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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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प्रेरणात्मक हिंदी कहानी

♥"जीवन दर्शन"♥

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♥“जीवन दर्शन“♥

।। “ हम ईश्वर में भरोसा करते हैं ” ।।

(In God We Trust)

कहानी अमेरिका का है। किसी कम्पनी के मालिक ने अपने यहाँ काम करने वाले साधारण से दम्पति को एक दिन बिताने के लिए महलनुमा आवास पर आमंत्रित किया।

वह उनकी मेहनत व ईमानदारी का सम्मान करना चाहता था। महिला ज्यादा खुश थी कि उसे अत्यंत समृद्ध व जीवन का अनुभव लेने का मौका मिला है। बॉस ने अपनी मेहमान नवाजी पूरी तरह निभाई। उसने उन्हें अपना घर दिखाया और फिर वह उन्हें शहर के महंगे रेस्तरां में डिनर के लिए ले गया। वहां पहुंचने पर बॉस अचानक रुका और फर्श को देर तक मौन होकर देखता रहा।

फर्श पर एक पुराने, काले पड़ चुके सिक्के के अलावा कुछ नहीं था। बॉस ने सिक्का उठाकर जेब में इस तरह रखा मानो उन्हें तो कोई बड़ा खजाना मिल गया हो। महिला सोचने लगी कि इस बड़े आदमी को ऐसा करने की क्या जरूरत है?

आखिर महिला से रहा नहीं गया और उसने पूछा, ‘आपने जो सिक्का उठाया क्या वह कोई पुराना सिक्का है?”  मुस्कुराकर बॉस ने सिक्का निकालकर दिखाया और कहा, ‘ देखिए क्या लिखा है इस पर।’

महिला ने पढ़ा ‘यूनाइटिड स्टेट्स’।
बॉस ने और पढ़ने को कहा।
महिला ने पढ़ा ‘एक सेंट’।
उसने कहा और पढ़ो।

महिला ने पढ़ा, “इन गॉड वी ट्रस्ट ( हम ईश्वर में भरोसा करते हैं )।”

बॉस ने कहा, “ हां, ईश्वर का नाम पवित्र है। ईश्वर ने मुझे संदेश भेजा है कि मैं उन पर भरोसा रखूं। मैं कौन होता हूँ कि उसे नजर-अंदाज करूं? जब भी मुझे सिक्का दिखता है, मैं रुककर प्रार्थना करता हूँ और सिक्का उठाकर पुष्टि करता हूँ कि मुझे उस परमशक्ति पर भरोसा है। थोड़ी देर के लिए मैं इस भरोसा का आनंद लेता हूँ, जैसे यह भगवान की दी कोई खजाना है। सौभाग्य से ईश्वर के पास असीम धैर्य है और सिक्कों की अर्थात् खजानों की कोई कमी नहीं है।”
  ♦-संदीप वर्मा, बीकानेर (राज.)♦

Sandeep Verma-kmsraj51
संदीप वर्मा।

Post share by Mr. Sandeep Verma, from Bikaner (Raj.).

We are grateful to Mr. Sandeep Verma, for sharing inspirational Hindi Story.

We wish you a great & bright future. Thanks a lot dear Sandeep Verma.

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Head Editor, Founder & CEO
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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

 

 

_______Copyright © 2015 kmsraj51.com All Rights Reserved.________

Filed Under: 2015-Kmsraj51 की कलम से….., संदीप वर्मा कि कवि‍ताएँ हिंदी में।, हिंदी, हिंदी कविता, हिन्दी साहित्य Tagged With: Hindi Kahani-हिंदी कहानी, Hindi Poems, hindi poetry, Hindi Poetry Collection, http://kmsraj51.com/, http://mcitpkmsraj51.blogspot.in/, I am woman-Hindi Poetry, I am woman-Poetry in Hindi, Kmsraj51, Moral Hindi Story for Kids, Motivational Hindi Story, Poetry, Sandeep Verma, एक मासूम कहानी, कहानी-किस्से, नैतिक कहानी हिंदी में।, नैतिक हिन्दी कहानी संग्रह, पढ़ें प्रेरणादायक कहानियों का विशाल संग्रह, पढ़ें शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह हिंदी में।, प्रेरणात्मक हिंदी कहानी, प्रेरणात्मक हिन्दी कहानी, प्रेरणादायक कहानियां, प्रेरणादायक कहानियों का विशाल संग्रह, प्रेरणादायक वास्तविक स्टोरी-हिंदी में।, बच्चों के लिए प्रेरणात्मक हिंदी कहानी का संग्रह, बच्चों के लिए शैक्षिक हिन्दी कहानियाँ, बच्चों के लिए हिन्दी कहानी, मैं नारी हूँ।, शिक्षाप्रद कवि‍ताएँ, शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।, शैक्षिक हिन्दी कहानी संग्रह, संदीप वर्मा - बीकानेर (राजस्थान), संदीप वर्मा कि शिक्षाप्रद कवि‍ताएँ हिंदी में।, स्वागत है बेटी।, हिंदी कहानी, हिंदी शायरी, हिन्दी-कविता

“मन की आवाज”

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

♣ “मन की आवाज” ♣

दो दोस्त थे। दोनों बचपन में एक साथ पढ़े-लिखे थे। एक दोस्त जो पढ़ लिख कर बड़ा अमीर आदमी बन गया। वहीं उसका बचपन का दोस्त गरीबी के कारण गरीबी तक ही सिमित रहा। फिर भी दोनों की मित्रता में नहीं भाव में प्रभाव हुआ। एक बार दोनों मित्र मिले। धनवान दोस्त ने कार खड़ी की और दोनों बगीचे में बैठकर बातें करने लगे। बहुत इधर- उधर की बातें की फिर अपनी-अपनी समस्याएँ बताई। जब शाम होनें को चली तो दोनों बगीचे से निकल रहे थे…… तभी गरीब दोस्त अचानक रूक गया।

मित्र क्या हुआ ? अमीर दोस्त ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा।

तुम्हें कुछ आवाज सुनी दी। गरीब दोस्त ने कहा।

अमीर दोस्त कुछ इधर-उधर मुड़ा फिर नीचे झुकते हुए सिक्का उठाकर बोला-किसी की आवाज नहीं थी मित्र। मेरा सिक्का गिरा था इसकी आवाज थी।

फिर भी गरीब दोस्त का मन शांत नहीं हुआ। जिधर से आवाज आ रही थी गरीब दोस्त उधर की तरफ गया। एक कांटे के छोटे पौधे में एक तितली पंख फडफड़ा रही थी। गरीब दोस्त ने उस तितली को धीरे से बाहर निकाला और आकाश में आजाद कर दिया।
अमीर दोस्त ने आतुरता से पूछा- तुम्हें तितली की आवाज कैसे सुनाई दी?

