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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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Positive Soul

सन् 1600 बनाम सन् 2014 – 40 ~ Year 1600 vs. Year 2014 – 40 !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..


kmsraj51 की कलम से …..
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** सन् 1600 बनाम सन् 2014-40 ….. **

वर्तमान दौर चाहे वह राजनीति का हो या आर्थिक या फिर इस देश के चिर-संस्कारों से निर्मित नैतिक मूल्यों का ये सभी एक बहुत ही भयावह दौर से गुजर रहे हैं शायद कुछ लोग जो विद्वता के धनी है इसे संक्रमण काल के नाम से भी जानते हैं तो कुछ लोग इसे विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोगवाद कह रहे हैं लेकिन यह समय मात्र और मात्र एक सच्चे भारतीय जो इसकी अखंडता एवं गौरवमयी इतिहास से थोड़ा भी सरोकार रखता है, के लिए बहुत ही विषम एवं चिंताजनक है स्पष्ट रुप में कहें तो बहुत ही भयावह है।
इतिहास गवाह है कि इस देश की मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि इसने एक से एक संस्कारी महापुरुष तथा देशभक्त पैदा किए हैं लेकिन यह इस मिट्टी का दुर्भाग्य है कि विनाशकारी खरपतवार के रुप में यहां जयचंदों ने भी जन्म लिया है तथा इस पावन धरा को कलंकित किया है। आज का भारत भी इसी दौर से गुजर रहा है जहां ख्ररपतवार इतना बढ़ गया है कि अब पोषक फसलें नज़र ही नहीं आती और यह स्थिती केवल राजनीति ही नहीं कमोबेश हर क्षेत्र की हैं। इसका मात्र और एक मात्र कारण हमारे चिर-संस्कारों एवं मूल्यों का ह्रास होना है। मूल्यों एवं आदर्शों का प्रवाह सदैव शीर्ष से होता है और कहा भी है कि यथा राजा-तथा प्रजा लेकिन आज अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए हमारे देश के कर्णधार नेतृत्व कर्ताओं ने इस उक्ति को ही बदल दिया और बयान दिया कि जैसी जनता है वैसे ही नेतृत्व कर्ता बनेंगे अर्थात ये लोग जनता के इच्छानुसार ही अपने हित साधन के लिए सारे अपराध एवं भ्रष्ट तंत्र को बढ़ावा दे रहे हैं। आखिर वो कौन सी प्रजा या जनता है जिसने राजा को भ्रष्ट एवं डकैत बनने के लिए जनादेश दिया? शायद इसका उत्तर यह है कि इस देश में जनता या नागरिक नाम की कोई व्यवस्था अब अस्तित्व में ही नहीं है यहां केवल उपभोक्तावादी संस्कृति के पोषक मतदाता रहते हैं जिन्हें कोई भी खरीद सकता है तथा ये तथाकथित मतदाता भोली चिड़ियाओं की भांति किसी भी बहेलिए के जाल में फंसने को आतुर है। फिर चाहे वह बहेलिए देशी हो या विदेशी इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लालच ने संवेदनाओं को मृत प्राय: कर दिया है। इन चिड़ियाओं को स्वतंत्र आसमान से बेहतर सुख-सुविधा युक्त वो स्वप्निल सोने का पिंजड़ा अधिक रास आने लगा है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं और जो मात्र और मात्र एक छलावा भर है।

