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KMSRAJ51-Always Positive Thinker

“तू ना हो निराश कभी मन से” – (KMSRAJ51, KMSRAJ, KMS)

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sukhmangal singh poems

राखो चुंदरिया संवारि।

Kmsraj51 की कलम से…..

Rakho Chundaria Sanvaari | राखो चुंदरिया संवारि।

भीगल जाले मोर चुनरिया, छुपाये छिपे ना द्युति दागरी।
चूक चटक चंदा जो छिपा था, चुंदरी तो चटकार री॥

भीगल चुंदरी निखिल निचोड़ा, मोहन ज्यों सपने साथ री।
घट-घट खोजत नीक चुनरिया, पायो अपने पास री॥

इहै चुनरिया नहीं तुम्हारी, प्यारी-प्यारी यारी दुलारी।
जेते सुन्दर चुंदरी पायो, तेते ज्ञान, मान, ग्यान अगाध री॥

जा बुन लायो मोहन मोरे, मौन ज्यों महा भंडार री।
चुनरी चुरा चारो चौकछु रे, सूर्य चन्द्रमा जान्यो संसार रे॥

आंगन लाये पिया चुनरिया भीगी झीनी सारी।
गणपति गावत बीच बाजार, नीक चुनरिया नीक किनारी॥

रंगी चुनरिया को रंग निराला, मागत मधुवन मां नन्दलाल।
मंगल मंदिर बूझत न्यारी, देखत बारी – बारी – सारी॥

सोलह सी बंद चुंदरी चोखी, चार चौपटा नाग-पास री।
रंगना धूमिल चुंदरी चटकीली, राखो राजे इसे संवारि री॥

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — यह कविता मोहन (श्री कृष्ण) और उसकी प्यारी चुंदरी के प्रेम की कहानी को व्यक्त करती है। चुंदरी को धीरे-धीरे मोहन की प्यारी यारी और उसके ज्ञान के साथ मिल जाती है। मोहन की प्रेरणा से, वह चुंदरी अपने स्वामी के पास आती है और उसका साथ देती है, जैसे सूर्य और चंद्रमा समय-समय पर संसार को प्रकाशित करते हैं। चुंदरी का रंग निराला होता है और वह मंगल मंदिर की शोभा को बढ़ाती है, जैसे मधुवन में नन्दलाल के साथ खुशियों की गाथा। इस रूप में, चुंदरी को मोहन के प्रेम और उसकी भक्ति का प्रतीक माना जा सकता है।

—————

यह कविता (राखो चुंदरिया संवारि।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।-KMSRAj51

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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ज्ञानवापी षंड-धा।

Kmsraj51 की कलम से…..

Gyanvapi Shand-dha | ज्ञानवापी षंड-धा।

श्रृंगार गौरी जी की साधना के साधक शिव,
विविध प्रभाव छापे ‘ज्ञानवापी’ धाम हो।
जिनकी उपासना को महिमा बखाने जग,
नन्दीश्वर संग जो विराजे आठो याम हो।
काल – काल महाकाल ताल ठोंक खड़े हैं जो,
सदर अदालत दिया सर्वे प्रोग्राम हो।
भेष, निसून सर्वे हित अधिवक्ता चले,
नामित हुये थे सर्वे हित जो जो नाम हो।

कला कृतियों में का फोटोग्राफी लिया जाने लगा,
नोंक-झोंक होने लगा दोनों पक्षकार में।
बात पर बात बढ़ती ही गयी दोनो ओर,
सर्वे काम रोक दिया गया तकरार में।
नंदी महराज सामने मिला था शिवलिंग,
मिल गये बाबा शोर हुआ इजहार में।
मूर्तियों को तोड़ रखा गया तहखाने में था,
ताला नहीं खोला गया ही इन्तजार में।

टूटी मूर्तियाँ मिली अंधेरे में विराजमान,
उसकी रिकार्डिंग हुयी बैटरी प्रकाश में।
मिट्टी डाली नमी मिली दस दिन पहले की,
राज खुला पक्ष और विपक्ष बीच क्रास में।
लोम हर्षक घटना न घट पायी दुनो ओर,
पुलिस प्रशासन साथ दिया इतिहास में।
चुनके दिवाल जो छिपाये माता गौरी जी को,
‘मंगल’ मनाने लगे आस्था के सुभाष में।

