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Quotes

कबीर दास जी के दोहे।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT-Oct-14-1

Sant-Kabir-kmsraj51
कबीर दास जी के दोहे।

कबीर दास जी के दोहे।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ : जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.

—

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा.

—

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे.

—

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है. यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

—

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ : मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है. अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु  आने पर ही लगेगा !

—

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ : कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती. कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या  फेरो.

—

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ : सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए. तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का.

—

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थ : यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह  दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत.

—

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ : जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते  हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है. लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते.

—

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है.

—

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ : न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है. जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है.

—

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

अर्थ : जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है.

—

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ : इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं
लगता.

—

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर.

अर्थ : इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो !

—

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए, मरम न कोउ जाना।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है. इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।

—

 

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन.                                                                                             

कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन.

अर्थ : कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया. कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है.

—

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई.                                                                                                         

बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए. बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है. इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।

—

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई.                                                                                             

जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो  गुण की कीमत होती है. पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है.

—

कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस.                                                                                                     
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस. 

अर्थ : कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है. मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले.

—

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात.                                                                                                

एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात.

अर्थ : कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है।जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी.

—

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास.                                                                                               

सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास.

अर्थ : यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं. सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है. —

—

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।                                                                                              

जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

अर्थ : इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा. जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा.

—

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद.                                                                                                

खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है.

—

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस.                                                                                                      

भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस.

अर्थ : कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न  मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता.

—

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत                                                                                                     

चन्दन भुवंगा बैठिया,  तऊ सीतलता न तजंत।

अर्थ : सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता. चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता.

—

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ.                                                                                          

 जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है.

—

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई.                                                                                        

सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ.

अर्थ : शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं.

—

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय.                                                                                                        

सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए. सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा.

—

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर.                                                                                       

आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर .

अर्थ : कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन. शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं.

—

मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई.                                                                                                

पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई.

अर्थ : मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा.

– संत कबीर दास जी की जीवनी – 

कबीर एक ऐसी शख्शियत जिसने कभी शास्त्र नही पढा फिर भी ज्ञानियों की श्रेणीं में सर्वोपरी। कबीर, एक ऐसा नाम जिसे फकीर भी कह सकते हैं और समाज सुधारक भी ।

मित्रों, कबीर भले ही छोटा सा एक नाम हो पर ये भारत की वो आत्मा है जिसने रूढियों और कर्मकाडों से मुक्त भारत की रचना की है। कबीर वो पहचान है जिन्होने, जाति-वर्ग की दिवार को गिराकर एक अद्भुत संसार की कल्पना की।

मानवतावादी व्यवहारिक धर्म को बढावा देने वाले कबीर दास जी का इस दुनिया में प्रवेश भी अदभुत प्रसंग के साथ हुआ। माना जाता है कि उनका जन्म  सन् 1398 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन वाराणसी के निकट लहराता नामक स्थान पर हुआ था । उस दिन नीमा नीरू संग ब्याह कर डोली में बनारस जा रही थीं, बनारस के पास एक सरोवर पर कुछ विश्राम के लिये वो लोग रुके थे। अचानक नीमा को किसी बच्चे के रोने की आवाज आई वो आवाज की दिशा में आगे बढी। नीमा ने सरोवर में देखा कि एक बालक कमल पुष्प में लिपटा हुआ रो रहा है। निमा ने जैसे ही बच्चा गोद में लिया वो चुप हो गया। नीरू ने उसे साथ घर ले चलने को कहा किन्तु नीमा के मन में ये प्रश्न उठा कि परिजनों को क्या जवाब देंगे। परन्तु बच्चे के स्पर्श से धर्म, अर्थात कर्तव्य बोध जीता और बच्चे पर गहराया संकट टल गया। बच्चा बकरी का दूध पी कर बङा हुआ। छः माह का समय बीतने के बाद बच्चे का नामकरण संस्कार हुआ। नीरू ने बच्चे का नाम कबीर रखा किन्तु कई लोगों को इस नाम पर एतराज था क्योंकि उनका कहना था कि, कबीर का मतलब होता है महान तो एक जुलाहे का बेटा महान कैसे हो सकता है? नीरू पर इसका कोई असर न हुआ और बच्चे का नाम कबीर ही रहने दिया। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि अनजाने में ही सही बचपन में दिया नाम बालक के बङे होने पर सार्थक हो गया। बच्चे की किलकारियाँ नीरू और नीमा के मन को मोह लेतीं। अभावों के बावजूद नीरू और नीमा बहुत खुशी-खुशी जीवन यापन करने लगे।

