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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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moral stories in hindi

सोच।

Kmsraj51 की कलम से…..

Thinking | सोच।

उस दिन राम किसी लंबी यात्रा से अपने घर लौटा था। राम ने जैसे ही दरवाजा खटखटाया बेटा जल्दी से दरवाजा खोलने आया और एकदम से अपने पापा के बैग से अपने लिए मिठाई ढूंढने लगा। बेटे ने ना तो पापा के चरण स्पर्श किए और ना ही हाल-चाल पूछा। क्योंकि बेटा अभी 5 साल का है इसलिए पापा ने भी ज्यादा परवाह न की। घर के अंदर बेटी ने भी पापा को नमस्ते की और कहा पापा मेरे लिए क्या लाए हैं? पापा ने भी बैग खोलते हुए उसको बताया कि उसके लिए कपड़े लाए हैं। पापा ने अपनी मां के चरण स्पर्श किए और मां ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि शाबाश मुझे तुम पर गर्व है।

इसके बाद राम की धर्मपत्नी ने ना तो राम को पानी के लिए पूछा, ना चाय के लिए पूछा, क्योंकि शाम को लगभग 8:00 का समय था, राम अभी अपने कपड़े बदल ही रहा था कि उसकी पत्नी ने उसे कहा थोड़ी सी सब्जी बची है, बाकी अगर खाना, खाना है तो खाना बना लो, बाकियों के लिए भी खाना बना लो, मैं खाना नहीं बनाऊंगी। राम को एकदम से गुस्सा आया और उसने कहा कि मैं इतनी दूर से आया हूं ना तो तुम मेरे लिए चाय के लिए पूछ रही हो, ना पानी के लिए। सीधे ही हुक्म लगा रही हो कि अपने लिए खाना बना लो, बाकी के लिए भी खाना बना लो, यह कहां का न्याय है?

राम की पत्नी तपाक से बोली तुमने कहा मेरा हाल चाल पूछ लिया मैं बीमार हूं, मेरे बारे में कोई नहीं सोचता है, जबकि ऐसा नहीं था वह पता नहीं किस बात के लिए नाराज थी। राम ने कपड़े बदल कर कुर्सी पर बैठकर सोचा कि आखिर आदमी किसके लिए कमाता है, किसके लिए वह दिन भर इधर-उधर दौड़ भाग करता है और अगर आदमी कमा भी लेता है तो अपने साथ क्या लेकर जाएगा?

आखिरकार राम ने अपने मन को शांत किया और चुपचाप रसोई घर में जाकर बहुत सारे प्रश्न लेकर खाना बनाने की तैयारी करने लग पड़ा। तभी राम की बीवी रसोई में आती है और अपनी आंखों से आंसू टपकाते हुए आटा गूंथने में लग जाती है जबकि राम ने कहा कि कोई बात नहीं, तुम अगर बीमार हो तो तुम आराम करो, मैं खाना बना लूंगा। लेकिन राम की बीवी ने आनन-फानन में आटा गूथ ली और चपाती भी बना दी। उधर राम ने सब्जी बना दी और सबने खाना खाया और थोड़ा माहौल शांत हुआ लेकिन राम के मन में उठे प्रश्नों का जवाब राम को कहीं नहीं मिल पाया?

एक तरफ राम की मां थी जो राम को आशीर्वाद देते हुए कहा कि शाबाश बेटा मुझे तुम पर गर्व है और दूसरी तरफ राम की धर्मपत्नी थी जिसने मुबारकबाद देने की बजाय हुकुम चलाना शुरु कर दिया कि तुम यह करो, तुम वह करो, तुम ऐसा नहीं करते हो, तुम वैसा नहीं करते हो? या औरत ही है जो मन भी है और बीवी भी है लेकिन सच में दिन-रात का फर्क है। कोई मां अपने परिवार के लिए दिन रात ही सोचती रहती है तो कोई मां ऐसी भी है जो सिर्फ और सिर्फ अपने तक ही सीमित है? सब सोच-सोच का फर्क है।

♦ लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी  – बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लघु कथा के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — “एक मां ही है जो अपने परिवार के लिए दिन रात ही सोचती रहती है” तो कोई मां ऐसी भी है जो सिर्फ और सिर्फ अपने तक ही सीमित है? ये सब सोच-सोच का फर्क है। भारतीय संस्कृति में माँ सदैव ही अपनों का हित चाहती है, और एक माँ ही है जो बिना किसी स्वार्थ के सबका ध्यान रखती है, भले ही खुद कितना भी कष्ट झेलती है फिर भी गुस्सा नही करती है, लेकिन आजकल की कुछ लड़कियों को क्या हो गया है जो अपनी निज संस्कार व फर्ज को भूलती जा रही है, ये कैसी सोच है इनकी? खैर एक बात याद रखे की मानव जीवन की तीन मुख्य जरूरतें है, अच्छा खाना, अच्छा पहनने को कपडा और रहने के लिए मकान, इन्हीं जरूरतों के लिए आदमी कार्य करता है जिससे उसके परिवार का जरुरत पूर्ण होता रहे। इसके बदले वह सिर्फ दिल का प्रेम व सहानुभूति के दो शब्द चाहता है अपनों से।

—————

यह लघु कथा (सोच।) “श्री लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, लघु कथा, सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम लेफ्टिनेंट (डॉ•) जयचंद महलवाल है। साहित्यिक नाम — डॉ• जय अनजान है। माता का नाम — श्रीमती कमला देवी महलवाल और पिता का नाम — श्री सुंदर राम महलवाल है। शिक्षा — पी• एच• डी•(गणित), एम• फिल•, बी• एड•। व्यवसाय — सहायक प्रोफेसर। धर्म पत्नी — श्रीमती संतोष महलवाल और संतान – शानवी एवम् रिशित।

  • रुचियां — लेखक, समीक्षक, आलोचक, लघुकथा, फीचर डेस्क, भ्रमण, कथाकार, व्यंग्यात्मक लेख।
  • लेखन भाषाएं — हिंदी, पहाड़ी (कहलूरी, कांगड़ी, मंडयाली) अंग्रेजी।
  • लिखित रचनाएं — हिंदी(50), पहाड़ी(50), अंग्रेजी(10)।
  • प्रेरणा स्त्रोत — माता एवम हालात।
  • पदभार निर्वहन — कार्यकारिणी सदस्य कल्याण कला मंच बिलासपुर, लेखक संघ बिलासपुर, सह सचिव राष्ट्रीय कवि संगम बिलासपुर इकाई, ज्वाइंट फाइनेंस सेक्रेटरी हिमाचल मलखंभ एसोसिएशन, सदस्य मंजूषा सहायता केंद्र।
  • सम्मान प्राप्त — श्रेष्ठ रचनाकार(देवभूमि हिम साहित्य मंच) — 2022
  • कल्याण शरद शिरोमणि सम्मान(कल्याण कला मंच) — 2022
  • काले बाबा उत्कृष्ट लेखक सम्मान — 2022
  • व्यास गौरव सम्मान — 2022
  • रक्त सेवा सम्मान (नेहा मानव सोसायटी)।
  • शारदा साहित्य संगम सम्मान — 2022
  • विशेष — 17 बार रक्तदान।
  • देश, प्रदेश के अग्रणी समाचार पत्रों एवम पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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दास्तान ए जात पात।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दास्तान ए जात पात। ♦

अपनी अरुणिमा को बिखेरते हुए सूर्य देव हिमालय की पावन वादियों में पहाड़ियों के बीचो बीच बसे इस छोटे से सुंदर एवं सुरम्य गांव को ऐसे नहला रहे थे, कि मानो आद्या सुंदरी परा शक्ति प्रकृति का चाकर बन कर अपनी सेवाएं नियमित दे रहे हो।घाटी के इस छोटे से गांव में कितनी आत्मीयता थी और कितना प्रेम और भाईचारा? कहते नहीं बनता। न कोई लड़ाई न कोई झगड़ा। न ही तो शहरों जैसी आपाधापी और लूट – खसोट। चारों ओर थी तो सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता और असीम सकून।