जांच टीम संग दोनों पक्षकार साथ रहे,
सुबह दोपहरी से काम को निभाया था।
तहखाना इमेज में बनी जो दीवार रही,
वो श्रृंगार गौरी श्री मूर्ति को छिपाया था।
स्वेत सीमेंट तहखाने में मिला जो भी,
सद्व्यवहार भंग हुआ जो निभाया था।

मंगल’ मुरीद बीच तालमेल हुआ नहीं,
हताशा होने लगी साथ जो भी आया था।
सदी पन्द्रहवीं मूर्ति मिली तहखाने में जो,
भग्नावशेष का भण्डारण वहाँ भाया था।
यत्र-तत्र बिखरे हुए थे मूर्ति चारों ओर,
कुछ सही मूर्तियों को वहां पर छुपाया था।

फोटोग्राफी ली गयी करीने से सजा के इसे,
महमूद औरंगजेब मलवा बनाया था।
सर्वे ऑफ इण्डिया करेगी पहचान इसे,
न्याय प्रिय सर्वे का आदेश जो सुनाया था।

मिले हुए मलबे को छान रही सर्वे टीम,
सत्य दफनाया गया मलबे के ढेर में।
उजागर होते तथ्य कागज पे लाया गया,
बसते में बन्द करवाया गया देर में।

हाल ही में पेंटिंग तहखाने में हुयी है मिली,
किस सदी का है मुल्ला उलझाये फेर में।
कोर्ट के आदेश पर फिर जांच होगा क्योंकि,
दनुज प्रभाव सत्य छ्लें ना अहेर में।

कुछ कला कृतियाँ है कह रही लोगों से,
प्राचीन मूर्तियाँ दबा दी गयी तोड़ कर।
फोटो लिया जाने लगा बरामदा खम्भों का है,
रोशनी नीलाम हुयी शिव – धाम तोड़ कर।

रानी ग्वालियर बनवायी वहाँ मण्डप थी,
रास्ता सुरंग का है बना हुआ जोड़ कर।
कहा गया रामनगर किले में जा मिलता है,
राजघाट पुरातत्व में भी बना जोड़कर।

ताला खुला मिला तहखाने के दो कमरों का,
समय पाबंद सर्वे किया गया उसका।
देव परिसर की दुकाने सभी बन्द रहीं,
पाँव पयादे राहियों पर ध्यान जिसका।

तीसरे भी कमरे का ताला तोड़ा गया वहाँ,
चौथे कमरे का दरवाजा कहाँ खिसका।
अन्दर की चुनी गयी दीवारों के पीछे क्या है,
तोड़ने का न्यायिक आदेश नहीं उसका।

गुम्बद तालाब की भी रिकार्डिंग हु‌यी वहाँ,
साठ पैसठ परसेन्ट हुवा काम है।
देखने को शान्ति काशी वासियों में मिली अहा,
अधिवक्ता आयुक्त टीम भी ललाम हैं।

न्यायालय न्याय प्रिय काम को सराहें, लोग,
फर्स तोड़ जाँच हो तो सच खुले आम है।
‘मंगल’ मनावें लोग, देवता रमन्ते जहाँ,
मुल्ला कठमुल्ला छेड़ रहें, शिव-धाम है।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — श्रृंगार गौरी जी की साधना के साधक शिव, विविध प्रभाव छापे ‘ज्ञानवापी’ धाम हो। जिनकी उपासना को महिमा बखाने जग, नन्दीश्वर संग जो विराजे आठो याम हो। काल – काल महाकाल ताल ठोंक खड़े हैं जो, सदर अदालत दिया सर्वे प्रोग्राम हो। नंदी महराज सामने मिला था शिवलिंग, मिल गये बाबा शोर हुआ इजहार में। मूर्तियों को तोड़ रखा गया तहखाने में था, ताला नहीं खोला गया ही इन्तजार में। टूटी मूर्तियाँ मिली अंधेरे में विराजमान, उसकी रिकार्डिंग हुयी बैटरी प्रकाश में। मिट्टी डाली नमी मिली दस दिन पहले की, राज खुला पक्ष और विपक्ष बीच क्रास में। मिले हुए मलबे को छान रही सर्वे टीम, सत्य दफनाया गया मलबे के ढेर में। उजागर होते तथ्य कागज पे लाया गया, बसते में बन्द करवाया गया देर में। “सत्य छुपाये नहीं छुपता।”

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यह कविता (ज्ञानवापी षंड-धा।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

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अयोध्या।

Kmsraj51 की कलम से…..