आज इस देश की जनता को देश के प्रोफाईल से अधिक अपना हाई प्रोफाईल प्रिय है कमोबेश आज हमारा देश गुलामी से पहले के उसी दौर से गुजर रहा हैं। जनता विभिन्न मुद्दों पर आपस में बंटी हुई है चाहे वो आरक्षण का मुद्दा हो या राज्यवाद या फिर धर्म या जातिवाद का चारों और विघटनकारी शक्तियों का बोलबाला हैं हर आदमी ने अपने चारों और अपने स्वार्थों का एक घेरा बना रखा है तथा इस घेरे या उसके क्षुद्र स्वार्थों को नुकसान पहुंचाने वाला हर आदमी उसका शत्रु है। इस देश में अपनी जातिगत गौरव गाथा गाने वाले इतने जातिगत व धार्मिक सामाजिक संगठन है जिनको शायद गिनना भी संभव नहीं होगा लेकिन दुर्भाग्य है कि वे महापुरुष जो राष्ट्र के लिए एक होकर लड़े उनको भी इन कम्बख्तों ने अपने स्वार्थ के अनुरुप बांट दिया । आज कहीं भी अखिल भारतीय समाज नाम की कोई संस्था नही है क्योंकि सभी ने अपने आपको कई सांचों में बांट लिया है तथा सभी के अपने अपने हित हैं जिनके लिए वे लड़ रहे है उनकी तरफ से देश भले गर्त में जाए कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उन्हें यह पता नही कि जब तक यह देश अखंड एवं सुरक्षित है तभी तक उनका या उनके समाज का अस्तित्व है: आज की युवा पीढ़ी को एक अदद नौकरी और सुख सुविधा युक्त घर से अधिक सोचने की जरूरत महसूस नहीं होती देश के विषय में या अपनी सभ्यता संस्कृति के बारे में मनन करने का कोई औचित्य नहीं हैं अपने घर की बनी रोटी भी यदि विदेशी पेकिंग में दी जाती है तो खुशी होती है। आज कमोबेश हर दूसरा आदमी मानसिक गुलामी के दौर से गुजर रहा है राष्ट्र छद्म अराजकता के वातावरण से गुजर रहा है। क्या यही स्वतंत्रता है? विकास के नाम पर अपने स्वाभिमान, राष्ट्रीय संस्कृति को भूलाना तथा भौतिकता के चकाचौंध में प्राकृतिक संसाधनों का बंदरबांट कर देश को रसातल की और ले जाना, क्या आजादी का यही मतलब है?

आज के दौर की तुलना भारत के राजपूतकालीन समय से की जा सकती है जब भारत कई छोटी- छोटी रियासतों में बंटा हुआ था तथा ये रियासतें छुद्र स्वार्थों की पूर्ती हेतु आपस में लड़ती रहती थीं। विलासिता एवं अकर्मण्यता की पर्याय बन चुकी ये रियासतें अंदर से जर्जर हो चुकी थी।परिणामस्वरूप ये रियासतें कमजोर होती गईं विदेशी आक्रांताओं ने अपनी हवस एवं बेलगाम क्षुधा की पूर्ति हेतु इसा पावन धरा को कलुषित किया ताकत का एक बड़ा भाग भारतीय समाज कई बुराईयों जैसे छुआछुत, उच्श्रंखल जातिवाद , संप्रदायवाद इत्यादि में जकड़ा हुआ था तो क्या आज कमोबेश हमारे सामने वही परिदृश्य नहीं दिखाई दे रहा है। किसी ने क्या खूब कहा है कि इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता है पर क्या इतने कम अंतराल पर और क्या हम इससे सीख लेने के बजाय इसकी पुनरावृति होने देंगें। आज ये छोटे-छोटे राज्य जो कि नदी के पानी, भाषा, खनिजों के आधिपत्य के लिए न्यायालय में हाजिरी दे रहे हैं और सैकड़ों पार्टियां जो क्षुद्र स्वार्थों के लिए जनता को सब्ज बाग दिखा कर उनका वोटा हासिल कर रही हैं तत्पश्चात उसी जनता का शोषण तो क्या ये आजादी और उससे भी पूर्व अंग्रेजों के आगमन के समय का परिदृश्य प्रस्तुत नहीं कर रही है तथा जनता लाचार कई मतभेदों में उलझी हुई निरिह बनी सब कुछ सहने को विवश है।अगर इसी का नाम आजादी है तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश के गद्दार इस देश की अमूल संपदा के साथ-साथ यहां के कथित मतदाताओं के भविष्य का भी किसी विदेशी के हाथों सौदा कर दें तथा बाद में कहें कि जीडीपी बढ़ाने के लिए यह जरूरी था।
जिस देश के पड़ोसी ताकतवर, कूटनीतिक एवं साम्राज्यवादी हों उस देश का राजनैतिक व नैतिक पतन की ओर अग्रसर होना उसके दुश्मनों के मार्ग को और सुगम बना देता है तथा वह देश बिना किसी युद्ध के ही गुलाम बनाया जा सकता है क्योंकि किसी देश का नेतृत्व ही उस देश की समृद्धि और ताकत का आईना होता है जिसमें उस देश की बाकी आवाम की झलक देखी जा सकती है।