नित्य प्राकट्य की तरह आज भी आदित्य देव अपनी सेवाएं देने धीमे – धीमे तप और विशाल प्रकाश के साथ पहाड़ी की चोटी पर निकल आया था। गांव की जानकी चाची की आवाजे हर रोज की तरह कानों में गूंज उठी।

” राधा, शालू, कमला, मनु उठो भाई उठो। देखो तो सूरज चढ़ आया है। सारा संसार उजाला हो गया है और तुम ……….।” यह बोलते बोलते जानकी चाची उस कमरे में घुंस गई, जहां राधा सोई थी।

“अरे ओ मेरी भोली सी, प्यारी सी, अच्छी सी दादी। क्यों हर रोज सुबह – सुबह अपनी कोयल सी मधुर आवाज़ का प्रचार – प्रसार करती फिरती हो ? आस – पड़ोस को भी अलार्म का काम करती हो।” बिस्तर पर ऊंघते हुए से पलथी मार कर जानकी चाची के झुर्रियों से लबरेज चेहरे को चूमते हुए राधा बोली।

“तुझे अब सुबह इतनी देर तक सोए रहना शोभा नहीं देता राधा। शादी की उम्र हो गई है। मां का हाथ बंटाया कर। कुछ सीख भी जाएगी और मां की मदद भी हो जाएगी।”

जानकी चाची बूढ़ी आंखो की कोरों में पानी भरते हुए से बोली।
“बस भी कर मेरी प्यारी दादी। जब देखो तो तब उपदेश। और हां जो ये बात – बात पर इन झील सी आंखो में लहरे उठाती रहती हो ना, ये मत किया करो जी।” राधा जानकी चाची की झुर्रियों से लबरेज पोपलों को दोनों ओर से पकड़ते हुए और पुचकारते हुए से बोली।

“कैसे चुप रहूं बच्चा? दादी जो हूं तेरी।” जानकी चाची कोरो का पानी पोंछते हुए और राधा का सिर सहलाते हुए बोली।

“उमा। ओ उमा।” बाहर से मोहन भैया ने आवाज लगाई।
“जी आई।” अंदर से रोटियों को बेलते हुए उमा भाभी बोली।

“अरे मैं काम पर जा रहा हूं। देर हो रहा हूं। बाहर कुछ सामान रखा है। देखना उठा लेना। राधा को बोल दे चाहे।” जाते हुए से मोहन भैया बोले।

“जी उठा लूंगी। आपकी लाड़ली तो अभी खरांटे मार रही होगी। बिगाड़ रखा है बुढ़िया ने।” अंदर से उमा भाभी बोली।

“ठीक है। उठा लेना। बाहर गाय भी चुग रही है। कहीं खा न ले सामान।” मोहन भैया सड़क से बोले।

“जी उठा लूंगी। शाम को जल्दी अना।” अंदर से उमा भाभी बोली। पर शायद ये सब मोहन भैया ने नहीं सुना हो। वे निकल पड़े थे।

गाय को हट्टका करते हुए सामानों के थैले लिए हुए राधा और जानकी चाची रसोई में आई।

“क्यों री बुढ़िया की बच्ची? क्या कह रही थी ? बुढ़िया ने बिगाड़ रखा है!” जानकी चाची ने उमा भाभी के कान प्यार से पकड़ते हुए पुचकारते हुए से कहा।

“सॉरी – सॉरी अम्मा जी! अब नहीं बोलूंगी।” अपने कान पकड़ते हुए माफीनामे की तहजीब में उमा भाभी बोली।

“खबरदार जो आगे से किसी ने मेरी लाड़ली पोती को कुछ कहा तो।” फिर से आंखों की कोरें नम करते हुए से जानकी चाची बोली।

“नहीं कहूंगी कुछ अम्मा। पर इसकी मां हूं। चिंता तो होती है न! 24 की हो गई है।सबको आप जैसी सास थोड़े ही न मिलती है।” उमा भाभी रूआंसा चेहरा करके बोली।

“सो तो मैं भी इसे समझाती रहती हूं बेटा। पर यह मानती कहां है?” यह बोलते – बोलते जानकी चाची की आंखे छलक आई थी।

“ओ री ओ सुंदर सास – बहू की जोड़ी। ये रोना धोना छोड़ो और कुछ नाशता – पानी कराओ। भूख लगी है। तुम्हारी राधा जिंदा है अभी। मरी नहीं है।” राधा ने दोनों को छेड़ते हुए से कहा।

“चल ! झल्ली कहीं की? पहले नहा – धोकर आ, फिर खाना कुछ।” जानकी काकी आंसू पोंच्छते हुए बोली।

अपनी अहलड मस्ती में राधा नहाने जाती है। इस बीच चाची और उमा भाभी में यह बात हो रही थी कि परसों राधा को देखने लड़के वाले आ रहे हैं। “उमा के बाबू जी बोल रहे थे कि बेटी जवान हो गई है। हाथ पीले करना हमारा फ़र्ज़ है। फिर बी ए भी इस साल इसकी पूरी हो जाएगी।” उमा भाभी चाची से बोल रही थी।

“सो तो है बच्चा। बेटियां तो है ही पराया धन। कब तक पास रखोगे?” चाची उमा भाभी से बोल रही थी।

” जब देखो तब सब बस मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। किसी न किसी तरह से मुझे जल्दी भगाने की तैयारी में चुपके – चुपके लगे हैं। मैं नहीं करूंगी अभी शादी हां। कह दिया मैंने। जब तक एम ए न कर लूं।” राधा बाल झाड़ते हुए झल्ला कर बोली।

“बस कर री ओ छमक-छलो। कब तक बाप के यहां बैठी रहेगी? 24 की हो ली फिर कब 50 की करेगी शादी क्या? कौन वरे गा तब तुझे। तेरी उम्र की थी न हम। तो दो – दो औलाद जन बैठे थे।” पास मनु को नहला रही चंपा दीदी व्यंग्य करते हुए बोली। वह यहां मायके अपने बच्चों के साथ मेहमान आई थी। शायद राधा का यह रिश्ता भी उसी की सलाह पर उमा भाभी और मोहन भैया करवा रहे थे। पर इसमें राधा को विश्वास में न लिया गया हो शायद।

“वह आप का जमाना था फूफी। अब मॉडर्न जमाना है। समझी !” राधा पुचकारते हुए से बोली।

“हां – हां तोड़ ले अपने बाप की रोटियां और! तुझे कौन समझाएं?” चंपा दीदी बोली।

“बस भी कर चंपा! तू हमेशा इसे छेड़ते हुए क्यों ताने मारती रहती है?” जानकी चाची डांटते हुए से बोली।

“हां – हां मां और चढ़ाओ इसे सर पर। तूने ही तो इसे बिगाड़ रखा है। ठीक कहती है भाभी।” चंपा दीदी बोली।

“हर चीज का एक समय होता है बच्चा। शादी की भी एक उम्र होती है। ठीक कह रहे हैं सब।” राधा की बेनी बनाते हुए चाची बोली। तीसरे दिन लोक रीत के तहत बुलाए गए मेहमान आते हैं और राधा जैसी सुंदर और पढ़ी लिखी लड़की को देख कर रिश्ता तुरंत पक्का कर लेते हैं।

दिन गुजरते गए। यहां राधा ने बुद्धि से तो यह रिश्ता कबूल लिया था पर दिल से नाखुश ही थी। एक दिन पास में एक मेला था। राधा अपनी सहेली रूपा के साथ मेला देखने चली गई। रास्ते में उन्हें पिंकू मिला, जो उन का क्लास मेट था। वह पास के गांव का रहने वाला था और एक अच्छा लड़का था। उसने गाड़ी रोकी।

“अरे राधा और रूपा कहां जा रही हो?” पिंकू ने कहा।
“ओह पिंकू! हम मेले जा रही है और तुम?” रूपा ने चौंकते हुए से कहा।
“मैं भी मेले जा रहा हूं। आओ चलो बैठो।” पिंकू ने कहा।
दोनों गाड़ी में बैठ जाती है। और तीनों बतियाते – बतियाते मेले पहुंचे। बातचीत से माहौल तो पहले ही खुशनुमा हो गया था उस पर मेला भी आ गया। मेले के पास रास्ता कुछ खराब था। सो राधा ने पिंकू को हाथ दे कर मदद करने को कहा।

