते थे कि खजुराहो के मंदिर केवल स्त्री पुरुष के मिलन, कामशास्त्र की गाथा का वर्णन करते हैं। वहां पर अंतरंग चित्र अधिक दिखाई देते हैं। प्रेम संबंधों को बहुत सूक्ष्मता से दिखाया गया है। परंतु इनके पीछे जो इतिहास है और जो भावनाएं हैं वह अलग है। यहां पर प्रेम प्रदर्शन के साथ इन मूर्तियों के चेहरों के भावों पर कहीं भी वासना या उत्तेजना नहीं दिखाई देती है। उनके चेहरों पर एक दिव्यता, एक समर्पण, एक संतुष्टि, एक तेज दिखाई देता है जो गृहस्थ धर्म के स्तंभ माने गए हैं। यही प्रेम संबंध, समर्पण सृष्टि चक्र का आधार है। यहीं से एक औरत मां बनने का सौभाग्य प्राप्त करती है और मां बनना पूर्णता को प्राप्त करना है। प्रसव पीड़ा का आनंद और उसके बाद का फल क्या होता है इसके बारे में शब्दों में बता पाना संभव नहीं है।

—————

यह लेख (खजुराहो यात्रा: एक अविस्मरणीय दैवीय अनुभव।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari, etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: हिन्दी साहित्य Tagged With: author Dr. Vidushi Sharma, Dr. Vidushi Sharma, dr. vidushi sharma articles, खजुराहो यात्रा: एक अविस्मरणीय दैवीय अनुभव - डॉ विदुषी शर्मा, डॉ विदुषी शर्मा, डॉ विदुषी शर्मा जी की रचनाएँ

कार्तिक मास का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक पक्ष।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कार्तिक मास का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक पक्ष। ♦

आध्यत्मिक ऊर्जा एवं शारीरिक शक्ति संग्रह करनें में कार्तिक मास का विशेष महत्व है। इसमें सूर्य एवं चन्द्र की किरणों का पृथ्वी पर पड़ने वाला प्रभाव मनुष्य के मन मस्तिक को स्वस्थ रखता है।

कुछ रोचक तथ्य —

उत्सवों और त्योहारों का मास – कार्तिक मास —

हिन्दु पंचांग के अनुसार वर्ष का आठवां महीना *’कार्तिक मास‘* के नाम से जाना जाता है। पुरे माह में ब्रह्म मुहुर्त में स्नान, पाठ, तुलसी पूजन, व्रत कथा श्रवण दीपदान आदि का महात्मय बताया गया है। इसी मास में अधिकतम त्यौहार आते हैं जैसे:—

  • शरद पूर्णिमा
  • करवा चौथ
  • अहोई अष्टमी
  • रमा एकादशी
  • गोवत्स द्वादशी
  • नरक चर्तुदशी
  • तुलसी विवाह
  • हनुमान जयंति
  • दीपावली पर्व
  • अन्नकूट महोत्सव
  • गोवर्धन पूजा
  • भैया दूज
  • कार्तिक छठ पूजा
  • देवोत्थान एकादशी

जहाँ *’स्कंद पुराण‘* में इसे सबसे अच्छा महीना माना गया है वहीं *’पद्म पुराण‘* में कार्तिक मास को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष एवं भक्ति देने वाला मास कहा गया है।

• 7 नियम • —

पुराणों में कहा गया है कि भगवान नारायण ने ब्रह्मा जी को, ब्रह्मा जी ने नारद जी को और नारद जी ने राजा पृथु को कार्तिक मास के सर्वगुण संपन्न माहात्म्य के संदर्भ में बताया है। कार्तिक मास में 7 नियम प्रधान माने गए हैं।

• दीपदान • —

धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में सबसे प्रमुख नियम दीप दान करना बताया गया है। इस महीने में नदी, पोखर, तालाब, मन्दिर एवं शयन कक्ष में दीपदान किया जाता है। ऐसा करने से जीवन से अज्ञानरूपी अंधकार दूर होता है एवं भक्ति, सुख, वैभव एवम् लक्ष्मी का शुभ आगमन होता है।

• श्री तुलसी पूजा • —

*श्री कृष्ण प्रेयसी* के नाम से भी सम्बोधन किया जाता है तुलसी जी को। वैसे तो हर महीने तुलसी जी की पूजा करनी चाहिए। परन्तु विशेष रूप से इस महीने में तुलसी जी की वन्दना और पूजा करने से इसका फल कई गुणा हो जाता है एवं *निश्चित ही श्री कृष्ण प्रेम की प्राप्ति होती है।* श्री तुलसी वन्दन, श्री तुलसी परिक्रमा एवं श्री कृष्ण नाम संकीर्तन तुलसी जी के पास बैठ कर उच्च स्वर से गान करने से तुलसी मैया अति प्रसन्न होती है।

• भूमि पर शयन • —

भूमि पर शयन-कार्तिक मास का तीसरा मुख्य नियम हैं। इससे मन में कोमलता आती है। अहम् का नाश होता है। विकार समाप्त होते हैं।

• तेल और दालें वर्जित • —

  • कार्तिक महीनें में केवल एक बार नरक चतुर्थी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) के दिन ही तेल सेवन किया जाता है। कार्तिक मास में अन्य दिनों में तेल पकाना और लगाना दोनों नहीं किये जाते।
  • दलहन (दालों) खाना निषेध: कार्तिक महीने में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई, तथा बैंगन नहीं खाना चाहिए।

• ब्रह्मचर्य का पालन • —

कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है। इसका पालन नही करने पर पति – पत्नि को दोष लगता है और इसके अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं।

• संयम रखें • —

कार्तिक मास का व्रत करने वालों को चाहिए कि वह तपस्वियों की भांति व्यवहार करें। कम बोलें, किसी की निंदा नहीं करें विवाद नहीं करें। मन पर संयम रखें।

इन सभी उपरोक्त नियमों से अलग “नित्य से कम से कम दुगना भजन, कथा श्रवण एवं वे सभी क्रियाएँ जिससे ठाकुर जी के प्रति प्रीति बढ़े एवं उनका स्मरण सभी पहर बना रहें। करते रहना चाहिए। प्रिया लाल जी को इस मास में भजन अत्यधिक प्रिय है।”

॥श्री राधारमण समर्पण॥

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — “कार्तिक मास” यह साल के 12 मासों में उत्तम मास माना गया है। इस महीने में की गई प्रार्थना और पूजन सीधे भगवान विष्णु तक पहुंचती है। इस महीने की सबसे अच्छी बात यह है कि इस माह में भगवान विष्णु धरती पर जल में निवास करते हैं। इसलिए प्राचीन काल से परंपरा रही है कि लोग सूर्योदय से पूर्व ही नदी या तालाब में जाकर स्नान करते हैं और वहीं पर तिल के तेल या घी से दीपक जलाकर भगवान विष्णु की पूजा करके दीप को दोने में रखकर जल में प्रवाहित कर देते हैं। यह सुंदर नजारा आज भी गांवों में देखने को मिल जाता है। आपके आस-पास नदी-तालाब नहीं है तो आप घर पर भी सूर्योदय पूर्व स्नान करते भगवान विष्णु की पूजा करें और दीप जलाएं। इससे भी पुण्य के भागी बनेंगे।

