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You are here: Home / Archives for हेमराज ठाकुर की कविताएं

हेमराज ठाकुर की कविताएं

ये तो नाइंसाफी है।

Kmsraj51 की कलम से…..

This is Unfair | ये तो नाइंसाफी है।

बेतरतीब भभकती एक आग को देखा,
उसमें सुलगते नफरत के अंगारे देखे।
हिन्दू – मुस्लिम की उसमें ज्वालाएं देखी,
फिर भी लोगों में आपसी भाईचारे देखे।

कुछ लोग लगे हैं बस सत्ता के लोभ में,
सियासी घी डालकर लपटें भड़काने में।
विविधता में एकता का है मुल्क हमारा,
एक वर्ग लगा है सबको यह समझाने में।

कोई जाति – धर्म के तूफान है उड़ाता,
नफ़रत की लपटें और तेजी से भड़के।
फिर भी खड़ा मजबूती से भारत कैसे?
दुश्मनों के सोच में जैसे प्राण ही लटके।

कई लगे हैं समता की बरसात बरसाने,
वे चले हैं नफरतों की आग बुझाने को।
एक कुनबा भीतर ही भीतर ऐसा भी है,
जो लगा है राष्ट्र हित के मुद्दे दबाने को।

सत्ता समर में गुनहगारों को है मिलती,
हमेशा हम सबने देखी यारो माफ़ी है।
बेगुनाहों को सियासी चाल में फंसाना,
आजाद भारत में ये तो नाइंसाफी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आजकल के कुछ सियासी लोग अपनी जेब भरने के लिए दिखावटी फिक्रमंद बनकर जनता के बीच नफरत फैला रहे है, और आपस में सभी को लड़ा रहे है। हम भारत वासी है, अनेकता में एकता ही हमारी पहचान है। जिस भी भारतीय के अंदर देश प्रेम नहीं वह भारत देश के लिए नासूर के समान है, ऐसे ही लोग आगे चलकर सियासी पद पर पहुंचकर बाहर के देशो में जाकर अपने भारत देश की बुराई करते हैं। हमे ऐसे लोगों को पहचान कर इनके कहे में बिलकुल भी नहीं आना है, क्योकि ऐसे लोग हमे आपस में लड़ाकर अपनी ज़ेब भरते है, हमे ऐसे लोगों से सदैव ही सावधान रहना चाहिए। हम सभी को आपस में मिलजुलकर अपने भारत देश की उन्नति में हमेशा योगदान देना चाहिए, तभी अपना देश तेज गति से आगे बढ़ेगा। जय हिन्द!

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यह कविता (ये तो नाइंसाफी है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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खो जाने दो।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kho Jaane Do | खो जाने दो।

खो जाने दो हमें गुमराहियों के अंधेरे में,
वाहवाहियों की हमें कोई दरकार नहीं।
नहीं चाहिए हमें ऐसी ख्याति विख्याती,
लोक मंगल का हो जिसमें विचार नहीं।

कहां खोए रहे हर क्षण छिछले से शब्द न्यास में,
बेकार वह बात जिसमें गरिमा का अधिभार नहीं।
नफरत भली है उस दिखावटी प्रेम से भी कहीं,
जिसमें हकीकत का हो लेश मात्र भी दीदार नहीं।

सजानी नहीं है जिन्दगी की महफिलें हमें,
खुशामदी के रंग बिरंगे बनावटी फूलों से।
फिल्मी किरदारी प्रेम की है चाह ही कहां?
जिन्दगी जीना चाहते हैं प्यार के उसूलों से।

कमबख्त यह जीवन भी बदलता है रंग,
हर रोज बस मौसम के मिजाज की भांति।
सुकून से जीने ही नहीं देता है किसी को भी,
जिन्दगी की उहापोह में है ही कहां शान्ति।

