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बारिश पर कविता

काले बादल।

Kmsraj51 की कलम से…..

Dark Clouds | काले बादल।

काले बादल कहाँ से तुम हो आते
अब तो कारनामे तुम्हारे छुपाए नहीं जाते।

बेवक्त, बेमौसम तुम हो नीर बरसाते
सड़क, मोहल्ला, गली सब जलमग्न हो जाते।

नदी नाले अपनी सीमा को भूल जाते
कहीं न कहीं आपदा का कहर जरूर बरपाते।

बच्चा, बूढ़ा नौजवान इसकी भेंट है चढ़ जाते
तो कहीं पशु भी अपने को बचा नहीं पाते।

बरसते बादल तो कई वर्षों से हैं देखे
अबकी बार जो बरसे नहीं मिले कहीं ऐसे लेखे।

तीन महीने लगातार तुम रहे बरसते
बिन तुम्हारे एक दिन देखने को रहे तरसते।

बरसात को एकदम सर्दी से जोड़ दिया
तुम्हें याद नहीं रहा कि किसान ने
अभी खेतों से अनाज इकट्ठा नहीं है किया।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कवि ने इस कविता में अत्यधिक वर्षा और उसके दुष्परिणामों को मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया है। वह काले बादलों से प्रश्न करता है कि वे अब क्यों बेमौसम और बेवक्त वर्षा करने लगे हैं। उनकी अनियंत्रित बारिश से सड़कें, मोहल्ले और नालियां जलमग्न हो जाती हैं, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। कवि बताता है कि ऐसी बारिश में बच्चे, बूढ़े, नौजवान और पशु तक संकट में पड़ जाते हैं, और हर जगह आपदा का कहर दिखाई देता है। पहले भी बारिश होती थी, पर अबकी बार की वर्षा अत्यधिक और असामान्य रही, जो लगातार तीन महीनों तक थमी नहीं।
  • अंत में कवि व्यंग्यात्मक लहजे में कहता है कि इस बारिश ने मौसम के क्रम को भी बिगाड़ दिया, क्योंकि बारिश खत्म होते ही सर्दी शुरू हो गई, जबकि किसान अभी अपने खेतों से अनाज इकट्ठा भी नहीं कर पाया था।

    यह कविता प्रकृति के असंतुलन और जलवायु परिवर्तन के खतरों पर चेतावनी देती है।

—————

यह कविता (काले बादल।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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वो मस्ती भरी बरसात।

Kmsraj51 की कलम से…..

Wo Masti Bhari Barsaat | वो मस्ती भरी बरसात।

वो मस्ती भरी बरसात
अब कहां
जिसमें आनंद होता
था बेपनाह।

बेफ्रिक हो कर
खड्डों में नहाते
रास्ते में आए पानी
तो कागज की किस्तियां
भी बहाते।

पानी के डैम बनाना
फिर पानी छोड़कर
आंनद भी खूब लेना।

झूला झूलने पींगे डालते
फिर झूल झूल कर
मस्ती भरे गीत गाते।

अब न वैसा बचपन रहा
न ही वैसी बरसात
जिसमें हर रोज़ दिखती
थी कोई नई शरारत।

खेतों से छलियां चुराते
छुप छुप कर फिर
उन्हें खाते।

किसी आंगन में
कहीं ककड़ी देखते
उसे चुराकर ही सांस भरते।

अब तो पानी की जगह
दलदल आता
दिन रात बड़ा है डराता।

वो मस्ती भरी बरसात
अब कहां।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता बचपन की बीती हुई मासूम, मस्ती भरी बारिश की यादों को संजोती है। कवि उन दिनों की बारिश को याद करता है, जब बरसात केवल पानी नहीं, बल्कि खुशियों और शरारतों की सौगात लेकर आती थी। कविता में बताया गया है कि पहले बच्चे बेफिक्र होकर खड्डों में नहाते, कागज की नावें बहाते, पानी से डैम बनाते, और पिंग झूला डालकर गीत गाते थे। खेतों से चुपके से छलियां चुराना, किसी के आंगन से ककड़ी उठाना, और फिर छुपकर खाना, ये सब बचपन की मासूम शरारतें थीं। लेकिन अब न वो बचपन रहा, न वैसी बरसात। आज की बारिश में मस्ती की जगह डर और दलदल है। अब बरसात का आनंद खो गया है, और बचपन की वो खुली, निश्छल दुनिया कहीं पीछे छूट गई है। कुल मिलाकर, यह कविता एक नॉस्टेल्जिक भाव को उजागर करती है — बचपन की बारिश की मस्ती, आज की यथार्थपूर्ण स्थिति में एक मीठी कड़वाहट के साथ याद आती है।

—————

यह कविता (वो मस्ती भरी बरसात।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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बारिश।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rain | बारिश।

बारिश की बौछार जब धरा पर पड़ती है,
गर्मी की तपन से सबको राहत मिलती है।

सूखी हुई फसल को अमृत सा मिल जाता है,
यह देखकर कृषक गदगद हो जाता है।

मुरझायी हरियाली को जैसे सिंगार मिल जाता है,
बारिश की बौछार से मन प्रसन्न हो जाता है।