—————

यह लेख (कार्तिक मास का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक पक्ष।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari, etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, डॉ विदुषी शर्मा जी की कविताएं।, हिन्दी साहित्य Tagged With: dr. vidushi sharma article, Essay On Kartik Purnima In Hindi, Hindi Essay on Kartik Purnima, उत्सवों और त्योहारों का मास - कार्तिक मास, कार्तिक के महीने में कौन सा त्यौहार मनाया जाता है?, कार्तिक पूर्णिमा का महत्व, कार्तिक पूर्णिमा क्यों मनाया जाता है?, कार्तिक पूर्णिमा पर निबंध, कार्तिक पूर्णिमा पर हिंदी निबंध, कार्तिक मास, कार्तिक मास की हिंदू धर्म में है खास महिमा - जानें जरूरी बातें, कार्तिक माह का महत्व व्रत कथा एवम पूजा विधि, डॉ विदुषी शर्मा, डॉ विदुषी शर्मा की के शोध लेख, डॉ विदुषी शर्मा के लेख, डॉ विदुषी शर्मा जी की रचनाएँ

छठ महापर्व – सूर्योपासना का महापर्व।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ छठ महापर्व – सूर्योपासना का महापर्व। ♦

🚩सनातन धर्म की जय 🚩🟢आइए छठ पर्व को समझें…

छठ महापर्व – सूर्योपासना का महापर्व – आइए इस पर्व की वैज्ञानिकता को समझें🚩तत्सवितुर्वरेण्यं – सूर्य की सविता शक्ति का पूजन।
(चार दिवसीय छठ पूजन उत्सव, 28 अक्टूबर कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से 31 अक्टूबर कार्तिक शुक्ल सप्तमी तक)

• महत्‍वपूर्ण तिथि व मुहूर्त •

  1. छठ पूजा का पहला दिन — नहाय-खाय 2022: 28 अक्टूबर, दिन शुक्रवार।
    सूर्योदय: प्रात: 06 बजकर 30 मिनट पर सूर्यास्त: शाम 05 बजकर 39 मिनट पर।
    शुभ समय — शोभन योग: प्रात:काल से देर रात 01 बजकर 30 मिनट सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 06 बजकर 30 मिनट से सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक रवि योग: सुबह 10 बजकर 42 मिनट से अगली सुबह 06 बजकर 31 मिनट तक।
  2. छठ पूजा का दूसरा दिन — लोहंडा और खरना 2022: 29 अक्टूबर, दिन शनिवार।
    सूर्योदय: प्रात: 06 बजकर 31 मिनट पर सूर्यास्त: शाम 05 बजकर 38 मिनट पर।
    शुभ समय — रवि योग: सुबह 06 बजकर 31 मिनट से सुबह 09 बजकर 06 मिनट तक सुकर्मा योग: रात 10 बजकर 23 मिनट से अगली सुबह तक।
  3. छठ पूजा का तीसरा दिन — छठ पूजा का संध्या अर्घ्य 2022: 30 अक्टूबर, रविवार।
    सूर्यास्त: शाम 05 बजकर 38 मिनट पर।
    शुभ समय — सुकर्मा योग: प्रात: काल से शाम 07 बजकर 16 मिनट तक धृति योग: शाम 07 बजकर 16 मिनट से अगली सुबह तक रवि योग: सुबह 07:26 बजे से अगले दिन सुबह 05:48 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 06:31 बजे से सुबह 07:26 बजे तक।
  4. छठ पूजा का चौथा दिन — छठ पूजा का प्रात: अर्घ्य 2022: 31 अक्टूबर, सोमवार
    सूर्योदय: प्रात: 06 बजकर 32 मिनट पर।
    शुभ समय — सर्वार्थ सिद्धि योग: प्रात: 05:48 बजे से सुबह 06:32 बजे तक त्रिपुष्कर योग: प्रात: 05:48 बजे से सुबह 06:32 बजे तक।

• लोक आस्था के महापर्व के रूप में प्रसिद्ध महापर्व छठ पूजा 2022 दिवाली के 6 दिन बाद मनाया जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में छठ पूजा बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। ये त्योहार साल में दो बार आता है। इस व्रत को पारिवारिक सुख और समृद्धि के लिए किया जाता है। ये त्योहार चार दिन तक मनाया जाता है। इस दौरान महिलाएं नदी या तालाब में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देती हैं।

• छठ की शुरुआत •

छठ की शुरुआत — ऐसी मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सारा राज-पाट हार गए, तब द्रौपदी बहुत दुःखी थीं। तब श्रीकृष्ण भगवान ने उन्हें सूर्योपासना गायत्री मन्त्र अनुष्ठान के साथ करने की सलाह दी। इसी सूर्य उपासना से उन्हें अक्षय भोजन पात्र मिला जिसमे भोजन कभी कम नहीं पड़ता था। सूर्य की सविता शक्ति गायत्री को ही छठी मईया भी कहा जाता है। गायत्री कल्पवृक्ष है, इससे असम्भव भी सम्भव है। सर्वप्रथम दौपदी ने छठ का व्रत किया, तब से मान्यता है कि व्रत के साथ गायत्री अनुष्ठान और सूर्योपासना करने से दौपद्री की तरह सभी व्रती की मनोकामना पूरी होती है, तभी से इस व्रत को करने प्रथा चली आ रही है।

• छठ पूजा विधि •

छठ पूजा 4 दिनों तक की जाती है, इस व्रत की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को और कार्तिक शुक्ल सप्तमी तक चलता है। इस दौरान व्रत करने वाले लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं, इस दौरान वे अन्न नहीं ग्रहण करते है, जिससे प्राणवायु अन्न पचाने में ख़र्च न हो और प्राण ऊर्जा ज्यादा से ज्यादा शरीर के 24 शक्ति केंद्रों तक पहुंचे और उन्हें जागृत कर शक्ति का संचार करे। जल प्रत्येक एक-एक घण्टे में पीते रहना चाहिए जिससे पेट की सफ़ाई हो, और आंते दूषित और पेट में जमा हुआ अन्न और चर्बी उपयोग में न ले सकें। जो लोग जल नहीं पीते उनकी आंते उनकी शरीर की चर्बी पचाते हैं, और पेट में संचित मल और अपच भोजन से शक्ति लेते है, उससे प्राणवायु शक्ति केन्द्रो तक नहीं पहुंचती।

  • यदि जलाहार में असुविधा हो रही हो तो एक या दो वक़्त रसाहार अर्थात् फ़ल के जूस ले लेवें। कोई तला-भुना या ठोस आहार लेना वर्जित है।