रंगीनियों की तलबगार रही है हमेशा से,
छिछोले से पन की वह मदहोश वासना।
प्रेम पूजा है, जरूरत है, रहम है, इबादत है,
प्रेम तो खुद ही है उस खुदा की उपासना।

सब जानते हैं लोग, लेकिन फिर भी न जाने क्यों?
जहां में नफरतों और वासनाओं का जहर घोलते हैं।
जिधर भी देखो उधर ही एक अजीब सी मदहोशी है,
अब तो लोग प्रेम को भी रूप और दौलत से तोलते हैं।

बस एक अजीब सी घुटन है हर किसी के भीतर,
बिरले ही है कोई जो दिल का हर राज खोलते हैं।
है अधूरे प्रेम की आज भी लाखों कहानियां यहां,
पर मजाल है कि कोई किसी से कुछ बोलते हैं।

गुजर जाती हैं जिन्दगियां सच्चे प्रेम की तलाश में,
नसीब कहां? मिल जाए तो खुद को खो जाने दो।
मन मसोसकर घुट – घुट के जीने से बेहतर तो यह है,
कि खुद को खुदा की इबादत से प्रेम में रो जाने दो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — दिखावटी वाहवाहियों की हमें कोई दरकार नहीं है, नहीं चाहिए हमें ऐसी ख्याति विख्याती, लोक मंगल का हो जिसमें विचार नहीं। ये सच है की नफरत भली है उस दिखावटी प्रेम से भी कहीं, जिसमें हकीकत का हो लेश मात्र भी दीदार नहीं। सजानी नहीं है जिन्दगी की महफिलें हमें, खुशामदी के रंग बिरंगे बनावटी फूलों से। हमें फिल्मी किरदारी प्रेम की है चाह ही कहां? हम जिन्दगी जीना चाहते हैं प्यार के उसूलों से। आज का मानव दहोश वासना में है, जबकि उसे जरुरत है प्रेम, स्नेह व भक्ति-भजन की, हम सब जानते है की प्रेम ईश्वर का ही रूप है। सब जानते हैं लोग, लेकिन फिर भी न जाने क्यों? जहां में नफरतों और वासनाओं का जहर घोलते हैं। जिधर भी देखो उधर ही एक अजीब सी मदहोशी है, अब तो लोग प्रेम को भी रूप और दौलत से तोलते हैं। बस एक अजीब सी घुटन है हर किसी के भीतर, बिरले ही है कोई जो दिल का हर राज खोलते हैं। गुजर जाती हैं जिन्दगियां सच्चे प्रेम की तलाश में, नसीब कहां? मिल जाए तो खुद को खो जाने दो।

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यह कविता (खो जाने दो।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

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वासनाओं की आजादी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Freedom Of Lust | वासनाओं की आजादी।

आशाओं के सब भंवर टूट गए,
तट विहीन हो रही मोह नदियां।
तृष्णाओं के जाले फैंक फैंक कर,
पकड़ रहे हैं विकारों की मछियां।

झुरमुट बन मद झाड़ है उपज रहे,
दब रही है जिनमें ज्ञान की फसलें।
प्रेम की खाद अब मिलती कहां है?
वासना रसायन में उलझे सब मसले।

फरिश्ते तो हो गए हैं दूर की कौड़ी,
रिश्ते ही नित निरन्तर जर्जरा रहे हैं।
प्रेमी प्रेमिका के तो भला क्या कहने?
भाई – बहन मदहोशी में सठिया रहे हैं।

छल छदम तो होते सदियों से आए हैं,
बेशर्मी तो इस युग में देखो आई नई है।
न बच्चों में तहजीब पहनावे बरतावे की,
न अभिभावकों में आज वह शेष रही है।

फिर कहते हैं क्यों टिकते नहीं रिश्ते?
यह प्रश्न तो शायद आज बेईमानी है।
शादी से पहले ही संबंधों को बनाना,
वासनाओं को प्रेम समझना नादानी है।

