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शिक्षाप्रद कहानियाें का विशाल संग्रह।

चालाक बगुला और केकड़ा।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ चालाक बगुला और केकड़ा। ϒ

बहुत समय पहले कि बात है घने जंगल में एक तालाब किनारे बहुत सारे जलीय जीव जब सुबह की धूप सेकने आए तो अपने शत्रु बगुले को एक टांग पर खड़े प्रार्थना करते देखा। आज उसने उन पर आक्रमण भी नहीं किया था।

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सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ – कि इस बगुले को क्या हुआ। कुछ साहसी मछलियां – कछुए और केकड़े इकट्टे होकर उसके पास पहुंचे और पूछा – “क्या बात है बगुले दादा, आज किस चिंता में हो?”

“भाई लोगो – मैंने आज से भगताई शुरू कर दी है। कल ही मुझे स्‍वप्‍न आया कि दुनिया खत्म होने वाली है, इसलिए क्यों न भगवान का नाम लिया जाए और सुनो, यह तालाब भी सूखने वाला है। तुम लोग जल्दी ही किसी दूसरी जगह चले जाओ।”

“क्या तुम सच कह रहे हो।”

“हां भाई – मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा। तुम देख ही रहे हो कि अब मैं तुम लोगों का शिकार भी नहीं कर रहा हूं, क्योंकि मैंने मांस खाना भी छोड़ दिया है। राम…राम…राम….।” बगुले का साधुपन देखकर सबको भरोसा आ गया कि बगुला भगत जो कह रहे हैं, सच है।

“बगुला भगत जी – अगर यह तालाब सूख गया तो हमारे बाल बच्चे तो तड़प-तड़पकर मर जाएंगे।” मेंढक ने कहा – “कोई उपाय करो।”

“भाई मैं आज रात ईश्वर से बात करता हूं, फिर जैसा वह कहेंगे तुम्हें बता दूंगा, मानना न मानना तुम्हारी मर्जी।”

सभी लोग बगुला भगत के पांव छूकर चले गए। दूसरे दिन बगुला भगत ने बताया कि भगवान ने कहा है कि अगर आप सब बगल वाले जंगल के तालाब में चले जाओ तो बच जाओगे।

मगर हम वहां जाएंगे कैसे? सबने चिन्ता जाहिर की। यदि यहां से वहां तक एक सुरंग खोद ली जाए तो…..  एक कछुआ बोला। अरे भाई ये क्या आसान काम है? केकड़ा बोला – और फिर इतनी लम्बी सुरंग कौन खोदेगा।

तभी एक मछली बोली – एक और भी उपाय है। बगुला भगत जी हमें अपनी पीठ पर बैठाकर वहां छोड़ आएं। यह सुनते ही बगुला भगत बोला – “मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूं। इतना बोझा भला।”

“भगत जी – आप हमें एक-एक करके वहां ले जाओ।” आप तो अब साधु हो गए हैं और साधु का काम है दूसरों की रक्षा करना। सबने गुहार लगाई। अब जब आप इतना कह रहे हैं तो ठीक है। आओ, ये शुभ काम मैं आज से ही शुरू कर दूं। आओ, तुममें से एक मछली मेरी पीठ पर बैठ जाए।

एक चतुर मछली फौरन उछलकर उसकी पीठ पर बैठ गई। बगुला भगत उसे लेकर फौरन उड़ गया। इसी प्रकार कई दिन गुजर गए। बगुला रोज दो – तीन मछलियों, मेंढकों, कछुओं आदि को ले जाता रहा। एक दिन केकड़े की बारी आई – केकड़ा उसकी पीठ पर सवार था। बगुला भगत सोच रहा था, आज तो मजा आ जाएगा। केकड़े का बढि़या मांस खाने को मिलेगा।

उधर – एक पहाड़ी पर से गुजरते हुए केकड़े को ढेर सारी मछलियों की हडिृयां, कछुओं के खोल और मेंढकों के पिंजर पड़े दिखाई दिए तो वह बगुले भगत की सारी चालाकी समझ गया और बिना एक पल गंवाए उसने बगुले की गरदन दबोच ली।

