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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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भोला शरण प्रसाद

कर्मों का फल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कर्मों का फल। ♦

मनुष्य का जीवन एक खेत की तरह है, जिसमें उसके कर्म बोए जाते हैं और मनुष्य अपने कर्मों के अच्छे व बुरे फल काटते हैं। बुरे कर्म करने वाले बुराई की दल-दल में फंस कर बुराई बटोरता रहता है; आम बोने वाला आम खाता है, बबूल बोने वाले के नसीब में कांटा ही कांटा होता है।

बबूल बोकर आम प्राप्त करने की कामना, प्रकृति के नियम के विरुध्द है, असंभव है, उसी प्रकार बुराई के बीज बोकर भलाई की उम्मीद करना, मृत इन्सान को जिन्दा देखने के समान है।

इतिहास गवाह है; कार्य कभी कारण रहित नहीं होते और कोई भी परिणाम अकारण नहीं होता। जो परीक्षा ही नहीं देगा उसका परिणाम कैसे निकलेगा। परिणाम हमेशा व्यक्ति के कर्मों की कलम से लिखी जाती है।

भाग्य का निर्माण कर्म से ही होता है। समाज, राष्ट्र या व्यक्ति कभी बुराई से नहीं पनपता। जीवन के हर क्षण का लेखा-जोखा भगवान चित्रगुप्त के पास होता है, कोई प्राणी बुरा कर्म करके बच नहीं सकता। जल कीचड़ से बहेगा, सड़े हुए चीज में दुर्गंध होगी, गंदे नाले का पानी पेय होगा-यह मात्र भ्रम है। सच्चाई से कोई वास्ता नहीं, ठीक उसी प्रकार बुरे कर्म, धोखे की असफलताएँ “पतन” और अपयश को जन्म देती है, कर्म फल अकाट्य है।

कल की सुबह का पता नहीं, लेकिन योजना लम्बी बनाने वाले, अंहकार में चूर इन्सान, दूसरे के विनाश की सोच रखने वाले, गरीबों का खून चूसने वाले, अपने कर्म की परवाह न करने वाले, अमावस्या की रात को चांदनी की कल्पना करते है जो कभी संभव नहीं है।

जैसा अन्न वैसा मन, अगर एक लड़के का चप्पल समुद्र में चला जाए तो वह समुद्र को चोर कहेगा, अगर किसी को मोती मिल जाए तो वह दानी कहेगा, जैसा अन्ना, वैसा मन, जैसी भावना, वैसा विचार। जिसे तुम अच्छा मानते हो, यदि उसे अपने व्यवहार में नहीं लाते, तो यह तुम्हारी कायरता है। अगर भय तुम्हें ऐसा करने से रोकता है तो न तो तुम्हारा चरित्र उठेगा और ना हीं तुम्हें प्रतिष्ठा मिलेगी।

मन की इच्छा को बार-बार दबाना, अपने विचारों को खुलकर व्यक्त नहीं करना, आत्महत्या करने के समान है। यदि ऐसा करके कोई किसी लाभ की उम्मीद करके बैठा है तो वह बहुत बड़े धोखे में है, बिन बादल बरसात की आश में है।

मनुष्य का जीवन दुःखों से भरा है, शारीरिक, आर्थिक, मानसिक, सामाजिक, चाहे कुछ भी हो, हर इन्सान इससे निजात पाने के लिए, सुख की प्राप्ति के लिए हर संभव प्रयास करता है; परन्तु विडंबना यह है कि कुछ ही लोगों को सुख की प्राप्ति होती है। अधिकतर लोगों की झोली में असफलता, असंतोष, अभाव, अतृप्ति एंव दुःख ही मिलता है। लोग भटकते हैं सुख की प्राप्ति के लिए, लेकिन मिलता है दुःख, अपमान, यही पीड़ा और वेदना है हर इन्सान की।

सुख ढूढ़ने वाले ये भूल जाते हैं कि दुःख कहीं बाहर से नहीं आता, दुःखों का मूल हमारे भीतर होता है। बाहर ढूढ़ने के कारण तो हजारों हो सकते हैं लेकिन समाधान कहीं नहीं मिल सकता। दुःखों से मुक्ति पाने के लिए दृष्टिकोण में बदलाव लाते हुए, दिल की गहराई में आत्मसात करना होगा।

