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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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You are here: Home / Archives for रक्षाबंधन पर कविता

रक्षाबंधन पर कविता

राखी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राखी। ♦

यमुना ने यम को बांधी राखी,
राखी बनाया अमर, यम को मौत कभी न आती।

बहन भाईयों को दिल से दुआ दे जाती,
अमर रहना मेरे भाई, मन की बात कह जाती।

भरी सभा में किया था नग्न,
द्रोपदी को दुर्योधन की पापी टोली ने।

लाज बचाने आ गए, कृष्ण कन्हैया,
लेके वस्त्र अपनी झोली में।

कृष्ण ने फर्ज निभाया भाई का,
द्रोपदी बहन की लाज बचाने को।

राखी की शक्ति देखो, कृष्ण दौड़े,
दुष्टों को मजा चखाने को।

भाई बहन को भूल न जाए,
ये राखी याद दिलाती है।

जिस भाई को बहन नहीं,
उसको राखी बहुत रुलाती है।

भाई नहीं तो क्या हुआ,
यह भाई से भरा संसार है।

मानो तो सब भाई हैं,
नहीं तो सब बेकार है।

राम भी तरस गए,
बहन का प्यार पाने को।

शांता बिछड़ गई बचपन में,
तड़प उठे राम राखी बंधवाने को।

हर किसी को बहन हो प्रभु,
राखी का त्योहार मनाने को।

हर बहन को भाई मिले,
रक्षा का वचन निभाने को।

♦ भोला शरण प्रसाद जी – सेक्टर – 150/नोएडा – उत्तर प्रदेश ♦

—————

  • “भोला शरण प्रसाद जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — रक्षाबंधन का त्योहार भाई बहन के पवित्र प्यार का प्रतिक है, जिसे राखी का त्योहार भी कहा जाता है। रक्षा बंधन पर बहन, भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके दीर्घायु व सुखी जीवन की प्रार्थना करती है। इसके साथ ही बहन अपने भाई से अपनी सुरक्षा का वचन लेती है, की जीवन में जब भी उस पर कोई मुसीबत आएगा उसका भाई उसकी मदद के लिए आ जायेगा। कृष्ण ने फर्ज निभाया भाई का, द्रोपदी बहन की लाज बचाने को। राखी की शक्ति देखो, कृष्ण दौड़े, दुष्टों को मजा चखाने को। रक्षाबंधन हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है, जिसे पूरे भारत समेत अन्य देशों में भी मनाया जाता है।

—————

यह कविता (राखी।) “भोला शरण प्रसाद जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं भोला शरण प्रसाद बी. एस. सी. (बायो), एम. ए. अंग्रेजी, एम. एड. हूं। पहले केन्द्रीय विघालय में कार्यरत था। मेरी कई रचनाऍं विघालय पत्रिका एंव बाहर की भी पत्रिका में छप चूकी है। मैं अंग्रेजी एंव हिन्दी दोनों में अपनी रचनाऍं एंव कविताऍं लिखना पसन्द करता हूं। देश भक्ति की कविताऍं अधिक लिखता हूं। मैं कोलकाता संतजेवियर कालेज से बी. एड. किया एंव महर्षि दयानन्द विश्वविघालय रोहतक से एम. एड. किया। मैं उर्दू भी जानता हूं। मैं मैट्रीकुलेशन मुजफ्फरपुर से, आई. एस. सी. एंव बी. एस. सी. हाजीपुर (बिहार विश्वविघालय) बी. ए. (अंग्रेजी), एम. ए. (अंग्रेजी) बिहार विश्वविघालय मुजफ्फरपुर से किया। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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धागे का प्रेम।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ धागे का प्रेम। ♦

ऐसे पावन देश में जन्में हम, करते हैं इस पर गर्व।
देवों की भूमि ये, जहाँ हर माह आते हैं हर्ष भरें पर्व॥

बारह मासों में पावन श्रावण मास तो सदैव ही, हर आयु-वर्ग को हर्षाता रहा।
शिव-स्तुति, हरियाली तीज व रक्षाबंधन जैसा पर्व जीवन को आनंदित बनाता रहा॥

