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Dil ko Chune Wali Shayari

बदलता भारत।

Kmsraj51 की कलम से…..

Badalta Bharat – बदलता भारत।

बदल गया भारत, देश बदल गया,
नया दौर आने से भारत बदल गया।
इंसान ही इंसान का दुश्मन बन गया,
जो विश्वास अपनों पर था वो मिट गया।

ऐसा मंजर आया, सब कुछ बदल गया,
झूठ का बोलवाला, सत्य का पतन हो गया।
बन गए अलग-अलग दल, अपनी राजनीति चला रहे है,
सत्ता की खातिर, एक दूसरे को नीचा दिखा रहे है।

देश प्रेम और सद्भावना तो कहाँ लुप्त हो रही है,
गुनाहों और अपराधों को सरेआम बढ़ावा दिया जा रही है।
दिन दहाड़े अपहरण, धोखाधड़ी,
बेटियों की इज्जत सरे आम लूटी जा रही है,
देखकर भी सभी मौन धारण किये हुए है।

तिरंगा की शान की खातिर कितने वीरों ने बलिदान दिया,
आज वही तिरंगा शर्म से सर को झुकाए हुए है।
आजादी की खातिर हमारे वीरों ने अपने प्राण गवाएं,
आज देख भारत की दुर्दशा देख कर आँखों में आँसू भर आएं।
इंसान अपने में इतना व्यस्त हो गया,
दूसरे को अनदेखा कर अपने में ही खो गया।

♦ पूनम गुप्ता जी – भोपाल, मध्य प्रदेश ♦

—————

  • “पूनम गुप्ता जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता के माध्यम से समझाने की कोशिश की है — चारो तरफ आज झूठ का बोलवाला है सत्य का पतन हो गया। सभी राजनीति दल, अपनी-अपनी राजनीति चला रहे है, गरीबो व निर्दोषों की ना सुने कोई, जनता मारी-मारी फिर चहु ओर। जिस देश प्रेम और सद्भावना के लिए वीरो ने अपना बलिदान दिया वो तो कहाँ लुप्त हो गया है, गुनाहों और अपराधों को सरेआम बढ़ावा दिया जा रही है अब। दिन दहाड़े अपहरण, धोखाधड़ी, बेटियों की इज्जत सरे आम लूटी जा रही है, देखकर भी सभी मौन धारण किये हुए है क्यों? इंसान ही इंसान का दुश्मन बन बैठा है आज, जो विश्वास था अपनों पर वो मिट गया है आज।

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यह कविता (बदलता भारत।) “पूनम गुप्ता जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी लेख/कवितायें सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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हृदय कमल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ हृदय कमल। ♦

काव्य : हारे जीते।

शब्दों की वेणु की गुञ्जन कैसी बस गई,
मन के तारों में हमारे कैसे घुल गई।
आँखें संसार की सूर्य-चंद्र-सी खुल गई,
सर्दियों के कमलिनी झीलों में बसकर,
हृदय के भाव में बसकर खिल गई।

नीवर से उठकर प्रांजल कँवल विश्राव जैसे,
सुवास स्वर पीकर क्षितिज भी।
मधुसूदन चित्त विभ्रम बन पधारे,
उर समीर के हिय में भरा कम्पन सारा,
प्रीति का मंद – मंद गति क्रम जैसे।

रहा है कर समय विश्व को,
सोया हुआ सा हुआ जो निर्मोही।
खुद को हारकर जो सकल जन जीते,
विजित कर जो जन सकल हारे,
जो भर गई शास्त्र सिन्धु माया।

जगत में आलोक कर गई छाया,
मिलकर हृदय धन से छूट गई।
प्रियतमा की वास्तविक काया,
कथाओं में लोक-कांताओं के,
श्यामता के गुमान झाड़े।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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यह कविता (हृदय कमल।) “सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल’ जी“ की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें/लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा।

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कोमल कँवल।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कोमल कँवल। ♦

काव्य : इक नजर।

कुसुमित हुई कँवल जब रश्मि पड़ी केश की,
खिल – खिल गई पंखुड़ी उस घड़ी पड़ी जब।

रचती डली पर डली में स्वच्छ सुथरी-सुथरी,
बड़े – बड़े पल्लव कोमल वो भी भरे – भरे।

सुवासमयी सुगंध से गले – गले तक सँवरे,
तिलस्म की शंस में जैसे आँखें खुली – खुली।

सितारों में अपने जीवन की मालिकाओं के,
हार बनाये उपवन में सुघड़ – सुघड़।

सुमन मयूख के बदन पर बिखरी पड़ी,
यौवन की मदमाती रसभरी अमर कड़ी।

वियोग से भरी चितवन सारी,
चिन्मय दु:खद् मधुर भास कांति निपात।

शीर्ण हृदय अलक्ष्य रचन,
खुली आँखें हैं नयननीर भरी बड़ी-बड़ी।

♦ सतीश शेखर श्रीवास्तव ‘परिमल‘ जी — जिला–सिंगरौली, मध्य प्रदेश ♦

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