छठ महापर्व पर अनुष्ठान मंत्र एवं विधि —

  • व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य के पालन के साथ भूमि पर शयन अनिवार्य है। कम से कम सोयें और उगते हुए सूर्य का ध्यान करें।
  • दिन में तीन बार पूजन होगा, पहला पूजन सूर्योदय के समय, सूर्य के समक्ष जप करने के बाद अर्ध्य देना होगा।
  • दूसरा समय दोपहर का, गायत्री जप के बाद तुलसी को अर्घ्य देना होगा।
  • शाम को गायत्री जप के बाद नित्य शाम को पांच दीपकों के साथ दीप यज्ञ होगा।
  • इन चार दिनों में 108 माला गायत्री जप की पूरी करनी होती है। अर्थात् 27 माला रोज जप करना होगा। इसे अपनी सुविधानुसार दिनभर में जप लें।
  • पूजन के वक़्त पीला कपड़ा पहनना अनिवार्य है, उपवस्त्र गायत्री मन्त्र का दुपट्टा ओढ़े। आसन में ऊनी कम्बल या शॉल उपयोग में लें।
  • सूर्योपासना अनुष्ठान मन्त्र — ॐ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।
  • दीपदान के समय महामृत्युंजय मंत्र — ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
  • सूर्य गायत्री मन्त्र — ॐ भाष्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्॥

• सूर्य अर्घ्य देने की विधि •

  • यदि घर के आसपास नदी तलाब या कोई जलाशय हो तो पानी में कमर तक पानी में खड़े होकर अर्घ्य दें, यदि नहीं है तो घर की छत पर या ऐसी जगह अर्घ्य दें जहाँ से सूर्य दिखें। सूर्योदय के प्रथम किरण में अर्घ्य देना सबसे उत्तम माना गया है। सर्वप्रथम प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व नित्य-क्रिया से निवृत्त्य होकर स्नान करें। उसके बाद उगते हुए सूर्य के सामने आसन लगाए।
  • पुनः आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में पवित्र जल लें। रक्तचंदन आदि से युक्त लाल पुष्प, चावल आदि तांबे के पात्र में रखे जल या हाथ की अंजुलि से तीन बार जल में ही मंत्र पढ़ते हुए जल अर्पण करना चाहिए। जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्योदय दिखाई दे आप दोनों हाथों से तांबे के पात्र को पकड़कर इस तरह जल अर्पण करे की सूर्य तथा सूर्य की किरण जल की धार से दिखाई दें।
  • ध्यान रखें जल अर्पण करते समय जो जल सूर्य देव को अर्पण कर रहें है वह जल पैरों को स्पर्श न करे। सम्भव हो तो आप एक पात्र रख लीजिये ताकि जो जल आप अर्पण कर रहे है उसका स्पर्श आपके पैर से न हो पात्र में जमा जल को पुनः किसी पौधे में डाल दे। यदि सूर्य भगवान दिखाई नहीं दे रहे है तो कोई बात नहीं आप प्रतीक रूप में पूर्वाभिमुख होकर किसी ऐसे स्थान पर ही जल दे जो स्थान शुद्ध और पवित्र हो। जो रास्ता आने जाने का हो भूलकर भी वैसे स्थान पर अर्घ्य (जल अर्पण) नहीं करना चाहिए।

• सूर्य अर्घ्य मन्त्र •

ॐ सूर्य देव सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते।
अनुकंपये माम भक्त्या गृहणार्घ्यं दिवाकर:॥

ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय।
मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा :॥
ऊँ सूर्याय नमः। ऊँ घृणि सूर्याय नमः।

ऊं भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात॥

• छठ पूजा 2022 का प्रसाद •

छठ पूजा में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, इस दौरान छठी मैया को लड्डू, खीर, ठेकुआ, फल और कष्ठा जैसे व्यंजन के भोग लगाए जाते हैं। छठ पर कई प्रकार के पारंपरिक मिठाई भी बनाई जाती हैं। प्रसाद में लहसुन और प्याज का उपयोग नहीं किया जाता है।

जय सूर्य देव!

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — छठ महापर्व (सूर्योपासना का महापर्व) के महत्‍वपूर्ण तिथि व मुहूर्त, छठ पूजा विधि, छठ महापर्व पर अनुष्ठान मंत्र एवं विधि, सूर्य अर्घ्य देने की विधि, सूर्य अर्घ्य मन्त्र इत्यादि के बारे में विस्तार से बताया है। शास्त्रों में बताया गया है कि माता छठी भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं। साथ ही कई जगह इन्हें सूर्य देव की बहन के रूप में भी बताया गया है। माना जाता है कि माता छठी की उपासना करने से संतान को लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है। संतान प्राप्ति के लिए भी माता छठी की उपासना को बहुत कारगर माना गया है। छठ माता लोगों को समृद्धि, धन, बच्चे, सभी कुछ का आशीर्वाद देती है। वह हमारी सभी इच्छाओं को पूरा करती है और अपने भक्तों को आशीर्वाद देती है। लोगों का बहुत दृढ़ विश्वास है, इसीलिए हर साल वे इस अवसर को बहुत ईमानदारी से मनाते हैं। वह हमारे जीवन को आनंद और खुशी से भर देती है जो हम सभी को पसंद है।

—————

यह लेख (छठ महापर्व – सूर्योपासना का महापर्व।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari, etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, छठ महापर्व - सूर्योपासना का महापर्व।, हिन्दी साहित्य Tagged With: Chhath Puja, Chhath Puja Essay in Hindi, Chhath Puja Hindi Article, dr. vidushi sharma article, essay on chhath puja in hindi, छठ पूजा की कहानी क्या है?, छठ पूजा पर निबंध, छठ पूजा पर निबंध 200 शब्द में, छठ पूजा पर निबंध और स्पीच, छठ पूजा पर निबंध लिखें, छठ पूजा पर निबंध लिखें हिंदी में, छठ पूजा पर निबंध हिंदी में, छठ पूजा मनाने से क्या होता है?, छठ महापर्व, छठ महापर्व - सूर्योपासना का महापर्व, छठ सूर्योपासना का महापर्व, जानें कौन हैं छठी मैया, डॉ विदुषी शर्मा, डॉ विदुषी शर्मा जी की रचनाएँ, सूर्य अर्घ्य देने की विधि

माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा। ♦

“नवरात्र” शब्द से ‘नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध’ होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि ‘रात्रि’ शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। जैसे- नवदिन या शिवदिन। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते।

नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम नवरात्र को समझ लेते हैं। मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है- विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र मनाया जाता है। लेकिन, फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।

हालांकि आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। यहां तक कि सामान्य भक्त ही नहीं अपितु, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। आज कल बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं।

• वैज्ञानिक आधार •

नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है।

प्रेम से बोलो – जय माता दी! सारे मिलकर बोलो जय माता दी!

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

—————

यह लेख (माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (डबल वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ®———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes, Shayari, etc. या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, हिन्दी साहित्य Tagged With: Dr. Vidushi Sharma, dr. vidushi sharma articles, Durga Puja Essay in Hindi, Essay On Durga Puja In Hindi - kmsraj51, Essay on Navratri In Hindi, डॉ विदुषी शर्मा, डॉ विदुषी शर्मा जी की रचनाएँ, दुर्गा पूजा पर निबंध, नवरात्रि पर निबंध - लेख, नवरात्रि पर निबंध हिंदी में, मां दुर्गा पर निबंध, माँ दुर्गा सर्व रक्षा कुरु-कुरू स्वाहा

शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई? ♦

अब हम सनातनी हिन्दू खुद शिवलिंग को शिव् भगवान का गुप्तांग समझने लगे है और दूसरे हिन्दुओं को भी ये गलत जानकारी देने लगे हैं।

⇒ शिवलिंग :—

प्रकृति से शिवलिंग का क्या संबंध है ..?
जाने शिवलिंग का वास्तविक अर्थ क्या है और कैसे इसका गलत अर्थ निकालकर हिन्दुओं को भ्रमित किया…??