खिले-खिले वन उपवन महकने लगते है,
छोटी-छोटी कपोलों से फूल खिलने लगते है।

बादल गरजते मोर भी नृत्य करने लगता है,
झम-झम नाचते सभी जंगल में रौनक लगती है।

गर्मी से सुकून भरा राहत मिलती है सभी को,
मिट्टी से आती सोधी खुशुबू से मन खिल जाता है।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — भारत में वर्षा ऋतु जुलाई महीने में शुरु हो जाती है और सितंबर के आखिर तक रहता है। ये असहनीय गर्मी के बाद सभी के जीवन में उम्मीद और राहत की फुहार लेकर आता है। हमारे देश में वर्षा ऋतु बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है इसका महत्व इसलिए अधिक बढ़ जाता है क्योंकि हमारे देश में अधिकतर किसान निवास करते हैं जिनका जीवन खेत और खेती पर निर्भर करती है। किसी को बरसात के मौसम में घूमना पसंद होता है, तो किसी को बरसात में भीगना अच्छा लगता है। वर्षा ऋतु के मौसम में पेड़-पौधों पर हरियाली की सुंदरता भी और बढ़ जाती है। बादल गरजते और मोर भी नृत्य करने लगता है, झम-झम नाचते सभी जंगल में रौनक लगती है।

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यह कविता (बारिश।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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रिमझिम बरसता सावन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rainy Sawan | रिमझिम बरसता सावन।

घिर – घिर आये काले – काले बदरा,
नयनों में उमड़ – घुमड़ रह-रह बरसाते होगें।

चली गई अँगना किसी की,
मस्ती भर-भरकर इठलाती।
सूने मेरे आँगन में आकर,
लाकर सुधि नीर बरसाती।

जगी उनींदी पलकों पर,
रह-रहकर बदली जाती होगी।
चातकनंदन की बौछारों में,
हम विलग प्रेमी फिर रोयेगें।

झिलमिल – झिलमिल जले जुगनूँ,
मन की दहक फिर भड़कायेगें।
यादों की शम्पाओं से कर गर्जन-तर्जन,
रह – रहकर हृदय को डरायेगें।

निभृत सन्नाटों में आ – आकर,
विकलता उर के बढ़ायेंगे।
बिछुड़न की बेदी पर लाकर,
उर दाह घाव – शूल से धोयेगें।

कालिमा निशिता से पूँछ रही,
मेघ क्यूँ उमड़े कजरारे नयनों में।
किसने कब लूट लिये सपने,
भर दिये अँगारे प्राणों में।

भीष्म प्रश्न सुलगते कानों में,
हृदय व्यथित पड़ा किनारों में।
प्राणों में भर दी बिछुड़न,
दाग हृदय के अब शूल चुभोयेगें।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (रिमझिम बरसता सावन।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख/दोहे सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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गर्माती तपिश पर बूँदे ठंडक की।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ गर्माती तपिश पर बूँदे ठंडक की। ♦

गर्मी की ऋतु थी सब ओर अभी अपने चरम पर।
प्रकृति की करवट दर्शा गयी जीवन है इसके रहम पर॥

गर्मी की तपिश से हुए थे सभी बेहाल।
ऐसे में मौसम ने बदली खुशनुमा चाल॥

गर्मी की तपिश ने सभी का जीवन दूभर किया।
शायद सबकी करुण पुकार सुन मेंह दिया॥

कल ही प्रकृति ने धूल भरी आंधी बरसाई।
आभार प्रकृति का जो सब पर दया आई॥

इस बारिश ने तो बदल दिया अब नजारा।
धुला-धुला नजर आए साफ हुआ रेत सारा॥

सब पेड़ – पौधे झूमें सब ठंडी हवा के संग।
बूझें दिलों में जागी कुछ नया करने की तरंग॥

पत्तों ने ऐसा लिया रूप जैसे अभी नए आये।
चहुँ ओर बारिश इस दिल को खूब लुभाये॥

धरती के सीने पर पड़ी जो ये बूँदे प्यारी।
ऐसा लगे जैसे आसमां ने निभाई यारी॥

प्यारी बूंदों से बन गया खुशनुमा वातावरण।
मानों प्रकृति ने ओढा ठंडी चादर का आवरण॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — पेड़ के पत्तों ने ऐसा लिया रूप जैसे अभी नए आये, जब चहुँ ओर बारिश इस दिल को खूब लुभाये। धरती के सीने पर पड़ी जो ये बूँदे प्यारी, ऐसा लगे जैसे आसमां ने निभाई अपनी यारी इंसानो के साथ। प्यारी बूंदों से बन गया खुशनुमा पूरा वातावरण, मानों प्रकृति ने ओढा ठंडी चादर का आवरण।

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यह कविता (गर्माती तपिश पर बूँदे ठंडक की।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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