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“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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poet sukhmangal singh poems

ऑनलाइन पाँव पसारो।

Kmsraj51 की कलम से…..

Spread Your Feet Online | ऑनलाइन पाँव पसारो।

जमा न पाया पांव धरा पर,
पर उड़ते आकाश।
घास उखाड़ने कूबत नहीं,
धरा धर्म फैलाने की आस।

पवन की पूजा करते सभी,
छा जाते हैं बादल कभी-कभी।
धूल गुबार अंधड़ कभी भी,
इस डाल से उस डाल पर,
कूदते रहते हैं बंदर सभी।

मानव कितना भोला भाला,
बरसों से आया है सहता।
सहता है अपनों का झमेला,
धरा धर्म और समाज का।
आक्षादित विश्वासों का मेला,
मानों चारो तरफ घेरा खेला।

लोगों संग कुनबे का रेला,
से ऑनलाइन में बढ़ रहा खेला।
फिल्म समीक्षा में ठेलम ठेला,
होती है भारत में वर्षों से ही सही।
लगभग डेढ़ सौ मिलियन से खरीद,
धरती पर पांव जमा लुटते हैं शरीर।

ऑस्ट्रेलिया, शॉपिंग में आया उछाल,
सत्य छिपा है कहीं भूल में।
मूल छिपा है कहीं भूल में,
पांव जमाने को खोजना मुश्किल,
पांव पसारने को जमीन आवंटित।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जिस तरह से ऑनलाइन लोगों को बेवकूफ बनाकर लुटा जा रहा हैं, चाहे वह फर्जी फिल्म समीक्षा करके हो, अन्य ऑनलाइन शॉपिंग का लोभ दिखाकर लूटना हो, आजकल विदेशी कंपनियां बहुत तेजी से अपने देश में ऑनलाइन पाँव पसार रही है, और अपने भारत देश का पैसा विदेश लेकर जा रही है। जरा सोचों और कोशिश करों की अपने देश का पैसा अपने देश में रहे। अपने भारत में बने भारतीय वस्तुओं को अपने भारतीय भाई – बहनों खरीदों, जिससे भारत का पैसा भारत में रहे।

—————

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यह कविता (ऑनलाइन पाँव पसारो।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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कृष्ण जन्माष्टमी।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ कृष्ण जन्माष्टमी। ♦

सौ जन्मों के पापों से छुटकारा मिलता है,
कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव सबसे उपयुक्त पर्व है।
हजारों एकादशी का व्रत करने से जो पुण्य मिलता है,
जन्माष्टमी पर्व पर व्रत करने से ही मनुष्य तर जाता है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में भी चित्रण किया गया है,
भविष्य पुराण में श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर वर्णन है।
पुत्र जन्म का समाचार सुन दयानंद से हृदय भरे आया,
ब्राह्मणों को दान दिया स्वस्तिवाचन जात कर्मों को कराया।

देवता की विधि पूर्वक पूजा – पाठ मंत्रोचार करवाया,
गौ और तिल के साथ पहाड़ सुनहरे वस्त्र भूषण दान दिया।
ब्रह्मण सूत माधव और बंदी जन आशीर्वाद देने लगे,
गाने लगे गायक, दुंदुभी और भेरियां भी बजने लगीं।

बृज के सभी हाल बागवानी और आंगनबाड़ी सजने लगी,
इत्र और जल का छिड़काव चारों तरफ किया जाने लगा।
रंग बिरंगी वस्त्र पुष्प और पल्लवों में वंदन द्वार सजाया गया,
गाय बैल और बछड़ों के अंगो में हल्दी तेल लेप किया गया।

गेरू से पीठ पर हाथ के पंजों से रंगीन संस्कृतिक निशान लगे,
मोर पंख और फूलों के हार से जानवरों को पहनाया गया।
ग्वाल वाल सब मिलकर हाथों में भेट लिए नंद बाबा के घर चले,
सुनकर यशोदा को पुत्र हुआ है गोपियों को भी आनंद मिला।

विशेष तरह से ही सुंदर वस्त्र आभूषण अंजन से श्रृंगार किया,
भेंट की सामग्री के संग गोपिकाएं मिलनें यशोदा जी के पास चलीं।
झल फल झल फल चलते समय कानों का सुंदर कुंडल डोल रहा,
गले पड़े हुमेल और मणियों के कुण्डल सुशोभित हो रहे थे।

जिस मार्ग में आगे बढ़ती थीं उसमें चोटियों के गुथे पुष्प बरसते,
हाथों की जड़ाऊ कंगन रुक रुक कर चमकने लगता।
नंद बाबा के घर जाकर सभी लोग नवजात को आशीर्वाद देतीं,
हल्दी मिला हुआ पानी छिड़क कर मंगल गान करती थीं।