कुछ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते हैं..…।
छोटे-छोटे बच्चों को बताते हैं कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते हैं। मूर्खों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है..…और अपने छोटे-छोटे बच्चों को हिन्दुओं के प्रति नफ़रत पैदा करके उनको आतंकी बना देते हैं। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसे देववाणी भी कहा जाता है।

⇒ लिंग :—

लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, प्रतीक होता है…।
जबकी जनर्नेद्रीय को संस्कृत मे शिश्न कहा जाता है।

⇒ शिवलिंग :—

शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक….
पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक। अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य की जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..…तो वे बताये “स्त्री लिंग” के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए।

⇒ शिवलिंग क्या है? :—

  • शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत।
  • शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनी नहीं होता। ..दरअसल यह गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और मलेच्छों यवनों के द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने पर तथा बाद में षडयंत्रकारी अंग्रेजों के द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं।

उदाहरण के लिए — यदि हम हिंदी के एक शब्द “सूत्र” को ही ले लें तो – सूत्र का मतलब डोरी/धागा गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है। जैसे कि नासदीय सूत्र ब्रह्म सूत्र इत्यादि। उसी प्रकार “अर्थ” शब्द का भावार्थ : सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी।

  • ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। तथा कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है। जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam).
  • ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे हैं: ऊर्जा और पदार्थ। हमारा शरीर पदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है।
  • इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं।
    ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है।

The universe is a sign of Shiva Lingam.

शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है, तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी है। अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान हैं।

आज भी बहुतायत हिन्दू इस शिवलिंग के दिव्य ज्ञान से अनभिज्ञ है।
हिन्दू सनातन धर्म व उसके त्यौहार विज्ञान पर आधारित है। जोकि हमारे पूर्वजों, संतों, ऋषियों-मुनियों तपस्वीयों की देन है। आज विज्ञान भी हमारी हिन्दू संस्कृति की अदभुत हिन्दू संस्कृति व इसके रहस्यों को सराहनीय दृष्टि से देखता है व उसके ऊपर रिसर्च कर रहा है।

⇒ अब बात करते है योनि शब्द पर :—

मनुष्ययोनि “पशुयोनी” पेड़-पौधों की योनी, जीव-जंतु योनि।
योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव, प्रकटीकरण अर्थ होता है….जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। किन्तु कुछ धर्मों में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है नासमझ बेचारे। इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते हैं। जबकी हिंदू धर्म मे 84 लाख योनि बताई जाती है। यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं। अब तो वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि धरती में 84 लाख प्रकार के जीव (पेड़, कीट, जानवर, मनुष्य आदि) है।

⇒ मनुष्य योनि :—

पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है। अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है। तो कुल मिलकर अर्थ यह है:-

लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक।
दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई, बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं। हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया। ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके। लेकिन कुछ लोगों ने इस में गुप्तांगो की कल्पना कर ली और झूठी कुत्सित कहानियां बना ली और इसके पीछे के रहस्य की जानकारी न होने के कारण अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं को भ्रमित किया गया। परंतु सत्य आपके सामने है।

हर हर महादेव…….हर हर महादेव

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत। लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है, शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक। दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई, बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं। हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया। ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके।

—————

यह लेख (शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई?) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ® ———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई?, हिन्दी साहित्य Tagged With: author Dr. Vidushi Sharma, Dr. Vidushi Sharma, Lord Shiva Meaning of Shivling, जानें शिवलिंग का क्या अर्थ है, डॉ विदुषी शर्मा, डॉ विदुषी शर्मा जी की रचनाएँ, मनुष्य योनि, लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, शिवलिंग, शिवलिंग का अर्थ, शिवलिंग को गुप्तांग की संज्ञा कैसे दी गई?, शिवलिंग क्या है?

नारी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नारी। ♦

भारतीय नारी का यहां कोई नही सानी है,
है सब पर भारी क्योंकि वह आत्माभिमानी है।

हो सौंदर्य, वैदुष्य या सहनशीलता हो,
गार्गी, विद्योत्तमा, रंभा या शकुंतला हो।

अपने गुणों से वो सदा सम्मान पाती आई है।
हो भी क्यों ना वह अपने गुणों का लोहा मनवाती आई है।

सृष्टि का आधार है नारी, प्रकृति का श्रृंगार है नारी,
नारी है तो प्रेम है, बंधन है, हर रिश्ते की डोर है नारी।

बचपन की अल्हड़ता में भी, भाव का भंडार हैं नारी,
यौवन में लज्जा संयम का, सुंदरता का संगम है नारी।

होती विदा जब बाबुल के घर से, दो घरों की लाज है नारी,
अपने तन, मन, निष्ठा से, नव जीवन को अपनाती नारी।

माँ बन कर जीवन में, पूर्णता पा लेती है नारी,
सर्वस्व अपना सौंप कर, बच्चों को बनाती हैं नारी।

प्रकृति धरती की तरह, बस देना ही जानती है नारी,
प्रेम, भाव, इज्जत, बस यही तो मांगती हैं नारी।

जीवन के हर पड़ाव में, बस आलंबन चाहती है नारी,
वरना तो वो स्वयं शक्ति है, और हर किसी पर भारी है नारी।

नारी को सरल न समझो, ईश्वरत्व का मिश्रण है नारी,
हम खुद अपना सम्मान करें, और मान करें हम हैं नारी।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस कविता से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है — माँ बन कर जीवन में पूर्णता पा लेती है नारी, सर्वस्व अपना सौंप कर, बच्चों को महान बनाती हैं नारी। जैसे प्रकृति धरती सदैव ही देना जानती है, उसी की तरह, बस देना ही जानती है नारी, प्रेम, भाव, इज्जत, बस यही तो मांगती हैं नारी। जीवन के हर पड़ाव में, बस आलंबन चाहती है नारी, वरना तो वो स्वयं शक्ति है, और हर किसी पर भारी है नारी। नारी को सरल समझने की भूल न करो, ईश्वरत्व का मिश्रण है नारी, हम खुद अपना सम्मान करें, और मान करें हम हैं नारी। ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ पर साहस व शौर्य की प्रतिमूर्ति नारी शक्ति को नमन। नारी सशक्तिकरण के बिना मानवता का विकास अधूरा है।

—————

यह कविता (नारी।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

ज़रूर पढ़ें — साहित्य समाज और संस्कृति।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ® ———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____Copyright ©Kmsraj51.com  All Rights Reserved.____

Filed Under: 2022-KMSRAJ51 की कलम से, डॉ विदुषी शर्मा जी की कविताएं।, हिंदी कविता, हिन्दी-कविता Tagged With: Dr. Vidushi Sharma, dr. vidushi sharma articles, poem on women's day in hindi, poet Dr. Vidushi Sharma, shayari on women's day in hindi, डॉ विदुषी शर्मा, डॉ विदुषी शर्मा की कविताएं, महिला के सम्मान में कविता