जिम्मेदार कोई और नहीं- “केवल मैं खुद हूँ” ये हमारे ही द्वारा किए गए कर्मों का परिणाम है। बाहर दिखने वाली हर चीज अन्दर की छाया है। सुख हो या दुःख, आनंद हो या विषाद, सम्मान हो या अपमान – ये सभी अपने कर्मों का ही फल है। स्वंय पर जिम्मेदारी लेने के बाद ही दृष्टिकोण में बदलाव संभव है। क्रांन्ति उन्हीं के जीवन में घटती है जो जिम्मेदारी लेना जानते हैं। जो अपनी गलतियों के लिए दूसरों को दोषी ठहराते हैं वो अपने अन्दर बदलाव कभी नहीं ला सकते।

दुःख का कारण अपने अंदर तलाशने वाले ही समाधान ढूढ़ सकते हैं। किसी इन्सान को यह पता नहीं, वह कब तक जिन्दा रहेगा। अगर किसी को यह पता चल जाए कि कल उसकी मौत निश्चित है; तो क्या उसका व्यवहार वही रहेगा जो वह प्रतिदिन रखता है। निश्चित रुप से उसके व्यवहार में बदलाव आ जाएगा, किसी का दिल नहीं दुखाएगा, अंहकार त्याग देगा, विनम्र भाव से पेश आएगा, हर गलत कर्मों के लिए माफी मांगेगा, माया-मोह के बंधन से मुक्त होने की कोशिश करेगा। जब यही सत्य है कि जीवन अपने हाथ में नहीं तो अपने कर्मों को सुधार कर क्यूं न अच्छा मनुष्य बने।

किसी को दोष देने से बेहतर है खुद को दोषी मानें; यही सत्य है।

“जिन्दगी है बहुत छोटी, इसका न कोई ठिकाना।
किसके लिए बना रहे हो, ये महल, ये आशियाना॥”

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — देर हो सकता है लेकिन अंधेर नहीं होता हैं; कर्मो का फल एक न एक दिन जरूर मिलता हैं। अगर किसी को यह पता चल जाए कि कल उसकी मौत निश्चित है; तो क्या उसका व्यवहार वही रहेगा जो वह प्रतिदिन रखता है। निश्चित रुप से उसके व्यवहार में बदलाव आ जाएगा, किसी का दिल नहीं दुखाएगा, अंहकार त्याग देगा, विनम्र भाव से पेश आएगा, हर गलत कर्मों के लिए माफी मांगेगा, माया-मोह के बंधन से मुक्त होने की कोशिश करेगा। जब यही सत्य है कि जीवन अपने हाथ में नहीं तो अपने कर्मों को सुधार कर क्यूं न अच्छा मनुष्य बने। इतिहास गवाह है; कार्य कभी कारण रहित नहीं होते और कोई भी परिणाम अकारण नहीं होता। जो परीक्षा ही नहीं देगा उसका परिणाम कैसे निकलेगा। परिणाम हमेशा व्यक्ति के कर्मों की कलम से लिखी जाती है।

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यह लेख (कर्मों का फल।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हकीकत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हकीकत। ♦

नौका है टूटी हुई,
जाना है उस पार।
ना जानूं कितना गहरा पानी,
नैया बिन पतवार।

पीने को पानी नसीब नहीं,
कुऍं का ख्वाब रखता हूं।
खाने को भोजन नहीं,
दुश्मन पे फतह का ख्याल रखता हूं।

ख्वाब में भी न सोचा था हमनें,
दोस्ती का वास्ता देकर,
वो दुश्मन बन गया होगा।
उसे गुमां हो गया,
कद देखकर नाटा।

शास्त्री जी पर गुमां है सबको,
दुश्मन को दिखाया हिन्दुस्तानी चाटा।
नफरतों की फिजाओं में,
प्यास मुहब्बतों की नहीं बुझती।

