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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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माँ

प्रथम गुरु माता।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ प्रथम गुरु माता। ϒ

प्रथम गुरु माता – Pratham Guru Mata

महर्षि वेदव्यास जी के अनुसार …..

“पितुरप्यधिका माता   
गर्भधारणपोषणात् ।
अतो हि त्रिषु लोकेषु 
नास्ति मातृसमो गुरुः”॥
गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है।
“नास्ति गङ्गासमं तीर्थं 
नास्ति विष्णुसमः प्रभुः।
नास्ति शम्भुसमः पूज्यो
नास्ति मातृसमो गुरुः”॥
गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं।
निर्माण यानी “सृजन”। सृजन की शक्ति प्रकृति ने केवल नारी जाति को ही प्रदान की है। (हालांकि बीज तत्व की महिमा को नकारा नहीं जा सकता।) नारी वह है जो निर्माण करती है, सृष्टि का पोषण करती है, संरक्षण करती है, पुष्पित-पल्लवित करती है। नारी जाति के बिना पुरुष का, इस विश्व का अस्तित्व संभव नहीं है। नारी हर रूप में पूजनीय है। जब एक मां बनती है तो उसके ऊपर बहुत अधिक जिम्मेदारी आ जाती है। मां वह है जो अपने बच्चे को हर तरह से, हर हर दृष्टि से सुरक्षित, संरक्षित करती है। और गर्भ (गर्भाधान) से लेकर जब तक बच्चे माँ की बात सुने, तब तक वह केवल उचित संस्कार और उचित शिक्षा ही प्रदान करती है। मां के द्वारा प्रदान संस्कार व्यक्ति के मानस पटल पर आजीवन रहते हैं। हमारा इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है जिसमें बचपन में जिन महापुरुषों ने अपनी मां से वीर रस की कविताएं, कहानी सुनी और देश के लिए अपनी जान गवा दी। एक मां अपने बच्चे को हर प्रकार से समाज उपयोगी, मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण इंसान बनाना चाहती है। इसलिए अपने पूरे तन, मन, धन से इस बात का प्रयास करती है कि उसका बच्चा एक अच्छा सभ्य नागरिक बन सके एवं मानवता के लिए, समाज के लिए, देश के लिए वह कुछ भी करने के लिए सदैव तत्पर रहे। इस संदर्भ में मैं अपनी स्वरचित कविता की  पंक्तियां कहना चाहूंगी जिसमें एक माँ की महिमा का वर्णन है __
♥ माँ ♥

माँ है तो श्री है, आधार है क्योंकि,
प्रकृति, धरती एक माँ का ही तो प्रकार है।
                    
माँ है तो आसक्ति है क्योंकि,
माँ में ही तो असीम शक्ति है।
                     
माँ है तो त्याग है, बलिदान हैं क्योंकि,
                                  माँ में सिमटा एक बच्चे का पूरा जहान है।                              
                       
माँ वो है जो खुद मिटकर एक बच्चे को बनाती है
क्योंकि – पत्थर पर पिसकर ही हिना रंग लाती है।
                       
माँ है तो परिवार है, संस्कार है, क्योंकि,
केवल माँ में ही तो ममता है, प्यार है, दुलार है।

                      
माँ है तो जन्म है, बचपन है, लोरी है क्योंकि, 
माँ की ममता एक रेशम की डोरी है। 

                      
माँ है तो कृष्ण है, राम है, बलराम भी है क्योंकि,
माँ के बिना असम्भव इन्सान तो क्या भगवान भी है। 

                       
माँ है तो दादी है, नानी है और, 
एक बालक के बिना, माँ भी एक अधूरी कहानी है।

माँ है तो सबका बचपन अनूठा, निराला है, क्योंकि माँ ही तो हर बच्चे की प्रथम पाठशाला है।
 🙂 जरूर पढ़े – प्रसन्नता बाहर से नहीं अंदर से आती है।
इस कविता के माध्यम से हमने देखा कि मां व्यक्ति के जीवन में क्या कर सकती है और मां के बिना यह जीवन ही नहीं है। उसकी शिक्षा के बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं बन पाएगा क्योंकि मां प्रथम गुरु है। वह गर्भस्थ शिशु से लेकर अपने जीवन के अंत तक, अपने बच्चे को केवल अच्छे संस्कार, अच्छी शिक्षा, किसी प्रतिफल की इच्छा किए बिना, प्रेम, ममता और दुलार के साथ प्रदान करती है। उसमें उसका कोई भी स्वार्थ, कोई भी लाभ निहित नहीं होता। इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति यदि कुछ भी प्रदान करता है तो उसमें प्रतिफल पाने का (किसी न किसी तरीके से, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से) उसका लक्ष्य होता है। एक माता-पिता ही होते हैं जिनमें कभी भी किसी भी प्रकार का प्रतिफल पाने की कोई इच्छा नहीं होती। वह सदैव अपने बच्चों का केवल कल्याण और कल्याण ही चाहते हैं और यह चाहते हैं कि उनके बच्चे सदा प्रगति के पथ पर अग्रसर रहें और सदा खुश रहें। इससे ज्यादा मां के बारे में और क्या कहा जा सकता है। मां केवल मां है। प्रथम गुरु है, आदरणीय है। दुनिया में सभी का ऋण चुकाया जा सकता है परंतु एक मां के ऋण से कभी भी उऋण नहीं हुआ जा सकता। इसीलिए कहा भी है सबसे पहले “मातृ देवो भव”आता है। मां चाहे कोई भी हो सदैव आदरणीय हैं। अतः अंत में बस यही कहना चाहूंगी कि __
एक माँ की बस यही कहानी है,
उसके आँचल में दूध और पाँव में जिंदगानी है,
माँ और माटी का सदियों पुराना नाता है, इन दोनों की हस्ती को चाहकर भी भला कौन मिटा पाता है, 
एक जननी है तो दूसरी मातृभूमि भारत माता है।
♦ डॉ• विदुषी शर्मा – नई दिल्ली ♦
_____
हम दिल से आभारी हैं डॉ• विदुषी शर्मा जी के प्रेरणादायक लेख (प्रथम गुरु माता) हिन्दी में Share करने के लिए।
About – डॉ• विदुषी शर्मा जी,
आप अभी कार्यरत हैं – दिल्ली स्टेट की जनरल सेक्रेटरी इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गेनाईजेशन. (You are currently working – Delhi State General Secretary International Human Rights Organization.)
 —♦—