साहित्य समाज और संस्कृति।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ साहित्य समाज और संस्कृति। ♦

शोध सारांश —

साहित्य समाज का दर्पण है और समाज का निर्माण संस्कृति से होता है। वास्तव में साहित्य समाज और संस्कृति तीनो ही एक दूसरे के अनुपूरक कहे जा सकते हैं, क्योंकि किसी एक का भी अस्तित्व दूसरे के बिना संभव हो ही नहीं सकता।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि मानव ने किस प्रकार आदिम युग से लेकर आज तक के वैज्ञानिक युग का सफर तय किया है। वह जंगल और गुफाओं से होता हुआ आज अंतरिक्ष तक पहुंच गया है।

विज्ञान की उपलब्धि में जहां उसका मस्तिष्क, अभिप्रेरणा, प्रयास उसका आधार बने हैं वही अपनी मानव सुलभ भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए, हृदय में उठने वाले भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए उसे अनेक साहित्यिक विधाओं का आश्रय भी लेना पड़ा है। यहीं से आरंभ होता है “सृजन”। जिसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से झलक होती है उसकी भाषा (मातृभाषा) की। यह अटल सत्य है।

आप किसी भी देश का साहित्य उठाकर देख लीजिए, उसमें जो विशेषता होगी, वह वहां की मिट्टी की सुगंध लिए होगी, मातृभाषा की झंकार उस में व्याप्त होगी। क्योंकि बिना मातृभाषा के साहित्यिक रचनाओं में मौलिकता का गुण आ ही नहीं सकता। किसी भी साहित्यिक रचना में वो भाव, वो प्रेरणा, वो समर्पण, वो सच्चाई, वो मौलिक चिंतन, अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम यह सब कुछ साहित्यिक रचना के प्राण होते हैं।

प्रस्तुत शोध पत्र में हम यह सार्थक प्रयास करने का यत्न करेंगे कि “साहित्य समाज और संस्कृति” के अंतर्संबंधों का पूर्णतया सारगर्भित विश्लेषण किया जा सके तथा संगोष्ठी के अन्य उपविषयों से भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रस्तुत शोध पत्र की परस्पर निर्भरता सिद्ध की जा सके।

परिचय —

“भाषा समाज और संस्कृति” संगोष्ठी का एक ऐसा विषय है जो समग्रता लिए हुए है। वास्तविक अर्थों में आजकल के समाज, साहित्य और भाषा की जो स्थिति है वह सही नहीं है। संस्कारों से भाषा में अपेक्षित सुधार हो सकता है, भाषा से संस्कृति का सुधार संभव है और संस्कृति से समाज में अपेक्षित परिवर्तन हो सकता है।

और जब इन तीनों में ही अवश्यमेव सुधार होंगे तो उससे हमारा देश सुधर सकता है, विश्व सुधर सकता है, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य, उनकी मानसिकता, उनके मूल्य, उनकी नैतिकता, उनका चारित्रिक बल, धार्मिकता, सामाजिकता संबंधी आचरण सुधर सकते हैं और हम सब का यही तो कर्तव्य है और प्रबुद्ध वर्ग की यही तो चिंता है कि किन उपायों से इन सब में सार्थक सुधार लाया जा सके।

आज जिस तरह हिंदी सिनेमा और सोशल मीडिया की भाषा और संस्कृति हमारे समाज को दिन – प्रतिदिन विकृत किए जा रहे हैं, हमारी युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट कर रहे हैं वह चिन्तनीय है। वर्तमान में हमारे समाज की यह स्थिति है कि —

“आज दिवस में तिमिर बहुत है, जैसे हो सावन की भोर,
मानव तो आकाश की ओर, मानवता पाताल की ओर”।

हम सभी को यह सार्थक प्रयास करने होंगे, इस प्रकार उपाय किए जाएं कि “समाज और संस्कृति के बीच अंत: संबंध” स्थापित हो सके। और वह ऐसे कौन से यत्न किये जाने चाहिए, कौन से ऐसे प्रबंध होने चाहिए कि जिन्हें “समाज और संस्कृति के अंत: सूत्रों” की संज्ञा दी जा सके।

समय – समय पर सरकार द्वारा, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों द्वारा इस बात पर निरंतर चिन्तन किया जाता रहा है कि “सत्ता, भाषा और समाज’ में टकराव की स्थिति उत्पन्न होने के स्थान पर ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे सत्ता भाषा और समाज के मिलन की एकरूपता, समरसता की स्थिति कायम की जा सके।

इन्हीं सब उपायों को अपनाकर ही हम “भाषा, समाज और संस्कृति के द्वारा राष्ट्रीय एकता” कायम करने में कामयाब सिद्ध हो सकते हैं।

इस प्रकार हमने देखा कि संगोष्ठी का मुख्य विषय तथा उसके सारे उप विषय किस प्रकार एक दूसरे पर आश्रित हैं, अंतर संबंधित हैं, और अंत में सभी का एक ही लक्ष्य है “राष्ट्रीय एकता”।

साहित्य का स्वरूप, भाषा, समाज और संस्कृति —

भाषा, समाज, सभ्यता और संस्कृति के संबंध में पाश्चात्य विद्वान “ग्रीन” का मत दर्शनीय है —

“एक संस्कृति तभी सभ्यता बनती है जबकि उसके पास एक लिखित भाषा, दर्शन विशेषीकरण युक्त श्रम विभाजन, एक जटिल विधि और राजनीतिक प्रणाली हो”।

इस संदर्भ में एक और विद्वान का मत।

“जिसबर्ट” के अनुसार, सभ्यता बताती है कि, ‘हमारे पास क्या है’, और संस्कृति यह बताती है कि, ‘हम क्या हैं’।

साहित्य क्या है? इसका स्वरूप क्या है? यह समाज से किस प्रकार संबंधित है? और यह संस्कृति को किस प्रकार अपने अंदर समेटे हुए है? तथा किस प्रकार संस्कृति को प्रभावित करता है? एवम किस प्रकार यह संस्कृति से प्रभावित होता है? यह सब महत्वपूर्ण बिंदु है।

किसी भी प्रकार के साहित्य की मूल चेतना या भावना, मुख्य आधार, मानव समाज की चहुँमुखी उन्नति ही होती है। प्रत्येक प्रकार के साहित्य का यह उद्देश्य होता है कि मानव हर प्रकार के राग, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या, शोषण, कलुषित विचार आदि दुर्भावनाओं को त्याग कर, उस परमपिता परमेश्वर, सर्वशक्तिमान ईश्वर की सत्ता को, उसकी शक्ति को जानने का प्रयास करता हुआ, “आत्मवत सर्व भूतेषु” यानी सभी को अपने समान समझने का प्रयास करे तथा “सर्वे भवंतु सुखिन:” का भाव लेकर “परमार्थ” “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के सिद्धान्त को अपने जीवन में उतार ले।

यह अकाट्य सत्य है कि जितना साहित्य हमारे भारत में है, जितना विषय वैविध्य हमारे साहित्य में है, उतना किसी भी अन्य देश के साहित्य में हो ही नहीं सकता। हमारा तो एक-एक ग्रंथ ही सर्वकालिक Timeless है कि जिसके सिद्धांत आज से हजारों वर्ष पूर्व भी उतने ही प्रासंगिक थे, जितने आज है।