कोशिश चाहे लाख कर लो,
आग से कभी आग नहीं बुझती।
पलट गई तख्तो ताज,
हिल गई सल्तनत।

हौसला व बहादुरी के आगे,
सर झुकाती हैं, हरकतें नापाक।
आग लगी है तेरे शहर में,
चिंगारी तेरे घर तक आएगी।

कभी साथ मनाते थे ईद और होली,
आज चलाते हो सरहद पे गोली।
मत ललकारो ये है हिन्दुस्तान,
तेरा मुल्क नहीं बचेगा,
बन जाएगा कब्रिस्तान।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हम भारत वासी दिल से प्रेम करने वाले को प्रेम करते है और जो हमें आँख दिखाते है उनका आँख भी निकाल लेते है। हम कभी किसी पर पहले वार नही करते है लेकिन अगर दुश्मन हम पर वार करे तो हम हाथ पर हाथ धरे बैठे भी नहीं रहते है। हमें गर्व है अपने वीर सेनानी सुभाष चंद्र बोस जी पर, उन्होंने दुश्मन को दिखाया हिन्दुस्तानी चाटा। एक बात याद रखे नफरतों की फिजाओं में कभी भी प्यास मुहब्बतों की नहीं बुझती। चाहे कोई भी पड़ोसी देश हो हमारा हमसे प्यार करेगा, हम भी उन पर प्यार बरसायेंगे, लेकिन अगर हमसे गद्दारी करेंगे तो उसका जवाब उसी की भाषा में हमें देना आता हैं, जय हिन्द – जय हिन्द की सेना।

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यह कविता (हकीकत।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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अंधविश्वास।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ अंधविश्वास। ♦

मानव समाज युगों-युगों से अंधविश्वास की कड़ियों में जकड़ा हुआ है। धर्म की आड़ में इन्सान के सोचने की शक्ति खत्म हो जाती है। इस धरती पर कई महापुरुष, ज्ञानी, संत, अवतरित हुए, समाज में प्रचलित अंधविश्वास, कुरीतियों को दूर करने के लिए। श्री राजाराम मोहन राय, श्री स्वामी विवेकानन्द, श्री महर्षि महेश योगी, श्री परमहंस योगानन्द जी, श्री महर्षि दयानन्द सरस्वती, श्री गुरु नानक देव जी वगैरह ने मानव समाज को अंधविश्वास से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया।

• अंधविश्वास का बोलबाला •

आज भी समाज में अंधविश्वास का बोलबाला है चाहे इन्सान कितना भी शिक्षित हो जाए, किसी भी धर्म का अनुयायी हो; अंधविश्वास उसका पीछा कभी नहीं छोड़ता। कुछ ऐसे बंधन हैं जो इन्सान को कभी मुक्त नहीं होने देता।

स्वार्थ एंव वर्चस्व की लड़ाई में जघन्य अपराध का समर्थन करते हैं, बच्चों की बलि देना, जानवरों की बलि देना, अपने ही समाज के कमजोर महिला को लाक्षंन लगाकर अपमानित करना, श्राध्द के नाम पर शोषण करना, अंधविश्वास के प्रमाण हैं।

भूत-प्रेत, डायन, काली-बिल्ली, विधवा औरत का अलग ही महत्व है। पूरी दुनिया में अंधविश्वास फैलाने में बिल्लियों का बड़ा योगदान है। क्या आप जानते हैं- “काली बिल्ली के प्रति अंधविश्वास” भारतवर्ष में शादी से पहले काली बिल्ली देखना खुशनसीबी मानी जाती है।

• बिल्ली एक, अंधविश्वास अनेक •

स्काटलैण्ड में अगर काली बिल्ली बरामदे में धूमती नजर आती है, इसका मतलब कोई मुसीबत आने वाली है। इग्लैण्ड में अगर काली बिल्ली अपने कान के पीछे सफाई करती नजर आए तो बारिश जरुर होगी। आयरलैण्ड में अगर बिल्ली चन्द्रमा की रौशनी में रास्ता काट दे तो किसी की मौत महामारी से होगी।