कबीर को बचपन से ही साधु संगति बहुत प्रिय थी। कपङा बुनने का पैतृक व्यवसाय वो आजीवन करते रहे। बाह्य आडम्बरों के विरोधी कबीर निराकार ब्रह्म की उपासना पर जोर देते हैं। बाल्यकाल से ही कबीर के चमत्कारिक व्यक्तित्व की आभा हर तरफ फैलने लगी थी। कहते हैं- उनके बालपन में काशी में एकबार जलन रोग फैल गया था। उन्होने रास्ते से गुजर रही बुढी महिला की देह पर धूल डालकर उसकी जलन दूर कर दी थी।

कबीर का बचपन बहुत सी जङताओं एवं रूढीयों से जूझते हुए बीत रहा था। उस दौरान ये सोच प्रबल थी कि इंसान अमीर है तो अच्छा है। बङे रसूख वाला है तो बेहतर है। कोई गरीब है तो उसे इंसान ही न माना जाये। आदमी और आदमी के बीच फर्क साफ नजर आता था। कानून और धर्म की आङ में रसूखों द्वारा गरीबों एवं निम्नजाती के लोगों का शोषण होता था। वे सदैव सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध थे और इसे कैसे दूर किया जाये इसी विचार में रहते थे।

एक बार किसी ने बताया कि संत रामानंद स्वामी ने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लङाई छेङ रखी है। कबीर उनसे मिलने निकल पङे किन्तु उनके आश्रम पहुँचकर पता चला कि वे मुसलमानों से नही मिलते। कबीर ने हार नही मानी और पंचगंगा घाट पर रात के अंतिम पहर पर पहुँच गये और सीढी पर लेट गये। उन्हे पता था कि संत रामानंद प्रातः गंगा स्नान को आते हैं। प्रातः जब स्वामी जी जैसे ही स्नान के लिये सीढी उतर रहे थे उनका पैर कबीर के सीने से टकरा गया। राम-राम कहकर स्वामी जी अपना पैर पीछे खींच लिये तब कबीर खङे होकर उन्हे प्रणाम किये। संत ने पूछा आप कौन? कबीर ने उत्तर दिया आपका शिष्य कबीर। संत ने पुनः प्रश्न किया कि मैने कब शिष्य बनाया? कबीर ने विनम्रता से उत्तर दिया कि अभी-अभी जब आपने राम-राम कहा मैने उसे अपना गुरुमंत्र बना लिया। संत रामदास कबीर की विनम्रता से बहुत प्रभावित हुए और उन्हे अपना शिष्य बना लिये। कबीर को स्वामी जी ने सभी संस्कारों का बोध कराया और ज्ञान की गंगा में डुबकी लगवा दी।

कबीर पर गुरू का रंग इस तरह चढा कि उन्होने गुरू के सम्मान में कहा है,

सब धरती कागज करू, लेखनी सब वनराज।
सात समुंद्र की मसि करु, गुरु गुंण लिखा न जाए।।
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।

ये कहना अतिश्योक्ति नही है कि जीवन में गुरू के महत्व का वर्णन कबीर दास जी ने अपने दोहों में पूरी आत्मियता से किया है। कबीर मुसलमान होते हुए भी कभी मांस को हाँथ नही लगाया । कबीर जाँति-पाँति और ऊँच-नीच के बंधनो से परे फक्कङ, अलमस्त और क्रांतिदर्शी थे। उन्होने रमता जोगी और बहता पानी की कल्पना को साकार किया।
कबीर का व्यक्तित्व अनुकरणीय है। वे हर तरह की कुरीतियों का विरोध करते हैं। वे साधु-संतो और सूफी-फकीरों की संगत तो करते हैं लेकिन धर्म के ठेकेदारों से दूर रहते हैं। उनका कहना है कि-