सिर्फ एक ग्रंथ “श्रीमद्भगवद्गीता” को ही लीजिए जो विश्व प्रसिद्ध है। सिर्फ यदि इसी एक ग्रंथ को ही आत्मसात कर लिया जाए तो मानव मात्र का जीवन सुधर सकता है, तो फिर अन्य साहित्य की तो बात ही क्या है।

हमारा साहित्य हमें धार्मिकता, नैतिकता, सामाजिकता, नीति राजनीति, आर्थिकता आदि सभी गुण सिखाता हैं। हमारे साहित्य में ज्ञान है, वैराग्य है, नीति है, श्रृंगार है, भक्ति है, प्रेम है, वात्सल्य है, करुणा है, ओज है, वीरता है, प्रकृति प्रेम है, जीव प्रेम है।

हिंदी साहित्य के इतिहास को इन्हीं गुणों के आधार पर विभक्त किया गया है, जैसे —

वीरगाथा काल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल।

जिस काल में जिस भाव, जिस प्रकार के साहित्य की प्रधानता रही, उसे उसी के नाम से संबोधित किया गया है। यही साहित्य, स्वस्थ सभ्यता एवं संस्कृति का निर्माण करने में सहायक है, जो हमारी पहचान है, भारतीयता की पहचान है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे साहित्य में एक और जहां विष्णु शर्मा जी ने पंचतंत्र के माध्यम से ज्ञान, जीव प्रेम, प्रकृति प्रेम, पारिस्थितिकीय संतुलन आदि का संप्रेषण किया जो सभी के लिए हर युग में प्रासंगिक है तथा पर्यावरण संरक्षण, शाकाहार की भावना को पोषण प्रदान करता है जो कि वर्तमान की एक समस्या तथा आवश्यकता बन चुकी है।

साहित्य, साहित्यकार, समाज और संस्कृति —

साहित्य समाज का दर्पण है, यह हम सब जानते हैं। आत्मा और शरीर का जो संबंध है वही संबंध साहित्य और समाज का है। यह शाश्वत सत्य है कि साहित्य की अपेक्षा समाज पहले जन्म लेता है। समाज से ही साहित्यकार जन्म लेते हैं।

साहित्यकार के व्यक्तित्व की पहचान अलग होती है। सच्चे साहित्यकार गंभीर, चिंतनशील, संवेदनशील, दूरदृष्टा, व्यापक दृष्टिकोण रखते हुए भावना और सम्वेदनाओं से परिपूर्ण होते हैं। क्योंकि अपनी लेखनी से वो जिस साहित्य का निर्माण करते हैं, सृजन करते हैं, वह भविष्य में समाज का, संस्कृति का निर्माण करता है।

इसलिए प्रत्येक साहित्यकार यह प्रयास करता है कि वह जिस विषय पर साहित्य का सृजन करे, उसकी जड़ें समाज से, उसकी समस्याओं से गहराई से जुड़ी हुई हों।ज्वलंत मुद्दों पर भी अपनी बात कहने से पूर्व उक्त सामाजिक विषय से संबंधित पूर्ण जानकारी प्राप्त करना अनिवार्य है, क्योंकि साहित्यकार की कलम से निकला एक-एक शब्द समाज में परिवर्तन लाने में सक्षम है।

‘कलम के सिपाही’ सामाजिक जन चेतना लाने का कार्य करते रहे हैं। अतः लेखक अथवा कवि (साहित्यकार) अपने समाज की हर गतिविधि, हर परिस्थिति में ही जीता है, उनसे प्रभावित होता रहा है। वह किसी भी रुप से समाज से अलग नहीं हो सकता। वह इसी समाज में ही रहकर इसके प्रभावों को, इन परिवर्तनों को, इन समस्याओं को जानता है, क्योंकि वह भी तो एक सामाजिक प्राणी ही है।

साहित्य, समाज और संस्कृति अन्योन्याश्रित —

प्रत्येक समाज का एक सांस्कृतिक आधार भी होता है। प्रत्येक संस्कृति, उस समाज की आत्मा, उसकी पहचान होती है, जिस प्रकार किसी भी प्रकार की सभ्यता एवं संस्कृति में व्याप्त अच्छाई और बुराई को हम सब देखते हैं, महसूस करते हैं कि यह हमारे समाज में किस प्रकार फैल रही है, समाज को दूषित कर रही है, संस्कारों का हनन कर रही है।

उसी प्रकार साहित्यकार इन सब को देखते हुए, इन सब पर अपनी व्याख्या प्रदान करते हुए, समाज में परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं, और यह कार्य करना अपना कर्तव्य समझते हैं, क्योंकि —

“केवल मनोरंजन ही न कवि का कर्म होना चाहिए ,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए”।

इतिहास साक्षी है कि मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नवीन विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधाराओं में गतिशीलता प्रदान करते हुए उसे सभ्य बनाने का कार्य किया है।किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए हैं, वो सब साहित्य और संस्कृति के माध्यम से ही आए हैं।

साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विकृतियों, विसंगतियों, अभावों, विषमताओं व असमानताओं आदि के बारे में अपने विचार, सुझाव, उपाय आदि प्रस्तुत करता है। इन सब के प्रति जनसाधारण को जागरुक करने का प्रयास करता है।

वर्तमान में साहित्य को ज्ञानवर्धक, मूल्यवर्धन, मनोरंजक बनाने के लिए सोशल मीडिया, सिनेमा का आश्रय लिया जा रहा है जो कुछ – कुछ हद तक उचित भी है, क्योंकि लिखित साहित्य में ज्ञान, मूल्य, नीति, संस्कार आदि सब कुछ तो है परंतु मनोरंजक तत्व नहीं।

अतः साहित्य को दृश्य, श्रव्य भाव के साथ मनोरंजक भी बनाते हुए जनमानस तक पहुंचाने का कार्य एक अनूठा प्रयास रहा है। इससे समाज में गहरा परिवर्तन देखने को मिला है। 80 के दशक में रामानंद सागर द्वारा लिखित और निर्देशित धारावाहिक “रामायण” तथा बी आर चोपड़ा द्वारा निर्देशित धारावाहिक “महाभारत” का नाम इस श्रेणी में लिया जा सकता है जिन्होंने समाज में सकारात्मक परिवर्तन किए, जनमानस को भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का दर्शन कराया, मानवीय मूल्यों से अवगत कराया तथा वर्तमान पीढ़ी को सामाजिक, नैतिक, मानवीय मूल्यों को परोक्ष भाव में ही सिखा दिया।

साहित्य के विकास की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी कि मानव सभ्यता। अतः यह नितांत आवश्यक है कि साहित्य लेखन, संशोधन, परिवर्द्धन निरंतर जारी रहना चाहिए। अन्यथा सभ्यता का विकास ही अवरुद्ध हो जाएगा।

भारत की अपनी विशिष्ट सभ्यता एवं संस्कृति रही है। “भा” का अर्थ हुआ प्रकाश। “रत” का अर्थ है संलिप्तता। यानि “भारत” का अर्थ हुआ प्रकाश में दत्तचित्त होकर अनुष्ठान करने से संप्राप्त संस्कार, और संपन्नता। यही भारतीय संस्कृति है। यही संस्कृति समाज से, साहित्य से अनादि काल संपोषित होती चली आ रही है और आगे भी इसी तरह संपोषित, संवर्धित होती रहेगी।