“अरे केकड़े भाई, क्या करते हो?” बगुला चिल्लाया …

“पाखण्डी बगुले” – फौरन मुझे मेरे तालाब पर वापस लेकर चल वरना बेमौत मारा जाएगा। मैं तेरी सारी चालाकी समझ गया हूँ। अब चूंकि तू बूढ़ा हो चुका है, इसलिए तुझसे शिकार नहीं होता। इसीलिए तूने यह चाल चली और भोली-भाली मछलियों को यहां लाकर खा गया। अब अगर जिंदगी चाहता है तो वापस चल वरना तेरी कब्र भी यहीं बन जाएगी।

बगुला “मरता क्या न करता।” वह वापस पलटा और उसी तालाब पर आ गया। उसका ख्याल था कि केकड़ा उसे छोड़ देगा, मगर केकड़े ने उसे छोड़ा नहीं। उसने उसकी गरदन काट दी और तालाब में जाकर सबको उसकी हकीकत बता दी।

मौत के मुंह से बच गए सभी जीव केकड़े का धन्यवाद करने लगे।

प्यारे दोस्तों – जिसका स्वभाव धूर्तता का हो, अर्थात जाे धूर्त हाे उस पर भरोसा करने से धोखा ही मिलेगा। इसलिए कभी भी ज़िन्दगी में धूर्ताें पर विश्वास न करें।

♥⇔♥

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भटकता इंसान।

Kmsraj51 की कलम से…..
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ϒ भटकता इंसान। ϒ

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भटकता इंसान।

एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था। उसकी पत्नी ने कहा-‘वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं। तब तक आप इंतजार करें।’ कुछ ही देर में किसान खेत से अपने घर आ पहुंचा। उसके साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी आया। कुत्ता जोरों से हांफ रहा था। उसकी यह हालत देख, मिलने आए व्यक्ति ने किसान से पूछा-‘क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है?’ किसान ने कहा-‘नहीं, पास ही है। लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?’ उस व्यक्ति ने कहा-‘मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए, लेकिन तुम्हारे चेहरे पर रंच मात्र थकान नहीं जबकि कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है।’ किसान ने कहा-‘मैं और कुत्ता एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी कोई खास दूर नहीं है। मैं थका नहीं हूं। मेरा कुत्ता थक गया है। इसका कारण यह है कि मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, मगर कुत्ता अपनी आदत से मजबूर है। वह आसपास दूसरे कुत्ते देखकर उनको भगाने के लिए उसके पीछे दौड़ता था और भौंकता हुआ वापस मेरे पास आ जाता था।

फिर जैसे ही उसे और कोई कुत्ता नजर आता, वह उसके पीछे दौड़ने लगता। अपनी आदत के अनुसार उसका यह क्रम रास्ते भर जारी रहा।
इसलिए वह थक गया है।’ देखा जाए तो यही स्थिति आज के इंसान की भी है। जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना यूं तो कठिन नहीं है, लेकिन लोभ, मोह अहंकार और ईर्ष्या जीव को उसके जीवन की सीधी और सरल राह से भटका रही है। अपनी क्षमता के अनुसार जिसके पास जितना है, उससे वह संतुष्ट नहीं। आज लखपति, कल करोड़पति, फिर अरबपति बनने की चाह में उलझकर इंसान दौड़ रहा है। अनेक लोग ऐसे हैं जिनके पास सब कुछ है।


भरा-पूरा परिवार, कोठी, बंगला, एक से एक बढ़िया कारें, क्या कुछ नहीं है। फिर भी उनमें बहुत से दुखी रहते हैं। बड़ा आदमी बनना, धनवान
बनना बुरी बात नहीं, बनना चाहिए। यह हसरत सबकी रहती है। उसके लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होगी तो थकान नहीं होगी। लेकिन दूसरों के सामने खुद को बड़ा दिखाने की चाह के चलते आदमी राह से भटक रहा है और यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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सकारात्मक सोच + निरंतर कार्य = सफलता।

स्वयं पर और स्व-कर्माे पर विश्वास माना सफलता का आधार(नींव) मज़बूत।

 ~KMSRAJ51

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

 ~KMSRAJ51

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

 ~KMSRAJ51

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