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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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हिंदी पोयम्स

हिमाचल की पुकार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Himachal Ki Pukar | हिमाचल की पुकार।

आज हिमाचल रो रहा है, चहुं ओर देख कर चीख पुकार।
टूटे पर्वत, सड़कें टूटीं, बहा गई नदियां कई लोगों के घरबार।

बेघर हुए, कई अनाथ हुए, कईयों का बह गया सब परिवार।
बेजुबां पशु भी बह गए, पेड़-पौधे तो बह गए लाख – हजार।

वह बह गया! वह ढह गया! रुको! भागो! बचो! – है यही गुंजार।
बस काया का कपड़ा ही शेष रहा, लुट गया बाकी का संसार।

लोगों की मदद लोग ही कर रहे, थक गई है हिमाचल सरकार।
पक्ष – विपक्ष में घमासान मचा है, कौन करेगा इसका उपचार?

सत्ता हो गई निरुत्तर-सी, कुदरत भी न कुछ सुनने को तैयार।
मानव मस्ती में चूर है, सुधारा किसने यहां अपना व्यवहार?

पेड़ काटना, अवैध खनन और गंदगी फैलाना देवों के दरबार।
मान बैठा है सुविधा – जीवी, मानव अपना मौलिक अधिकार।

देव-स्थल हो गए पिकनिक के अड्डे, होने लगे वहां व्यभिचार।
छोटों को रही न कद्र बड़ों की, तनिक भी रहा न शिष्टाचार।

तर्कवादी मानव न मानेगा, कुदरत तो चलाएगी अपने हथियार।
आत्म – शुद्धि कुदरत को भी करनी है, तू करता रह हाहाकार।

पढ़ाई-लिखाई से बुद्धि सठियाई, स्वार्थ बढ़ा और भ्रष्टाचार।
कायदे-कानून सब कागज में रह गए, बाकी मची है मारामार।

संभल ले मूर्ख मानुष अभी भी! बहुत बुरी कुदरत की मार।
आ गई अपनी पर तो छोड़ेगी न फिर, तुझे न तेरा कारोबार।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता यह कविता हिमाचल में आई प्राकृतिक आपदा और उसके कारण हुए विनाश को दर्शाती है। भारी बारिश और बाढ़ से पर्वत टूट गए, सड़कें बह गईं, घर उजड़ गए और कई लोग बेघर-अनाथ हो गए। पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी प्रकृति के इस कहर का शिकार हो गए। कवि बताते है कि इस संकट की घड़ी में लोग ही एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं, जबकि सरकार और सत्ता तंत्र निष्क्रिय और राजनीति में उलझा हुआ है। आपदा के पीछे का कारण भी मनुष्य का लोभ और स्वार्थ ही है – जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अवैध खनन, गंदगी फैलाना और धार्मिक स्थलों को पिकनिक स्पॉट बना देना। मानव ने संस्कार और शिष्टाचार भी त्याग दिए हैं। कवि चेतावनी देता है कि प्रकृति आत्मशुद्धि के लिए विनाश का मार्ग अपनाती है। यदि मनुष्य ने अब भी अपना व्यवहार और जीवनशैली नहीं बदली, तो कुदरत की मार और भी भयानक होगी।
  • 👉 कुल मिलाकर, कविता मानव को प्रकृति का सम्मान करने और समय रहते सचेत होने का संदेश देती है।

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यह कविता (हिमाचल की पुकार।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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देश भक्ति देख तुम्हारी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Desh Bhakti Dekh Tumhari | देश भक्ति देख तुम्हारी।

वाह रे सोफिया और व्योमिका,
कभी तुम बेटी बनी तो कभी मां,
पत्नी बनकर चमका दिया दो घरों का जहां।
चूल्हे चौके से लेकर देश सेवा का फर्ज़ निभाया,
तुमने दुनियां को दिखा दिया दुश्मनों का कैसे हो सफाया।

तुम्हारी कुशलता का नहीं कोई जबाब,
आड़े नहीं आने दिया कभी नारी स्वभाव।
दिन रात अपना फर्ज़ अदा कर रही हो तुम,
देश भक्ति देख तुम्हारी दुश्मनों के होश हुए गुम।