हिंदू बरत एकादशी साधे दूध सिंघाङा सेती।
अन्न को त्यागे मन को न हटके पारण करे सगौती।।
दिन को रोजा रहत है, राति हनत है गाय।
यहां खून वै वंदगी, क्यों कर खुशी खोदाय।।

जीव हिंसा न करने और मांसाहार के पीछे कबीर का तर्क बहुत महत्वपूर्ण है। वे मानते हैं कि दया, हिंसा और प्रेम का मार्ग एक है। यदि हम किसी भी तरह की तृष्णां और लालसा पूरी करने के लिये हिंसा करेंगे तो, घृणां और हिंसा का ही जन्म होगा। बेजुबान जानवर के प्रति या मानव का शोषण करने वाले व्यक्ति कबीर के लिये सदैव निंदनीय थे।

कबीर सांसारिक जिम्मेवारियों से कभी दूर नही हुए। उनकी पत्नी का नाम लोई था, पुत्र कमाल और पुत्री कमाली। वे पारिवारिक रिश्तों को भी भलीभाँति निभाए। जीवन-यापन हेतु ताउम्र अपना पैतृक कार्य अर्थात जुलाहे का काम करते रहे।

कबीर घुमक्ङ संत थे अतः उनकी भाषा सधुक्कङी कहलाती है। कबीर की वांणी बहुरंगी है। कबीर ने किसी ग्रन्थ की रचना नही की। अपने को कवि घोषित करना उनका उद्देश्य भी न था। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों का संकलन किया जो ‘बीजक’ नाम से जाना जाता है। इस ग्रन्थ के तीन भाग हैं, ‘साखी’, ‘सबद’ और ‘रमैनी’। कबीर के उपदेशों में जीवन की दार्शनिकता की झलक दिखती है। गुरू-महिमा, ईश्वर महिमा, सतसंग महिमा और माया का फेर आदि का सुन्दर वर्णन मिलता है। उनके काव्य में यमक, उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकारों का सुन्दर समावेश दिखता है। भाषा में सभी आवश्यक सूत्र होने के कारण हजारी प्रसाद दिव्वेदी कबीर को “भाषा का डिक्टेटर” कहते हैं। कबीर का मूल मंत्र था,

“मैं कहता आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखिन”।

कबीर की साखियों में सच्चे गुरू का ज्ञान मिलता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि कबीर के काव्य का सर्वाधिक महत्व धार्मिक एवं सामाजिक एकता और भक्ती का संदेश देने में है।

कबीर दास जी का अवसान भी जन्म की तरह रहस्यवादी है। आजीवन काशी में रहने के बावजूद अन्त समय सन् 1518 के करीब मगहर चले गये थे क्योंकि वे कुछ भ्रान्तियों को दूर करना चाहते थे। काशी के लिये कहा जाता था कि यहाँ पर मरने से स्वर्ग मिलता है तथा मगहर में मृत्यु पर नरक। उनकी मृत्यु के पश्चात हिन्दु अपने धर्म के अनुसार उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे और मुसलमान अपने धर्मानुसार विवाद की स्थिती में एक अजीब घटना घटी उनके पार्थिव शरीर पर से चादर हट गई और वहाँ कुछ फूल पङे थे जिसे दोनों समुदायों ने आपस में बाँट लिया। कबीर की अहमियत और उनके महत्व को जायसी ने अपनी रचना में बहुत ही आतमियता से परिलाक्षित किया है।

ना नारद तब रोई पुकारा एक जुलाहे सौ मैं हारा।
प्रेम तन्तु नित ताना तनाई, जप तप साधि सैकरा भराई।।

 

मित्रों, ये कहना अतिश्योक्ति न होगी की कबीर विचित्र नहीं हैं सामान्य हैं किन्तु इसी साघारणपन में अति विशिष्ट हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व कोई नही है।

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भविष्य के लिए।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMY-KMSRAJ51-N