फ्रांस में यदि बिल्ली दिखाई दे नदी के पास, तो लोग पानी में नहीं जाते। तुर्की में यदि काली बिल्ली दिखाई दे तो लोग अपने बालों को पकड़ लेते हैं, अन्यथा बदनसीबी आ जायेगी। अमेरिका में यदि एक ऑंख की काली बिल्ली दिखाई पड़ती है तो लोग अपने एक हाथ के अंगूठे को दूसरे हथेली पर कसकर दबाते हैं और मुराद मांगते हैं। बिल्ली एक, अंधविश्वास अनेक।

• वैज्ञानिक युग में भी लोगों का विचार पुर्ववत •

इस वैज्ञानिक युग में भी लोगों का विचार पुर्ववत, भिन्न-भिन्न हैं। विद्वता, शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं। जापान में लोग आमदनी बढाने के लिए अपने पर्स में सांप की केचुली रखते हैं और अंक चार शुभ माना जाता हैं।

ताइवान में सुबह-सुबह काला कौआ देखना अशुभ माना जाता हैं। तुर्की में दो व्यक्ति यदि एक नाम वाले एक साथ खड़े हों तो उनके बीच में खड़े होने से मन्नत पूरी होती हैं। वेनेजुएला में लोग रुमाल का उपहार नहीं लेते। कोरिया में लोग परीक्षा के दिन बाल नहीं धोते, चीन में दीवाल घड़ी तोहफा में नहीं लेते।

रुस में यदि कुछ लेने के लिए लौटते हैं तो बिना आईना देखे घर से वापस नहीं जाते। चाहे कोई भी देश कितना भी विकसित हो, अंधविश्वास को मानने वाले की कभी नहीं हैं। विधवा औरत को शादी के रस्म से दूर रखा जाता हैं।

जन्म और मृत्यु किसी भी दिन, किसी भी मुहुर्त्त में होती हैं फिर भी इंसान शुभ मुहुर्त्त के पीछे जीवन भर भागता हैं। शादी शुभ मुहुर्त्त में विद्वान पंडित करवाते हैं सभी बड़े आशीर्वाद देते हैं फिर भी औरत विधवा हो जाती हैं और पुरुष विधुर। जिम्मेदार कौन है- कोई नहीं। अगर लड़की पैदा होती है या शादी के बाद लड़की के ससुराल में किसी की मृत्यु हो जाती है तो लड़की (दुल्हन) अशुभ मानी जाती हैं।

अगर गंगा में नहाने से पाप धूल जाता तो गंगा पुत्र भीष्म वाण की शैया पर प्राण नहीं त्यागते। मछली और अन्य जीव-जन्तु को मोक्ष मिलता। गंगा की कोई जिम्मेदारी नहीं हैं। वह तो सब कुछ समुद्र को दे देती हैं। समुद्र वाष्प बनाकर आसमान में भेज देती हैं फिर बादल बनकर धरती पर पानी के रुप में आ जाता है।

• इविल आई •

गंगा स्नान से पाप धूल जाएगा यह आग लगने पर स्वतः बरसात हो जाएगी, के समान हैं। काला टीका लगाकर नजर उतारी जाती हैं। मिश्र में काटों की ऑंख का लाकेट पहनने से देखने वाली हर बुरी निगाह का उल्टा असर होता है। मिश्र एंव तुर्की से आई “इविल आई” का सारी दुनिया में प्रचलन है।

• टोटका या अंधविश्वास •

समाज में कुछ लोग वहम, टोटका या अंधविश्वास को हवा देते रहते हैं। आज के वैज्ञानिक युग में सच्चाई में ही विश्वास करना चाहिए, न कि अंधविश्वास में। अंधविश्वास हमें पूर्वजों से विरासत में मिली है।

वक्त के साथ जब हम पोशाक बदल रहे हैं, नई-नई प्रथाऍं समाज में स्वतः अपनायी जा रही है तो फिर अंधविश्वास में विश्वास क्यों, हर शिक्षित व जागरुक व्यक्ति का यह धर्म है कि वह समाज को अंधविश्वास से मुक्त करे।