आज हर नारी अपने में तुम्हें है देखती,
अरे सोफिया और व्योमिका महान हो तुम ये हैं कहती।
ये हौंसला ये जज्बा कहां से है तुमने पाया,
दुश्मन है कांपते जब नज़र आता है तुम्हारा साया।

सोफिया-व्योमिका बोल उठी मां भारती,
तुम जैसी नारी की उतारे यहां सब आरती।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में सोफिया और व्योमिका जैसे बहादुर महिलाओं की वीरता और साहस की सराहना की गई है। कवि ने इन्हें उस आदर्श नारी का प्रतीक माना है, जो बेटी, मां, पत्नी और देशभक्त सभी रूपों में चमकती है। उन्होंने न केवल अपने घरों को संभाला, बल्कि देश की सेवा में भी अपना योगदान दिया, दुश्मनों का सामना करते हुए अपने कर्तव्यों को बखूबी निभाया। कविता में नारी की कुशलता, दृढ़ता और साहस को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है, जो कभी अपने नारीत्व को रुकावट नहीं बनने देतीं। उनकी देशभक्ति इतनी प्रबल है कि दुश्मन उनका नाम सुनते ही कांप उठते हैं। अंत में, कवि कहता है कि ऐसी नारी का सम्मान करना हर किसी का कर्तव्य है, और मां भारती खुद इन वीरांगनाओं को नमन करती है, जो नारी शक्ति का प्रतीक हैं।

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यह कविता (देश भक्ति देख तुम्हारी।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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संघर्ष है कहानी हर जीवन की।

Kmsraj51 की कलम से…..

Sangharsh Hai Kahani Har Jeevan Ki | संघर्ष है कहानी हर जीवन की।

Struggle is The Story of Every Life

ऊंचे शिखर से निकली नदियां,
कहां सागर से पहले रुकती हैं?
लाख दीवारों से रोके चाहे कोई,
वे डैम फांदती हैं न कि झुकती हैं।

कौन बनाता है कहां राहें कब उनको?
वे खुद ही अपनी राहें नित बनाती हैं।
कहीं चलती हैं सीधी धारा सी मैदानों में ,
कहीं पहाड़ों में टकरा कर बलखाती हैं।

सीधी चलना नदी की सरलता है होती,
बलखाना जीवन संघर्षों से टकराना है।
नदी का स्वभाव है हमेशा आगे बढ़ना,
रोकने में लगा रहता सदा ही जमाना है।

हो मंजिल कितनी अनजान या दूर,
वे बेपरवाह हो, अपना जल बहाती हैं।
लेती कहां है विश्राम वे राह में तब तक ?
जब तक वे प्रिय सागर में न मिल जाती है।

मंजिल को पाने की हो होड़ नदी सी तो,
सफलता क्यों किसी के कदम न चूमेगी?
हो सूरज सी नियमावली गर जीवन में तो,
दुनियां फिर उसके चारों ओर क्यों न घूमेंगी?

झुकती नहीं है दुनियां आज, कौन कहता है?
झुकती है पर इसको झुकाने वाला चाहिए।
समझती नहीं है दुनियां आज, कौन कहता है?
समझती है पर इसको समझाने वाला चाहिए।

ज्यों सागर में मिलकर विलीन है वे होती,
त्यूं जीवन अन्त में परम में मिल जाता है।
संघर्ष है कहानी हर जीवन की इस जग में,
खुशी का फुल संघर्ष धर्म में खिल जाता है।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता नदी के प्रतीक के माध्यम से जीवन के संघर्ष, आत्मविश्वास और निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इसमें बताया गया है कि जैसे ऊँचे शिखरों से निकलने वाली नदियाँ कभी अपनी मंजिल (सागर) से पहले नहीं रुकतीं, वैसे ही मनुष्य को भी बाधाओं से डरना नहीं चाहिए। चाहे रास्ते में कितनी भी दीवारें हों, संघर्ष से जूझते हुए आगे बढ़ते रहना ही जीवन का सार है। नदी कभी सीधे रास्ते पर बहती है तो कभी पहाड़ों से टकराकर बल खाती है, जो दर्शाता है कि जीवन में कभी सरलता होती है तो कभी कठिनाइयाँ आती हैं। लेकिन नदी का स्वभाव है निरंतर बहते रहना, और यह हमें सिखाता है कि लक्ष्य की प्राप्ति तक कभी रुकना नहीं चाहिए। कविता यह भी कहती है कि दुनिया को झुकाने या समझाने के लिए पहले खुद में दृढ़ता और नेतृत्व होना चाहिए। यदि हमारे जीवन में नियम सूर्य जैसे हों और मंजिल को पाने की ललक नदी जैसी हो, तो सफलता हमारे कदम जरूर चूमेगी। अंत में, जैसे नदी सागर में विलीन हो जाती है, वैसे ही मनुष्य का जीवन अंततः परम तत्व (ईश्वर) में विलीन हो जाता है। जीवन एक संघर्ष है, लेकिन इस संघर्ष में ही सच्ची खुशी और सफलता का फूल खिलता है।