गरीब दोस्त ने नम्रता से कहा-

“तुम्हारे में और मुझ में ये ही फर्क है मित्र”
तुम्हें  ‘धन की आवाज’ सुनाई दी और
मुझे  “मन की आवाज” सुनाई दी।

♥- संदीप वर्मा, बीकानेर (राज.) ♥

Sandeep Verma-kmsraj51
संदीप वर्मा।

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* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

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कथा एक राजकुमार की।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT04

ϒ कथा एक राजकुमार की। ϒ

एक था राजकुमार मितभाषी, सुन्दर, सुकुमार।
महलों में पला बढ़ा लोगों की नज़र में अत्यंत ईमानदार॥

तैंतालीस बसंत देख चुका। यह युवराज, राजगद्दी खाली, पर नहीं पहनता ताज। खुद को अभी नहीं समझता था उपुक्त। राज काज के झंझटों से था वह मुक्त। सारा राज-पाट बूढ़े मंत्री के कन्धों पर था। मंत्री था बड़ा वफ़ादार, था वो मंत्रियों का सरदार। एक दिन आखेट पर चला गया दूर तक साथ में मंत्री, सेवादार रथ, पालकी गाजे, बाजे बहुत-बहुत पहरेदार।  पहुँच गया सुदूर एक गांव मच गया हाहाकार राजकुमार आया, राजकुमार आया मच गया शोर हलचल चहु ओर, आनन् फानन में सभा बुलाई ढोल तमाशा, नाच-गाना, बढ़िया लज़ीज़ खाना।

राजकुमार मुखातिब हुए प्रजा से – बोलो भाई हमारे राज्य में कोई कष्ट हो तो बताओ खुल कर सुनाओ।

समवेत स्वरों में आवाज़ आई सरकार, हमलोगन गरीबी ते बहुतै दिक्क हन कौनो उपाय बतावा जाई।

युवराज को कुछ नहीं सूझा आँखों ही आँखों में सेवादार से पूछा और फुसफुसाहट भरी आवाज़ में बूझा फिर बाँहे समेट कर खड़े हुए और ज्ञान बघारा।

भई गरीबी तो केवल दिमाग की सोच है तुम लोग नाहक ही परेशान हो, मन में सोच लो तो सुखी इंसान हो।

यह सुनते ही पूरी सभा में सन्नाटा छा गया लोग तालियाँ बजाना भूल गए। कंठ रुंध गए चक्षुओ से अश्रुधार बह निकली।

सदिओं से जिस गरीबी को लेकर हमारे बाप-दादा, खून पसीना बहाते रहे, रहे पीढ़ियो तक परेशान। उसका समाधान कितना आसान।

मौक़ा देख सेवादारों ने आवाज़ लगाईं।

राजकुमार की जय हो !! युवराज की जय हो !!

भीड़ से आवाज़ आई युवराज की जय हो !! राजकुमार की जय हो !!

राज्य में सब सुखी थे लोगों के दिमाग से गरीबी ख़त्म हो गयी थी। तो क्या हुआ यदि लोग भूखों मर रहे थे। जवान बूढ़े लग रहे थे बूढ़े केवल ज़िंदा लाश थे। पर वो गरीब कतई नहीं थे।

तभी अचानक एक दिन कुछ सिर फिरों ने कहना शुरू किया। गरीबी के बारे में अनाप-शनाप बकना शुरू किया, कि हम गरीब इसलिए हैं क्योंकि ऊपर से भेजा हुआ पैसा, डाकू हड़प जाते है पूरा वैसे का वैसा।

लोगों ने कहा राजकुमार ने तो कुछ और ही बताया था। क्या राजकुमार को पता नहीं था?

सिरफिरों ने कहा उनको जरूर पता होगा। उनके परमपूज्य पिता श्री महाराजाधिराज ने एक बार गलती से बता दिया था।
कि सोलह आने में केवल दो आने ही जनता तक पहुँचते है बाकी सब डाकू लूट लेते हैं।

ये अलग बात है कि उन्होंने डाकुओं को कुछ नहीं कहा। उनकी इस साफगोई पर ही जनता गद्गद थी।

सिरफिरे ये भी कहने लगे कि काफी डाकू तो, मंत्रियो और दरबारिओं के कपड़े पहन कर अपनी बंदूके छुपा कर दरबारे ख़ास में हैं।

जनता को धीरे-धीरे विश्वास होने लगा। सिरफिरों को भी आभास होने लगा। लोग नंगे पैर, भूखे पेट चिथड़ो में लिपटे हुए।

राजधानी के चौक पर जमा हो गए, लम्बी-लम्बी तकरीरें बहुत सारे सुझाव।

सभी मंत्रियों दरबारियों की कपड़े उतरवाकर जांच हो। डाकुओं को पहचान कर बाहर निकाला जाए कुछ का कहना था। सारे मंत्रियों, दरबारियों को बर्खास्त किया जायें जितने मुह उतनी बातें।

लोगों का गुस्सा सरे आम हो गया, दरबारे ख़ास में कोहराम हो गया। सबने सिर से सिर मिलाकर मंत्रणा की चतुर मंत्रियों का गैंग बना।
सरकारी भोंपू से समझाया गया जनता को भरमाया गया।