पिंकू ने जैसे ही ऊपर से नीचे को राधा को ऊपर खेंचाने के लिए हाथ किया, त्यूं ही उसकी नजर राधा के वक्ष स्थल के ऊपर वाले अधखुले भाग पर पड़ी। राधा ने पिंकू को देखते हुए भांप लिया। दोनों के दिलो में एक अजीब सी हलचल हुई, जो शायद इन दोनों ने पहली बार महसूस की थी। वे एक दूसरे को संभालते – संभालते नयन मटके में उस मेले के पास वाली किचन में फिसल गए। दोनों के कपड़े खराब हो गए। रूपा को वहीं बिठा कर वे पास के नल में अपने कपड़े साफ करने गए।

“तुम्हारी सगाई सच में हो गई क्या?” कपड़ों को झाड़ता हुआ पिंकू शरमाते हुए सा बोला।

“क्यों? नहीं हुई होती तो तब क्या तू………….?” राधा ने स्त्री सुलभ मुस्कुराहट बिखेरते हुए नीची नजर कर के तिरछी चितवन निहार कर कपड़े धोते हुए कहा।

” नहीं – नहीं। बस सुना था। सो पूछ लिया।” पिंकू उसी मुद्रा में बोला।

“हां हो गई है। ठीक सुना है तुमने।” राधा ने भी उसी मुद्रा में जबाव दिया। वे दोनों बातों ही बातों में मस्त हो गए थे। बाहरी परिचय तो उनका पहले से ही था, पर आज तो उनका रूहानी परिचय भी हो गया था शायद। ऊपर से धीमे से रूपा की आवाज आई,” ओ री ओ राधा। जल्दी कर बच्ची। तेरा मंगेतर मेले में पहुंच गया है शायद।फोन कर रहा है।”

“उठा ले तू ही।” राधा ने ठिठोली करते हुए कहा।
“अरे ओ लैला! कहीं उसने तुम्हे यूं देख लिया न पानी में आग लग जाएगी आग हां।जल्दी कर।” रूपा ने चठकरी करते हुए कहा।

“अच्छा पिक्की!” हाथ हिलाते हुए राधा ने पिंकू से जाते हुए कहा।

राधा के मुख से अपने लिए पिंक्की सुन कर पिंकू के दिल की आग में घी पड़ गया। शाम को राधा अपने घर पहुंची और सीधा अपने कमरे में चली जाती है।

“राधा। ओ राधा।” जानकी चाची ने आवाज लगाई।
“जी दादी।” राधा अंदर से कपड़े बदलते हुए बोली।
“देख तो तेरा फोन आया है।” चाची बोली।

“किसका है दादी?” राधा बोली।
“किसका होगा ? तुझे नहीं मालूम क्या?” चाची ठिठोली करते हुए बोली।
चाची की बातों से राधा ने अंदाजा लगाया लिया कि उसके मंगेतर का ही होगा। उसने उतना तबजो न दिया। कपड़े बदलती रही। इतने में शालू खिखियाते हुए राधा के कमरे में फोन ले कर आया।

“सुन भी तो लो दीदी। जीजा जी नाराज हो जाएंगे नहीं तो।” वह छुटकू राधा को छेड़ते हुए से बोला।

“होने दे नाराज। पीछा छूटेगा।” राधा अपनी घर वाली कमीज़ पहनते हुए बोली और उसके हाथ से फोन झुंझला कर ले लेती है।

“हेलो ! कौन है? अब बोलो भी चुप क्यों हो। कपड़े बदल रही थी। देर लग गई। इसमें नाराज होने की क्या बात है?
बोलो भी कुछ नहीं तो मैं काट रही हूं।” राधा त्योरियों को चढ़ाते हुए बोली।

“सुन – सुन, मैं पिंक्की बोल रहा हूं। फोन मत काटना प्लीज!” फोन पर पिंकू ने धीरे से कहा।

यह सुन कर राधा घर के पिछवाड़े में फोन सुनने चली गई। घरवालों ने सोचा कि यह हमसे शर्मा कर दामाद से बात करने पिछवाड़े गई है। चाची ने राधा का फोन पहले उठाया था। उस पर किसी मर्द की आवाज सुन कर अंदाजे से दामाद का फोन होने का अनुमान लगाया था।

सब खुश थे कि बेटी को दामाद का फोन आया है। पर किसे मालूम कि राधा ने फोन पर किसी और से कल मुलाकात का प्रोग्राम फिट किया है।

हल्की – हल्की बारिश बाहर हो रही थीं। कस्बे के नुकड़ पर बने रेन शेल्टर में राधा और पिंकू दो के दो बैठे हैं। कोई उन्हें देख नहीं रहा है।

“क्या तुम अपने मंगेतर से खुश नहीं है?” पिंकू ने राधा से कहा।
“किसने कहा?” राधा ने तल्खियों में कहा।

“तुम ही तो कल फोन पर कह रही थी।” पिंकू ने कहा। पिंकू ने राधा को शालू के छेड़ने पर बड़बड़ाते हुए सुन लिया था।

“हां नहीं हूं खुश। तो क्या कर लोगे तुम?” राधा बोली।

“तूने क्या यह फिल्म समझी है? कि हीरो विलन को पीट देगा।” पिंकू बोला।

“हीरो। और वो भी तू?” राधा हंसते हुए से बोली।

“हां – हां मैं। क्यों आपको कोई शक है?” पिंकू बड़े रुआब से बोला।
पिंकू की यह अदा तो राधा को और भी घायल कर गई।

“अच्छा – अच्छा एक बार फिर से करो ऐसा भला।” राधा ने अनुनय किया।
पिंकू ने क्रिया पुनः दोहराई।

उस रोज राधा के ससुराल वाले राधा की शादी की बात करने आए थे।

“देख भाई कुडमा (समधी)। अगले महीने तक जो देना ब्याह करी एबे। से मठा भी आई जाना घरा जो। फेरी कंपनी मंझा छुट्टी नी मिलदी।” राधा का ससुर मोहन भैया से बोल रहा था।
“हां बेटा ब्राह्मणा ते लग्न जोड़ी ले ओ। बाकी फेरी ब्याह रे घरा निकलें कई काम।” चाची ने हामी भरते हुए कहा।

शादी का लग्न शोध लिया गया था और तैयारियां दोनों ओर जोरों से थी। एक दिन दोनों परिवारों के लोग शहर शादी के जेवर – कपड़े खरीदने आए थे। राधा को भी पसंद का सामान खरीदने के लिए साथ लाया गया था। सभी खरीद फरोक्त कर रहे थे।

इस बीच राधा टॉयलेट गई। वहां से वह वापिस नहीं आई। थोड़ी देर बाद सब का ध्यान जब इस ओर गया तो दोनों परिवारों में खलबली मची। फोन लगाया। वह स्विच ऑफ आ रहा था। शहर का कोना – कोना छान डाला पर कोई खबर नहीं मिली। शाम होने वाली थी। तब सब ने निर्णय लिया कि पुलिस में रपट दर्ज की जाए। रपट लिखवाते ही सब अपने – अपने घरों को चले गए।

तीन दिन बाद डाकिया चिट्ठी को चाची के पास दोपहर को छोड़ गया था। चाची को पढ़ना आता नहीं था।
शाम को जब भैया और भाभी आए तो उन्हें दे दी।
“देखना मोहन तेरे नाम डाकिया चिट्ठी दे गया था।” चाची बोली।
मोहन भैया ने जब चिट्ठी पढ़ी तो आग बबूला हो उठा।

“नालायक को यह दिन दिखाने के लिए ही पाला – पोसा था हमने। नाक कटा डाली मूर्ख ने हमारी। मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा कहीं। क्या बोलेंगे समधी जी को। चलो उनसे तो ले दे के निपट भी लेंगे पर समाज को क्या कहेंगे?” मोहन भैया गुस्से से लाल हो कर बोल रहे थे।