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यह कविता (संघर्ष है कहानी हर जीवन की।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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हमारा क्या कसूर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hamara Kya Kasoor | हमारा क्या कसूर।

खुशी खुशी घूमने पहुंचे पहलगाम,
क्या पता था कि यहाँ हो जाएगा काम तमाम।
कोई विदेश से आया तो कोई अपने ही देश से,
हसीन वादियों का आनंद ले रहे थे बड़े शौक से।

एकाएक सन्नाटा सा छा है जाता,
किसी को कुछ भी समझ नहीं आ पाता।
गोलियों की आवाज़ जोर से है आती,
किसी से धर्म की तो किसी से कलमा पढ़ने की बात पूछी जाती।

हिन्दू शब्द जैसे ही सुनाई देता,
सीने में गोली दाग जान ले लेता।
कलमा पढ़ने में जो नहीं हुआ पास,
उसे भी जीने की नहीं रही थी आस।

हाथों से अभी मेहंदी का रंग भी नहीं था उतरा,
सुहाग उजाड़ कर जिन्दगी कर दी कतरा – कतरा।
आखिर कसूर क्या था जो गोलियों से उड़ाए,
अपने ही देश के तो थे हम कहाँ थे पराए।

♦ विनोद वर्मा जी / (मझियाठ बलदवाड़ा) जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — यह कविता पहलगाम जैसी सुंदर और शांत जगह पर हुई एक दर्दनाक घटना को दर्शाती है। कवि बताता है कि लोग खुशी-खुशी वहाँ घूमने आए थे, कोई विदेश से तो कोई देश के अन्य हिस्सों से, पर उन्हें क्या पता था कि यह यात्रा उनकी आखिरी बन जाएगी। अचानक वहाँ अफरा-तफरी मच जाती है, गोलियों की आवाजें गूंजने लगती हैं। कुछ लोग धर्म पूछकर जान लेने लगते हैं — अगर कोई हिन्दू निकले तो उसे गोली मार दी जाती है, और जो कलमा नहीं पढ़ पाते, उनकी भी जान नहीं बख्शी जाती। कविता उस दर्द को भी दर्शाती है जब नवविवाहित दुल्हनों की हाथों से मेहंदी का रंग भी नहीं उतरा था, और उनका सुहाग उजड़ गया। सवाल उठाया गया है कि आखिर उनका कसूर क्या था? वे तो अपने ही देश के नागरिक थे, फिर भी उन्हें पराया समझकर मारा गया। कुल मिलाकर, यह कविता धार्मिक असहिष्णुता और आतंक की भयावहता को उजागर करती है, साथ ही यह सवाल उठाती है कि जब अपने ही देश में लोग सुरक्षित नहीं हैं, तो इंसानियत कहाँ बची है?

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यह कविता (हमारा क्या कसूर।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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बज गया जीत का डंका।

Kmsraj51 की कलम से…..

Baj Gaya Jeet Ka Danka | बज गया जीत का डंका।

In that period a savior emerged from Madwan, the drowning man found a straw and the boat crossed the sea. The trumpet of victory was sounded.