ये सिरफिरे झूठ बोल रहे हैं इसमें विदेशी ताकतों का हाथ है। हम तो आपके साथ हैं। लोगों ने बूढ़े मंत्री की बात का भरोसा किया भीड़ छटने लगी। इस दौरान राजमाता विदेशी दौरे पर थीं युवराज कहीं दूर आखेट पर।

उनके लौटने तक सब शांत हो गया था डाकू खुश थे। चतुर मंत्रियों का गैंग मुस्कुरा रहा था, एक दुसरे की पीठ थप-थपा रहा था।

तभी अचानक राज्य के सबसे बुज़ुर्ग न्यायाधीश ने आदेश पारित कर दिया, कि जो भी डाकू रंगे हाथ डाका डालते हुए पकड़ा जाएगा, वो दरबारे ख़ास में नहीं बैठ पायेगा।

दरबारियों और मंत्रियों में गुस्सा था कुछ दरबारी भी दरबारे ख़ास को डाकुओं से मुक्त कराना चाहते थे और बहुत खुश थे बाकी सब नाखुश थे।

नाराज़ मंत्रियों, दरबारियों की संख्या बहुत ज्यादा थी। बूढ़े मंत्री की बात भी कोई सुन नहीं रहा था। राजकुमार सो रहा था। राजमाता का पता नहीं।

सब ने मिलकर हल निकाला। नया क़ानून बनायेंगे अपने डाकू भाइयों को बचायेंगे।

फिर क्या आनन्-फानन में अध्यादेश बनाया गया खूबसूरत शब्दों से सजाया गया। युवराज का अब भी पता नहीं शायद आखेट से लौट कर गहरी नींद में थे।

तभी राजकुमार ने सपने में देखा भारी भीड़ नंगे आदमी। चीथड़ो में लिपटी हुई औरतें बड़े पेट और पतली टांगों वाले बच्चे, आँखों में अंगारे, हाथो में बरछी, भाले, आरे।

राजकुमार की घिघ्घी बांध गयी बिस्तर छोड़ कर महल से नींद में ही भागे। रथ, सारथी, पहरेदार, सेवादार सब पीछे वो आगे।

बाहर पूरे राज्य में सारे मंत्री, दरबारी। जनता को डाकुओं के बारे में समझा रहे थे। डाकू समाज के लिए कितने जरूरी हैं ये बुझा रहे थे।
चोर उचक्के, छोटे मोटे मवाली आपको तंग नहीं कर सकते। अगर कोई सरकारी डाकू आपके संपर्क में है।

जनता फुसफुसाई लेकिन दरबारे ख़ास में। डाकुओं की नुमाइंदगी तो बहुत ज्यादा है मंत्री गुर्राए। उनका काम भी तो ज्यादा है हमारे लिए वो इतना करते हैं। क्या हम उनको इज्जत से दरबारे ख़ास में बैठा भी नहीं सकते।

जनता में सुगबुगाहट थी वो मंत्रियों की बात नहीं सुन रहे थे। सिरफिरे जनता को भड़का रहे थे डाकू हड़का रहे थे।

ऐसी सी ही एक सभा में युवराज हाँफते हांफते पहुचे। जनता, मंत्री, दरबारी सब खड़े हो गए युवराज अभी नींद में थे।
माथे पर पसीना लडखडाती आवाज़ उनको लग रहा था। चारों तरफ गरीबों की भीड़ है हथियारों से लैस।
युवराज का मुह सूख रहा था, मंत्री के हाथ से छीन कर अध्यादेश फाड़ दिया। जनता, मंत्री, दरबारी सब सन्न काटो तो खून नहीं थोड़ी देर तक छाया रहा सन्नाटा।

तभी चतुर मंत्रियों को कुछ याद आया सभी एक साथ चिल्लाये।

राजकुमार की जय !! युवराज की जय !!

पर इस बार भीड़ से एक भी आवाज़ नहीं आई। जनता चुप थी राजकुमार का सपना टूट चुका था, वो धीरे-धीरे थके हुए कदमों से अपने रथ की तरफ बढ़ रहा था, और भारत एक नया इतिहास गढ़ रहा था।

kmsraj51-rahul-jaiswal

We are grateful to my dear friend Mr. Rahul Jaiswal, for sharing this Inspirational Story in Hindi.

 

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

∗ निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

* क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

* KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

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बेनाम रिश्ता।

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cymt-kmsraj51-1

♣♥ बेनाम रिश्ता। ♣♥

-मृदुला सिन्हा।

चित्राजी निमंत्रण-पत्र के साथ हाथ से लिखे मनुहार पत्र के हर अक्षर को अपनी नजरों से आँकती उनमें अंतर्निहित भावों को सहलाने लगीं। कई बार पढ़े पत्र। सोचा विवाह में इकट्ठे लोग पूछेंगे—मैं कौन हूँ? क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से मेरा? क्या जवाब दूँगी मैं? क्या जवाब देंगे शालिग्रामजी? दोनों के बीच बने संबंध को मैंने कभी मानस पर उतारा भी नहीं। नाम देना तो दूर की बात थी। बार-बार फटकारने के बाद भी वह अनजान, अबोल और बेनाम रिश्ता चित्राजी को जाना-पहचाना और बेहद आत्मीय लगने लगा था। कभी-कभी उसके बड़े भोलेपन से भयभीत अवश्य हो जाती थीं और तब उस रिश्ते के नामकरण के लिए मानो अपने शब्द भंडार में इकट्ठे हजारों शब्दों को खँगाल जातीं। नहीं मिला था नाम। और जब नाम ही नहीं मिला तो पुकारें कैसे?