विदुषी शर्मा जी के लिए मेरे विचार:

♣ 🙂 “विदुषी शर्मा जी” ने बहुत ही सरल शब्दों में माँ के गुणों और प्यार का मनोरम वर्णन किया है। हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। माँ के गुण और प्यार सागर के गहराई से भी ज्यादा हैं। सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान गहराई से हर शब्दाे का सार समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

जरूर पढ़े: दिल से कागज में उतर ही जाती है।

जरूर पढ़े: हम दोनों की दो-दो आंखें।

♥⇔♥

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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Filed Under: 2018-Kmsraj51 की कलम से….., माँ, हिन्दी साहित्य Tagged With: essay on mother, first guru of knowledge, mother day essay in hindi, pratham guru mata, Vidushi Sharma, ज्ञान की प्रथम गुरु माता है, डॉ विदुषी शर्मा, प्रथम गुरु माता, माँ, माँ की महिमा, माँ की महिमा कविता, माँ के ऊपर छोटी कविता, माँ पर कविता हिन्दी में, माँ पर कुछ पंक्तियाँ, माँ पर कुछ शब्द, विदुषी शर्मा

माँ।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ माँ। ϒ

यह वह शब्द है जो किसी भी व्यक्ति के जीवन में सबसे ज्यादा अहमियत रखता है। ईश्वर सभी जगह उपस्थित नहीं रह सकता इसीलिए उसने धरती पर मां का स्वरूप विकसित किया, जो हर परेशानी और हर मुश्किल घड़ी में अपने बच्चों का साथ देती है, उन्हें दुनियां के हर गम से बचाती है। बच्चा जब जन्म लेता है तो सबसे पहले वह मां बोलना ही सीखता है। मां ही उसकी सबसे पहली दोस्त बनती है, जो उसके साथ खेलती भी है और उसे सही-गलत जैसी बातों से भी अवगत करवाती है। मां के रूप में बच्चे को निःस्वार्थ प्रेम और त्याग की प्राप्ति होती है तो वहीं मां बनना किसी भी महिला को पूर्णता प्रदान करता है।

¤~≈~¤

मन्नतें और मिन्नते कुछ भी काम नही आती।
चले ही जाते है वो जिन्हें, जाना होता है।
कोई कुछ नही कर पाता॥

©- विमल गांधी। ∇

Vimal Gandhi-kmsraj51
विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी कविता साझा करने के लिए।

विमल गांधी जी के लिए मेरे विचार: 

♣ “विमल गांधी जी” की कविताआे के हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

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जुलाई-२७ – निर्वाण तिथि Of.. डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम।

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ϒ जुलाई-२७ – निर्वाण तिथि Of.. डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम। ϒ

जुलाई-२७ – निर्वाण तिथि Of.. डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, काे शत-शत नमनः
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July -27 – Nirvana Date Of Dr. A. P. J. Abdul Kalam

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“एक महान विचारक, विद्वान, विज्ञानविद और उच्च कोटी के मनुष्य, भारत के 11वें राषट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, एक ख्याती प्राप्त वैज्ञानिक इंजीनियर जिन्होने भारत को उन्नत देशों के समूह में सबसे आगे लाने के लिये प्रक्षेपण यानो तथा मिसाइल प्रऔद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।”

मैं अब भी पूनम की रात में अपनी माँ काे याद करता हूँ। उस स्मृति की छवियाँ मेरी पुस्तक “अग्नि की उड़ान” में संग्रहीत `माँ` कविता में उभरी हैंः …..

मेरी यादाें में वे क्षण,
हैं जीवंत अभी भी।

दस बरस का बालक मैं,
पूरनमासी की निशि-वेला में
नींद के आगाेश में
बड़े भाई-बहनाें की ईर्ष्या का पात्र बना
साेया हुआ था तुम्हारी गाेद में।

तुममें ही सिमटा था
मेरा पूरा जहान।
माँ, ओ माँ, तू महान!

जाग कर आधी रात में लगता मैं बिलखने
उनींदी आँखाें से आँसू लगते झरने
और भीग जाते मेरे घुटने।

भाँप लेती थी तब तू मेरे दर्द काे, और
तेरी स्नेहिल पुचकार से
हाे जाता दर्द सहज ही छूमंतर।
तेरे वत्सल स्नेह से
मिली अपार शक्ति मुझे-
कि बेख़ाैफ़ निकल पड़ा
उसी एक आस-विश्वास के सहारे-
ज़िदगी की डगर पर
जीतने जहान काे।

है मुझको विश्वास ॰ पूरा है विश्वास
कि हम फिर मिलेंगे कयामत के दिन
रहूँगा नहीं मैं, माँ,
तब भी अकेला – तुम्हारे बिन।

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* चांदी की छड़ी।

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