हम मानव हैं, समझते क्यों नहीं?
क्यों पशु की नकल सब करते हैं?
वासनाओं की आजादी, अमर्यादी,
निज पद में कुठाराघात क्यों करते हैं।

विकारों को समझना स्वर्ग से बढ़ कर,
वासनाएं ही क्यों पीयूष सी लगती है?
इनकी प्यास कहां बुझती है किसी की?
ये तो युगों युगों से यूं ही बस भभकी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आजकल समाज में आधुनिकता के नाम पर इंसान कितना गिर गया है वासनाओं के गर्त में? जिस्म की भूख में सब मर्यादाओं को भूल गया है आज का दानवी मानव क्यों? शादी से पहले ही संबंधों को बनाना और वासनाओं को ही प्रेम समझना नादानी है। हम मानव हैं, समझते क्यों नहीं? क्यों पशु की नकल सब करते हैं? वासनाओं की आजादी, अमर्यादी, निज पद में कुठाराघात क्यों करते हैं सभी? प्रेमी प्रेमिका के तो भला क्या कहने? भाई – बहन मदहोशी में सठिया रहे हैं आजकल। बेशर्मी तो इस युग में देखो आई नई है, न बच्चों में तहजीब पहनावे बरतावे की और न अभिभावकों में आज वह शेष रही है लाज – शर्म। वासनाओं के कारण मनुष्य का व्यक्तित्व सडऩे लगता है और काम वासना में बुरे से बुरा कर्म कर रहा है आज का जानवर से भी गया गुजरा मानव। विषयासक्ति की दुर्गंध हमारे व्यक्तित्व को इस तरह ढांप लेती है कि हम दानव बन जाते है। वासना पूरी तरह से यौन आकर्षण पर आधारित है, जबकि प्रेम भावनात्मक इच्छा पर।

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यह कविता (वासनाओं की आजादी।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मेरे वतन की।

Kmsraj51 की कलम से…..

Mere Vatan Ki | मेरे वतन की।

मेरे वतन की माटी की खुशबू, सुबह – शाम जिसे जब आती है।
मन हो उठता है बाग – बाग सा, रूह होती तब मदमाती है।

यह भक्ति – मुक्ति की पावन धरा है, राम – कृष्ण को जनाती है।
गंगा – यमुनी तहजीबों को, यह भूमि खुद पर ही तो बहाती है।

धर्म अनेक यहां नाना भाषाएं, कई कुल कुनबे, कई जाति है।
सीधा सादा मानुष यहां का, विश्व पटल पर जिसकी ख्याति है।

दादुर, म्यूर, पपिहरा के शोर और कोयल काली मीठा जब गाती है।
भारत देश की धरती सचमुच, हर्षित हो फूली न तब समाती है।

शीतल पवन जब हवा के झोंको से, धूल धारा से अम्बर में उड़ाती है।
यूं लगता है मानो भारत की भूमि, मस्ती में होली का पर्व मनाती है।

रिमझिम बारिश की शीतल बूंदें, सिंचित करती यहां की जब माटी है।
उग आती है तब नाना फसलें, भारत की जनता उन्हे तब खाती है।

छा जाए कभी संकट के बादल तो, वीर बिरादरी सर अपना जब चढ़ाती है।
बुंदेले हर बोलों की भांति फिर गौरव गाथा, जनता उनकी तब गाती है।

प्रेम करुणा की प्रवाहक यह भूमि, हमेशा विश्व में शान्ति ही चाहती है।
नाहक इसको छेड़े जो कोई, फिर तो दुश्मन की ईंट से ईंट बजाती है।