अंधविश्वास के जंजीर को तोड़ना ही, विज्ञान की उपलब्धि होगी। श्री राजा राम मोहन राय अपशब्द सुनकर भी भारतीय समाज को सती प्रथा से मुक्त किया। इन्हीं की प्रेरणा से वैशाली जिले के महनार तहसील के जहॉंजीरपुर शाम में कुछ बुध्दिजीवियों ने गॉंव को अंधविश्वास से मुक्त किया, आज सभी खुशहाल हैं।

—♥—

दुःख में सब को सिखाए मुस्कुराना,
अंधविश्वास तो धोखा है, सत्य ही अपनाना।
चाहे दुनिया कुछ भी कहे, मुझे आवाज लगाना,
अगर देर हो गई, गुजर जाएगा जमाना।

जिन लोगों ने समाज सेवा के साथ साथ,
अंधविश्वास के खिलाफ लोगों को,
जागृत किया, उन्हें गॉंव के लोग,
बच्चा-बच्चा उनके अच्छे कर्मों के,
लिए आज भी याद करता है।

डा. शम्भु शरण अपने अच्छे कार्यो,
के लिए अमर हो गए, गॉंव का हर
व्यक्ति अपने में सुधार लाने की,
प्रतिज्ञा करता हैं, समाज उन लोगों
का ऋणी होता है जो समाज के उत्थान,
के लिए अपने को समर्पित कर देते हैं।

आज इस गॉंव में साक्षरता बढ़ गई,
आज हर सपना साकार होता हुआ नजर आता हैं।
“जब तक अंधविश्वास रहेगा,
इन्सान भय त्रस्त और परेशान रहेगा।

पहले घर में करो उजाला,
फिर मंदिर में दीप जलाओ।
मानव-मानव में भेद नहीं,
सब को अपने गले लगाओ।

जैसे किसी के द्वारा प्रार्थना किए,
बिना ही सूर्य कमल-समूह को,
विकसित करता हैं, जैसे चन्द्रमा,
कैरव-समूह को प्रफुल्लित करता हैं।

तथा जिस प्रकार मेघ बिना मांगे,
ही प्राणियों को जल देता हैं।
उसी प्रकार महापुरुष स्वाभाविक,
स्वंय ही परहित में लगे रहते हैं,
ताकि समाज की बुराइयां,
स्वतः दूर हो जाए।

“कोपरनिकस” ने कहा पृथ्वी गोल हैं,
यह वैज्ञानिक खोज धार्मिक तथ्यों से,
अलग होने के कारण, कोपरनिकस को
मौत मिली, अंधविश्वास से मुक्ति
तभी मिलेगी जब सोच वैझानिक हो।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — वक्त के साथ जब हम पोशाक बदल रहे हैं, नई-नई प्रथाऍं समाज में स्वतः अपनायी जा रही है तो फिर अंधविश्वास में विश्वास क्यों, हर शिक्षित व जागरुक व्यक्ति का यह धर्म है कि वह समाज को अंधविश्वास से मुक्त करे। अंधविश्वास के जंजीर को तोड़ना ही, विज्ञान की उपलब्धि होगी।

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यह लेख (अंधविश्वास।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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सत्य का ज्ञान।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ सत्य का ज्ञान। ♦

दीपक में केवल तेल, घी, और बाती होने से रौशनी नहीं मिलती, जब तक घने अंधकार में उसे प्रज्वलित न की जाए। तेल, बाती, अंधकार, अग्नि और इच्छा के बिना रौशनी की कल्पना नहीं की जा सकती। अंधकार से लड़ने की क्षमता केवल रोशनी में है। मनुष्य के अंधकारमय जीवन को सत्य का ज्ञान ही प्रकाश में ला सकता है।

बिना गुरु के सत्य का ज्ञान असम्भव, अकल्पनीय है, प्राचीन समय से शिक्षित, ज्ञानी, परमात्मा को जानने वाले, कलम एंव बुद्धि के धनी, समाज को सत्य के मार्ग पर अग्रसर करने वाले, रक्षा करने वाले, अंधकार से प्रकाश में लाने वाले, सही शिक्षा एंव संस्कार पर समान बल देने वाले, मनुष्य को अपने ज्ञान के माध्यम से न्याय के मार्ग पर चलते हुए, परमात्मा से जुड़ने का मार्ग गुरुओं ने बताया है —