बज गया, आज जीत का डंका,
जलने वाली है, भ्रष्टाचार की लंका।
फिर हुआ कलयुग में कृष्णावतार,
बंशी की धुन से तिरहुत का हुआ नैया पार।
शिक्षकों की बात अब सड़क से सदन तक,
पहुंचाने आए सूबे के कर्णधार रखकर सबकुछ ताक।

जीत नहीं स्वाभिमान की जंग छिड़ी है,
जुल्म ढाने वालों की होनी किरकिरी है।
कहा जाता शिक्षक समाज का दर्पण होता,
मगर यहां उसे ही है सताया जाता।
याद कीजिए वो दिन जब हम शिक्षामित्र हुआ करते थे,
वेतन के लिए मुखिया जी की जी हुजूरी किया करते थे।

उस दौर में उदय हुआ मड़वन से एक तारणहार,
डूबते को मिला तिनके का साथ हुआ बेड़ा पार।
शिक्षामित्र से नियोजित बने लिए हाथ में हाथ,
संघर्ष का कारवां आगे बढ़ा।
जुझारू अग्रदर्शी बंशी की बजी धुन,
मिला चाइनीज वेतनमान ताना बाना बुन।

जिसके बारे में सोचा न था उसे दिलाया,
शिक्षकों को वेतनमान का स्वाद चखाया।
पूर्ण वेतनमान की चली लंबी लड़ाई के थे सूत्रधार,
मोगैंबो के खौफ से सब थे सन्न लगाई दहाड़ पाया पार।
विखंडित शिक्षक समाज को लाया एक मंच,
शिक्षकों की एकता पर जिसने कसा तंज,
बंशीधर का पड़ा उसपर तगड़ा पंच।

ये मात्र जीत नहीं आगाज है,
अभी तो शुरुआत है अंजाम का इंतजार है।
ये जीत नहीं मिशाल है आलाधिकारियों के लिए काल है,
बज गया आज जीत का डंका,
जलने वाली है भ्रष्टाचार की लंका।

♦ विवेक कुमार जी – जिला – मुजफ्फरपुर, बिहार ♦

—————

• Conclusion •

  • “विवेक कुमार जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है —कविता में शिक्षक समाज के संघर्ष और उनकी जीत का वर्णन किया गया है। भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ लड़ाई को रावण की लंका के जलने से तुलना की गई है। शिक्षक समुदाय को जागरूक और संगठित करने में एक नेता, जिसे “मड़वन से तारणहार” कहा गया है, की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई है। इस संघर्ष में शिक्षकों को उनकी मेहनत का उचित वेतनमान और सम्मान दिलाने की दिशा में कई सफलताएं हासिल की गईं। कविता शिक्षक समुदाय की एकता, उनकी संघर्षशीलता और उनके अधिकारों की प्राप्ति की कहानी बयां करती है। यह जीत सिर्फ एक शुरुआत है, और इसे अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बताया गया है। कविता अंततः यह संदेश देती है कि शिक्षक समाज जब संगठित होकर प्रयास करता है, तो वह बदलाव और जीत का परचम लहरा सकता है।

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यह कविता (बज गया जीत का डंका।) “विवेक कुमार जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मैं एक शिक्षक हूं। मुजफ्फरपुर जिला, बिहार राज्य का निवासी हूं। भोला सिंह हाई स्कूल पुरुषोत्तम, कुरहानी में अभी एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। शिक्षा से शुरू से लगाव रहा है। लेखन मेरी Hobby है। इस Platform के माध्यम से सुधारात्मक संदेश दे पाऊं, यही अभिलाषा है।

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हिन्दी भाषा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Hindi Bhasha | हिन्दी भाषा।

Hindi Day is celebrated in India to commemorate the date 14 September 1949 on which a compromise was reached—during the drafting of the Constitution of India—on the languages that were to have official status in the Republic of India.

जो हिन्दी भाषा से नहीं होगा परिचित।
उसके लिए नहीं है हमारे पास कोई इज्जत।
हैलो हाय कहने वालो एक बार फिर सुन लो।
अपने मन में हिन्दी भाषा के विचार बुन लो।

हमने सुना था कि बच्चों को हिन्दी भाषा पढ़ाई जाती है।
मगर आज पैदा होते ही विदेशी भाषा सिखाई जाती है।
विदेशी भाषा पढ़ने वालों ने कर दिया एक नया काम।
थोड़ी बहुत हिन्दी भाषा बोलने वालों का जीना हो गया हराम।

आज हिन्दी भाषा का नहीं है उतना स्थान।
फिर भी लोगों के दिल में है कुछ अरमान।
आज विदेशों में भी लोग हिन्दी बोला करते हैं।
फिर हम हिन्दी बोलने से क्यों शरमाते है।

