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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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hindi short story

मेरी अपनी है मंजिले।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ मेरी अपनी है मंजिले। ϒ

प्यारे दोस्तों,

एक घर के पास काफी दिन से एक बड़ी इमारत का काम चल रहा था। वहा रोज मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चें एक – दूसरे की शर्ट पकड़कर रेल – रेल का खेल खेलते थे।

रोज कोई बच्चा इंजन बनता और बाकी बच्चे डिब्बे बनते थे। इंजन और डिब्बे वाले बच्चे रोज बदल जाते, पर केवल चड्ढी पहना एक छोटा बच्चा हाथ में रखा कपड़ा घुमाते हुए रोज गार्ड बनता था। एक दिन उन बच्चो को खेलते हुए रोज देखने वाले एक व्यक्ति ने काैतुहल से गार्ड बनने वाले बच्चें को पास बुलाकर पूछा … बच्चें तुम रोज गार्ड बनते हो। तुम्हे कभी इंजन कभी डिब्बा बनने की इच्छा नहीं होती ?

इस पर वो बच्चा बोला… बाबू जी मेरे पास पहनने के लिए कोई शर्ट नहीं है। तो मेरे पीछे वाले बच्चे मुझे कैसे पकड़ेंगे … और मेरे पीछे कौन खड़ा रहेगा …? इसलिए मै रोज गार्ड बनकर ही खेल में हिस्सा लेता हूँ। ये बोलते समय मुझे उसकी आँखों में पानी दिखाई दिया।

वो बच्चा जीवन का एक बड़ा पाठ पढ़ा गया…। अपना जीवन कभी भी परिपूर्ण नहीं होता। उसमे कोई न कोई कमी जरूर रहेगी …। वो बच्चा माँ – बाप से गुस्सा होकर रोते हुए बैठ सकता था। परन्तु ऐसा न करते हुए उसने परिस्थितियों का समाधान ढूंढा।

हम कितना रोते हैं ? कभी अपने सांवले रंग के लिए, कभी छोटे कद के लिए, कभी पैसे के लिए, कभी पड़ोसी की बड़ी कार, कभी पड़ोसन के गले का हार, कभी अपने कम marks, कभी English, कभी Personality, कभी नौकरी की मार तो कभी धंधे में मार …। हमे इससे बाहर आना पड़ता हैं … ये जीवन है… इसे ऐसे ही जीना पड़ता हैं।

चील की ऊँची उड़ान देखकर चिड़िया कभी depression में नहीं आती, वो अपने आस्तित्व में मस्त रहती है। मगर इंसान – इंसान की ऊँची उड़ान देखकर बहुत जल्द चिंता में आ जाता है। तुलना से बचें और खुश रहें। न किसी से ईर्ष्या, ना किसी से कोई होड़, मेरी अपनी है मंजिले, मेरी अपनी दौड़ …।

सीख – परिस्थितियां कभी समस्या नहीं बनती, समस्या इसलिए बनती है, क्योंकि हमें उन परिस्थितियों से लड़ना नहीं आता। यह सृष्टि एक रंगमंच है और सभी मनुष्य आत्मा Actor व Actress है सभी को अपना- अपना पार्ट पूरा करना चाहिए। हर इंसान के अंदर असीमित शक्तियां निहित है – बस जरूरत है इन शक्तियों को जागृत कर – उसे सही तरीके से Use करना। जिससे जीवन में सरलता पूर्वक सुख व शांति मिले।

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© आप सभी का प्रिय दोस्त ®

Krishna Mohan Singh(KMS)
Editor in Chief, Founder & CEO
of,,  https://kmsraj51.com/

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to become themselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

 

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सच्चे गुरु का सच्चा शिष्य।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ सच्चे गुरु का सच्चा शिष्य। ϒ

ऐसी हो सच्चे गुरु में निष्ठा – तो जीवन सवर जाये।

प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-शास्त्रादि का अध्ययन करते थे।

एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।

वेदधर्म मुनि ने शिष्यों से कहा – “हे शिष्यो ! अब प्रारब्धवश मुझे कोढ़ निकलेगा, मैं अंधा हो जाऊँगा इसलिए काशी में जाकर रहूँगा, है कोई हरि का लाल, जो मेरे साथ रहकर सेवा करने के लिए तैयार हो?

शिष्य पहले तो कहा करते थे – ʹगुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्यौछावर हो जाए मेरे प्रभु !ʹ अब सब चुप हो गये।

उनमें संदीपक नाम का शिष्य खूब गुरु सेवापरायण, सच्चा गुरुभक्त था। उसने कहा – “गुरुदेव ! यह दास आपकी सेवा में रहेगा।”

गुरुदेव – “इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा।”

संदीपक – “इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है, गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है।” वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी में मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे।

कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया। शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ। वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के घावों को धोता, साफ करता, दवाई लगाता, गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता।

गुरुजी गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध प्रकार से परीक्षा लेते।

किंतु संदीपक की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़ होता गया।

काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ संदीपक के समक्ष प्रकट हो गये और बोले –

“तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम प्रसन्न हैं…

जो गुरु की सेवा करता है वह मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है।”

बेटा ! कुछ वरदान माँग ले। संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और बोला…