Ayodhya | अयोध्या।

कण-कण वासी, अवध निवासी,
मानवता के त्राता, जगत के सुखदाता।
दानव – दुष्ट – दलन अवतारी,
श्रृष्टि सृजन सद्धर्म प्रभारी।
सहज शेष शारदा संग में,
भव – भय भन्जन जग हितकारी।

सरयू अमिय प्रदाता, श्रृष्टि जगत विख्याता,
मानवता के त्राता, जगत के सुख दाता।

बंदर संग मदारी भेषा,
दरस-परस शिव अति लवलेशा।
बाल सुलभ श्री राम दरस पा,
अति सुख पावे नर हरि भेषा।

समता मूलक ध्ताया त्रिपुर विनाशक ज्ञाता,
मानवता की त्राता, जगत के सुख दाता।

जल निधि वक्षस्थल पर धाये,
राम सेतु निर्माण कराये।
मर्कट बंदर भालू के संग,
लांघि समंदर लंका आये।

‘मंगल’ भाष्य विधाता, जीवन ज्योति प्रदाता,
मानवता के त्राता, जगती के सुख दाता।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जिस भूमि पर प्राचीन समय से ही महापुरुष तपस्या करते आये है, निष्काम उपासकों की पुण्य गाथा से कण – कण सुशोभित है प्राचीन पुरी अयोध्या धाम। महाबली हनुमान जी के आराध्य की नगरी अयोध्या धाम। सरयू नदी के तट पर प्राचीन पुरी अयोध्या धाम जहां जगत पिता श्री हरि खुद आये श्री राम रूप में, पूरी मानव जाती को मर्यादा व धर्म का सीख देने। दुष्टों का संहार कर, जगत में शांति की पुनः स्थापना कर, प्रेम, पवित्रता व त्याग के साक्षात रूप श्री राम। अयोध्या धाम पुनः विश्व में “वसुधैव कुटुम्बकम्” सनातन धर्म के मूल संस्कार को मानवों में भरने का कार्य करेगा।

—————

यह कविता (अयोध्या।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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भ्रमर गुंजार।

Kmsraj51 की कलम से…..

Bhramar Gunjar | भ्रमर गुंजार।

भ्रमर तुम्हारे गुंजारों पर,
फूल-फूल हंसे कलियां मुस्कायी।
पंकज के पंखुड़ियों में तुम,
बंद हुये रजनी जब आई।

रजनी भर दुःख झेला तुमने,
रश्मि रथी जब नभ में छाई।
छिप गये तारे नभ में सारे,
उषा लली चिड़ियां चहकायी।

मुंह धोकर जल-पान कि ये सब,
उठ गये बाल युवा नर – नारी।
बांध पीठ पर बस्ता बालक,
पढ़ने की सब की तैयारी।

भौंरे सहगामी बन मधु-रस,
चूस सुमन से छत्ता भरते।
शहद बना जीवन हित ‘मंगल’,
दिनभर दौड़ लगाते रहते।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — भ्रमर(भौरे) दिन – रात एक करके जी-तोड़ मेहनत करती है, एक फूल से दूसरे फूल पर, फिर तीसरे फूल पर जाती है, इस तरह से वह अनगिनत फूलों पर जाती है और उन फूलों से थोड़ा – थोड़ा रस लेकर अपने छत्ते में इकट्ठा करती है। इतनी कड़ी मेहनत के बाद तब कही जाकर मधु बनता है, जो हम सभी को बहुत पसंद हैं। भ्रमर(भौरे) से हमें यह सीख मिलती है की कठिन से कठिन मेहनत करने से कतराना व घबराना नहीं चाहिए। हम सभी को हर परिस्थिति से डटकर सामना करना चाहिए।

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यह कविता (भ्रमर गुंजार।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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जागृत का एक दिन।

Kmsraj51 की कलम से…..