इसलिए सच तो यही था कि उन्होंने कभी उस रिश्ते को आवाज नहीं दी। रिश्ते के जन्म और अपनी जिंदगी के रुक जाने के समय पर भी नहीं। जिंदगी के पुनःचालित होकर उसकी भाग-दौड़ में भी नहीं। शालिग्रामजी को कभी स्मरण नहीं किया। शालिग्रामजी ने ही बेनाम रिश्ते को याद रखने की पहल की थी।

बहुत सोच-विचार करने के बाद चित्राजी ने भोपाल जाना तय कर लिया। बहुत दूर जाना था। बस, और फिर ट्रेन की यात्रा। वह भी गरमी में। शालिग्रामजी ने दूरभाष पर ही विश्वास दिलाया था—‘आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। मेहमानों को ठहराने की व्यवस्था करते समय भी हमने मौसम का ध्यान रखा है। मैं समझता हूँ, हमारे मेहमानों को कोई कष्ट नहीं होगा। और आप तो खास मेहमान हैं।’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने जब जाने का निश्चय ही कर लिया था तो कष्ट और आराम का क्या? शिमला बस स्टैंड पर वॉल्वो बस में बैठ गई थीं। मोबाइल की घंटी बजी। शालिग्रामजी का फोन था। उन्होंने कहा, ‘‘आपकी बस के दिल्ली बस अड्डे पर रुकते ही हमारा एक आदमी मिलेगा। उसका नाम राकेश है। उसके पास आपकी रेल टिकट होगी।’’

चित्राजी ने कुछ नहीं कहा। इतना भी नहीं कि मैंने टिकट ले रखी है। और वैसा ही हुआ। उनकी बस के रुकते ही एक व्यक्ति अंदर घुसा। उसकी खोजी नजर ने चित्राजी को पहचान लिया। उनकी अटैची नीचे उतारकर बोला, ‘‘आपके पास यदि कोई टिकट है तो मुझे दे दीजिए। मैं उसे कैंसिल करवा दूँ। ए.सी. द्वितीय श्रेणी की यह टिकट रख लीजिए। ट्रेन शाम को निजामुद्दीन स्टेशन से जाती है। मैं आपको लेने आ जाऊँगा। मैं भी आपके साथ चल रहा हूँ।’’

चित्राजी ने उस व्यक्ति को स्लीपर क्लास की टिकट निकालकर दे दी। वे थ्री-व्हीलर में बैठकर गोल मार्केट स्थित अपनी एक सहेली के क्वार्टर में चली गईं। शाम को सबकुछ वैसे ही घटा जैसा राकेश ने बताया था।

सुबह-सुबह गाड़ी के भोपाल जंक्शन पर रुकते ही एक नौजवान उनकी सीट तक आ गया। उनके पैर छूकर बोला, ‘‘मैं दीपक हूँ। मेरे पिता का नाम शालिग्राम कश्यप है।’’

चित्राजी ने ‘खुश रहने’ का आशीष दिया और उसके पीछे चल पड़ीं। गाड़ी आगे बढ़ रही थी। रोड पर भीड़ के कारण कभी-कभी उसका हॉर्न बजता। अंदर पूरी शांति बनी रही। कोई कुछ नहीं बोला। चित्राजी उस नौजवान से बातें करना चाहती थीं, पर शुरुआत कैसे करें।
उस घर की चौहद्दी, आबादी, संस्कार और स्थितियाँ, कुछ भी तो नहीं जानती थीं। भोपाल शहर के बारे में पूछने ही जा रही थीं कि दीपक बोल पड़ा—‘‘मैं आपको आंटी कहूँ ?’’

‘‘हुँ’’
‘‘तो आंटी! बारात आज शाम को आ रही है, लोकल बारात है, इसलिए समय से ही आ जाएगी। मैंने सुना कि आप कल ही लौट रही हैं। आपके पास समय बहुत कम है। पिताजी ने कहा है कि आप भोपाल शहर पहली बार आ रही हैं। इसलिए भोपाल भी तो देखना चाहेंगी। बड़ा सुंदर शहर है हमारा। आप जल्दी से तैयार हो जाएँ। आपको मेरा मौसेरा भाई घुमाने ले जाएगा।’’

‘‘ठीक है।’’ इतना ही बोल पाईं चित्राजी। मन तो उस व्यक्ति के प्रति आभार प्रकट करने को बन आया था। उनकी इतनी चिंता करनेवाले नौजवान को शाबासी भी दी जा सकती थी। पर वे कुछ नहीं बोलीं। दीपक बोला, ‘‘मेरे पिताजी आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं। कहते हैं, आप साक्षात् देवी की अवतार हैं। पर पता नहीं क्यों, न आप कभी भोपाल आईं, न हमें शिमला बुलाया। कुछ देर पहले ही आपके बारे में बताया। आपसे मिलने की चाहत पनप आई। इसलिए कई काम छोड़कर स्वयं स्टेशन आ गया।’’

चित्राजी कुछ बोलने के लिए जिह्वा पर शब्द सजाने लगीं कि ड्राइवर ने गाड़ी में ब्रेक लगा दिया था। गाड़ी किसी गेस्ट हाउस के सामने रुकी। गाड़ी से उनका सामान निकालकर दीपक आगे बढ़ा। वे पीछे-पीछे। उन्हें अंदर तक पहुँचाकर बोला, ‘‘आंटी! आप यहाँ नहा-धो लें। नाश्ता घर पर ही करना है। फिर आप भोपाल दर्शन के लिए निकलेंगी। दोपहर का भोजन भी घर पर ही है। भोजन के बाद फिर यहाँ आराम करिएगा। शाम को तो शादी ही है।’’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। दीपक के कमरे से निकलने पर अवश्य उसके पीछे गईं। आँखों की पहुँच से उसकी काया ओझल हो जाने पर पीछे लौट कमरे की सिटकिनी बंद कर बिस्तर पर बैठ गईं। सोचने लगीं—दीपक कितना लायक लड़का है। उन्नीस-बीस वर्ष का होगा। इतना जिम्मेदार और पितृभक्त! समाज नाहक परेशान है कि युवा पीढ़ी बिगड़ गई। मेरे साथ थोड़ी देर गुजारकर इस युवा ने मेरे मन में जगह बना ली। पर श्रेय तो इसके पिता को ही जाता है, शालिग्रामजी को। उनका ध्यान आते ही चित्राजी उठ बैठीं। अपना ध्यान बँटाने के लिए तैयार होने लगीं। चित्राजी के नहा-धोकर तैयार होते ही नरेश आ गया था। उन्हें नाश्ते के लिए ले जाते हुए पूछा, ‘‘आप दीपक की बुआजी हैं? उसकी दो बुआओं से मिल चुका हूँ। आपसे पहली बार मिला। दीपक का मैं मित्र हूँ।’’