“अरे हुआ क्या है? जरा हमें भी तो बता। बस उसे कोसता ही जा रहा है। ऐसा क्या किया है उसने?” चाची ने डांटते हुए से बोली।

“तुम तो चुप ही रहो अम्मा। तुम्हीं ने उसे अपने लाड़ प्यार से बिगाड़ा, जिसका परिणाम आज हम भुगत रहे हैं।” मोहन भैया झल्ला कर बोले।
“अरे मुझे जो भला – बुरा कहना है सो बाद में कहना। पहले बता तो सही हुआ क्या है?” चाची भी कड़की से बोली।

“होना क्या है अम्मा? यह कोर्ट की न्यायिक सूचना है। जिसमें लिखा है कि राधा ने पवन सुपुत्र बृजमोहन से शादी कर ली है और क्या?” मोहन भैया गुस्से से बोले।
उस दिन चंपा दीदी पुनः राधा के गायब होने की खबर सुन कर यहां खबर संभाल करने आई थी। वह चौंक कर बोली,” क्या? उस बृजमोहन के लड़के से, जो पड़ोस के गांव का है?”
“हां वही।” मोहन भैया ने ऊंघते हुए से बोला।

“देखा न। आखिर उसने अपनी करतूत दिखा ही ली आखिर। मैं न कहती थी कि यह लड़की तुमने कुछ ज्यादा ही सिर पर चढ़ा रखी है। बिगाड़ दी ना उसने जात। मेरी सुनता ही कौन था?” चंपा दीदी इठलाते हुए सी बोली।

“इससे तो वह मर ही गई होती तो एक ही दुख तो होता। अब तो वह जिंदगी भर खुद भी मरेगी और हमें भी मारती रहेगी।” छाती पीटते और रोते हुए उमा भाभी बोली।

“वह जिए अब अपने हाल में। मैं उसे अपने घर में घुसने नहीं दूंगा। मेरे लिए वह मर गई समझो।” मोहन भैया ने झुंझलाते हुए से कहा और अंदर चला गया।

कुछ दिन बाद राधा ने घर पर फोन किया। उमा भाभी ने उठाया। रोते – रोते बोली,” बेटा क्या कसर रखी थी हमने तुझे पालने में? तूने तो हमें कहीं का न छोड़ा! भागना भी था तो किसी अपनी जाति वाले के साथ भागती। क्या जरूरत पड़ी थी पिंकू के साथ भागने की? रिश्ता मंजूर न था तो मुझसे कहती, अपनी दादी से कहती। पर तूने तो हमारी नाक कटवा दी।,” रोते – रोते उमा भाभी ने फोन काट दिया।

राधा अभी अपनी बात कह ही नहीं पाई थी। वह कैसे बताती कि इश्क जात – पात को नहीं देखता। वह तो बस हो जाता है। और जब होता है तो सब नियम तोड़ कर अपनी मंजिल को लक्ष्य कर निशाना साधता है। पर वह जानती थी कि अभी मां का ही गुस्सा नहीं ठंडा है तो पिता जी का तो सातवें आसमान पर होगा।

कई दिन बीते पीछे बृजमोहन जी मोहन भैया के घर सुलह की बात करने आए। वह अपनी बिरादरी का गांव में ही नहीं इलाके में रसूखदार आदमी था। ऊंची जाति के लोग भी उसके ओहदे की तासीर के चलते ऊंची जुबान में उन से बात नहीं करते थे। पर वे दिल और व्यवहार के बहुत अच्छे थे। उन्होंने ही उस दिन कोर्ट में राधा और पिंकू की शादी करवाई थी। पिंकू को फोन पर जब राधा ने अपनी शादी की बात बताई थी तो उन्होंने इन दोनों की बाते सुन ली थी। सारी सेटिंग फोन पर इन्हीं की छत्र छाया में संपन्न हुई थी।

“अब क्या लेने आए हो बृजमोहन साहब? बेटी को तो ले गए हो बहला – फुसलाकर । उससे पेट नहीं भरा क्या? और क्या हमारी किरकिरी करने में अपनी ऊंची समझते हो?” मोहन भैया ने अनमने मन से कहा।

“नहीं मोहन बाबू। हम किसी को नीचा दिखाने नहीं आए हैं।बस सुलह करने आए हैं।” बृजमोहन शांति से बोले।

“काहे की सुलह ? कोई सुलह नहीं होगी। जाओ, चले जाओ यहां से। हमारे लिए वह मर गई और उसके लिए हम।” मोहन भैया झल्ला कर बोले। यहां गांव वालों ने मोहन भैया की बात की दात दी। उससे वे और शेर बन बैठे। उन्हें लगा कि अब गांव वाले मेरा आदर फिर से वैसे ही करेंगे, जैसे पहले करते थे।

“देखो मोहन बाबू! अब छोड़ो भी सारा गुस्सा। बच्चों ने प्यार किया कोई पाप नहीं किया। अब दोनों की कानूनी शादी भी हो चुकी है। अब तो उन्हें माफ कर लो और अपना लो। बच्चो को जितनी ही जरूरत हमारी है, उतनी ही आपकी भी है।” बृजमोहन पुनः शांति से बोले।

“क्या बात करते हो बृजमोहन साहब? अपने ओहदे और पैसों की धौंस मत जमाना।किस कानून की बात करते हो तुम? वही कानून तो तुम्हे जाति – पाती के प्रमाण पत्र बांटता है। फिर हम कैसे तुम्हारे साथ उठना – बैठना मंजूर करें?” मोहन भैया त्योरियां चढ़ाते हुए बोले।

“देखो मोहन भैया। इस संसार में कुदरत ने दो ही जातियां बनाई है। एक स्त्री और दूसरी पुरुष। वही सृष्टि के घटना चक्र को चलाने में सदा से कुदरत का साथ दे रही हैं। बाकी तो सब मनुष्य मन की खुरापात है। इसलिए इस जात – पात के विवाद में न पड़ कर बच्चों के बारे में सोचो।” बृजमोहन ने शांति से समझाते हुए से बोला।

“अपना यह ज्ञान कहीं और सुनाना, यहां नहीं। बड़े आए उपदेश देने। जब तुम एस. सी. का प्रमाण पत्र ले कर आरक्षण लेने के लिए अपनी जाति बड़े फखर से बताते हो, तब यह उपदेश नहीं देते? तब नहीं कहते कि हमें जाति प्रमाण पत्र नहीं चाहिए। हमें मानव होने का प्रमाण पत्र दो। अब अपनी जाति स्वीकारने में हेठी समझ रहे हो।” मोहन भैया ने अपने मन की सारी भड़ास उतार दी।

“अरे भाई क्यों बात उलझा रहे हो? मैं मानता हूं कि आरक्षण होना ही नहीं चाहिए।हो भी तो जातियों के आधार पर न हो। आर्थिक आधार पर हो। यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। ऐसा अगर समय पर हो गया होता तो इन आजादी के सत्तर साल में हमारे बच्चों ने आपसी रिश्ते कायम कर जात – पात का रोग ही मिटा दिया होता।पर यह तो राजनीतिक मसला है। इसमें हम क्या कर सकते हैं? और फिर इन बच्चों का तो कोई दोष ही नहीं।” बृजमोहन ने पुनः समझाते हुए से कहा।

“अच्छा! तुम कुछ नहीं कर सकते हो या कि जानबूझ कर कुछ करना ही नहीं चाहते? बृजमोहन साहब तुम जैसे रसूखदार जब इस बुराई का विरोध करें ना, सरकारों को रातों रात सब बदलना पड़ेगा। हम तुम्हारी चालाकियों को खूब समझते हैं। उससे पहले कि गांव वाले तुम्हारे साथ कुछ बुरा कर डालें, अपने रास्ते चलते बनो।” मोहन भैया विलक्षण मुद्रा में बोले।

बृजमोहन समझ गए कि इन तिलों से तेल नहीं निकले गा।अपने छोटे को इशारा कर घर को चले गए।

वर्षों बीत गए। वहां राधा और पिंकू के एक बेटी हुई। वह चार – पांच साल की हो गई थी। अब सुंदर बहू का मोह धीरे – धीरे राधा की सास से उतर रहा था। हररोज दोनों में घर के किसी न किसी कामकाज पर नोक – झोक होती ही रहती थी। उस दिन सास ने राधा को बहुत खरी – खोटी सुनाई थी,” तेरे मां – बाप ने तुझे रखा कहां था? खाना भी बनाना नहीं सिखाया। किसी भी काम की नहीं है डायन। मेरे बेटे को डोरे डाल कर अपना उल्लू सीधा कर गई बेईमान।” और भी न जाने क्या कुछ?