जय बोलो भाई जय बोलो सब, मां भारती के पावन आंचल की।
जय बोलो भाई जय बोलो सब, उतर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्वांचल की।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — धर धरा,धरती, वसुंधरा, भारत भूमि। ऐसी सबकी प्यारी, भारत भूमि। ॠषी मुनियों, संतो तपस्वीयों की तपोभूमि। ऐसी सबकी, प्यारी भारत भूमि। भारत की धरती, खेत, पहाड़, जंगल, झरने आदि तो उसके अंग हैं। हालांकि, वास्तव में भारतमाता तो भारत की सम्पूर्ण जनता ही हैं, जो पूरे देश में बसी हुई हैं। यह मातृभूमि हमारी जन्मभूमि है, अगर यह नहीं तो मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं होता। भारतभूमि की अनोखी सुंदरता को निहारने के लिए पर्यटक दूर देशो से आते है। मातृभूमि के साहित्य और संस्कृति पर ही हमारे संस्कार निर्भर करते हैं। मातृभूमि स्वर्ग के समान है और इसकी तुलना किसी अन्य स्थान से नहीं की जा सकती है। भारत को ‘माता’ कहकर संबोधित करने का श्रेय बंगला लेखक किरण चंद्र बनर्जी को भी जाता है। 1873 में इनके नाटक ‘भारत-माता’ में भारत के लिए ‘माता’ शब्द का प्रयोग किया गया था। आज़ादी से पहले बंगाल में दुर्गा पूजा लोगों को एकजुट करने और स्वराज (आजादी) पर चर्चा करने का एक माध्यम बनी हुई थी। भारत को मातृदेवी के रूप में चित्रित करके भारत माता या ‘भारतम्बा’ कहा जाता है। भारतमाता को प्राय नारंगी रंग की साड़ी पहने, हाथ में तिरंगा ध्वज लिये हुए चित्रित किया जाता है तथा साथ में सिंह होता है। जिन्होंने भी भारत माता के लिए अपनी जान न्योक्षावर की वो मर कर भी अमर हो गए। आजादी के समय भारत माता के लिए अपनी जान कुर्बान करने की लिए वीरों ने एक पल भी नहीं सोचा।

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यह कविता (मेरे वतन की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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सैन्य कार्रवाई।

Kmsraj51 की कलम से…..

Military Action | सैन्य कार्रवाई।

उत्तुंग शिखर नीरव हिमालय की वादियां,
भय खाकर कोलाहल से घबराती है।
ये टोली दर टोली भीड़ उमड़ती,
हिमालय में क्या करने आती है?

सरहदी सीमाओं को आज सजाने,
सैन्य टुकड़ियां धड़ाधड़ जाती है।
रोम – रोम में उनके रंगत निखरी,
स्वधर्म – हर्ष गर्व से चौड़ी छाती है।

सैनिक कहता दूसरे से प्रियवर,
चल, मां भारती हमें बुलाती है।
शौर्य सिमटता कदमों में उनके,
चंचल चालें तो है ही मदमती है।

मदहोश है ऐसे देश प्रेम से,
मानों, मित्र विवाह के बराती है।
गूंज उठती है घाटियां तब जब,
आवाजें उनकी झुंझलाती है।

थरराती है रूहें अरी की,
बुद्धि भी विक्षिप्त सी हो जाती है।
सीना ठोक जब वीर जवानों की ,
गर्जना रौरव – रौद्र मचाती है।

लहलाती श्यामल फैसले जैसे ,
मौसम के साथ, खेतों में उग आती है।
है वही नजारा सीमा पे आज तो,
यह भव्य भारत देश की माटी है।

लहू से सींचते वीर शहीद जब,
यह नए वीर तब उगाती है।
हिम्मत की ऊंचाई के आगे उनकी,
आज, बौनी हिमालय की घाटी है।

चट्टानी वक्ष, भुजदण्ड फौलादी,
हर इरादे पक्के और दिमागी है।
एक इंच न देंगे लूटने उनको,
सागर की तलहटी, चाहे गलवान की वादी है।