रक्षा-सूत्र का ये पावन पर्व, श्रावण माह की पूर्णिमा को अपना संकल्पभाव ले आएँ।
निश्छल प्रेम, रक्षा-कवच, मर्यादा-बंधन दो आत्माओं को दे जाएँ॥

प्राचीनकाल की ओर मुड़कर देखें, तो एक बात समझ में आये।
जीवनदायिनी वृक्ष भी, बहनों के प्रेम के कच्चे धागे में बंध जाएँ॥

जब इंद्राणी ने अपने सुहाग इंद्र की विजय की झोली फैलाई, भगवान विष्णु के आगे।
दिया आशीष उन्होंने विजयी भव का, कहा, जाकर उनकी कलाई पर बांधे धागें॥

तदोपरांत युद्धक्षेत्र के लिए कोई नरेश जाता, महल के द्वार खोल।
उससे पहले ही रानी तिलक कर, विजय-सूत्र का धागा बांधे अनमोल॥

जब से आँचल का कोना, रक्तरंजित श्रीकृष्ण की उँगली पर बांधा था।
तब से ही इस कर्ज को सूद समेत चुकाने, द्रोपदी को बहन माना था॥

इतिहास गवाह है कि श्रीकृष्ण ने कृष्णा को सूद समेत, चुकाया था ये कर्ज।
वसन का अंबार लगा, रोका चीर-हरण को, निभाया एक धर्म भाई का फर्ज॥

ऐसा ही होता है ये मांगलिक पल, जो सबको घने नेह से भर जायें।
अक्षत-रोली से तिलक कर, कच्चे धागे से स्नेह की उम्र दराज कर जायें॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

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  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — रक्षाबंधन का त्योहार भाई बहन के पवित्र प्यार का प्रतिक है, जिसे राखी का त्योहार भी कहा जाता है। रक्षा बंधन पर बहन, भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके दीर्घायु व सुखी जीवन की प्रार्थना करती है। इसके साथ ही बहन अपने भाई से अपनी सुरक्षा का वचन लेती है, की जीवन में जब भी उस पर कोई मुसीबत आएगा उसका भाई उसकी मदद के ली आ जायेगा। रक्षाबंधन हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है, जिसे पूरे भारत समेत अन्य देशों में भी मनाया जाता है।

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यह कविता (धागे का प्रेम।) “श्रीमती सुशीला देवी जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम श्रीमती सुशीला देवी है। मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ब्लॉक – घरौंडा, जिला – करनाल, में J.B.T.tr. के पद पर कार्यरत हूँ। मैं “विश्व कविता पाठ“ के पटल की सदस्य हूँ। मेरी कुछ रचनाओं ने टीम मंथन गुजरात के पटल पर भी स्थान पाया है। मेरी रचनाओं में प्रकृति, माँ अम्बे, दिल की पुकार, हिंदी दिवस, वो पुराने दिन, डिजिटल जमाना, नारी, वक्त, नया जमाना, मित्रता दिवस, सोच रे मानव, इन सभी की झलक है।

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राखी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ राखी। ♦

अपने घर से मेरे घर तक,
पैदल ही तो तुम चली आती थी।
फुर्सत कहां थी तुम्हारे किसानी जीवन में,
वह तो खींच के, राखी तुम्हें यहां लाती थी।

आज कहां हो तुम बहना?
देख, कलाई मेरी सुनी है।
मैं पूछ रहा हूं विधि से बार-बार,
तूने जिंदगी देकर, मौत काहे को चुनी है?

रो रहा हूं भीतर ही भीतर,
पड़ोस में, बहने सबकी आई है।
उनके घरों में खुशियां हैं आज तो,
बहने जो राखी लाई है।

चीर डालो आज अंबर का सीना,
सूरज की किरणों पर बैठकर तुम आओ।
छोटा हूं मैं तुम्हारा बहना,
चांद – सितारे आज तुम मुझे पहनाओ।

निष्पाप प्रेम का बंधन यह बहना,
लोगों को, रेशम का जो धागा है।
क्या जाने ये कीमत राखी की बहना?
इनकी जिंदगी से, शायद कोई अपना ऐसा न भागा है?