जब नंद बाबा की ब्रृज में प्रकट हुए भगवान श्री कृष्णा
उस समय उनकी जन्म का महान उत्सव मनाया गया।
नंद बाबा के व्रज में रिद्धि -सिद्धियां अठखेलियां खेलने लगी,
लक्ष्मीनिया का क्रिडास्थल श्रीकृष्ण का निवास स्थान बन गया।

गोकुल के नन्द बाबा मथुरा चले कंस को वार्षिक कर चुकाने,
बात जान कर वसुदेव भाई नन्द जी से मिलने मथुरा चले गए।
आपस में दोनों लोग मिलकर प्रेम से विह्वल हो रहे थे,
वासुदेव नें नंद जी से कुशल मंगल पूछकर कहने लगे।

बड़े ही सौभाग्य की बात है कि तुम्हें संतान प्राप्त हुआ,
आनंद का विषय है कि आज हम लोग का मिलना हुआ।
सगे प्रेमियों का मिलना कामनाएं पूर्ण होना बड़ा दुर्लभ है,
सगे संबंधी और प्रेमियों का एक स्थान पर रहना संभव नहीं है नहीं।

यद्यपि सबको प्रिय लगता पर सबके प्रारब्ध अलग-अलग होते हैं,
मेरा लड़का अपनी मां रोहणी के साथ ब्रज में भाई रहता है!
जिसका पालन पोषण तुम और यशोदा ही करतीं हैं,
तुम्हीं को वह सम्मान के साथ माता – पिता मानता है।

धर्म अर्थ और काम मनुष्य के लिए स्वजनों को सुख देने वाला हो,
अपने स्वजनों को दुख देने वाला कार्य हितकारी नहीं होता है।
नंद जी और वसु देव ने सुख और दुख की बातें आपस में की,
वसुदेव ने नंद जी से मथुरा में अधिक दिन नहीं ठहरें कहीं।

हम दोनों मिल चुके गोकुल में बड़े – बड़े उत्पात हो रहे हैं,
तब गोपो के साथ नंद छकड़ों पे सवार होकर गोकुल की यात्रा की।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — इतिहास इस बात का साक्षी है, दुष्ट कभी सुधरते नहीं, दुष्टों का संहार करना ही पड़ता है दुनिया व समाज में शांति और खुशहाली के लिए, फिर चाहे युग (समय) कोई भी हो। कृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था। वे माता देवकी और पिता वासुदेव की ८वीं संतान थे। श्रीमद भागवत के वर्णन अनुसार द्वापरयुग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज करते थे। उनका एक आततायी पुत्र कंस था और उनकी एक बहन देवकी थी। श्रीकृष्ण के आगमन से ब्रज भूमि तथा गोकुल में बचपन की अठखेलियों से गोकुलवासी अत्यंत खुश थे। क्या गोप क्या गोपिया, उनकी क्रीड़ाओं और लीला से अत्यंत हैरान व प्रसन्न थे। हैरान इसलिए क्योंकि इससे पहले अद्भुत लीला उन्होंने अपने जीवन काल में कभी नही देखीं थी, और खुश इसलिए क्योंकि श्रीकृष्ण की लीलाओं से सभी को आनंद आता था। माता यशोदा श्रीकृष्ण का लालन पालन कर अत्यंत ही हर्षित थी। नन्द व माता यशोदा श्रीकृष्ण के पालक माता-पिता थे। श्रीकृष्ण ने इंसान के जीवन में धर्म, अर्थ, कर्म व काम का क्या महत्व हैं इसे बहुत ही सरल रूप से समझाया है। इस कविता में कवि सुखमंगल सिंह जी ने श्रीकृष्ण के जीवन व उनके द्वारा की गई लीलाओं का बहुत ही मनोरम व सुन्दर वर्णन किया है।

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यह कविता (कृष्ण जन्माष्टमी।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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काफिया – रदीफ।

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ काफिया – रदीफ। ♦

जिसे रदीफ से पहले ही,
प्रयोग में लाया जाता।
जाने के लिए तैयार जो,
गजल के संदर्भ में शब्द,
इसको पाया जाता है।

शेर में समतुकात्मकता,
बदलता हुआ दिख जाता।
समझ लो काफिया में कि,
टोना होना महकना आता।

वहीं रदीफ के शब्दों में,
पिघलना जलना निकालना।
जैसे शब्द प्रयोग में,
लाए जाते रहते हैं।