“बिना गुरु ज्ञान कहाँ, जहॉं गुरु हर धाम वहां”

संस्कार मनुष्य को आत्मसंयमी, त्यागी एंव अहंकार रहित बना देता है। सही ज्ञान के अभाव में मनुष्य का जीवन कष्टों से घिर गया है, खुशी, शांति लुप्त हो गई। आज मनुष्य के भीतर संवेदना, प्रेम, त्याग, भाइचारे की कमी देखी जाती है। अमानवीय कार्य करने में थोड़ी भी झिझक नहीं होती। एक दूसरे का शोषण करना, अपना जन्म सिध्द अधिकार समझते हैं। यह दोष गलत शिक्षा, गलत परिवेश एंव गलत संस्कार का है।

दूसरे की निन्दा करना, कृतघ्नता, दूसरों के गुप्त भेद को खोलना, निष्ठुरता दिखाना, निर्दयी होना, परायी स्त्री का सेवन करना, दूसरों का धन हड़प लेना, अपवित्र रहना, धूर्त्त बनकर मनुष्य को ठगना, मनुष्यों के प्राण लेना, पद के अहंकार में अंधा हो जाना, किसी को दुःख देकर आनन्दित होना, गलत शिक्षा देकर दूसरे को भ्रमित करना, आजकल मनुष्य की प्रवृति बन गई, क्योंकि वर्त्तमान समय में इंसान वेद के उपदेशों को भूल गया।

वेद में बताए गये मार्ग को कुछ स्वार्थी, अयोग्य लोगों ने गलत ढंग से प्रस्तुत किया, षडयंत्र के तहत, लोग भ्रमित होते चले गये, शिक्षा का मतलब ही बदल गया। जब बीज ही खराब हो तो फसल कैसी होगी। सही शिक्षा लुप्त होती गई, मनुष्य के बीच ऊँच-नीच, बड़े-छोटे, छूआ-छूत का दरार पैदा हो गया। वेद को पढ़ने से वंचित कर दिया गया। सत्य को दबाकर, असत्य का प्रसार होने लगा। विद्वानों की अनदेखी होने लगी।

कुछ लोग ठेकेदार बन गए, लेकिन समय का चक्र बदलता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द घोष, महर्षि महेश योगी, श्री परमहंस योगानन्द जी, श्री ठाकुर अनुकूल चन्द्र जी, गुरु नानक जी, सम्पूर्ण मानव जाति को विनाश से बचाने के लिए एक सूत्र में बॉंधकर सही मार्ग दिखाने का कार्य किया।

वेद स्वतः प्रमाण है।

वेद स्वतः प्रमाण है— ऐसी दृष्टि रखना, गुरु श्रेष्ठ, देवता, ऋषि, महात्माओं, माता-पिता एंव बड़ों का सत्कार करना, अच्छे कर्मों का अभ्यास करना, सब के प्रति मित्र भाव रखना। लेकिन आज के परिवेश में ये सभी चीजें विलुप्त होती जा रही है। इंसान कुत्ते को गोद में बिठाकर प्यार करता नजर आता है लेकिन इंसान से, अपनों से, छूआछूत एंव नफरत का भाव रखता है। अहंकार में दूरी बनाकर रखने में शान समझता है। कोई भी धर्म छूआछूत या नफरत फैलाने की इजाजत नहीं देता।

कोई भी पवित्र, स्वच्छ इंसान किसी भी धर्मस्थल पर जाने का अधिकारी है। “रोको मत, जाने दो, रोको, मत जाने दो।” इन दोनों वाक्यों में जो फर्क है, वही फर्क कुछ लोगों ने पैदा किया, समाज को बॉंटने के लिए, अपनी जीविका चलाने के लिए, अपनी रोटी सेंकने के लिए, नफरत की बीज बोने के लिए। नींव की ईंट कभी दिखाई नहीं पड़ती। गुनाहगार हमेशा पर्दे के पीछे रहना चाहता है, सत्य का ज्ञान नहीं होने के कारण लोग निर्दोष को ही गुनहगार मान लेते हैं।