अभी उम्र ही क्या थी बयालीस की,
क्यों छोड़ के तुम हमें चली गई?
पहले, भैया छोड़ कर चले गए, अब तुम,
हमारी तो जिंदगी ही जैसे छली गई।

जहां भी होंगे तुम, ओ बहना – भैया!
महफूज रहे तुम, सदा खुश रहना।
वहीं मनाना त्योहार राखी का तुम,
ओ सूरज – चंदा! तुम उनसे यह कहना।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — रक्षा बंधन का त्योहार सावन महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। रक्षा बंधन को “राखी के पर्व” नाम से भी जाना जाता है, जो भाई और बहन के बीच पवित्र प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। रक्षा बंधन का अर्थ है ‘सुरक्षा का बंधन’। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई बहन को उपहार देता है। भविष्य पुराण में एक कथा है कि वृत्रासुर से युद्ध में देवराज इंद्र की रक्षा के लिए इंद्राणी शची ने अपने तपोबल से एक रक्षासूत्र तैयार किया और श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई में बांध दी। इस रक्षासूत्र ने देवराज की रक्षा की और वह युद्ध में विजयी हुए। यह घटना भी सतयुग में हुई थी।

—————

यह कविता (राखी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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कच्चे धागे की प्रीत।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कच्चे धागे की प्रीत। ♦

श्रावण मास की पूर्णिमा, एक पावन त्यौहार ले आई।
अटूट प्रीत, विश्वास व आस्था का एक और उपहार ले आई॥

रक्षाबंधन की प्रचलित है, ऐसी ऐतिहासिक कहानियाँ।
जो सुनते आए हम, अपने पुराण कथाओं की जुबानियाँ॥

एक कच्चा धागा अपने अंदर समाहित किए, सागर जितना प्यार।
एक भरोसा, निश्छल प्रेम से, दो आत्माओं को बांधे ये त्यौहार॥

भगवान विष्णु बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर, भक्त के घर रहने आए भगवान।
फिर मां लक्ष्मी व्याकुल हो बलि को राखी बांध, हरि को ले आई बैकुंठ धाम॥

चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने भी, अपनी प्रजा की रक्षा के लिए हुमायूं को राखी भेजी।
तब हुमायूं ने भी उनकी राज्य की रक्षा कर, बहन की प्रीत दिल में सहेजी॥

जब इंद्राणी ने भी अपने पति की दानवों से रक्षा की, बांधकर रेशम का धागा।
फिर इंद्र के मस्तक पर, विजय श्री का तिलक लागा॥

महाभारत में शिशुपाल के वध से, जब श्री कृष्ण की उंगली से रक्त बहा था।
तब द्रोपदी ने साड़ी के पल्लू का अंश बांधकर, श्री कृष्ण को धर्म भाई कहा था।

एक बार यमदेव कई बरस तक, अपनी बहन यमुना से नहीं मिलने आए।
तब यमुना ने भी, प्यारी आंखों से नीर बहाए॥

फिर गंगा ने अपने भाई को, मिलने के संदेश पहुँचाये।
आकर बहन को प्यार से मिलकर, यमुना को अमृतत्व दे जाए॥

यह त्यौहार रक्षा – कवच के नाम से भी, अक्सर जाना जाए।
इस कच्चे धागे में तो, दो पावन आत्माओं का बंधन माना जाए॥

जब कच्चे धागे की प्रीत बसती चली जाए, ऐसा ही यह पर्व पावन।
सारी खुशियां देकर अब, रुखसत हो जाएगा सावन॥

♦ सुशीला देवी जी – करनाल, हरियाणा ♦

मेरे सभी प्रिय पाठकों आप सबको तहे दिल से रक्षाबंधन पर्व पावन की शुभकामनाएं।-KMSRAJ51

—————

  • “श्रीमती सुशीला देवी जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से भाई बहन के पवित्र प्रेम और रक्षा वचन से भरपूर पवित्र पर्व रक्षाबंधन का वर्णन किया है। भाई बहन एक दूजे के सच्चे मित्र भी है जन्म – जन्मांतर तक। रक्षाबंधन – भाई और बहन के प्रेम को दिखाता एक पवित्र पर्व।

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