♦ विनोद वर्मा जी / जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — कविता में लेखक हिन्दी भाषा के महत्व को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं। वे इसके लिए यह कह रहे हैं कि हिन्दी भाषा को बढ़ावा देना आवश्यक है, और लोगों को यह बदलाव लाने के लिए अपने मन में हिन्दी के विचार बुनने की आवश्यकता है। कविता में यह भी कहा गया है कि विदेशी भाषा की पढ़ाई के बावजूद हिन्दी भाषा के प्रति लोगों की आकर्षण और समर्थन बढ़ गए हैं, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि अब विदेशों में भी लोग हिन्दी बोलते हैं, जबकि भारत में ही हिन्दी का महत्व कम हो गया है। आखिर में, कविता लोगों को हिन्दी का समर्थन देने की ओर प्रोत्साहित कर रही है और उन्हें शरम करने की जरूरत नहीं है।

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यह कविता (हिन्दी भाषा।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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शब्द-माला।

Kmsraj51 की कलम से…..

String of Words | शब्द-माला।

अभिनव रस परिरंभ से,
थरथराते बाला के वेश।
कंपकंपाते अधर पुट,
उड़ते मदहोश से केश।

चूमकर अचानक अभ्र को,
भाग जाना अति दूर।
अनुपम है अणुभा का रूप,
मंजुलता मोहकता से चूर।

अविनीश के हाथों का परस,
पाकर व्याकुल कुछ-कुछ ऊब।
मृणालिनी का जल में जाना,
आकंठ तक डूब।

पुष्करिणी के तन किन्तु,
मन रात-भर शशि में लीन।
शशिकांत की आँखों में,
अलस-हीन निद्रा-विहीन।

स्वप्न का योग सारा,
प्राणों से सबको प्यार।
धन-दौलत है पास मगर,
निछावर कर दूँगा साकार।

विवस्त्र कर कुण्डल से,
देखे विस्मित चरणों का देश।
रहता जहाँ है बसा,
अगुण मानक उज्जवल वेश।

इस पावन पवित्र नीलिमा के,
धरा पर करुँगा तुझको मैं आसीन।
उपवन में भी तुम रहोगी,
अलि कटंक कुसुम विहीन।

अपने लहू के चंड से,
सुलगने न दूँगा अंग।
साथ रहोगी तुम पर,
आँच न आने दूँगा नि:संग।

शब्दों की माला में पिरोकर,
लिखता रहुँगा भाग्य अपना मान।
तुम रहोगी इस अधिलोक में,
बन सरगम की सुरीली तान।

मधुर मुरली की तान वह,
जिसके प्राणवंत विभोर।
डोलती काया तुम्हारी,
मोहक मोहनी होगी तस्वीर।

लोहित की दुर्जय क्षुधा,
दुःसह चाम की प्यास।
छा रही होगी सुर-सरगम,
घर-घर अवनी आकाश।

सुर तुम्हारे जब बजेगें,
ताल-तरंग चूमने की चाह।
आह निकलेगी फिज़ाओं से,
झूमने लगेंगे सब बाग।

करतल जब बजेगी,
चलने लगेंगे आँसुओं के तार।
बज उठेगी विश्व में जब,
निश दिन बोलों की झंकार।

जग तुम्हें घेरकर,
करेगा कलरव चहुँ ओर।
फूलों का उपहार होगा,
मनके-मनके में भरा प्यार।

कुछ दीवानगी में भर कर,
भित्ति हृदय पर उकेर लेंगे।
गीतों के भीतर घुसकर,
तुम्हारी छवि आँखों में उतार लेंगे।

कंठों में जाकर बसोगी,
बिन सरगम गुनगुना लेंगे।
प्राणों में आकर हँसोगी,
हँसकर होंठों पर छा लेंगे।

मैं मुदित हूँगा देखकर,
इन गीतों को वाक्य दूँगा।
रचित शब्द-माला में पिरोये,
अपने सृजन को आकार दूँगा।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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सारंग – सुमन।

Kmsraj51 की कलम से…..