निष्कर्ष —

निष्कर्षत: यही कहा जा सकता है कि वास्तव में हर देश का साहित्य उस देश की लौकिक सभ्यता एवं संस्कृति, मातृभाषा, लोक गीत, लोक भाषाओं, (जन भाषाओं) तथा तत्कालीन परिस्थितियों (सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक) को भी उजागर करता है। साहित्य एक राष्ट्र की धरोहर है, उसका अभिमान है, गौरव है, पहचान है।

प्रत्येक युग का साहित्य उस युग की पहचान, उस युग का वैशिष्टय बताता है। अब इससे अधिक और क्या कहा जाए कि प्राचीन वैदिक साहित्य भारत के उन्नत और गौरवशाली समाज का प्रमाण है। इस साहित्य में “विश्व मानव” (वैश्विक एकता) और “वसुधैव कुटुंबकम” की जो भावना है, वह विशुद्ध भारतीय संस्कृति की महानता, विशालता, नि: स्वार्थपरता, लोक कल्याणकारी भावनाओं की परिचायक है।

हमारा साहित्य समाज को न केवल ज्ञान, बोध और मूल्य प्रदान करता है अपितु एक चिंतन की दिशा भी प्रदान करता है ताकि हम सभी यथासंभव प्रयास कर सके जिससे कि भारतीय मूल्य, भारतीय सभ्यता एवम संस्कृति, भारतीय साहित्य का विश्व में सदैव उच्चस्थ स्थान बना रहे तथा भारत पुन: “जगदगुरु” (विश्वगुरु) की उपाधि ग्रहण करे वो भी अपने अक्षय साहित्य, विशुद्ध सभ्यता एवं अलौकिक संस्कृति के बल पर।

इन्ही शुभकामनाओं के साथ — शुभमस्तु।

ज़रूर पढ़ें — नारी : इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति कर्म शक्ति।

♦ डॉ विदुषी शर्मा जी – नई दिल्ली ♦

—————

  • ” लेखिका डॉ विदुषी शर्मा जी“ ने अपने इस शोध लेख से, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से बखूबी समझाने की कोशिश की है – वास्तव में हर देश का साहित्य उस देश की लौकिक सभ्यता एवं संस्कृति, मातृभाषा, लोक गीत, लोक भाषाओं, (जन भाषाओं) तथा तत्कालीन परिस्थितियों (सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक) को भी उजागर करता है। साहित्य एक राष्ट्र की धरोहर है, उसका अभिमान है, गौरव है, पहचान है।

—————

यह शोध लेख (साहित्य समाज और संस्कृति।) “डॉ विदुषी शर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख / कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम डॉ विदुषी शर्मा, (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर) है। अकादमिक काउंसलर, IGNOU OSD (Officer on Special Duty), NIOS (National Institute of Open Schooling) विशेषज्ञ, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

ग्रंथानुक्रमणिका —

  1. डॉ राधेश्याम द्विवेदी — भारतीय संस्कृति।
  2. प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति — दामोदर धर्मानंद कोसांबी।
  3. आधुनिक भारत — सुमित सरकार।
  4. प्राचीन भारत — प्रशांत गौरव।
  5. प्राचीन भारत — राधा कुमुद मुखर्जी।
  6. सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति — श्री आनंदमूर्ति।
  7. भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति — स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)।
  8. नवभारत टाइम्स — स्पीकिंग ट्री।
  9. इंटरनेट साइट्स।

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ® ———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

cymt-kmsraj51

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

 

 

____Copyright ©Kmsraj51.com  All Rights Reserved.____

Filed Under: 2021-KMSRAJ51 की कलम से, डॉ विदुषी शर्मा जी की रचनाएँ।, हिन्दी साहित्य Tagged With: Dr. Vidushi Sharma, जीवन में साहित्य का स्थान, डॉ विदुषी शर्मा, डॉ विदुषी शर्मा की के शोध लेख, डॉ विदुषी शर्मा की रचनाएँ, डॉ विदुषी शर्मा के लेख, भारत की संस्कृति, भारतीय साहित्य और समाज, शोध लेख: साहित्य समाज और संस्कृति, समाज और साहित्य, समाज में साहित्य का महत्व, समाज में साहित्य की आवश्यकता, समाज में साहित्य की भूमिका, संस्कृति और समाज, साहित्य और समाज का संबंध है, साहित्य और समाज की रूपरेखा, साहित्य और समाज के लेखक कौन हैं, साहित्य और समाज पर निबंध, साहित्य समाज और संस्कृति, साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं मार्गदर्शक भी है, साहित्य समाज का दर्पण है, हमारे जीवन में साहित्य का महत्व

प्रथम गुरु माता।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ प्रथम गुरु माता। ϒ

प्रथम गुरु माता – Pratham Guru Mata

महर्षि वेदव्यास जी के अनुसार …..

“पितुरप्यधिका माता   
गर्भधारणपोषणात् ।
अतो हि त्रिषु लोकेषु 
नास्ति मातृसमो गुरुः”॥
गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है।
“नास्ति गङ्गासमं तीर्थं 
नास्ति विष्णुसमः प्रभुः।
नास्ति शम्भुसमः पूज्यो
नास्ति मातृसमो गुरुः”॥
गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं।
निर्माण यानी “सृजन”। सृजन की शक्ति प्रकृति ने केवल नारी जाति को ही प्रदान की है। (हालांकि बीज तत्व की महिमा को नकारा नहीं जा सकता।) नारी वह है जो निर्माण करती है, सृष्टि का पोषण करती है, संरक्षण करती है, पुष्पित-पल्लवित करती है। नारी जाति के बिना पुरुष का, इस विश्व का अस्तित्व संभव नहीं है। नारी हर रूप में पूजनीय है। जब एक मां बनती है तो उसके ऊपर बहुत अधिक जिम्मेदारी आ जाती है। मां वह है जो अपने बच्चे को हर तरह से, हर हर दृष्टि से सुरक्षित, संरक्षित करती है। और गर्भ (गर्भाधान) से लेकर जब तक बच्चे माँ की बात सुने, तब तक वह केवल उचित संस्कार और उचित शिक्षा ही प्रदान करती है। मां के द्वारा प्रदान संस्कार व्यक्ति के मानस पटल पर आजीवन रहते हैं। हमारा इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है जिसमें बचपन में जिन महापुरुषों ने अपनी मां से वीर रस की कविताएं, कहानी सुनी और देश के लिए अपनी जान गवा दी। एक मां अपने बच्चे को हर प्रकार से समाज उपयोगी, मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण इंसान बनाना चाहती है। इसलिए अपने पूरे तन, मन, धन से इस बात का प्रयास करती है कि उसका बच्चा एक अच्छा सभ्य नागरिक बन सके एवं मानवता के लिए, समाज के लिए, देश के लिए वह कुछ भी करने के लिए सदैव तत्पर रहे। इस संदर्भ में मैं अपनी स्वरचित कविता की  पंक्तियां कहना चाहूंगी जिसमें एक माँ की महिमा का वर्णन है __
♥ माँ ♥