वे अपने देश में आजाद रहे,
हमें अपने देश की आजादी है।
आंख उठाने की जरूरत मत करना,
फिर तो हृदय विदारक बर्बादी है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — हमारी सेना विशाल और सशक्त है। जब भारतीय सेना वर्दी में हथियारों को लिए कदम से कदम मिलाकर एक साथ सीमा की ओर चलती है तो यह हमारे भारत की ताकत को दर्शाती हैं। भारतीय सेना देश की सीमाओं को सुरक्षित करके देश के भीतर शांति और सुरक्षा बनाये रखती है। भारत सरकार और उसके प्रत्येक भाग की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत सेना सदैव तत्पर रहती है। भारत सरकार को ताकत हमारी सेना के कारण ही मिलती है। भारतीय सेना कर्मी सभी प्रकार की साहसिक गतिविधियों में हमेशा आगे रहे हैं। साहसिक कार्य मुख्य रूप से सैन्य प्रशिक्षण का एक अनिवार्य हिस्सा है। यह इच्छाशक्ति, दृढ़ संकल्प, साहस और देश प्रेम भारत माता के सेवा का जूनून व ज़ज्बा है हर सैनिक के रगो में, जो उन्हें सदैव ही ऊर्जावान बनाये रखता है, चाहे गर्मी हो, बारिश हो या फिर सर्दी हो। भारतीय थल सेना का कार्य राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद की एकता सुनिश्चित करना, राष्ट्र को बाहरी आक्रमण और आंतरिक खतरों से बचाना और अपनी सीमाओं पर शांति और सुरक्षा बनाए रखना है।

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यह कविता (सैन्य कार्रवाई।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

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बादल।

Kmsraj51 की कलम से…..

Clouds | बादल।

हृदय क्षितिज में घर्राते बादल,
गर्जना छोड़, बरसात बरसा।
तृषित धारा के रोम-रोम की,
आज प्रिये तू , प्यास बुझा।

सुकून मिले अब विरहिणी को,
और न इसको यूं ही तड़पा।
सोया सपना अलसाई आंखें,
निज नेह से प्रिय तू , अब तो जगा।

है यौवन की पीड़ा, सावन- भादो की क्रीड़ा,
दादुर, मोर और पपीहरा के शोर।
मानस पटल पर आग लगी है,
दिल को लूट ले गया कोई, श्यामरा चोर।

कटे न कटती है रातें काली,
दिन, न सांझ, न कटती है भोर।
प्रेम की लगी है प्यास प्रिये अब,
रूप से रूह का रुख, करो इस और।

चंद लम्हों के मिलन से क्या होगा?
नीर नीरद का बह जाने दे।
मन की बातें मन मांझ रहे न,
रोक न मुझे, सब कह जाने दे।

दिन चार की है ये जिंदगानी सबकी,
कहने को हैं प्रिये, बहुतेरी बातें।
इक बार गुजरे दिन, जिंदगी के तो,
फिर बहुर न लौट के आते।

है जीवन वही जो दिल से जिया,
फिर न पछताना कि, अभी कुछ न किया।
आज माहौल प्रलय की मानिंद बना है,
कुछ हमने करा है, कुछ कुदरत ने किया है।

रह न जाए कुछ अधूरी बातें,
जीवन प्रिये अब थोड़ा है।
घनघोर घटा कुछ यूं न बरसाना,
जिन्होंने, सब्र – बांध ही तोड़ा है।

हो जाने दे रिमझिम बारिश,
बरसात तो प्रिय अब आनी है।
बिरह बदरी बन घुमड़ रहा है,
आत्म निवेदन – नेह का पानी है।

घनश्याम पिया के संदेशे ले – ले,
आती नीरद की जलधारा है।
कब तक, विरहिणी वेदना झेले?
यह जीवन कितना प्यारा है?