Sarang – Suman | सारंग – सुमन।

हे अचले! तेरे तारक सारंग,
ये सृष्टि के धवल मुक्ताहार।
दीप बागों के उज्जवल धवल,
जिससे है वन जुगनू सुकुमार।

मेरी कोमल कल्पना के तार,
तरंगित उत्साहित उद्भ्रांत।
हृदय में हिल्लोर करते रहते,
भावों के कोमल-कोमल कान्त।

नालों-नालों की ज्योति,
जगमग उर्मि पसार।
ज्योतित कर रहे आज,
किसलिए कालिमा का संसार।

ये परियों का सुंदर-सा देश,
मृदुहासों का मृदुलमय स्थान।
दिव्य ज्योत्स्ना में घुल-घुलकर,
दिखता जैसे हो अम्लान।

मोहक तरंगिणी ने धो-धो कर,
हिम उज्जवल कर लिया परिधान।
आओ चलें प्रकाशित वन में,
खोजे ज्योतिरिंगण वो अनजान।

मलय समीरों के मृदुल झोंकों में,
कतिपय कंपित डोल-डोल।
अंतर्मन में क्या सोच रहा,
अनबोले रह जाते मेरे बोल।

स्वयं के ‘परिमल’ से सुशोभित,
निज की अपनी ज्योति द्युतिमान।
मुग्धा-से अपनी ही छवि पर,
निहार पड़े स्रष्टा छविमान।

खुद की मंजुलता पर अचम्भित,
देखे विस्मित आँखें फाड़।
खिलखिलाते फूल-पल्लवों को देख,
आत्मीयता से नयनों को काढ़।

सृजित हो रहे स्वर्ग भूतल पर,
लुटा रहे उन्मुक्त विलास।
अग्नि की सुंदरता का सौरभ,
सुमन-सारंग का उल्लास।

कवि का स्वप्न सुनहला,
देखे नयन ये बार-बार।
हर पंक्ति-पंक्ति में रच डाली,
नयनों की देखी साभार।

अनन्त के क्षुद्र तारे तो दूर,
उपलब्धि के गहरे-गहरे पात।
देव नहीं हम मनुजों की,
प्रियतम है अवनी का प्रान्त।

बीते जीवन की वेदनाएं,
अम्बा की चिन्ता क्लेश।
वादी में सृजित किया तूने,
मंजुल मनोहर आकर्षक देश।

स्वागत करो अरुणोदय का,
स्वर्णिम शीशों पर पुष्कर विहार।
विश्राम करे धवल तमस्विनी,
आँचल में सोते हैं सुकुमार।

कितनी मादकता है बसी यहां,
कुंडा-कुंडा है छन्दों का आधार।
पुष्पों के पल्लव-पल्लव में बसा,
सुरभि सौरभ सुगंध का भार।

विश्व के अकथ आघातों से,
जीर्ण-शीर्ण हुआ मेरा आकार।
अश्रु दर्द व्यथा वेदना से,
परिपूरित है मेरा जीवन आधार।

सूख चुका है कब से,
मेरे कलियों का जीवात्म।
हृदय की वेदना कहती है,
बचा विश्व में बस पयाम।

इक-इक पंक्ति से बन गई,
मेरी कविता का संसार।
लेखनी को घिस-घिस कर,
उद्धृत किया अपना संस्कार।

आशा के संकेतों पर घूमा,
सृष्टि के कोने-कोने हाथ पसार।
पर अंजलि में दी ‘दुर्गा’ ने,
आत्म तृप्ति का उपहार।

छोटे से जीवन के इस क्षण में,
भरा अंतस् कण-कण में हाहाकार।
भरत-भूमि तेरी सुंदरता पे,
खड़ा सारंग-सुमन तेरे द्वार।

इक पल के मधुमय उत्सव में,
भूल सकूँ अपनी वेदना हार।
ऐसी हँसी दे दो दाता मुझको,
नित दे सकूँ सबको हँसी बेसुमार।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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चंद्र विजय।

Kmsraj51 की कलम से…..