माँ है तो श्री है, आधार है क्योंकि,
प्रकृति, धरती एक माँ का ही तो प्रकार है।
                    
माँ है तो आसक्ति है क्योंकि,
माँ में ही तो असीम शक्ति है।
                     
माँ है तो त्याग है, बलिदान हैं क्योंकि,
                                  माँ में सिमटा एक बच्चे का पूरा जहान है।                              
                       
माँ वो है जो खुद मिटकर एक बच्चे को बनाती है
क्योंकि – पत्थर पर पिसकर ही हिना रंग लाती है।
                       
माँ है तो परिवार है, संस्कार है, क्योंकि,
केवल माँ में ही तो ममता है, प्यार है, दुलार है।

                      
माँ है तो जन्म है, बचपन है, लोरी है क्योंकि, 
माँ की ममता एक रेशम की डोरी है। 

                      
माँ है तो कृष्ण है, राम है, बलराम भी है क्योंकि,
माँ के बिना असम्भव इन्सान तो क्या भगवान भी है। 

                       
माँ है तो दादी है, नानी है और, 
एक बालक के बिना, माँ भी एक अधूरी कहानी है।

माँ है तो सबका बचपन अनूठा, निराला है, क्योंकि माँ ही तो हर बच्चे की प्रथम पाठशाला है।
 🙂 जरूर पढ़े – प्रसन्नता बाहर से नहीं अंदर से आती है।
इस कविता के माध्यम से हमने देखा कि मां व्यक्ति के जीवन में क्या कर सकती है और मां के बिना यह जीवन ही नहीं है। उसकी शिक्षा के बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं बन पाएगा क्योंकि मां प्रथम गुरु है। वह गर्भस्थ शिशु से लेकर अपने जीवन के अंत तक, अपने बच्चे को केवल अच्छे संस्कार, अच्छी शिक्षा, किसी प्रतिफल की इच्छा किए बिना, प्रेम, ममता और दुलार के साथ प्रदान करती है। उसमें उसका कोई भी स्वार्थ, कोई भी लाभ निहित नहीं होता। इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति यदि कुछ भी प्रदान करता है तो उसमें प्रतिफल पाने का (किसी न किसी तरीके से, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से) उसका लक्ष्य होता है। एक माता-पिता ही होते हैं जिनमें कभी भी किसी भी प्रकार का प्रतिफल पाने की कोई इच्छा नहीं होती। वह सदैव अपने बच्चों का केवल कल्याण और कल्याण ही चाहते हैं और यह चाहते हैं कि उनके बच्चे सदा प्रगति के पथ पर अग्रसर रहें और सदा खुश रहें। इससे ज्यादा मां के बारे में और क्या कहा जा सकता है। मां केवल मां है। प्रथम गुरु है, आदरणीय है। दुनिया में सभी का ऋण चुकाया जा सकता है परंतु एक मां के ऋण से कभी भी उऋण नहीं हुआ जा सकता। इसीलिए कहा भी है सबसे पहले “मातृ देवो भव”आता है। मां चाहे कोई भी हो सदैव आदरणीय हैं। अतः अंत में बस यही कहना चाहूंगी कि __
एक माँ की बस यही कहानी है,
उसके आँचल में दूध और पाँव में जिंदगानी है,
माँ और माटी का सदियों पुराना नाता है, इन दोनों की हस्ती को चाहकर भी भला कौन मिटा पाता है, 
एक जननी है तो दूसरी मातृभूमि भारत माता है।
♦ डॉ• विदुषी शर्मा – नई दिल्ली ♦
_____
हम दिल से आभारी हैं डॉ• विदुषी शर्मा जी के प्रेरणादायक लेख (प्रथम गुरु माता) हिन्दी में Share करने के लिए।
About – डॉ• विदुषी शर्मा जी,
आप अभी कार्यरत हैं – दिल्ली स्टेट की जनरल सेक्रेटरी इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गेनाईजेशन. (You are currently working – Delhi State General Secretary International Human Rights Organization.)
 —♦—

विदुषी शर्मा जी के लिए मेरे विचार:

♣ 🙂 “विदुषी शर्मा जी” ने बहुत ही सरल शब्दों में माँ के गुणों और प्यार का मनोरम वर्णन किया है। हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। माँ के गुण और प्यार सागर के गहराई से भी ज्यादा हैं। सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान गहराई से हर शब्दाे का सार समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

जरूर पढ़े: दिल से कागज में उतर ही जाती है।

जरूर पढ़े: हम दोनों की दो-दो आंखें।

♥⇔♥

अपने विचार Comments कर जरूर बताये, और हमेशा नए Post को अपने ईमेल पर पाने के लिए – ईमेल सब्सक्राइब करें – It’s Free !!

Please share your comments.

आप सभी का प्रिय दोस्त

©KMSRAJ51

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

———– © Best of Luck ® ———–

Note:-

यदि आपके पास हिंदी या अंग्रेजी में कोई Article, Inspirational Story, Poetry, Quotes या जानकारी है जो आप हमारे साथ Share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी ID है: kmsraj51@hotmail.com पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

____ अपने विचार Comments कर जरूर बताएं! ____

Filed Under: 2018-Kmsraj51 की कलम से….., माँ, हिन्दी साहित्य Tagged With: essay on mother, first guru of knowledge, mother day essay in hindi, pratham guru mata, Vidushi Sharma, ज्ञान की प्रथम गुरु माता है, डॉ विदुषी शर्मा, प्रथम गुरु माता, माँ, माँ की महिमा, माँ की महिमा कविता, माँ के ऊपर छोटी कविता, माँ पर कविता हिन्दी में, माँ पर कुछ पंक्तियाँ, माँ पर कुछ शब्द, विदुषी शर्मा

Primary Sidebar

Recent Posts

  • निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।
  • बात वक्त की।
  • तिरंगा का करें सम्मान।
  • एक सफर।
  • बाल विवाह – एक अभिशाप।
  • क्या बदलाव लायेगा नया साल।
  • है तो नववर्ष।
  • मोह।
  • अपना धर्म सबसे उत्तम।
  • ठंडी व्यार।
  • रिश्तों को निभाना सीखो।
  • तंत्र, मंत्र और तत्व ज्ञान में अंतर।
  • मित्र।
  • आखिर क्यों।
  • समय।
  • काले बादल।
  • सुबह का संदेश।

KMSRAJ51: Motivational Speaker

https://www.youtube.com/watch?v=0XYeLGPGmII

BEST OF KMSRAJ51.COM

निरर्थक रील्स की आरी – गुमराह होती नारी।

बात वक्त की।

तिरंगा का करें सम्मान।

एक सफर।

बाल विवाह – एक अभिशाप।

क्या बदलाव लायेगा नया साल।

है तो नववर्ष।

मोह।

अपना धर्म सबसे उत्तम।

ठंडी व्यार।

रिश्तों को निभाना सीखो।

Footer

Protected by Copyscape

KMSRAJ51

DMCA.com Protection Status

Disclaimer

Copyright © 2013 - 2026 KMSRAJ51.COM - All Rights Reserved. KMSRAJ51® is a registered trademark.