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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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article by author vivek kumar

हे छठी मईया भर द झोलिया हमार।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हे छठी मईया भर द झोलिया हमार। ♦

आस्था और विश्वास का, सबसे अनूठा पर्व,
कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को आता, यह महापर्व।
षष्ठी तिथि के कारण इसे, कहा जाता छठ, होता है गर्व,
मनोवांछित फल पाने की लालसा में, व्रती करती सब्र।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

चार दिनों का यह पावन पर्व, अतुल्य अनमोल,
साक्षात ईश्वर के दर्शन का, बड़ा ही है मोल।
नहाय खाय से इस व्रत का, होता है आगाज,
दिल में लिए समर्पण भाव, व्रती करती काज।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

चार दिनों के पर्व में पहला दिन, होता काफी अहम,
घर की साफ सफाई से हर व्रती, शुरू करती काम।
कद्दू की सब्जी का उस दिन, महत्तम है अपार,
सबसे बड़े इस पर्व की महिमा है अपरम्पार।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

पर्व का दूसरा दिन खरना या लोहंडा काफी खास,
इस दिन व्रती करती पूर्ण उपवास।
बड़े निर्मल मनोभाव से बनाती प्रसाद, लेकर आस,
सूर्यदेव को नैवैद्य दे, करती एकांतवास।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

36 घंटों के व्रत के तीसरे दिन, पूरी होती मुराद,
मिलन की आस, संध्या अर्घ्य देती, संग प्रसाद।
प्रसाद में ठेकुआ, इस पर्व को बनाता खास,
सभी व्रती सूर्यदेव की कर पांच परिक्रमा, नमाती शीश।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

महापर्व का अंतिम दिन सूर्योपासना के बाद,
उषा अर्घ्य दे पूर्ण करती व्रत, उठाकर प्रसाद।
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए,
प्रसिद्ध लोकगीत, हर छठ व्रती गुनगुनाती जाए।
व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

अंत में इस पर्व का विशेष महत्व, सुने सज्जन जन,
ऐसी मान्यता है अपार, व्रत करे जो सच्चे मन।
छठी मईया पूरी करती, मन में हो जो जतन,
मुरादे होती पूरी, होता जग का कल्याण।
इसलिए व्रती लगाती एक ही छठी मईया से गुहार,
हे छठी मईया भर द झोलिया हमार॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — छठी मैया का व्रत को कैसे करना है? छठी मैया का व्रत करने से अनादि काल से ही लोगों को सूर्यदेव से मन चाहा फल मिलता आया है। समय समय पर जिस किसी ने भी सच्चे मन से छठी मैया का व्रत रख कर सूर्य देव की आराधना की है उसे जरूर मनोवांछित फल मिलता है। इस व्रत को कुवारी कन्या नहीं रख सकती। जिस जिस ने पूजा सच्चे मन से सूर्य देव को किया उनका कल्याण सूर्य देव ने। आओ मिलकर सूर्य भक्ति में छठ की अलख जगायें। करें वंदना चार दिनों तक, दो दिन नमक न खाएं। अस्ताचलगामी सूर्य देव को अर्घ्य प्रथम चढ़ाएं। होते सवेरे दूसरे दिन फिर जाकर सूरज को मनाए।

—————

यह कविता (हे छठी मईया भर द झोलिया हमार।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली। ♦

दो शब्दों की दिवाली लाती घर-घर खुशहाली,
दीप से दीपक बना श्रृंखला बनाती आवली।
खुशियों से दामन भर जाती भरकर थाली,
मन की तरंगे संग मिल जाती होती मतवाली।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

दिवाली तमस मिटाती घनघोर घटा काली,
मन में फैले अंधियारों को दूर भगाने वाली।
राम का सत्कर्म सत्य की आभा दिखलाती,
जन-जन को संदेश है देती असत्य है नाली।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

तमसो मा ज्योतिर्गमय: है बताती दीपावली,
दीपों की चमक से जगमगाती अमावस्या की काली।
दिवाली बुराई पर अच्छाई की जीत बतलाती,
अज्ञानता पर ज्ञान और निराशा पर आश है लाती।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

हमारा मन खाली रहता है हम करते काली,
अगर हमें चाहिए हर घर सुख शांति वाली।
मन के काली को इस दिवाली करनी होगी लाली,
सबके घर लक्ष्मी मईया भरकर देंगे झोली।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

दीप से दीप मिले बन जाती एकता निराली,
मन से मन आज मिल जाए बजेंगी सद्भावना की ताली।
हर दिल को साफ करती है हमारी दिवाली,
आज मिलकर प्रण करें मिटायेगे दिलों की काली।
दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — संस्कारों का, धैर्य का, इंसानियत, ईमानदारी व भाईचारे के लिए भी एक ज्योत जगा लो। हम सब जानते है की सदैव से ही त्याग का प्रतीक है दीप और सत्य की मशाल है दीप। अपने मन मंदिर में एक दीप जला लो, सुकून का एक ज्योत जगा लो। दिवाली तमस मिटाती घनघोर विकारों वाली घटा काली, सदैव से ही मन में फैले अंधियारों को दूर भगाने वाली दिवाली। राम का सत्कर्म सत्य की आभा दिखलाती ये दिवाली, जन-जन को संदेश है देती असत्य है समान नाली के, दिवाली बुराई पर अच्छाई की जीत बतलाती, अज्ञानता पर ज्ञान और निराशा पर आश है लाती। मन के इस काली को इस दिवाली करनी होगी लाली, सबके घर लक्ष्मी मईया भरकर देंगे झोली। हर दिल को साफ करती है हमारी दिवाली, आज मिलकर प्रण करें मिटायेगे दिलों की काली। दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली।

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यह कविता (दिवाली जीवन में लाती भरकर खुशहाली।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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मिट्टी का दिया।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ मिट्टी का दिया। ♦

अरमानों की साज सजा लो,
हर घर को तुम सजा धजा लो।
अपने मन मंदिर में एक दीप जला लो,
सुकून का एक ज्योत जगा लो।
धैर्य का तुम आस जगा लो,
मिट्टी के तुम दिए जला लो।
मिट्टी के तुम दिए जला लो॥

त्याग का प्रतीक है दीप,
सत्य की मशाल है दीप।
खुद जलकर औरों को करता रौशन,
खुशहाली का राग है दीप।
दिलवालों का प्यार है दीप,
मन मंदिर में इसे बसा लो।
मिट्टी के तुम दिए जला लो॥

ईमानदारी का झंडा दो गाड़,
इसके लिए एक दीप जला लो।
भाईचारे की कर लो बात,
चुपके से एक दीप जला लो।
इंसानियत का जब हो भान,
इसके लिए भी दीप जला लो।
मिट्टी के तुम दिए जला लो॥

मन का तमस आज भगा लो,
भाग दौड़ भरी जिंदगी में,
सुकून के एक दीप जला लो,
संस्कारों को तुम अपना लो।
सुख शांति जीवन में आएं,
सबके लिए एक दीप जला लो।
मिट्टी के तुम दीए जला लो॥

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

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• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से समझाने की कोशिश की है — संस्कारों का, धैर्य का, इंसानियत, ईमानदारी व भाईचारे के लिए भी एक ज्योत जगा लो। हम सब जानते है की सदैव से ही त्याग का प्रतीक है दीप और सत्य की मशाल है दीप। अपने मन मंदिर में एक दीप जला लो, सुकून का एक ज्योत जगा लो। मिट्टी के तुम दिए जला लो।

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यह कविता (मिट्टी का दिया।) “विवेक कुमार जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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