भीग जाने दे दिल के दरी खाने,
कलेजा भी ठंडा हो जाए।
मिल जाने दे नदी समंद में,
एक दूजे में प्रिये बस खो जाने दे।

सिर्फ गरजते मत रहना रे ओ बादल,
बरसात तो अब तू आने दे।
सदियों पुराना बिछड़ा यार,
रूह को अब तो तू पाने दे।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — प्यार एक खूबसूरत एहसास है। एक व्यक्ति जिसके पास प्यार भरा दिल है, वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता है। वह हर किसी से प्यार करता है जैसे हम जो देते हैं वह हमें मिलता है। इसलिए, अगर हम प्यार देते हैं तो हमें बदले में प्यार मिलता है और यह हमारे जीवन को सुंदर बनाने की शक्ति रखता है। सच्चा प्यार रूह का रूह से होता है, और सच्चे प्यार में समय का बंधन नहीं होता है। सच्चे प्यार में दो जिस्म एक जान की कहानी होती है।

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यह कविता (बादल।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

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योग।

Kmsraj51 की कलम से…..

Yog | योग।

अण्ड – ब्रह्माण्ड की महा विद्या है, योग जिसका नाम है।
यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान है॥
समाधि जिसकी चर्म अवस्था, जिसमें तत्व का ज्ञान है।
योग सिखाए जीव को भक्ति – मुक्ति और ब्रह्म ज्ञान है॥

मिथ्या जगत और ब्रह्म सत्य है, यही तो योग का सार है।
परम ब्रह्म ही शाश्वत है इस जग में, नश्वर यह संसार है॥
पीढ़ी दर पीढ़ी ले आना, इसे, यह गुरुओं का उपकार है।
निरोगी काया प्रभु की छाया सत है, बाकी सब विकार है॥

स्थूल जगत में रमता है भोगी, सूक्ष्म से योगी को प्यार है।
मैं और मेरा प्रभुत्व लालसा, यह तो नीरा ही अहंकार है॥
योगी को प्यार अंतर्जागत है, भोगी को तो बाह्य संसार है।
योग जगत की परा विद्या, इस पर ज्ञानी का अधिकार है॥

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — आओ हम सब मिलकर, योग दिवस मनायें। पद्मासन हो वज्रासन हो, या हो चकरा आसन, ध्यानमग्न हो बैठ जायें, बिना करे प्राशन। आओ हम सब मिलकर योग दिवस मनायें। हर रोज़ सुबह के समय योग करने के फायदे अनमोल है – यह हमारी पहली सांस को पुन: चक्रित करता है। योग का अभ्यास करने से शरीर किक-स्टार्ट होता है। ह्रदय रोग से बचाव करता है योग। दिमाग सदैव ही रहता है एक्टिव। बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता। योग के द्वारा सांसों को साध कर परमानन्द की अनुभूति किया जा सकता है। तन और मन को निरोग रखने के लिए प्रतिदिन योग करे।

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यह कविता (योग।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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नया साल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ नया साल। ♦

यह नया साल हमारा और वह तुम्हारा,
हैप्पी न्यू ईयर, नव संवत्सर की बधाई।
जश्न तो नए साल का है दोनो जगह पर,
फिर भी है भावों और विचारों की लड़ाई।

न जाने क्यों नफ़रत सी होती है मन में मुझे,
अंग्रेजी नव वर्ष के हर एक बधाई संदेश से।
जब ये नहीं मानते हैं नव संवत्सर हमारा तो,
मैं कहीं धोखा तो नहीं कर रहा हूं स्वदेश से?

हम क्यों भूल दें जी सनातन तहजीब हमारी?
और उपनिवेशवादियों का सब अपनाते चले।
भौतिक वैभव तो लूट ही गए थे हमारा ये सब,
और आज भावों से भी जाए क्यों हम ही छले?