भविष्य के लिए। 

एक परिवर्तन की चाह जैसे डालियां अधिक प्रौढ़ हो गयी हों

वह धीरे से सर झुकाता फिर उठा लेता था

जैसे अभी बहुत अधिक भार ले सकता है

वह एक नयी दिशा तलाशने लगा था

जहां रुचिकर काम और अच्छी तनख्वाह हो,

इतने अधिक सुदृढ़ आधार वाला काम

कि कम से कम पांच वर्षों तक दूसरी ओर झांकना न पड़े

अपने लिए अत्यधिक चिंता कर रहा था वो

कल बच्चे होंगे और परिवार बूढ़ा हो चला होगा

अभी एक शक्ति है कि किसी भी काम को वो सीख ले

नये काम को भी पुराने की तरह कर सकता है वो

इस बार जो काम मिलेगा उसे

उसी पर भविष्य का आधार होगा

पुरानी जगह बस समय कटता रहा

सिर्फ लोभ था अत्यधिक अनुभव पाने का

अब लोभ है अपना भविष्य संवारने का।

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आपका सबका प्रिय दोस्त,

Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor, Founder & CEO
of,,  http://kmsraj51.com/

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए हिम्मत और उमंग-उत्साह बहुत जरूरी है।

जहाँ उमंग-उत्साह नहीं होता वहाँ थकावट होती है और थका हुआ कभी सफल नहीं होता।

 ~KMSRAJ51

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सहेजें आवाज की शक्ति को।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ सहेजें आवाज की शक्ति को। ϒ

  • किसी भी बात को कम शब्दों में और सारे तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया जाता है तो उसे अच्छा माना जाता है।
  • हमेशा लिखने का ढंग अपना निजी होना चाहिए न कि नकल किया हुआ।
  • इस तरह से सम्भव है कि किसी नयी  भाषा का जन्म हो जो तुम्हारे मन को तरंगित कर दे और निश्चित रूप से वह इतनी सरल हो कि आसानी से समझ में आ जाए।
  • साथ-साथ उस भाषा में अच्छी लय – ताल  हो जो एक वेग के साथ हमसे जुड़ जाए ताकि उसे बिना पढ़े या सुने, हम रह नहीं पायें।
  • उम्मीद है कि इस दिशा में तुम पर्याप्त परिश्रम करोगी/करोगे।
  • फूल कभी भी परेशान नहीं होते कि उन्हें कांटों के आस-पास खिलना होगा बल्कि स्वयं में और कांटों में फर्क दिखलाकर वे खुशबू बिखेरते दूर चले जाते हैं।
  • इसलिए जो अच्छे काम हैं वही तुम्हें करना चाहिए।
  • यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि दूसरे कुछ लोग बुरे काम कर रहे हैं, या कुछ भी बुरा सोच रहे हैं वह तुम्हारे बारे में है। फिर दूसरों का मस्तिष्क या सोच तुम्हारें वश में भी तो नहीं है।
  • सारी चीजें पूरी होने में समय लेती हैं। बर्फीले पहाड़ों के थोड़े से ही हिस्से गर्मी में पिघल पाते हैं, जब तक वे पूरे पिघले, उसके पहले ही सर्दियां आ जाती हैं और वे पूर्ववत बने रहते हैं।
  • इसी तरह से मुसीबतें हमें पूरी तरह से निगल जाएं, उससे पहले ही उनसे बचाव किया जा सकता है।
  • इसलिए गलतियां करने के बाद भी संभलने के जो अवसर तुम्हें मिलते हैं उनमें संभल जाओ।
  • इस जिंदगी का यही नियम है, जहां बाधाएं हैं, उनसे बचाव के उपाय भी हैं।
  • अगर एक नदी अपने तट को रुका हुआ देखती रहती, तो खुद क्या भी रुक नहीं जाती?
  • यह हवा तो बिना थके परिश्रम करती रहती है।
  • अगर सभी अंधकार का ही अनुशरण करते, तो प्रकाश कौन फैलाता?
  • इसलिए वैसी चीजों की तरफ मत देखो जिनमें स्थिरता आ गयी है और जो जीवन में निराशा का संचार करती हैं।
  • तुम्हारे मन को छूने के लिए असीम चीजें हैं। अपनी झोली को इतना अधिक फैलाओ कि सब कुछ समा जाने के बाद भी खाली बच जाए, इसका कोई न कोई कोना।
  • फसल बोने के बाद भी डर लगा रहता है कि कहीं उसके अंकुरित होते छोटे-छोटे पौधों को चिडिय़ा खा नहीं जाएं या फसल के दानों को कीड़े चट न कर जाएं या रातों रात चोर इसे चोरी करके न ले जाएं। निरंतर प्रति दिन की सुरक्षा के बाद हमें हासिल होता है अन्न।
  • अतः हमारे ज्ञान को भी इसी तरह से संभाल कर रखना पड़ता है किसी कवच जैसी सुरक्षात्मक व्यवस्था से। जैसा कि हर घड़ी के ऊपर एक कांच लगा होता है।
  • हम हर अच्छी या बुरी चीज को देख सकते हैं। लेकिन सभी में हमारे दिमाग को लिप्त नहीं होने देना है। केवल अपने काम से मतलब रखने वाली जानकारियों को ही गहरी याददाश्त में रखना है अन्य को नहीं।
  • इस तरह का हमारा संयम ही हमारी सोच में आने वाली विकृतियों से हमें बचाए रखता है।
  • ये आंखें सचमुच में अंधी हैं। बिना प्रकाश के दो डग भी आगे नहीं बढ़ सकती। इन्हें प्रकाश चाहिए, अन्यथा बेकार। वैसे इतने सारे उपलब्ध प्रकाश का थोड़ा सा ही अंश ये लेती हैं बाकी इनके काम का नहीं।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