शालिग्रामजी शीघ्रता से गेट पर पहुँचे। उन्होंने चित्राजी का अभिवादन किया। नरेश ने कहा, ‘‘घुमा लाया आंटी को भोपाल। इन्हें तीनों ताल अच्छे लगे।’’

नरेश इतना नहीं कहता तो शायद चित्राजी सामने खड़े व्यक्ति को पहचान भी नहीं पातीं। कुछ दरक गया था चित्राजी के अंदर। उन्होंने अपने को सँभाला। हाथ जोड़कर उनके अभिवादन का उत्तर देते हुए चेहरे पर भी मुसकान थी। नाश्ते का इंतजाम फ्लैट के बाहरवाले हिस्से में ही किया गया था। कुछ लोग नाश्ता समाप्त कर चुके थे, कुछ का जारी था, कुछ आनेवाले थे। शालिग्रामजी को चित्राजी को लेकर नाश्ते के स्थान पर पहुँचने में दो मिनट भी नहीं लगे होंगे, पर वहाँ उपस्थित नाश्ता कर रहे मेहमानों के प्लेट में पडें स्वादिष्ट व्यंजनों में मानो एक विशेष व्यंजन आ टपका।

‘‘ये कौन हैं?’’ प्रश्न पसरा।
‘‘इन्हें तो पहले कभी नहीं देखा।’’ स्वाद लेने लगे लोग।
आपस में प्रश्नों का आदान-प्रदान हो रहा था। उत्तर किसी के पास नहीं था। शालिग्रामजी की पत्नी माला भी आ गईं। रिश्तेदारों से नाश्ता का स्वाद पूछतीं, कुछ और लेने का आग्रह करतीं, आगे बढ़ रही थीं। किसी ने पूछ ही लिया—‘‘वे कौन हैं? कोटा की साड़ी में वे सुंदर सी महिला?’’
माला ने इधर-उधर आँखें दौड़ाईं। दूसरी ने स्वर दाबकर ही कहा, ‘‘वही, जो शालिग्रामजी के साथ हैं। उन्हें शालिग्रामजी ने स्वयं अपने हाथों से प्लेट लगाकर दी है। देखिए!’’ ठीक ही तो कहा था सबने। माला ने भी यही देखा। चाय का प्याला लिये खड़े थे शालिग्रामजी। सौम्य आकृति, लगभग उसकी ही हम-उम्र, बड़े सलीके से नाश्ता कर रही, कौन है यह महिला? शालिग्रामजी ने तो कभी इसका जिक्र नहीं किया। आमंत्रण भेजनेवाली सूची भी माला ने पढ़ी थी। किसी अनजान महिला का नाम नहीं था। फिर कौन है यह?

प्रश्न तो अनेक थे। पर वह अवसर नहीं था पति से प्रश्न पूछने का। जबकि अधिकांश मेहमानों के बीच यही प्रश्न बॉल की भाँति दिन भर उछलता उसकी पाली में भी आता रहा। रीति-रिवाज और रस्म अदाएगी में सब एक-दूसरे से पूछते रहे। दोपहर के लंच के समय भी चित्राजी आ गईं थीं।
शालिग्रामजी की एक साली उनके पास गई। पूछा, ‘‘आप कहाँ से आई हैं?’’

दूसरा प्रश्न पूछने ही वाली थी—‘‘आप मेरे जीजाजी को कैसे जानती हैं?’’
इस बीच स्वयं जीजाजी उपस्थित हो गए थे। उन्होंने अपनी साली को किसी और विशेष मेहमान की खातिरदारी में लगा दिया था।
गेस्ट हाउस में आराम करते हुए चित्राजी का मन कई मसलों में उलझ गया था। बहुत दिनों बाद पच्चीस वर्ष पूर्व घटी घटना का संपूर्ण दृश्य नजरों के सामने रूढ़ हो गया। शिमला से गाड़ी में पति-पत्नी और दोनों बच्चे का कुल्लु-मनाली के लिए प्रस्थान। थोड़ी दूरी पर जाते ही गाड़ी का खड्डे में गिरना। पति के सिर में चोट आना। उनका होश नहीं लौटना। डॉक्टर से बातचीत। बेहाल-बेहोश चित्राजी के सामने डॉक्टर की एक माँग। माँग पर शीघ्रता से विचार करने का आग्रह। अकेली खड़ी चित्राजी। दो नन्हे बच्चे माँ से चिपके। अपना-पराया कोई साथ न था। निर्णय लेना था चित्राजी को। सबकुछ चला गया था। जो बचा था, उसकी माँग थी। चित्राजी ने वह वस्तु देना स्वीकार कर लिया, जो उनकी थी। डॉक्टर का सुझाव। और फिर मृत्यु के करीब गया व्यक्ति जीवित हो गया।

स्मृतियों में जीवित था सब दृश्य। कभी-कभी जीवंत हो जाता। पर चित्राजी ने दृढ़ निश्चय कर उन यादों को नजर के सामने से हटा दिया था। शुभ-शुभ का अवसर था। ‘जो बीत गई, वह बात गई’ कविता वे क्लास में पढ़ाती आई हैं। जिस लड़की का विवाह है, उसके लिए शुभ सोचना है। अवसर और समय की वही माँग थी।

बारात दरवाजे लगी। स्वागत में खड़े स्त्री-पुरुष तिरछी नजरों से चित्राजी की ओर अवश्य देखते रहे। प्रश्न वही—‘‘कौन है यह?’’, ‘‘क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से?’’