राधा अपनी बच्ची को उठा कर दुखी हो कर अपने पिता के यहां चली आई। सोचा मां – बाप माफ कर लेंगे। शाम के समय में जब वह अपने मायके पहुंची तो उसके पिता आंगन में बैठे थे। उससे पहले कि वह अपना दुख कहती। मोहन भैया ने आते ही उसे डांटना शुरू किया,
” क्यों आईं है यहां अब नालायक ? रह गई है कुछ कसर क्या?”
राधा रो रही थी। उसकी नन्ही सी मुन्नी उसके आंसू पोंछ रही थी और तोतली आवाज में बोल रही थी,” तुप तरो मम्मा! तुम तियुं डो डही हो? यह तुम्हे डांट रहे हैं। ये कौन है?”

मोहन भैया की ऊंची आवाज सुन कर घर के सब बाहर आ गए। पड़ोस के लोग भी बाहर निकल आए। राधा अपराधिनी की तरह नजरे झुकाए खड़ी थी।

“चुप भी कर अब मोहन। बस बोले ही जा रहा है। देखता नहीं कि कितने दिनों बाद बेटी आईं है?” चाची ने डांटते हुए कहा। और राधा को गले से लगा कर हालचाल पूछा।

दोनों को बतियते और रोते हुए उमा भाभी की आंखे भी भर आई। लोगों को बाहर देख कर राधा को दोनों मियां बीबी ने पुनः डांटना शुरू किया। डांटते – डांटते अंदर चले गए। सब लोग बाहर दात दे रहे थे। मोहन बिल्कुल ठीक बोल रहा है। इस कुलटा ने तो सारे गांव की नाक काट ली। उधर चाची ने सब को डांटा और भगा दिया।

अंदर भैया और भाभी आपस में मशविरा कर रहे हैं कि इसे रात को रखना कहां है? लोक लाज से बचने के लिए उसे बेटी के साथ नीचे वाले कमरे में रखने का निर्णय हुआ। सोचा धीरे -धीरे लोग भूल जाते हैं, तब सब ठीक होगा।

उस रात राधा को निचले कमरे में रखा गया। सुबह जब राधा की नन्ही बच्ची ममी – ममी चिलाने लगी तो सब निचले कमरे की ओर दौड़े। देखा वहां राधा थी ही नहीं।बच्ची को पूछा गया कि ममी कहां गई? पर उसे कुछ भी मालूम नहीं था। वह तो बस रो रही थी।

शालू रोता – रोता आया,” अरे पापा, पापा दीदी वहां चटान के पास पड़ी है। उसके मुंह से खून निकल रहा है।”
सब वहां भागे – भागे जाते हैं। पर राधा अब चली गई थी।

बच्ची ममी से चपटना चाह रही थी। उसे दूर ले जाया गया। सब रो रहे हैं। मोहन भैया भी फुट – फुट कर रो रहे हैं। शायद राधा ने रात को बच्ची को सुला कर उस पास वाली चटान से कूद कर अपनी जान दे दी थी। वह कुछ सहन नहीं कर पाई थी शायद। उसकी सहन शक्ति जबाव दे गई होगी। वहां सास की खींच – खींच और यहां उसे निचले कमरे में रखा जाना शायद रास नहीं आया। वह अंदर ही अंदर कुढ़ कर अपनी जान दे देती है।

उधर शहर से राधा के पति व ससुर घर पहुंचते हैं। उनसे राधा की सास ने कहानी उल्टी बता दी थी। पोस्ट मार्टम हुआ और लाश जाला दी गई। पुलिस केस दोहरा हो गया था। राधा के घर वालो ने मोहन भैया का केस किया और मोहन भैया ने घरेलू हिंसा का केस किया। दोनों परिवारों में आग लगी है। यहां पिंकू भी बहुत दुखी है।वह तो शायद दूसरी शादी करके संभल जाएगा पर बेचारी उस नन्ही सी बेटी की मां को कौन वापिस लाएगा? वह हर रोज मायूस होकर उस रास्ते को देखती रहती है, जहां से उसकी मां को जलाने के लिए ले जाया गया था।

घोषणा :- यह मेरी मौलिक और स्वरचित कहानी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — यह एक प्रेम कहानी है। इस कहानी में हेमराज ठाकुर जी ने भारतीय समाज की जात पात की रूढ़ भावना के चंगुल में जकड़े होने के उन कारणों पर भी प्रकाश डाला है, जिन के कारण आज की युवा पढ़ी लिखी पीढ़ी भी उसी छुआ छूत के जंजाल में फंसी पड़ी है। लेखक ने यह सिद्ध करने की कोशिश भी की है शायद कि आज़ादी के 74 सालों बाद भी भारतीय समाज जात पात की निकृष्ठ विचारणा से बाहर नहीं आ पाया है। इतना ही नहीं प्रेम के पाश में बंधे जोड़ो में यदि विजातीय प्रेम विवाह बच्चों के द्वारा किया जाता है तो उच्च वर्गीय समाज के अभिभावक अपनी सन्तान से नाता ही तोड़ देते हैं पर इस सामाजिक बुराई का विरोध नहीं कर पाते। चाहे उन्हे अपनी संतानों की जान ही क्यों न खोनी पड़े। सामाजिक नियमों और प्रतिष्ठाओं का इस सम्बन्ध में इतना प्रभाव है कि देश का कानून भी इसके आगे कुछ नहीं कर पाता। लेखक ने पात्रों के माध्यम से यह भी सिद्ध करने की कोशिश की है कि इस समस्या का मुख्य कारण वर्तमान पढ़े लिखे समाज के सामने जातिगत आरक्षण भी है शायद। संविधान में तो इस भेद भाव को मिटाने की बात की गई है और निम्न समझा जाने वाला समाज संविधान की इस दलील को पूर्ण रूप से लागू करने की मांग भी समाज से करता है। परन्तु आरक्षण छोड़ने को तैयार नहीं है। जबकि संविधान में आरक्षण का प्रावधान मात्र 10 साल तक प्रभावी रखने के निर्देश संविधान निर्माताओं ने दिए थे। इधर उच्च वर्गीय समाज को इस प्रथा से बाहर आने को कहा जाता है तो वह इसी जातिगत आरक्षण की बात डंके की चोट देकर करता है। एक छोड़ने को तैयार नहीं और दूसरा मानने को तैयार नहीं। इसी कारण नई और पढ़ी लिखी पीढ़ी में भी यह भावना सब कुछ जानते और समझते हुए भी निरंत बढ़ती ही जा रही है। लेखक का मानना है कि संसार में मात्र दो ही जातियां हैं, एक स्त्री और दूसरी पुरुष। जो प्रकृति ने सृष्टि संचालन के उद्देश्य से अपना सहयोग करने के लिए बनाई है। बाकी सब मानव मस्तिष्क की खुराफत है। अतः इस कहानी से हमे यह संदेश मिलता है कि भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए हमे भारत से जात पात के भेद भाव को जड़ से मिटाना होगा। पुनः वैदिक दर्प को स्थापित करना होगा।

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यह कहानी (दास्तान ए जात पात।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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छोटे अहंकार के कारण…।