* क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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गहराई से सोचना।

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ϒ गहराई से सोचना। ϒ

छोटे-छोटे रास्ते गांव की तरफ ले जाते हैं और लंबे रास्ते शहरों की तरफ। गांव बेहद छोटा लगता है, ऐसा महसूस होता है, जैसे बहुत कम होगी यह विभिन्नता। लेकिन ऐसा दूर से देखने से लगता है, जबकि ऐसा होता नहीं।  यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी हवाई जहाज से हम नीचे की ओर देखे तो सिर्फ धरती ही धरती नजर आती है लेकिन स्च्चाई  में होता है बहुत कुछ। गांव के लोग भी अपने सीमित साधनों में तरह के तरह काम करते हैं, जैसे कपड़े बुनना, मिट्टी के सामान तैयार करना, फसल उगाना, शहद तैयार करना, बांस की कलाकृतियां  तैयार करना आदि। धीरे-धीरे ये छोटे-छोटे साधन ही कोई बड़ा आकार ले लेते हैं, जैसे छोटे-छोटे गांव ही शहर का और गांव के लोग ही बाद में शहरी हो जाते हैं। इस तरह से तुम्हारी मौजूद बुद्धि को भी बड़ा आकार लेना  होगा ताकि वह आधुनिक हो जाए तथा देश – विदेश में मौजूद यंत्रों एवं उनकी प्रणाली को समझ सके और फिर कुछ नया कर सके या मौजूदा प्रणाली का अनुसरण कर अपने होने की सार्थकता सिद्ध कर सके।

पत्रों में हमारी गहरी निजी भावनायें छिपी होती हैं। वे गाढ़े शहद की तरह हैं। एक सैनिक ही पत्रों का महत्व जानता है या कोई प्रेमी। इन पत्रों को व्यर्थ की चीज नहीं समझकर मन बहलाने का सशक्त साधन मानना चाहिए। जो मित्र तुमसे बिछुड़ गए थे उनसे भी पत्रों के द्वारा  संपर्क बनाये रखा जा सकता है। ये पत्र कभी भी काम चलाऊ नहीं होने चाहिए बल्कि पूरी तन्मयता से लिखे होने चाहिएं। एक पत्र में तुम अपने मन की पूरी बातें कह सकती हो और तुम्हारा पत्र मिलने पर दूसरे भी उसी के अनुरूप तुम्हें पत्र लिखते हैं। एक अच्छा पत्र प्राय: जिन्दगी भर हमारे साथ रहता है एवम् उसे बार-बार पढऩे से सुख मिलता है।

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* चांदी की छड़ी।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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अच्छे अनुभवों का मूल्य।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ अच्छे अनुभवों का मूल्य। ϒ