आज, मंजूर है मुझको इनका हर त्यौहार मानना,
पर ये भी तो हमारे पर्वों को मिलजुल कर मनाएं।
पर हां, यह तो नहीं चलेगा कि हर बार ये इठले,
और हम हमेशा बस यूं ही मौन रह मुंह की खाएं।

ताली कहां सुना है बजाते तुमने एक हाथ से भाई,
आओ मिलकर मित्रवत दोनों ही हाथों से बजाएं।
हमने अपनाया आपका बहुतेरा है जी आज तक,
तुम भी तो संस्कृति का कुछ हमारी जी अपनाएं।

हमारे नव संवत्सर में मौसम नूतन वसंत है आता,
तुम्हारे नव वर्ष में आती महज पतझड़ और सर्दी।
अपनाने दो हमे भी कुछ अपनी ही संस्कृति का,
तुम्हारी नकल की तो हमने आज हद ही है कर दी।

लिवास तुम्हारे हैं, है हर एक अजब अंदाज़ तुम्हारा,
हमारे पास तो आज बचा ही क्या कुछ है हमारा?
अन्दर से बाहर, कुछ भी देखो, पैंट कोट चाहे शरारा,
चिन्तित हूं कि क्यों रंगा है पछुआ रंग में देश हमारा?

फैला दिया है जैसे रायता सा मेरे देश में तुमने आज,
छोड़ा ही क्या है तुमने आज शेष, बाकी देने लेने को?
कुछ तो रहने दो हमारे भी शेष अपनी संस्कृति का,
हमारे पास भी कोई थाती हो, नई पीढ़ी को देने को।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — अब भी समय है संभल जाओ, वर्ना अपनी संस्कृति सभ्यता का शायद फिर सुगंध भी सुलभ न होगा। वैसे जश्न तो नए साल का है दोनो जगह पर फिर भी है भावों और विचारों की लड़ाई। न जाने क्यों नफ़रत सी होती है मन में मुझे, अंग्रेजी नव वर्ष के हर एक बधाई संदेश से। जब ये नहीं मानते हैं नव संवत्सर हमारा तो, मैं कहीं धोखा तो नहीं कर रहा हूं स्वदेश से? जरा सोचे हमने क्यों भूला दिया अपने सनातन तहजीब को? हमारी भौतिक वैभव तो लूट ही गए थे हमारा ये सब, और आज भावों से भी जाए क्यों हम ही छले? आज, मंजूर है मुझको इनका हर त्यौहार मानना, पर ये भी तो हमारे पर्वों को मिलजुल कर मनाएं। हमारे नव संवत्सर में मौसम नूतन वसंत है आता, चारों तरफ हरियाली और खुशियां ही खुशियां और तुम्हारे नव वर्ष में आती महज पतझड़ और सर्दी। अब तो लिवास तुम्हारे हैं, है हर एक अजब अंदाज़ तुम्हारा, हमारे पास तो आज बचा ही क्या कुछ है हमारा? फैला दिया है जैसे रायता सा मेरे देश में तुमने आज, छोड़ा ही क्या है तुमने आज शेष, बाकी देने लेने को हमारे पास? कुछ तो रहने दो हमारे भी शेष अपनी संस्कृति का, हमारे पास भी कोई थाती हो, अपनी नई पीढ़ी को देने को।

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यह कविता (नया साल।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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वीरों की सदा से जाया है।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ वीरों की सदा से जाया है। ♦

यह धरा नहीं है अधीरों की,
यह वीरों की सदा से जाया है।
टीका नहीं है कोई इस धरा पर सदा,
हमने संघर्षों से सबको हटाया है।

आए कई और गए कई है,
सदियों से यहां आतताई हैं।
हम लड़े – भिड़े छल छद्म हटाया,
आज भी पछुआ से हमारी लड़ाई है।

दया धर्म को हटाने चले जो,
हमने उनको सबक सिखाना है।
जो इठला रहे हैं फूहड़ कामयाबी पर अपनी,
उन्हे औंधे मुंह गिराना है।

आओ मिलकर प्रयत्न करे हम,
संस्कृति विभंजकों को सबक सिखाना है।
पछुआ जीत का परचम फहराने वालों को,
हर हाल में धूल चटाना है।