शालिग्रामजी ने द्वार पर ही अपने समधी से चित्राजी का परिचय कराया था। उनकी दो सालियाँ अपने पतियों के साथ वहीं खड़ी थीं। उनका परिचय नहीं करवाया। और यह खबर उस भीड़ भरे स्थल पर भी आसानी से यात्रा कर गई। सबको मिल आई।

बराती और घराती के भोजनापरांत विवाह के रस्म पूरे किए जाने लगे। शालिग्रामजी को पंडितजी द्वारा मंडप पर कन्यादान के लिए बुलाया गया। मंडप पर बैठने के पूर्व उन्होंने चारों ओर निगाहें घुमाईं। उनकी दृष्टि के सम्मुख वह चेहरा नहीं आया, जिसकी उन्हें खोज थी। उनके आस-पास मंडप पर बैठी उनकी बहनों और सालियों ने भाँप लिया था। दो-तीन एक साथ बोल पड़ीं—‘‘वहाँ हैं आपकी मेहमान।’’

देखा माला ने भी। मानो खीझकर बोली, ‘‘अब बैठ जाइए। मनचित्त लगाकर कन्यादान करिए। इसी काम के लिए मेहमान और सारा इंतजाम है। बैठिए!’’

शालिग्रामजी ने ऊँची आवाज में कहा, ‘‘चित्राजी! आप इधर आइए। मंडप पर बैठिए। मेरी बेटी को आपका विशेष आशीर्वाद चाहिए।’’
चित्राजी अंदर से हिल गईं। ऊपर से उपस्थित जनों की निगाहों के तीरों से बिंध गईं। वे परेशान तो थी हीं। अपने स्थान पर खड़ी होकर बोलीं, ‘‘आप लोग शुभ कार्य के लिए वहाँ उपस्थित हुए हैं। बेटी का कन्यादान करिए। मुझे यहीं बैठना है। मैं विधवा हूँ। मेरा सुहाग नहीं है। समाज ऐसी महिला को किसी सौभाग्याकांक्षिणी को सुहाग देने की मनाही करता है। मैं दिल से आपकी बेटी का शुभ चाहती हूँ। इसलिए दूर बैठी हूँ। आप अपना पुनीत काम पूरा करें। मेरी चिंता छोड़ दें।’’ वे बैठ गईं।

‘‘मैं नहीं मानता ऐसे समाज के विधान को। मेरे परिवार के लिए, मेरी बेटी के लिए आपसे बढ़कर कोई शुभ नहीं हो सकता। आपकी कृपा के बिना तो न मैं होता न मेरी बेटी। आइए! आप मेरी प्रार्थना मानकर मेरी बेटी का कन्यादान करिए।’’ फिर तो पंडितजी भी परेशान हो गए। बोले, ‘‘शालिग्रामजी! आपकी मेहमान महिला ठीक कह रही हैं। आप कन्यादान करिए। अपनी पत्नी को साथ बैठाइए। मंडप पर बैठी सभी महिलाएँ सुहागन ही हैं।’’

शालिग्रामजी बिफर पड़े—‘‘आप सब आज सुबह से चित्राजी का परिचय जानने के लिए परेशान हैं। आपके बीच तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। कार्य व्यस्तता में भी मैं आपके प्रश्नों के बाणों से बिंधता रहा। जब तक मैं उनका परिचय न दे दूँ, आप सबों का ध्यान भी विवाह के रस्म-रिवाजों पर केंद्रित नहीं होगा। तो सुनिए!’’ और जो कुछ शालिग्रामजी ने सुनाया, सुनकर वहाँ बैठे उपस्थित लोगों के प्रश्न तो चुके ही, वे सब चित्राजी के प्रति नतमस्तक हो गए। वे अवाक् रह गए। ‘‘पच्चीस वर्ष पूर्व एक दुर्घटना में चित्राजी के पति घायल हो गए। उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था। जिस अस्पताल में उन्हें लाया गया, उसी के एक कमरे में मैं ऑपरेशन बेड पर लेटा था। मेरे दिल ने काम करना बंद कर दिया था। चिकित्सकों ने निर्णय लिया था—किसी का धड़कता दिल मिलने पर प्रत्यारोपण हो सकता है। आँख दान, किडनी दान जैसे अंग दान की बात तो सुनी गई थी। देहदान भी होने लगा था। पर हृदय दान तो तभी हो जब वह धड़कता हो, और जब तक दिल धड़कता है, आदमी जिंदा है। भला जीवित का हृदय कोई क्यों दान करे।

चित्राजी के पति का दिल धड़क रहा था। मस्तिष्क ने कार्य करना बंद कर दिया था। डॉक्टर शर्मा ने इनसे अनुरोध किया—‘‘आपके पति को अब हम नहीं बचा सकते। पर आपकी सहमति हो तो इनका दिल किसी और के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। वह जिंदा हो सकता है।

‘‘सुझाव सुनकर चित्राजी पर क्या बीती, मुझे नहीं मालूम। और किसी ने जानने की कोशिश भी की कि नहीं, मालूम नहीं। चित्राजी ने अनुमति दे दी थी। मेरा दिल पिछले पच्चीस वर्षों से धड़क रहा है, यह मेरा नहीं, इनके पति का दिल है। पर पिछले पच्चीस वर्षों में इन्होंने एक बार भी एहसान नहीं जताया। इन्होंने तो मुझे तब भी नहीं जाना, न देखा था। मैंने भी नहीं। इन्होंने कभी मुझे ढूँढ़ने की कोशिश भी नहीं की। पर मैं बहुत बेचैन था। जीवन देनेवाली के प्रति आभार भी नहीं प्रगट कर सका। दो वर्ष पूर्व इनके शहर में गया। डॉ. शर्मा मिल गए। मेरा दुर्भाग्य कि इनसे तब भी भेंट नहीं हो सकी। डॉ. शर्मा से इनका मोबाइल नंबर मिल गया। फोन पर ही मैंने इन्हें अपना परिचय दिया। मनुहार पत्र भेजा। फिर निमंत्रण। बहुत आग्रह करने पर ये मेरी बेटी के विवाह पर आईं हैं। मैंने भी इनको आज सुबह ही पहली बार देखा। अब आप ही सोचिए पंडितजी! हमारे परिवार के लिए इनसे बढ़कर शुभ और कौन होगा। मेरे विवाह और मेरे बच्चे होने के पीछे भी यही तो हैं। मैं हूँ, तभी तो सब है।’’

कन्यादान के रस्म के समय तो सबकी आँखें भरती हैं। शालिग्रामजी ने तो कन्यादान के पूर्व ही उपस्थित सभी आँखों में पानी भर दिया।
माला मंडप पर से उठी। सीधे चित्राजी के पास पहुँची। पैर छूकर आशीष लिये और हाथ पकड़कर मंडप पर ले आई। महिलाओं के झुंड ने आँसू पोंछकर गाना प्रारंभ किया —‘शुभ हो शुभ, आज मंगल का दिन है, शुभ होे शुुभ। शुभ बोलू अम्मा, शुभ बोलू पापा, शुभ नगरी के लोग सब, शुभ हो शुभ!’’