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ϒ छोटे अहंकार के कारण…। ϒ

छोटे अहंकार के कारण…

एक बार रेलगाड़ी में लोग यात्रा कर रहे थे। एक व्यक्ति खड़ा हुआ और खिड़की खोल दी, थोड़ी ही देर में दूसरा यात्री उठा और उसने खिड़की बंद कर दी। पहले को उसका यह बंद करना नागवार गुज़रा और उठकर खिड़की पुनः खोल दी।

  • जानते तो बहुत है…। ….. जरूर पढ़े।

एक बंद करता दूसरा खोल देता। यह बंद और खोलने का नाटक शुरू हो गया। यात्रियों का मनोरंजन हो रहा था, लेकिन अंततः सभी तंग आ गये। फिर क्या, ‘टी टी को बुलाया गया,’ टी टी ने पूछा ‘महाशय ! यह क्या कर रहे हो ? क्यों बार-बार खोल – बंद कर रहे हो ?’ पहला यात्री बोला- ‘क्यों न खोलू, मई गर्मी से परेशान हूँ, खिड़की खुली ही रहनी चाहिए।’ टी टी ने दूसरे यात्री को कहा – ‘भाई ! आपको क्या आपत्ति है, खिड़की खुली रहे तो ?’ इस पर दूसरे यात्री ने कहा- ‘मुझे ठंड लग रही है, मुझे ठंड सहन नहीं होती। टी टी बेचारा परेशान, एक को गर्मी लग रही है तो दूसरे को ठंड।

Stop Living In The Past, Spend Time In Future.
“अतीत में रहना बंद करो, भविष्य में समय व्यतीत करें।”

टी टी यह सोचकर खिड़की के पास गया कि कोई बीच का रास्ता निकल आये। उसने देखा और मुस्करा दिया। खिड़की में शीशा था ही नहीं। वहा तो मात्र फ्रेम थी। वह बोला – ‘कैसी गर्मी या कैसी ठंडी ? यहाँ तो शीशा ही गायब है, आप दोनों तो मात्र फ्रेम को ही ऊपर नीचे कर रहे हो।’ मित्रों, वस्तुतः दोनों यात्री न तो गर्मी और न ही ठंडी से परेशान थे। वे परेशान थे तो मात्र अपने अभिमान से। वे अपने अंह पाेषण में लिप्त थे, गर्मी या ठंडी का अस्तित्व ही नहीं था।

  • हिंदी कहानी – निरंतर प्रयास जरूर पढ़े।

सीख – अधिकांश कलह मात्र इसलिए होते है, कि अहंकार को चोट पहुँचती है, और आदमी को सबसे ज्यादा आनंद दूसरे के अहंकार को चोट पहुँचाने में आता है। साथ ही सबसे ज्यादा क्रोध अपने अहंकार पर चोट लगने से होता है। जो दूसरों के अहंकार को चोट पहुँचाने में सफल होता है, वह मान लेता है कि उसने बहुत ही बड़ा गढ़ जीत लिया, वह यह मानकर चलता है कि दूसरों के स्वाभिमान की रेखा को काट पीट कर ही वह सम्मानित बन सकता है। किन्तु परिणाम अज्ञानता भरे शर्म से अधिक नहीं होता। अधिकांश लड़ाइयों के पीछे कारण एक छोटा सा अहम् ही होता है। ज्ञान-ध्यान, कर्मयोग व् धर्मयोग की साधना से अहम और वहम (अहंकार और भ्रम), से ऊपर उठ कर अर्हम को प्राप्त करो।

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In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought to life by. By doing this you Recognize hidden within the buraiya ensolar radiation and encourage good solar radiation to become themselves.

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अभी समय नहीं…।

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ϒ अभी समय नहीं…। ϒ

अभी समय नहीं…

एक बार कबीरदास जी परमात्मा का भजन करते हुए गली से निकल रहे थे। उनके आगे कुछ स्त्रियां जा रही थी। उनमे से एक स्री की शादी कहीं तय हुई होगी तो उसके ससुराल वालों ने शगुन में एक नथुनी भेजी थी। वह लड़की अपनी सहेलियों को बार-बार नथनी के बारे में बता रही थी कि नथनी ऐसी है वैसी है…। ये ख़ास उन्होंने मेरे लिए भेजी है… बार-बार बस नथनी की ही बात…।

उनके पीछे चल रहे कबीरदास जी के कान में सारी बातें पड़ रही थी।

तेजी से कदम बढ़ाते हुए कबीरदास जी उनके पास से निकले और कहा –
‘नथनी देनी यार ने,
तो चिंतन बारम्बार, और
नाक दीनी जिस करतार ने,
उनको तो दिया बिसार… ।

सोचो यदि नाक ही न होती तो नथनी कहाँ पहनती।’

यही जीवन में हम भी करते हैं। भौतिक वस्तुओं का ज्ञान तो हमे रहता है, परंतु जिस परमात्मा ने यह दुर्लभ मनुष्य देह दी और इस देह से सम्बंधित सारी वस्तुएं, सभी रिश्ते-नाते दिए, उसी को याद करने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। इसलिए सदा उन अनगिनत अमूल्य देन के लिए पारब्रह्मा परमात्मा के आभारी रहें जो उन्होंने हमें दी है।

मन को अचल-अडोल स्थिती मैं स्थित करने के लिए सर्वप्रथम अपने मन को फालतू विचारों से मुक्त करना होगा अर्थात: अपने मन से फालतू विचारों का कचरा हटाना होगा, तभी आप अपने मन के अंदर अच्छे विचारों को स्थित कर पाएंगे।

♥ – एक बात सदैव ही – याद रखें ….. समय का प्रबंधन वास्तव में जीवन का प्रबंधन है। यह दरअसल घटनाओं के क्रम को नियंत्रित करना है। समय का प्रबंधन का अर्थ है, इस बात पर नियंत्रण करना कि आप अगला कार्य कौन सा करेंगे, और आप हमेशा अपना कार्य चुनने के लिए स्वतंत्र होते हैं। महत्वपूर्ण और महत्वहीन के बीच विकल्प चुनने कि आपकी काबिलियत, जिंदगी और काम-धंधे में आपकी सफलता तय करने वाली अहम कुंजी हैं। असरदार और उत्पादक लोग खुद को इस बात के लिए अनुशासित कर लेते हैं कि वे सबसे महत्वपूर्ण कार्य से ही दिन कि शुरुआत करें।

“किसी महत्वपूर्ण कार्य को शुरू और पूरा करने के बारे में सोचने भर से ही आप प्रेरित हो जाते हैं। इससे आपको टालमटोल छोड़ने में मदद मिलती हैं।”

सच तो यह हैं कि किसी महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए भी अक्सर उतने ही समय की जरूरत होती हैं, जितनी कि महत्वहीन कार्य को करने के लिए। फर्क यह है कि महत्वपूर्ण कार्य पूरा करने के बाद आपको गर्व और संतुष्टि का जबरदस्त एहसास होता हैं। बहरहाल जब आप उतना ही समय और ऊर्जा खर्च करके कोई मूल्यहीन या महत्वहीन कार्य पूरा करते हैं, तो आपको बहुत कम संतुष्टि मिलती हैं या जरा भी नही मिलती। उत्पादक लोग(productive people) या सफल लोग – महत्वपूर्ण कार्य को ही सबसे पहले करते हैं, भले ही वह कठिन हो, चाहे वह जो भी हो। नतीजा यह होता हैं – कि वे आम आदमी से कहीं ज्यादा हासिल करते हैं और ज्यादा खुश भी रहते हैं।

“कार्य करने का ये तरीका आपको भी अपनाना चाहिए।”

महत्वपूर्ण कार्य का जर्नल(नाेटबुक या डायरी) रखें – और उसमें रात में सोते समय ही अगले दिन के कार्य का डिटेल्स लिख ले – सबसे पहले अपनी डायरी में तीन कालम बना ले, पहले वाले कालम में हेडिंग्स डाले – अत्याधिक महत्वपूर्ण कार्य, दूसरे वाले कालम में हेडिंग्स डाले – महत्वपूर्ण कार्य, और तीसरे वाले कालम में हेडिंग्स डाले – कम महत्वपूर्ण कार्य।

सीख – क्योंकि प्रभु स्मृति और निराभिमानी स्थिति ही उन चीजों या देन को अविनाशी और सदैव खूबसूरत बनाये रख सकती है। इसलिए मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।

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मेरी अपनी है मंजिले।

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ϒ मेरी अपनी है मंजिले। ϒ

प्यारे दोस्तों,

एक घर के पास काफी दिन से एक बड़ी इमारत का काम चल रहा था। वहा रोज मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चें एक – दूसरे की शर्ट पकड़कर रेल – रेल का खेल खेलते थे।

रोज कोई बच्चा इंजन बनता और बाकी बच्चे डिब्बे बनते थे। इंजन और डिब्बे वाले बच्चे रोज बदल जाते, पर केवल चड्ढी पहना एक छोटा बच्चा हाथ में रखा कपड़ा घुमाते हुए रोज गार्ड बनता था। एक दिन उन बच्चो को खेलते हुए रोज देखने वाले एक व्यक्ति ने काैतुहल से गार्ड बनने वाले बच्चें को पास बुलाकर पूछा … बच्चें तुम रोज गार्ड बनते हो। तुम्हे कभी इंजन कभी डिब्बा बनने की इच्छा नहीं होती ?