संजय मिश्र “सदांश”

नोट: यह रचना किसी विशेष वर्ग, समुदाय या व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं है, न ही हमारा उद्देश्य किसी के दिल को ठेस पहुंचाना है । यह लेख पूर्ण रुप से मां भारती को समर्पित है। यदि कोई तथ्य किसी से मिलता है तो यह संयोग मात्र होगा।

** Important Note:: यह लेख संजय मिश्रा द्वारा शेयर किया गया है !! http://kmsraj51.wordpress.com/ **
पर ** दिल से धन्यवाद संजय भाई !! **
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** संजय मिश्रा **

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Soul Sustenance & Message for the day 17-12-2013 !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..

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** Soul Sustenance & Message for the day 17-12-2013 **

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Soul Sustenance 17-12-2013
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Living Life On The Surface

In an ideal situation, the thoughts that run in my mind, should be exactly those that I would like and I want. We do exert this control, that we possess, over our thoughts, but it is not complete and it is only sometimes. The more we become completely engrossed in our daily routine, the more our thoughts tend to become reactions to what goes on outside us. That’s when they go out of control and our lives move in an unfocused way. As a result things don’t work out as we might have desired. Then we develop a habit of blaming other people and circumstances, or we justify our pain by telling ourselves we are not very worthy or powerful enough. Often, these two inner strategies go together. The trouble is, both are cover ups, preventing us from going for a long-term solution.

In this way, we tend to live our lives on a very superficial level, without taking the time to find the solution to what is going on wrong inside. Deeper difficulties remain hidden inside. I move from one scene of life to another – eating, watching television, studying in college, getting married, changing jobs, buying a new car or house, etc. without ever stopping. All these are part of living, but if I make them my whole and sole, my foundation, it’s as if I skate across the surface of life without being in touch with the core. As time progresses, an inner shallowness develops. Then the feeling keeps growing inside that ‘there must be more to life than this’. I then, find that my relationships are not working out as I would have hoped and they are lacking in depth.

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Message for the day 17-12-2013
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Easy nature makes tasks easy.

Expression: The ones with an easy nature constantly think of solutions instead of problems. So such individuals are free from the burden of problems and are constantly contributing to make things easy for themselves and others too. The right environment to bring out the best result is naturally created by them.

Experience: When I have an easy nature, I am able to put a full stop in a second with great ease. I am not caught with the waste questions and exclamations. So I am able to enjoy everything that comes my way and move forward constantly with lightness.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris
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Soul Sustenance & Message for the day 14-12-2013 !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..


kmsraj51 की कलम से …..
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Soul Sustenance 14-12-2013
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Self Empowerment

Meditation, in practice, means to enter, and re-enter, the reservoir of peace inside us whenever we need to during the course of the day. This exercise increases self-control and prevents the explosions and reactions of anger that drain our strength. The easy method is not to expect but to accept: then tolerance and respect make our life far more comfortable.

There may be many shadows and pollutants inside us, but usually our pain is centered around these: I own, I need, I want, mine and I expect. If we learn to recognize the characteristics of such a consciousness, we are in a position to overcome difficult situations and thoughts before they overwhelm us. We simply have to remain awake, and that state of alertness stops these shadows from overpowering us and making us unconscious.