भारत के खोए गौरव को फिर से,
विश्व पटल पर स्थापित करवाना है।
अभिभूत होकर के सब कह उठे कि,
चलो, भारत दर्शन को हमने जाना है।

कोई खून खराबा नहीं चाहते हैं हम,
बस कागज पर कलम चलाना है।
पछुआ ज्ञान को हटा कर भारत का,
मूल ज्ञान सबके सामने लाना है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह भारतभूमि सदा से ही वीरों की भूमि रही है भारत मां के वीर सपूतों ने इतिहास में स्वर्णिम अध्याय रचा है ये सभी अपनी मातृभूमि को स्वर्ग से भी अधिक महान और पवित्र मानने वाले देश के ऐसे सपूत हैं जिन पर पूरा देश सदैव ही गर्व करता है। वर्तमान में भी वीरता की इस परंपरा को बरकरार रखते हुए हमारे बहादुर सैनिक बॉर्डर पर अपना फर्ज बखूबी निभाते हैं।

—————

यह कविता (वीरों की सदा से जाया है।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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बलिदानी क्या सोचेंगे?

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ बलिदानी क्या सोचेंगे? ♦

ओ पदवी के सब चाहवानों! अब तो पदवी का मोह छोड़ो।
अपनी गलती का ठीकरा प्यारो, दूसरों के सर पर न फोड़ों।

देश हमारा, हम सब हैं इसके, ध्रुवीकरण से इसे मत तोड़ो।
खैर जो चाहते हैं गर अपनी तो, जर्रा – जर्रा देश का जोड़ो।

रोप के पौधा आजादी का, पल्वित पुष्पित कर जो चले गए।
क्या बीतेगी दिल पर उनके? देखे सपने जो उनके छले गए।

जाति धर्म की बाट कहां जोही? समता ही जिनका स्वप्न रहा।
विषमता विश्व से मिटाने के खातिर, निरंतर कड़ा संघर्ष सहा।

वे बलिदानी क्या सोचेंगे? जब हमको लड़ता भिड़ता देखेंगे।
“बेकार हुई सब मेहनत हमारी,” हम पर तो लानत ही फेंकेंगे।

राष्ट्र बड़ा है स्वार्थ से पगलो, कभी कुछ तो खुद पे शर्म करो।
सत्ता के महल की नीव में यारो, ईमान – धर्म की कंक्रीट भरो।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

—————

  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — ओ पदवी के सब चाहने वालो, अब तो अपने पदवी का मोह छोड़ो और अपनी गलती का ठीकरा प्यारो, दूसरों के सर पर न फोड़ों। ये देश हमारा व हम सब हैं इसके, ध्रुवीकरण से इसे मत तोड़ो, अपनी सलामत अगर चाहते हैं तो, जर्रा – जर्रा देश का जोड़ो। रोप के पौधा आजादी का, पल्वित पुष्पित करके जो महानायक देशभक्त चले गए, जरा सोचों क्या बीतेगी दिल पर उनके? देखे सपने जो उनके छले गए तुम्हारे अपने निजी स्वार्थ के कारण। जाति धर्म से ऊपर उठकर सदैव समता ही जिनका स्वप्न रहा। नफ़रत को विश्व से मिटाने व आज़ादी के खातिर, निरंतर कड़ा संघर्ष सहा। कभी सोचा है की वे बलिदानी क्या सोचेंगे? जब हमको लड़ता भिड़ता देखेंगे। “बेकार हुई सब मेहनत हमारी,” हम पर तो लानत ही फेंकेंगे। एक बात याद रखना राष्ट्र बड़ा है स्वार्थ से पगलो, कभी कुछ तो खुद पे शर्म करो। अब तो सत्ता के महल की नीव में यारो, ईमान – धर्म की कंक्रीट भरो।

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यह कविता (बलिदानी क्या सोचेंगे।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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