रिश्ते को नामकरण की आवश्यकता नहीं पड़ी। अनेक रिश्तों से भरा था प्रांगण। पर सबसे ऊँचा हो गया था शालिग्रामजी और चित्राजी का रिश्ता। बेनाम था तो क्या?

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आकाश में कितने तारे।

Kmsraj51 की कलम से…..

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◊ आकाश में कितने तारे। ◊

एक दिन ख्वाजा ने बीरबल को मूर्ख साबित करने के लिए बहुत सोच-विचार कर कुछ मुश्किल प्रश्न सोच लिए। उन्हें विश्वास था कि बादशाह के सामने उन प्रश्नों को सुनकर बीरबल के छक्के छूट जाएंगे और वह लाख कोशिश करके भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाएगा।

बादशाह अकबर अपने मंत्री बीरबल को बहुत पसंद करता था। बीरबल की बुद्धि के आगे बड़े-बड़ों की भी कुछ नहीं चल पाती थी। इसी कारण कई दरबारी बीरबल से जलते थे।

अकबर के एक खास दरबारी ख्वाजा सरा को अपनी विद्या और बुद्धि पर बहुत अभिमान था। बीरबल को तो वे अपने सामने निरा बालक और मूर्ख समझते थे। लेकिन दरबार में तो बीरबल की ही तूती बोलती थी।

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एक दिन ख्वाजा ने बीरबल को मूर्ख साबित करने के लिए बहुत सोच-विचार कर कुछ मुश्किल प्रश्न सोच लिए। उन्हें विश्वास था कि बादशाह के सामने उन प्रश्नों को सुनकर बीरबल के छक्के छूट जाएंगे और वह लाख कोशिश करके भी उत्तर नहीं दे पाएगा। फिर बादशाह मान लेगा कि ख्वाजा सरा के आगे बीरबल कुछ नहीं है।

ख्वाजा साहब अचकन-पगड़ी पहनकर दाढ़ी सहलाते हुए अकबर के पास पहुंचे और सिर झुकाकर बोले, ‘बीरबल बड़ा बुद्धिमान बनता है। आप भी उसकी लम्बी-चौड़ी बातों के धोखे में आ जाते हैं। मैं चाहता हूं कि आप मेरे तीन सवालों के जवाब पूछकर उसके दिमाग की गहराई नाप लें।’ ख्वाजा के अनुरोध पर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उनसे कहा, ‘बीरबल! परम ज्ञानी ख्वाजा साहब तुमसे तीन प्रश्न पूछना चाहते हैं। क्या तुम उत्तर दे सकोगे?’ बीरबल बोले, ‘जहांपनाह! जरूर दूंगा। खुशी से पूछें।’ ख्वाजा साहब ने अपने तीनों सवाल लिखकर बादशाह को दे दिए। अकबर ने बीरबल से ख्वाजा का पहला प्रश्न पूछा, ‘संसार का केन्द्र कहां है?’ बीरबल ने तुरंत जमीन पर अपनी छड़ी गाड़कर उत्तर दिया, ‘यही स्थान चारों ओर से दुनिया के बीचों-बीच पड़ता है। ख्वाजा जी को विश्वास न हो तो वे फीते से सारी दुनिया को नापकर दिखा दें कि मेरी बात गलत है।’ अकबर ने दूसरा प्रश्न पूछा, ‘आकाश में कितने तारे हैं?’

बीरबल ने भेड़ मंगवाकर कहा, ‘इसके शरीर में जितने बाल हैं, उतने ही तारे आसमान में हैं। ख्वाजा साहब को सन्देह हो तो वे बालों को गिनकर तारों की संख्या से तुलना कर लें।’ अब अकबर ने तीसरा प्रश्न किया, ‘संसार की आबादी कितनी है?’ बीरबल ने कहा, ‘जहांपनाह! संसार की आबादी पल-पल घटती-बढ़ती रहती है, क्योंकि हर पल लोगों का मरना-जीना लगा रहता है। इसलिए यदि सभी लोगों को एक जगह इकट्ठा किया जाए तभी उन्हें गिनकर ठीक संख्या बताई जा सकती है।’ बादशाह बीरबल के उत्तरों से संतुष्ट हो गए, लेकिन ख्वाजा बोले, ‘ऐसे गोलमोल जवाबों से काम नहीं चलेगा जनाब!’ बीरबल बोले, ‘ऐसे सवालों के ऐसे ही जवाब होते हैं। ख्वाजा साहब से फिर कुछ बोलते नहीं बना।

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मेरू की मंजिल।

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◊ मेरू की मंजिल। ◊

मेरू को बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था। उधर उसका छोटा भाई चीनू बिल्कुल उससे उलट। बिल्कुल न पढ़ना और खेलकूद में मस्त रहना। मेरू चीनू से उम्र में तीन साल बड़ी थी और नौवीं क्लास में पढ़ती थी। चीनू छठवीं क्लास में था। मेरू अपनी क्लास में हमेशा अव्वल आती थी। उसके मम्मी-पापा को उस पर बहुत गर्व था, लेकिन चीनू की तरफ से वे परेशान रहते थे। जब भी वे पेरेंट्स मीटिंग में जाते तो चीनू के न पढ़ने और शैतानी करने की ज्यादा शिकायतें मिलतीं। लेकिन चीनू में एक खास बात थी कि स्कूल में वह फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी था। मेरू से क्लास के सभी टीचर खुश रहते थे, क्योंकि वह मेहनत से पढ़ाई करने के साथ-साथ स्कूल में समय-समय पर होने वाली गतिविधियों में भी खूब हिस्सा लेती थी।