Our needs and wants are truly fulfilled in a healthy way by tuning in to the original resources of the soul, because their fulfillment is not dependent on anyone, or anything from outside. When we sustain ourselves from the inside, then our well-being is secure and progressive. As a result, when we express and show our original qualities of the self to others, whether it is peace, happiness or love, they naturally increase inside. The more we give unconditionally, the more we have. This miracle of ‘quality being’ is the result of natural purity, the original state of selflessness, which God always has and good meditators aspire to return to.

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Message for the day 14-12-2013
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Real contentment spreads happiness to others too.

Expression: When one feels contentment but the others are not able to perceive that contenetment, it means that it is not true contentment. Real contentment is visible in such a way that others too are able to feel the happiness that is created. When there is real contentment, all thoughts, words and actions are filled with quality.

Experience: When I am content, others automatically recognise the contentment within me. They are able to take benefit from my state. Even in the most hopeless state, I find that I become a source of support for those around me. I am able to give hope to the hopeless and help them get back to a state of happiness.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris


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Message for the day 12-11-2013 !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..


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The one who has the power to face is free from tensions.

Projection: To be good with those who are good is quite natural, but to be good with those who are bad is known as having the power to face. This naturally comes when there is the power to transform even that which in negative into something positive. When there is the power to face, there is no retaliation, no conflict. There is love given to all around.


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Solution: When I am able to transform and look at each and everything in a positive way, I will not have any difficulty with any situation. I will naturally be able to face all situations in a light and easy way. When I am able to be free from tension in this way, I am also able to give my best and thus become an inspiration for those around me.

Note::-


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50 Great Quotations In Hindi !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..

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kmsraj51 की कलम से …..
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** 50 अनमोल वचन हिंदी में | 50 Great Quotations In Hindi **

1. जिसने ज्न्यान को आचरण में उतार लिया , उसने ईश्वर को मूर्तिमान कर लिया – विनोबा भावे

2. अकर्मण्यता का दूसरा नाम मर्त्यु है – मुसोलिनी

3. पालने से लेकर कब्र तक ज्ञान प्राप्त करते रहो – पवित्र कुरान

4. इच्छा ही सब दूखो का मूल है – गौतम बुद्ध

5. मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अज्न्यान है – चाणक्य

6. आपका आज का पुरुषार्थ आपका कल का भाग्य है – पालशिरू

7. क्रोध एक किस्म का क्षणिक पागलपन है – महात्मा गांधी

8. ठोकर लगती है और दर्द होता है तभी मनुष्य सीख पाटा है – महात्मा गांधी

9. अप्रिय शब्द पशुओ को भी नहीं सुहाते है – गौतम बुद्ध

10. नरम शब्दों से सख्त दिलो को जीता जा सकता है – सुकरात

11. गहरी नदी का जल प्रवाह शांत व गंभीर होता है – शेक्सपीयर

12. समय और समुद्र की लहरे किसी का इंतज़ार नहीं करती – अज्ञात

13. जिस तरह जौहरी ही असली हीरे की पहचान कर सकता है , उसी तरह गुनी ही गुणवान की पहचान कर सकता है – कबीर

14. जो आपको कल कर देना चाहिए था , वही संसार का सबसे का थीं कार्य है – कन्फ्यूशियस

15. ज्ञानी पुरुषो का क्रोध भीतर ही , शान्ति से निवास करता है , बाहर नहीं – खलील जिब्रान

16. कुबेर भी यदि आय से अधिक व्यय करे तो निर्धन हो जाता है – चाणक्य

17. डूब की तरह छोटे बनाकर रहो . जब घास -पात जल जाते है तब भी डूब जस की तस बनी रहती है – गुरु नानक देव

18. ईश्वर के हाथ देने के लिए खुले है . लेने के लिए तुम्हे प्रयत्न करना होगा – गुरु नानक देव

19. जो दूसरो से घृणा करता है वह स्वय पतित होता है – स्वामी विवेकानंद

20. जो जैसा शुभ व अशुभ कार्य करता है , वो वैसा ही फल भोगता है – वेदव्यास

21. मनुष्य की इच्छाओ का पेट आज तक कोइ नहीं भर सका है – वेदव्यास

22. नम्रता और मीठे वचन ही मनुष्य के सच्चे आभूषण होते है – तिरूवल्लुवर

23. खुदा एक दरवाजा बंद करने से पहले दूसरा खोल देता है , उसे प्रयत्न कर देखो – शेख सादी