इस पर वो बच्चा बोला… बाबू जी मेरे पास पहनने के लिए कोई शर्ट नहीं है। तो मेरे पीछे वाले बच्चे मुझे कैसे पकड़ेंगे … और मेरे पीछे कौन खड़ा रहेगा …? इसलिए मै रोज गार्ड बनकर ही खेल में हिस्सा लेता हूँ। ये बोलते समय मुझे उसकी आँखों में पानी दिखाई दिया।

वो बच्चा जीवन का एक बड़ा पाठ पढ़ा गया…। अपना जीवन कभी भी परिपूर्ण नहीं होता। उसमे कोई न कोई कमी जरूर रहेगी …। वो बच्चा माँ – बाप से गुस्सा होकर रोते हुए बैठ सकता था। परन्तु ऐसा न करते हुए उसने परिस्थितियों का समाधान ढूंढा।

हम कितना रोते हैं ? कभी अपने सांवले रंग के लिए, कभी छोटे कद के लिए, कभी पैसे के लिए, कभी पड़ोसी की बड़ी कार, कभी पड़ोसन के गले का हार, कभी अपने कम marks, कभी English, कभी Personality, कभी नौकरी की मार तो कभी धंधे में मार …। हमे इससे बाहर आना पड़ता हैं … ये जीवन है… इसे ऐसे ही जीना पड़ता हैं।

चील की ऊँची उड़ान देखकर चिड़िया कभी depression में नहीं आती, वो अपने आस्तित्व में मस्त रहती है। मगर इंसान – इंसान की ऊँची उड़ान देखकर बहुत जल्द चिंता में आ जाता है। तुलना से बचें और खुश रहें। न किसी से ईर्ष्या, ना किसी से कोई होड़, मेरी अपनी है मंजिले, मेरी अपनी दौड़ …।

सीख – परिस्थितियां कभी समस्या नहीं बनती, समस्या इसलिए बनती है, क्योंकि हमें उन परिस्थितियों से लड़ना नहीं आता। यह सृष्टि एक रंगमंच है और सभी मनुष्य आत्मा Actor व Actress है सभी को अपना- अपना पार्ट पूरा करना चाहिए। हर इंसान के अंदर असीमित शक्तियां निहित है – बस जरूरत है इन शक्तियों को जागृत कर – उसे सही तरीके से Use करना। जिससे जीवन में सरलता पूर्वक सुख व शांति मिले।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAJ51

 

 

 

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दयालु लकड़हारा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kind Woodcutter | दयालु लकड़हारा।

She started shouting and hitting Ramu's breasts. Due to his voice more birds also came. Everyone attacked Ramu.प्यारे दोस्तो – बहुत समय पहले किशनपुर गाँव में रामू नाम का एक गरीब लकड़हारा रहता था। वह दूसराे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता। जीवाें के प्रति उसके मन में बहुत दया थी। एक दिन वह जंगल से लकड़ी इकट्ठी करने के बाद थक गया ताे थाेड़ी देर सुस्ताने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गया। तभी उसे सामने के पेड़ से पक्षियों के बच्चाें के ज़ाेर-ज़ाेर से चीं-चीं करने की आवाज़ सुनाई दी।

उसने सामने देखा ताे डर गया। एक सांप घाेसले में बैठे चिड़िया के बच्चाें की तरफ बढ़ रहा था। बच्चे उसी के डर से चिल्ला रहे थे। रामू उन्हें बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ने लगा। सांप लकड़हारे के डर से नीचे उतरने लगा। उसी दाैरान चिड़िया भी लाैट आई। उसने जब रामू काे पेड़ पर देखा ताे समझा कि उसने बच्चाें काे मार दिया।

वह रामू काे चाेच मार-मारकर चिल्लाने लगी। उसकी आवाज़ से और चिड़िया भी आ गईं। सभी ने रामू पर हमला कर दिया। बेचारा रामू किसी तरह पेड़ से नीचे उतरा। चिड़िया जब घाेसले में गई ताे उसके बच्चे सुरक्षित बैठे थे। बच्चाें ने चिड़िया काे सारी बात बताई ताे उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।

वह रामू से माफी मांगना चाहती थी और उसका शुक्रिया अदा करना चाहती थी। उसे कुछ दिन पहले दाना ढूंढ़ते हुए एक कीमती हीरा मिला था। उसने हीरे काे अपने घाेसले में लाकर रख लिया था। चिड़िया ने वह हीरा रामू के आगे डाल दिया और एक डाली पर बैठकर अपनी भाषा में धन्यवाद करने लगी। रामू ने हीरा उठा लिया और चिड़िया की तरफ हाथ उठाकर उसका धन्यवाद किया और वहां से चल दिया। तभी कई चिड़िया आईं और उसके ऊपर उड़कर साथ चलने लगीं मानाे वे उसका आभार करते हुए विदा करने आई हाें।

सीख – किसी भी जीव पर किये गये उपकार का फल सदैव ही सकारात्मक नतीजे के रूप में return मिलता हैं।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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समोसे की दुकान।

Kmsraj51 की कलम से…..

Samosa Shop | समोसे की दुकान।

 

Now you tell me whose time and talent is being wasted?" The manager gave Rs 20 to the samosa seller for 2 samosas and walked away without saying anything.दोस्तों – सदैव ही अपने आत्मा की आवाज काे सुने। जाे कर्म करने से आपकाे अंदर से ख़ुशी(आनंद) महसूस हाे वही कर्म आपके लिए Perfect हैं।

अर्थात – यदि आपकाे आर्ट करना अच्छा लगता है, ताे इसे ही अपना Career बना लें। वह काेई भी कार्य हाे सकता है – जैसे तैराकी, कढ़ाई, बुनाई, सिलाई, व्यवसायी, खाना बनाना, प्रेरक वक्ता बनना, अध्यापक, अभिनेता, किसी भी प्रकार के खेल कूद, नृत्य इत्यादि।

 

एक बडी कंपनी के गेट के सामने एक प्रसिद्ध समोसे की दुकान थी। लंच टाइम मे अक्सर कंपनी के कर्मचारी वहा आकर समोसे खाया करते थे। एक दिन कंपनी के एक मैनेजर समोसे खाते-खाते समोसे वाले से मजाक के मूड मे आ गये।

मैनेजर साहब ने समोसे वाले से कहा, “यार गोपाल, तुम्हारी दुकान तुमने बहुत अच्छे से मेंटेन की है। लेकीन क्या तुम्हे नही लगता की तुम अपना समय और टॅलेंट समोसे बेचकर बर्बाद कर रहे हो ? सोचो अगर तुम मेरी तरह इस कंपनी मे काम कर रहे होते तो आज कहा होते ~ हो सकता है शायद तुम भी आज मैनेजर होते मेरी तरह।”

