Kmsraj51 की कलम से…..

Moh | मोह।
मोह भ्रम है पालता
खोने का डर है दिखाता ।
हर वक्त करीब करीब रहते
कहीं खो न जाए बस यही है कहते।
सबसे दूर हो जाते
पर मन की चाह पर काबू नहीं पाते।
डरावना सा मुहाल बना रहता
दूरी बढ़े तो खोने का डर है लगता।
जिसकी चाह मन में पालते
बस उसी के साथ की तमन्ना जताते।
विवेक बस में नहीं हो पाता
वही दुःख का कारण बन जाता।
मन स्वार्थ से भरा होता
फिर क्या चिंता और बेचैनी ही पाता।
मोह जहां जहां है पलता
वहीं गलतफहमियों का जन्म है होता।
इस जाल से बाहर जो है निकलता
उसका जीवन ख़ुशी ख़ुशी है बीतता।
♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦
मोह कैसे दुःख का कारण बनता है
जब किसी एक व्यक्ति या भावना से अत्यधिक जुड़ाव हो जाता है, तब दूरी असहनीय लगने लगती है। यही आसक्ति मानसिक तनाव और रिश्तों में टकराव को जन्म देती है।
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- “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में मोह को एक भ्रम के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो मन में किसी को खो देने का निरंतर भय पैदा करता है। व्यक्ति हर समय अपने प्रिय के पास रहना चाहता है और दूरी बढ़ने पर बेचैनी व असुरक्षा महसूस करता है। चाह इतनी प्रबल हो जाती है कि विवेक पर नियंत्रण नहीं रह पाता और वही चाह आगे चलकर दुःख का कारण बनती है।
कविता यह भी बताती है कि मोह स्वार्थ को जन्म देता है, जिससे चिंता, डर और मानसिक अशांति बढ़ती है। जहां मोह पनपता है, वहीं गलतफहमियाँ जन्म लेती हैं और रिश्तों में तनाव आता है। अंत में कवि संदेश देता है कि जो व्यक्ति इस मोह-जाल से मुक्त हो जाता है, उसका जीवन शांत, संतुलित और प्रसन्नता से भर जाता है।
👉 कविता में मोह को भ्रम और दुःख का कारण बताया गया है। मोह से खोने का डर, चिंता और गलतफहमियाँ जन्म लेती हैं। विवेक कमजोर पड़ जाता है और मन अशांत रहता है। जो व्यक्ति मोह से मुक्त हो जाता है, उसका जीवन सुख और शांति से भर जाता है।
👉 मोह को समझना और उससे ऊपर उठना ही सच्चे सुख की कुंजी है। यह कविता हमें भावनाओं पर नियंत्रण और विवेकपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देती है। 👉 मोह मनुष्य के जीवन में सबसे सूक्ष्म लेकिन प्रभावशाली भावनाओं में से एक है। यह प्रेम के रूप में प्रवेश करता है, लेकिन धीरे-धीरे भय, स्वार्थ और मानसिक अशांति का कारण बन जाता है। यह कविता मोह के इसी भ्रम और उससे मुक्ति के आध्यात्मिक संदेश को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है।
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यह कविता (मोह।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।
आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—
मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।
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