काफिया रदीफ की जरूरत,
गाना शायरी तुकांत कविता।
ये प्रयोग के साथ में ही,
गजल में अपनायी जाती।

काफिया और रदीफ बिना,
गाना शायरी गजल आदि।
नहीं लिखी जा सकती है,
इसे हिंदी के विधाओं में,
भी प्रयोग की जाती है।

काफिया! उर्दू कविता के रूप में,
सदा जाना जाता है।
यह अंग्रेजी से अनुवादित,
एक सामग्री के रूप में है।

काफिया शब्द का गायन,
राडिया से पहले हो।
काफिया अरबी शब्द है,
उत्पत्ति! कफु धातु से मानी जाती।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — काफ़िया ग़ज़ल के किसी शेर की लाइन के तुकांत को कहते हैैं। मतलब किसी शेर के आखिर में अगर ‘आता है’ लिखा है तो उसके अगले लाइन में ‘जाता है’, ‘पाता है’, ‘लाता है’ जैसे शब्द ही इस्तेमाल होंगे जो पहली लाइन के आखिरी शब्दों से मेल खाते हो, इसे ही काफ़िया कहा जाता है। काफ़िया के तुक (अन्त्यानुप्रास) और उसके बाद आने वाले शब्द या शब्दों को रदीफ़ कहते है। काफ़िया बदलता है किन्तु रदीफ़ नहीं बदलती है। उसका रूप जस का तस रहता है। इस मतले में ‘सारे’ और ‘प्यारे’ काफ़िया है और ‘मुँह से निकाल डालो’ रदीफ़ है।

—————

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यह कविता (काफिया – रदीफ।) “सुखमंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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विकास मार्ग पर चलें!

Kmsraj51 की कलम से…..

♦ विकास मार्ग पर चलें! ♦

उसने आगे आकर हमें सुनाया,
उत्तर देने के लिए मंगल आया।
हम शांति प्रदर्शक सबको भाया,
सद्भाव की हमने अलख जगाया।

वह कहता है पूराने संबंध छोड़ो,
हम हैं हमसे ही नया नाता जोड़ो।
भारत सदा बैलेंस करके चलता है,
शांतिदूत बन सबकी रक्षा करता।

रक्षा हजारों पर अपनी निर्भरता,
खत्म करने की वह हमसे कहा।
यह पता वह कितना साथ देगा,
वह तो अपनी देखी देखा करता।

तेल और हथियार देने को बोला,
दुनिया पर भरोसा करने से रोका?
खुद उकसा वे पर विश्वास करता,
अपने आप विचार किया करता।

एक अपने मंच से सचिव ने कहा,
ऊर्जा व वस्तुएं हमारे हित ने नहीं।
अपनी आवश्यकता है नहीं छोड़ा,
हमने तो सबसे अच्छा नाता जोड़ा।

मित्र देश के संबंध बिगाड़ने की कहा,
पुराने समझौते को टालने को कहा।
खुद ही महान नई मित्रता बनाता रहा,
आगे आकर चौध राणा चलाता रहा।

भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में भी अपना,
निष्पक्ष बयान दुनिया को दे डाला।
मानव के लिए जांच की कह डाला,
अमन चैन की राह सुझाव दे डाला।

उसके गले नहीं उतरती बात हमारी,
भला सबका, यही हमने बता डाला।
दोनों पक्षों को शांति संदेश सुनाया,
संयम बरतने के लिए हमने बताया।

सुंदर सुगम मार्ग प्रशस्त किया जाता,
उपदेशों की तरफ ध्यान दिया जाता।
दुनिया में प्रदूषण पर रोक लग जाता,
विकास मार्ग का रास्ता खुल जाता।

♦ सुखमंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुखमंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — दोस्त वही अच्छा जो अच्छे समय के साथ – साथ बुरे समय में भी साथ ना छोड़े। ऐसी दोस्ती का क्या करना? जो मात्र अपना ही फायदा देखे सदैव? ऐसे दोस्त से अच्छा है की, दोस्ती ही ना हो, हमे तो वही दोस्त चाहिए जो सदैव हमारा साथ दे ऐसे दोस्त के साथ ही कंधे से कन्धा मिलाकर चले। ऐसे दोस्त से दुरी ही भली है जो जरूरत पर साथ ही ना दे, उम्मीद पर कभी खरा ही ना उतरे, जो सदैव ही केवल अपने बारे में सोचे। हमारे लिए ऐसा ही दोस्त सही है जो सुख – दुःख में सदैव ही हमारे साथ खड़ा रहे।

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