इस बात पर समोसे वाले गोपाल ने बडा सोचा, और बोला – ” सर ये मेरा काम अापके काम से कही बेहतर है। 10 साल(10 Year) पहले जब मै टोकरी मे समोसे बेचता था तभी आपकी जाॅब लगी थी। तब मै महीना हजार रुपये कमाता था और आपकी पगार थी 10 हजार।

इन 10 सालो मे हम दोनो ने खूब मेहनत की – आप सुपरवाइजर से मैनेजर बन गये, और मै टोकरी से इस प्रसिद्ध दुकान तक पहुच गया। आज आप महीना 40,000 रुपये कमाते है, और मै महीना 2,00,000 रुपये।

लेकीन इस बात के लिए मै मेरे काम को आपके काम से बेहतर नही कह रहा हूँ। ये तो मै बच्चो के कारण कह रहा हूँ।

जरा सोचिए सर मैने तो बहुत कम कमाइ पर धंधा शुरू किया था, मगर मेरे बेटे को यह सब नही झेलना पडेगा। मेरी दुकान मेरे बेटे को मिलेगी। मैने जिंदगी मे जो मेहनत की है, वो उसका लाभ मेरे बच्चे उठाएंगे।

जबकी आपकी जिंदगी भर की मेहनत का लाभ आपके मालिक के बच्चे उठाएंगे ….. अब आपके बेटे को आप Direct अपनी पोस्ट पर तो नही बिठा सकते ना। उसे भी आपकी ही तरह जीरो से शुरूआत करनी पडेगी, और अपने कार्यकाल के अंत मे वही पहुच जाएगा जहा अभी आप हो।

जबकी मेरा बेटा बिजनेस को यहा से और आगे ले जाएगा, और अपने कार्यकाल मे हम सबसे बहुत आगे निकल जाएगा। अब आप ही बताइये की किसका समय और टॅलेंट बर्बाद हो रहा है ?” मैनेजर साहब ने समोसेवाले को 2 समोसे के 20 रुपये दिये और बिना कुछ बोले वहा से खिसक लिये।

सीख – सदैव याद रखें – जाे कर्म करने से आपकाे अंदर से ख़ुशी(आनंद) महसूस हाे वही कर्म आपके लिए Perfect हैं।

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प्रभु ने मेरी लाज रख ली।

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God Saved My Honour | प्रभु ने मेरी लाज रख ली।

It was not time for the mantra to end when the lifeless child's body came to life and he started moving his arms and legs.‘संत कंवर राम’ की प्रभु भक्ति….. सिंध प्रांत में ‘कंवर राम’ नामक एक प्रसिद्ध संत हो गए हैं। वे गांव-गांव जाकर भगवद्भजन के माध्यम से भक्ति का प्रचार करते और लोगों को अध्यात्म, नैतिक गुणों तथा सांप्रदायिक सद्भाव की सीख देते। एक बार उनका मुकाम डहरकी नामक एक गांव में था।

एक दिन एक गरीब विधवा का एकमात्र शिशु ईश्वर को प्यारा हो गया और वह उसके वियोग में जोर-जोर से विलाप करने लगी। उसका शोक एक वृद्ध पुरुष से देखा न गया और उसने महिला से कहा : “बेटी, वृथा शोक न कर यहां संत कंवर राम नामक एक महात्मा पधारे हैं। उनका आज रात्रि में मंदिर में भजन-कीर्तन है, तू संत से उसके चिरायु होने का आशीर्वाद मांगना। उनकी कृपा से तुम्हारा शिशु जीवित हो सकता है, मगर इसके मृतक होने की बात उनसे छिपाए रखना।”

महिला ने सुना, तो उसके मन में आशा जागी और अपने मृत बालक को चादर में लपेटकर वह रात्रि को मंदिर पहुंच गई और शिशु को कंवर राम जी के चरणों पर रखकर कहा : “भगत साहिब मैं अपने इस नन्हे शिशु के चिरजीवन की कामना लिए आपके पास आई हूं। कृपया इसे भागवत्राम का मंत्र देकर मुझ अबला को कृतार्थ करें।”

महिला की बातों पर विश्वास करके संत जी ने शिशु को भागवत्राम का श्रवण कराया। मंत्र के समाप्त होने की देर थी कि बेजान शिशु के शरीर में जान आ गई और वह हाथ-पैर हिलाने लगा। यह चमत्कार देखते ही महिला संत जी के चरणों पर गिर पड़ी और उसने सारी बात बताकर असत्य बोलने के लिए क्षमा मांगी।

किंतु कंवर रामजी को बड़ा दुख हुआ उन्होंने महिला से कहा : “आपको ऐसा नहीं करना था, हमें प्रभु की करनी को’ होनी मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए, इसी में हमारी भलाई है। यह तो अच्छा ही हुआ कि प्रभु ने मेरी लाज रख ली और मुझे दुविधा से बचा लिया।”

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तांबे का सिक्का।

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Copper Coin | तांबे का सिक्का।

The king felt that the beggar was very poor, so he gave a silver coin to the beggar.एक राजा का जन्मदिन था। सुबह जब वह घूमने निकला, तो उसने तय किया कि वह रास्ते मे मिलने वाले पहले व्यक्ति को पूरी तरह खुश व संतुष्ट करेगा। उसे एक भिखारी मिला। भिखारी ने राजा से भीख मांगी, तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया।

सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी नाली में हाथ डाल तांबे का सिक्का ढूंढ़ने लगा। राजा ने उसे बुला कर दूसरा तांबे का सिक्का दिया। भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढ़ने लगा।

राजा को लगा की भिखारी बहुत गरीब है, उसने भिखारी को चांदी का एक सिक्का दिया। भिखारी राजा की जय जयकार करता फिर नाली में सिक्का ढूंढ़ने लगा। राजा ने अब भिखारी को एक सोने का सिक्का दिया।

भिखारी खुशी से झूम उठा और वापस भाग कर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा। राजा को बहुत खराब लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है।

उसने भिखारी को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूं, अब तो खुश व संतुष्ट हो? भिखारी बोला, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूंगा जब नाली में गिरा तांबे का सिक्का मुझे मिल जायेगा।

हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है।

हमें भगवान(GOD) ने आध्यात्मिकता रूपी अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रूपी नाली में तांबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे है। परमात्मा को याद कियें बिन कैसे हो, बेड़ा तेरा पार जी। शवास हाथ से जा रहे हैं, कीमत बेशुमार जी।

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जीतने की प्रबल इच्छा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Strong Desire to Win | जीतने की प्रबल इच्छा।

In any case, we all will have to win from the enemies, because there are no boats and ships to go back.यह बात बहुत समय पहले कि है, एक महान शुरवीर योद्धा अपने दुश्मन राज्य से जब युद्ध करने जा रहा था, ताे उसने देखा की उसके सैनिकों में दुश्मनाें से युद्ध करने काे लेकर भय हैं। भय का मुख्य कारण था, दुश्मन राज्य के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी।

युद्ध करने के लिए सागर के पार जाना था। वह महान शुरवीर योद्धा अपने सभी सैनिकों के साथ बड़े समुद्री जहाजाें व बड़े नावाें से सागर के किनारे पहुँचने पर सारे जहाजाें और नावाें काे जला दिया।

फिर उस महान शुरवीर योद्धा ने अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाते हुए बाेला अगर आप सभी काे वापस घर जाना है, ताे हर हाल में हम सभी काे दुश्मनाें से जीतना ही हाेगा, क्योंकी वापस जाने के लिए नाव व जहाज अब नहीं रहे। अगर हम सभी दुश्मनाें से युद्ध ना जीत पाए ताे यही मारे जायेगे। इसलिए हर हाल में हम सभी काे दुश्मनाें से युद्ध जीतना ही हैं।

साेचियें मित्रों क्या हुआँ हाेगा।

वह महान शुरवीर योद्धा, युद्ध जीत गया था। सभी सैनिकों काे आंतरिक प्रबल इच्छा शक्ति का एहसास हाे गया था।

सीख: अगर किसी भी कार्य काे करने की प्रबल आंतरिक दृढ़ इच्छा हाे, ताे सफलता जरूर मिलेगीं।

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