24. बुरे आदमी के साथ भी भलाई करनी चाहिए – कुत्ते को रोटी का एक टुकड़ा डालकर उसका मुंह बंद करना ही अच्छा है – शेख सादी

25. अपमानपूर्वक अमरत पीने से तो अच्छा है सम्मानपूर्वक विषपान – रहीम

26. थोड़े से धन से दुष्ट जन उन्मत्त हो जाते है – जैसे छोटी , बरसाती नदी में थोड़ी सी वर्षा से बाढ़ आ जाती है – गोस्वामी तुलसीदास

27. ईश प्राप्ति (शान्ति ) के लिए अंत: कारन शुद्ध होना चाहिए – रविदास

28. जब मई स्वय पर हँसता हूँ तो मेरे मन का बोज़ हल्का हो जाता है – टैगोर

29. जन्म के बाद मर्त्यु , उत्थान के बाद पतन , संयोग के बाद वियोग , संचय के बाद क्षय निश्चित है . ज्ञानी इन बातो का ज्न्यान कर हर्ष और शोक के वशीभूत नहीं होते – महाभारत

30. जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढाकर है – अज्ञात

31. भरे बादल और फले वर्कश नीचे ज़ुकारे है , सज्जन ज्न्यान और धन पाकर विनम्र बनाते है – अज्ञात

32. सोचना, कहना व करना सदा सम्मान हो – अज्ञात

33. न कल की न काल की फिकर करो , सदा हर्षित मुख रहो – अज्ञात

34. स्व परिवर्तन से दूसरो का परिवर्तन करो – अज्ञात

35. ते ते पाँव पसारियो जेती चादर होय – अज्ञात

36. महान पुरुष की पहली पहचान उसकी विनम्रता है – अज्ञात

37. बिना अनुभव कोरा शाब्दिक ज्न्यान अँधा है – अज्ञात

38. क्रोध सदैव मूर्खता से प्रारम्भ होता है और पश्चाताप पर समाप्त – अज्ञात

39. नारी की उन्नति पर ही राष्ट्र की उन्नति निर्धारित है – अज्ञात

40. धरती पर है स्वर्ग कहा – छोटा है परिवार जहा – अज्ञात

41. दूसरो का जो आचरण तुम्हे पसंद नहीं , वैसा आचरण दूसरो के प्रति न करो – अज्ञात

42. नम्रता सारे गुणों का दर्द स्तम्भ है – अज्ञात

43. बुद्धिमान किसी का उपहास नहीं करते है – अज्ञात

44. हर अच्छा काम पहले असंभव नजर आता है – अज्ञात

45. पुस्तक प्रेमी सबसे धनवान व सुखी होता है – अज्ञात

46. सबसे उत्तम बदला क्षमा करना है – अज्ञात

47. आराम हराम है – अज्ञात

48. दो बच्चो से खिलाता उपवन , हंसते -हंसते कटता जीवन – अज्ञात

49. अगर चाहते सुख समर्द्धि , रोको जनसंख्या वर्द्धि – अज्ञात

50. कार्य मनोरथ से नहीं , उद्यम से सिद्ध होते है . जैसे सोते हुए सिंह के मुंह में मुर्गे अपने आप नहीं चले जाते – विष्णु शर्मा!

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Chankya Niti – मूल चाणक्य नीति!!

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** मूल चाणक्य नीति/चाणक्य सूत्र **


आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्यात हुए।

इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।

वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश –


1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।

2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता – ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।

3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।

4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

7. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।

8. ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा करना है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें। राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने बल को बढ़ाते रहें। वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन बढ़ाएँ, शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा करना है।

9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।

10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।

11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।

12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।

13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।

14. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।

15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।

17. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।

18. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

19. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।

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