आज मंदिर, गुरुद्वारा, जैन मंदिर, बौद्ध मंदिर, संतसंग, चर्चे हर जगह है, संख्या में काफी वृद्धि हो गई लेकिन गलत विचार के कारण गुनाहगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। धार्मिक स्थल पर जाने के बाद बहुत शकुन, शांति मिलती है क्योंकि वहां विचार पवित्र हो जाता है।

अगर सत्य का ज्ञान हो तो घर में अकेले बैठकर आंख बंद कर लेने के बाद जो शांति मिलती है वह कहीं नहीं मिलेगी। भगवान तो दिल में है, हर इंसान भगवान का ही अंश है, हम सभी परमपिता परमेश्वर की संतान है, यह कैसी बिडम्बना है कि जिस भगवान ने इंसान को पैदा किया, वही इंसान भगवान पैदा करे, यह असंभव ही नहीं, अनुचित प्रतीत होता है, यह एक विचार है। भगवान तो सर्वप्रिय, सर्वमान्य हैं, उनके बिना इच्छा, एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, वह सर्वशक्तिमान है। प्राण डालने का अधिकार केवल भगवान को है, इंसान, प्राण नहीं डाल सकता। जन्म और मृत्यु केवल भगवान के हाथ में है।

हर सम्प्रदाय या कुछ गुरु केवल अपनी बात थोपने का प्रयास करते हैं। खुद को ही भगवान घोषित कर देते हैं। शिक्षित, अशिक्षित सभी पूजने लगते है, इंसान कभी भगवान हो ही नहीं सकता। अच्छा बनने के लिए, बुराई को त्यागना पड़ता है। कोई भी इंसान धर्म का सही पालन करेगा, वह स्वतः बुराइयों से दूर हो जायेगा।

धरती पर लाखों धर्म स्थल हैं, लोगों की बहुत आस्था है फिर व्यभिचार, चोरी, बेईमानी, ईर्ष्या, जलन, कत्ल दंगे, फसाद क्यों, भगवान शिव, कृष्ण, मॉं दुर्गा, चित्रगुप्त, भगवान महावीर, बौद्ध, गुरु नानक, गुरु गोविंद सिंह के उपासक, आराधना करने वाले खुद ही संयमित होकर परोपकार करते हुए जीवन व्यतीत करने लगेंगे। लेकिन अशिक्षा और अज्ञानता के कारण लोग मार्ग से भटक गये हैं।

जो करना है, वह नहीं करते, जो नहीं करना है वो अवश्य करते हैं। सही कुलीन गुरु, सही मार्ग दर्शन देने वाले, भटके हुए को सही रास्ते पर लाने वाले, वेद का सही अर्थ समझाने वाले, आडम्बर से दूर रहने की सलाह देने वाले, शोषण से मुक्त रहने की प्रेरणा देने वाले गुरु ही सत्य का ज्ञान दे सकते हैं। सभी गुरुजनों को कोटी-कोटी नमन, सत्य को जाने, असत्य नरक का द्वार खोलता है। चूहा-सांप, मोर-बैल, शेर सभी एक साथ एक दूसरे का दुश्मन होते हुए भी, एक साथ शिव परिवार में रहते हैं। प्रभु चरण में समर्पित होने के बाद, अहंकार स्वतः गायब हो जाता हैं। जहाँ प्रेम, वहाँ भय कैसा, ये है सत्य का ज्ञान।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

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  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — ज्ञान, ध्यान और योग किसी भी इंसान के जीवन में सदैव ही खुशियाँ ले आती है। वेद, पुराण, श्रीमद भागवत गीता, रामायण, रामचरित मानस, का पाठ करना जरूरी है। गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता, समय-समय पर धर्म की रक्षा के लिए, महान आत्माये धरती पर आती रहती है, और धर्म का रक्षा करती हैं। अपने बच्चों को बचपन से ही धर्म और शास्त्र का ज्ञान दे, अच्छा संस्कार दे, तभी आपका बच्चा आगे चलकर, देश और समाज का भला करेगा।

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यह लेख (सत्य का ज्ञान।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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