एक बार एक अन्य स्कूल में एक साइंस क्विज का आयोजन हुआ, जिसमें हिस्सा लेने के लिए स्कूल से सिर्फ मेरू का ही नाम चुना गया। उस स्कूल में क्विज में हिस्सा लेने के लिए बहुत सारे स्कूलों से मेधावी बच्चे आये। शुरू में तो मेरू को डर लगा कि पता नहीं कैसे-कैसे प्रश्न पूछे जाएंगे। लेकिन जब क्विज शुरू हुआ तो उसका सब डर दूर हो गया और उसने सभी प्रश्नों के उत्तर बड़ी कुशलता व निर्भीकता के साथ दिये। अंत में उसे क्विज का विजेता घोषित किया गया। जब स्कूल प्रिंसिपल को पता चला कि मेरू ने क्विज प्रतियोगिता जीत ली है तो वह बहुत खुश हुईं। उन्होंने अपने स्कूल का नाम रोशन करने के लिए उसे सम्मानित किया।

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मेरू को साइंस विषय बहुत अच्छा लगता था। जब तक उसे साइंस का कोई टॉपिक समझ में नहीं आ जाता था, तब तक उसका वह पीछा नहीं छोड़ती थी। यही वजह थी कि उसे ही सभी जगह साइंस की होने वाली प्रतियोगिताओं में भेजा जाता। एक बार किसी प्रतियोगिता में उसे पूछा गया कि तुम बड़ा होकर क्या बनोगी, तो उसका जवाब था – साइंटिस्ट। उसने दसवीं क्लास में टॉप किया था। जब 11वीं में आई तो उसने साइंस स्ट्रीम ही चुनी। फिजिक्स व कैमिस्ट्री विषयों के होने वाले प्रयोगों में उसे बड़ा मजा आता था। जब क्लास के बच्चों को कोई बात समझ नहीं आती थी तो वह टीचर की अनुपस्थिति में खुद ही टीचर बन जाती थी।

एक बार स्कूल में एक नाटक का आयोजन किया गया। वह नाटक साइंस विषय पर ही आधारित था, जिसमें स्कूल के बच्चों को अभिनय करना था। उसमें एक साइंस टीचर का भी रोल था। उस रोल को निभाने की बात आई तो इसके लिए मेरू को चुना गया। मेरू प्रतिभाशाली तो थी ही और क्लास में अपने टीचर की अनुपस्थिति में टीचर बन जाती थी तो उसे यह रोल करना बड़ा आसान लगा। उसने यह रोल बखूबी निभाया। उस नाटक को देखने के लिए बड़े-बड़े अधिकारी व गण्यमान्य लोग आये थे। उनमें कुछ फिल्म व टेलीविजन के लोग भी शामिल थे। एक टीवी सीरियल के डायरेक्टर को मेरू साइंस की टीचर के रोल में बहुत पसंद आई।

वह दूसरे दिन प्रिंसिपल से मिले और मेरू के बारे में जानना चाहा। प्रिंसिपल ने मेरू को उनसे मिलाया तो वह उससे बहुत प्रभावित हुए। वह बहुत दिन से ऐसी ही एक बाल कलाकार की खोज में थे, जो उन्हें मेरू के रूप में दिखाई दे गयी थी। उन्होंने उसी समय उसे अपने एक नये टीवी सीरियल में अभिनय करने का ऑफर दे दिया। प्रिंसिपल ने भी अपनी सहमति जताई। यह सुनकर मेरू को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उसे टीवी सीरियल में काम करने का ऑफर मिल सकता है। पर दूसरी तरफ उसका मन तो साइंस पढ़ने और एक बड़ी साइंटिस्ट बनने का था। उसने सोचा कि अगर वह टीवी सीरियल में काम करने लगेगी तो उसकी पढ़ाई का क्या होगा। और उस सपने का क्या होगा, जिसे उसे साकार करना है, क्योंकि सीरियल करने पर वह अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाएगी।

जब पढ़ेगी ही नहीं तो आगे कैसे बढ़ेगी? यह सोच उसने सीरियल के डायरेक्टर को यह कहकर मना कर दिया कि उसका सबसे पहला उद्देश्य पढ़ाई करके साइंटिस्ट बनना है। यह बात सुनकर प्रिंसिपल बहुत खुश हुईं, पर सीरियल के डायरेक्टर के ज्यादा आग्रह करने पर और कुछ अपनी मम्मी-पापा के कहने पर मेरू ने हां तो कर दी, पर एक शर्त रखी कि अगर उसकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए तो वह सीरियल में एक्टिंग के लिए तैयार है। सीरियल डायरेक्टर ने कहा कि वह पढ़ाई के लिए उसे पूरा समय देंगे और उन्होंने प्रिंसिपल से भी आग्रह किया कि वह मेरू को पूरा सहयोग करें। चार महीने में सीरियल की शूटिंग पूरी हुई। लेकिन इस बीच मेरू की पढ़ाई का रुटीन कुछ गड़बड़ा गया। वह पढ़ाई में पिछड़ गई थी, क्योंकि जो समय वह सीरियल करने से पहले पढ़ाई में देती थी वह समय देना सीरियल करने पर मुमकिन नहीं था। उसने अच्छे से शूटिंग पूरी कर ली थी। लेकिन अब उसे अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी, जिसके लिए उसके सभी टीचरों ने उसे पूरा सहयोग किया।

मेरू को 11वीं में बहुत मेहनत करनी पड़ी। उसका हौसला बुलंद था। उसके अच्छे मार्क्स आए। जब 12वीं में आई तो स्कूल की ओर से उसे अमेरिका जाने का मौका मिला। वहां उसने एक साइंस प्रोग्राम में हिस्सा लिया। वह अब ऐसी सीढियों पर चढ़ गई थी, जो उसे साइंटिस्ट बनने की मंजिल पर ले जा रही थीं।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

 

 

 

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