Chandra Vijay | चंद्र विजय।

आज विक्रम चंद्रमा पर,
सुरक्षित उतर आया।
भारत का चंद्रयान मिशन 3
सफल हो पाया।

जिस मिशन को पूरा करने में,
बड़ी-बड़ी शक्तियां रही असफल।
भारतीय वैज्ञानिकों ने आज तिरंगा,
फहराकर किया सफल।

चंद्रमा के अब
भारत जान पाएगा राज।
खुशियों का माहौल
बना है पुरे भारत में आज।

♦ विनोद वर्मा जी / जिला – मंडी – हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “विनोद वर्मा जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस लेख के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में व्यक्त किया गया है कि चंद्रमा के स्पेस मिशन के माध्यम से भारतवासियों ने अपने वैज्ञानिक और तकनीकी योगदान के साथ दुनिया के स्तर पर अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाई है। वे चार देशों को संदर्भित कर रहे हैं, जो चंद्रमा पर मानव अभियान का आयोजन कर रहे हैं। हम संसार के उस देश के गौरवशाली नागरिक हैं, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सबसे पहले पहुंचे है। कविता का समापन भारत के वैज्ञानिक प्रगति को और उनके अंतरिक्ष मिशन को संकेतित करता है, जो दुनिया भर के लोगों की नजरों में होगा।

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यह कविता (चंद्र विजय।) “विनोद वर्मा जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

आपका परिचय आप ही के शब्दों में:—

मेरा नाम विनोद कुमार है, रचनाकार के रुप में विनोद वर्मा। माता का नाम श्री मती सत्या देवी और पिता का नाम श्री माघु राम है। पत्नी श्री मती प्रवीना कुमारी, बेटे सुशांत वर्मा, आयुष वर्मा। शिक्षा – बी. एस. सी., बी.एड., एम.काम., व्यवसाय – प्राध्यापक वाणिज्य, लेखन भाषाएँ – हिंदी, पहाड़ी तथा अंग्रेजी। लिखित रचनाएँ – कविता 20, लेख 08, पदभार – सहायक सचिव हिमाचल प्रदेश स्कूल प्रवक्ता संघ मंडी हिमाचल प्रदेश।

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धागा प्रेम का।

Kmsraj51 की कलम से…..

Dhaga Prem Ka | धागा प्रेम का।

आज वह धागा प्रेम का ओ बहना, तुम जरूर पहनाना।
हर भाई को अपने बहन होने का, एहसास जरूर कराना।

इस नफ़रत भरे मतलबी दौर में, रिश्तों की रसम निभाना।
महज रसम न रखना ओ पगली, राखी का भाव जगाना।

वासना के बाजारों से पुरुष को, प्रेम के घर को ले आना।
कामुकता की खीर ठुकरा बहना, प्रेम का लड्डू खिलाना।

अपने पति के सिवाए पगली, हर नर की बहन बन जाना।
वरना तो तृष्णा में डूब जाएगा, ओ शालीनें! यह जमाना।

बहन भाव का उपहार ही मांगना, और न कुछ ले जाना।
तू भी भाई को कुमकुम का नहीं, भ्रातृत्व तिलक कराना।

महज की रसमों ने शुरू किया है, रिश्तों को पंगुन बनाना।
यह भाई बहन का रिश्ता है पगली! कमजोर न इसे कराना।

नशों दलदल से बाहर ला कर, तू भाभी को भाई लौटाना।
भगनी आलिंगन के जल से, भाई के दिल का मैल धुलाना।

♦ हेमराज ठाकुर जी – जिला – मण्डी, हिमाचल प्रदेश ♦

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  • “हेमराज ठाकुर जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — इस कविता में प्रेम और भाई-बहन के आपसी संबंध की महत्वपूर्णता पर बल दिया गया है। रिश्तों की अनमोल भावना को जीवंत रखने की बात कही गई है, जहाँ राखी के पीछे छुपे भाव का महत्व बताया गया है। व्यक्ति को कामुकता के प्रति नहीं, बल्कि प्रेम के प्रति आकर्षित होना चाहिए। भाई-बहन के आपसी संबंध में मात्र रसमों से ज्यादा अपनत्व का प्रेम होता है और इसका सार कोई कमजोर नहीं कर सकता। अपने पति के आलावा, प्रत्येक पुरुष को हर औरत व लड़की को अपना भाई समझना चाहिए। भाई-बहन के प्रेम का मूल्य उपहारों से अधिक होता है और भाई को कुमकुम नहीं, बल्कि भ्रातृत्व का तिलक पहनना चाहिए।

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यह कविता (धागा प्रेम का।) “हेमराज ठाकुर जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दों में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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