  • दवा की सूक्ष्म मात्रा भी जीवन देती है, दवा सूक्ष्म होकर भी प्राण है। आर्द्रता? पानी का ही एक रूप है। इसी तरह जो चुपचाप हैं, वे अपने में श्रेष्ठता छुपाये हुए हैं। श्रेष्ठ चीजें झूठ-मूठ के वार्तालाप नहीं करती, बल्कि स्वयं श्रेष्ठ तौर-तरीकों से अपनी बात बताती हैं। अच्छे विज्ञापन मौन रहकर भी बहुत कुछ कह जाते हैं।
  • मैं अब भी जब कभी अपने पुराने विद्यालय की ओर देखता हूं तो लगता है कि मेरे जैसे  कितने ही छात्र यहां आए होंगे और पढ़ाई खत्म करके चले गए होंगे। मुझे इस विद्यालय में  बिताया हुआ हर खूबसूरत क्षण याद है और दूसरे छात्र भी होंगे जो यहां से पढक़र विदा हुए हैं, उन्हें भी यह सब याद होगा। इस तरह से तुम देखोगी कि हजारों बच्चे ऐसे हैं जो एक ही जगह पढऩे पर भी अलग-अलग अनुभव रखते हैं। इसलिए उन सभी के अच्छे अनुभवों का  मूल्य है। लेकिन सभी अपने अनुभवों को खुले दिल से सबके सामने नहीं रख पाते, फिर भी जो अपने अनुभव संस्मरण के रूप में किताबों के द्वारा सबके सामने रखते हैं, उन्हें पढऩा दूसरे लोगों को समझने जैसा है।
  • परीक्षा देते समय सबसे पहले आसान प्रश्नों को हल किया जाता है, फिर धीरे-धीरे कठिन  प्रश्नों को। इसी तरह से अपना पाठ याद करते समय सबसे आसान चीजों को पहले समझना होता है। फिर उसी समझ के सहारे कठिन चीजों को। सारे पाठ एक आधार पर खड़े होते हैं। जिन्हें जाने बिना दूसरी चीजों को समझना बिल्कुल मुश्किल है। लेकिन इस क्रिया में विषयों के संबंध में अत्यधिक रुचि बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। एक बार मार्ग निकाल लेने के बाद फिर कहीं भी कठिनाई नहीं होती।
  • जब पेड़ों पर फल आते हैं, तो पेड़ का सारा ध्यान उन्हें बड़ा एवम् स्वादिष्ट बनाने में लग जाता है। जैसे ही वे फल तोड़ लिये जाते हैं, पेड़ अपनी शाखाओं को बढ़ाने एवं मजबूत करने में अपना ध्यान लगाने लगता है। कोई भी शारीरिक कार्य करते समय हाथ-पांव, कान-आंखें दिमाग आदि सभी एक साथ लगे होते हैं। लेकिन पढ़ते वक्त वे अपनी सारी शक्ति पाठ को समझने में लगा देते हैं। तुम जितना ही अपनी शक्ति को इस तरह से पुस्तकों पर केन्द्रित करोगी, उतना ही अधिक लाभ मिलेगा।
  • जब कहीं आग लग जाती है, सबसे पहले मनुष्यों को बचाने की कोशिश की जाती है, फिर बाकी चीजों को। इससे समझ सकती हो कि मनुष्य जीवन का कितना अधिक महत्व है। मनुष्य ही पृथ्वी पर सबसे बड़ा बुद्धिजीवी है जो कुछ न कुछ नया करने का प्रयत्‍न करता  रहता है। इसलिए अपने में जो भी खास बातें हैं तथा जिनके कारण तुम मनुष्य हो, उन्हें पहचानो। ताकि तुम महसूस कर सको कि तुम्हारे पास इतने सारे गुण हैं। कलम अगर मेज पर पड़ी रही, तो प्लास्टिक का टुकड़ा भर थी। लेकिन जब इससे लिखा गया तो यह महत्वपूर्ण चीज बन गयी। इसलिए अपनी उपयोगिता को सुला कर मत रखो, उसे जगाये रखो।

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कुछ ज्ञान की बाते।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ कुछ ज्ञान की बाते। ϒ

  • All river and some men are”crooked” because they take the line of  least resistance.
  • Remember that you cannot promote yourself on another man`s mistakes and weaknesses, except by helping him to correct them.
  • The word “impossible” is not recognized by successful men but it is a handy alibi of the man who is failure.
  • No man can become a permanent success without taking others along with him.
  • It`s not what you are going to do, but it`s what you are doing now, that counts.

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