“शिवजी वरदान देना चाहते हैं आप आज्ञा दें तो वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाय।”

गुरु ने डांटा – “वरदान इसलिए माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से तेरी जान छूटे। अरे मूर्ख ! मेरा कर्म कभी न कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।”

संदीपक ने शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित हो गये कि कैसा निष्ठावान शिष्य है। शिवजी गये विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से सारा वृत्तान्त कहा। विष्णु भी संतुष्ट हो संदीपक के पास वरदान देने प्रकटे।

संदीपक ने कहा – “प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

भगवान ने आग्रह किया तो बोला – “आप मुझे यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे। गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे, गुरुचरणों में दिन प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे।”

भगवान विष्णु ने संदीपक को गले लगा लिया।

संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अँधापन। शिवस्वरूप सदगुरु ने संदीपक को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया।

वे बोले – “वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा, पुत्र – तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो।”

गुरु के संतोष से संदीपक गुरु-तत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया।

अपनी श्रद्धा को कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में सदगुरु पर से तनिक भी कम नहीं करना चाहिए। वे परीक्षा लेने के लिए कैसी भी लीला कर सकते हैं। गुरु आत्मा में अचल होते हैं, स्वरूप में अचल होते हैं। जो हमको संसार-सागर से तारकर परमात्मा में मिला दें, जिनका एक हाथ परमात्मा में हो और दूसरा हाथ जीव की परिस्थितियों में हो, उन महापुरुषों का नाम सदगुरु है।

सीख – 

“सच्चा गुरु कौन ?”

वास्तविक गुरु वह हाेता है जाे अपने अनुयाइयाें काे परमात्म मिलन का सच्चा मार्ग दिखाये, ना की स्वयं की पूजा-अर्चना करवायें। जाे गुरु स्वयं की पूजा-अर्चना करवाता हैं वह गुरु नहीं राक्षस(दैत्य) है, वह आपकाे परमात्मा से विमुख(दुर) कर रहा हैं। जबकी एक सच्चा गुरु ऐसा कभी नहीं करता।

मनुष्य कभी किसी मनुष्य का उद्धार(निर्वाण या मोक्ष) नहीं कर सकता, यहा तक कि साधु-संताे का भी उद्धार करने के लिए स्वयं परमात्मा काे आना पड़ता हैं। अर्थात: मनुष्य कभी किसी मनुष्य का उद्धार नहीं कर सकता।

सभी मनुष्याें का सच्चा गुरु परमात्मा(GOD) ही हैं।

यह बात “श्रीमत भागवत गीता” के चौथे अध्याय के श्लोक संख्या “८” से:

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥

अर्थात: साधु पुरुषोंका उद्धार करने के लिये, पापकर्म करनेवालाेंका विनाश करने के लिये और धर्मकी अच्छी तरह से स्थापना करने के लिये मैं युग-युगमें(संगमयुग में) प्रकट(किसी सतपुरुष शरीर का माध्यम लेकर) हुआ करता हूँ॥८॥

ध्यान दें,

संगमयुग : वह समय जब कलियुग(कलयुग) का आखिरी कुछ वर्ष शेष रह जाये, जिसके बाद सतयुग आने वाला हाे। यहीं समय संगमयुग कहलाता हैं।

♦ KMSRAJ51 ♦

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सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है?

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है? ϒ

प्यारे दोस्तों – बहुत समय पहले की बात है। एक राजा पंडितों, विद्वानों से प्रय: प्रश्न किया करते थे कि संसार में सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में विद्वानों ने उन्हें विभिन्न उत्तर दिए, पर किसी के भी उत्तर से राजा संतुष्ट नहीं हो पाए। एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गए। एक जानवर का पीछा करते-करते वे रास्ता भटक गए। भीषण गर्मी के कारण उन्हें चक्कर आने लगा।वह(राजा) एक आश्रय की खोज करने लगे – खोजते-खोजते उन्हें एक आश्रम दिखाई पड़ा, जहां एक संत ध्यान में बैठे थे। राजा इतना ज्यादा थक गए थे कि – उन्हें(संत) पुकारते हुए बेहोश हो गए।

होश में आने पर उन्होंने देखा कि – संत उनके मुख पर पानी के छींटे मार रहे हैं। राजा ने विनम्रता से कहा, `महात्मन ! आप तो समाधि में लीन थे। आपने मेरे लिए समाधि क्यों भंग की? संत ने राजा से कहा – `राजन ! आपके प्राण संकट में थे। ऐसे समय में मेरे लिए ध्यान की अपेक्षा आपकी सहायता के लिए तत्पर होना ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य था। समय और परिस्थिति को देखते हुए ही कर्तव्य का निर्धारण करना चाहिये।

उनके इस कथन से राजा की जिज्ञासा भी शांत हो गई कि इंसान का “सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है?” उन्होंने समाज लिया कि सबसे बड़े कर्तव्य का निर्णय परिस्थिति को देख कर ही किया जा सकता हैं।

सीख – जीवन में सदैव ही कर्तव्य का निर्णय परिस्थिति को देख कर ही ले। समय के अनुसार क्या उचित हैं और क्या अनुचित हैं को समझकर सही कदम उठाये। मानव सेवा को सदैव ही प्रथम स्थान पर रखे।

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