A Day Of Awakening | जागृत का एक दिन।

सम्मुख तेरे प्राण वान हूं,
या निष्प्राण हूं क्या बतलाऊं।
जागृति दर्पण के सम्मुख मैं,
क्या देखूं क्या देख न पाऊं।

फिर भी देखो उस महात्मा को,
नीरव में रसना – अर्पण है।
स्वर से स्वर का सम्मेलन ही,
प्राणवान जागृत दर्पण है।

जहां अनुत्तरित प्रश्न वहीं पर,
मिथ्या जगत का स्वप्न बड़ा है।
एक दिवस उठकर दौडूंगा,
नापूंगा जो जहां जड़ा है।

कलम उठा लिखने बैठूंगा,
अपनी गौरव गाथा को।
सबको दिखा सकूं दर्पण में,
संस्कृति और सभ्यता को।

धरती से नवम मंडल तक मैं,
दीपक ज्योति जलाऊंगा।
ज्ञान ध्यान से कबीर जैसा,
‘मंगल’ दरश कराऊंगा।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — हम सब जानते है की इस मिथ्या जगत की सभी चीजें नाशवान है सब नष्ट हो जायेगा एक दिन, फिर क्यों इन नाशवान चीजों के लिए कभी किसी को तकलीफ़ दे। अपने कर्म ऐसे करते चले की सभी को प्रेरणा मिले अच्छा-अच्छा कर्म करने का। कभी भी कोई ऐसा कार्य न करें की आपके कार्य से किसी को दुःख पहुंचे। एक लेखक अपनी कलम से अपने देश की महान संस्कृति और सभ्यता को दिखाने की कोशिश करता है। धरती से नवम मंडल तक का दर्शन कराता है अपनी लेख से लेखक। अपना जन्म, अपने जननी, व जन्मभूमि राष्ट्र के लिए सच्चे मन से समर्पित करें।

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यह कविता (जागृत का एक दिन।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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नारी शक्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

Nari Shakti | नारी शक्ति।

हे शक्ति स्वरूपा नारी,
तुम हो जग- जन हितकारी।

हो क्षीर – नीर की दानी,
वात्सल्यमयी कल्याणी।
हो सका उश्रृण ना कोई,
आंखों में लहरें पानी।

तेरे इस त्याग तपोमय,
आचरण का जग आभारी।
हे शक्ति स्वरुपा नारी,
तुम हो जग-जन हितकारी।

अधरों से अमन्द पिलाती,
लज्जा का भूषण धारी।
करती सतीत्व का पालन,
बन व्रती एक पति-नारी।

ध्रुव हुये अमर नमः मण्डल,
उग जननी – जीवन -क्यारी।
हे शक्ति स्वरुपा नारी,
तुम हो जग-जन हितकारी।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — वह संघर्ष नहीं, त्याग और ममता की एक प्रतिमा है। वह शक्ति भी है, जो समय आने पर दानवों का विनाश भी करती है। भारतीय नारी ने अपने महत्वपूर्ण भूमिका का पालन हर एक युग में किया है। भारतीय नारी अपने विशेष गुणों के कारण आज के आधुनिक युग में भी पुरुषों से कंधे से कंधा मिला कर हर क्षेत्र में कार्य कर रही है।

—————

यह कविता (नारी शक्ति।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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अपनी अंजुरी में भर-भर।

Kmsraj51 की कलम से…..

Apni Anjuri Mein Bhar Bhar | अपनी अंजुरी में भर-भर।

तीतर के झुंड पर,
फेंकना न कोई पत्थर।
प्रीति का सन्देश भेजा।
हर गली हर गाँव को।

धुप उतरी हो कड़ी तो,
कोशिशों से छाँव दो।
कल ये नव गीत मुखर हो,
हर चौकट आँगन में घर-घर।

तीतरों के झुंड पर,
धैर्य और साहस के बूते।
हर विपत्ति को दूर भगायें,
हो उल्लास भरा मन प्रतिपल।
आलस्य फटकने कभी न पाये।

सब को खातिर खुशियां बाटें,
हम अपनी अंजुरी में भर-भर।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

—————

— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — प्रआलस्य कभी भी आप पर सवार ना हो, सदैव अच्छे कर्म करते रहे अपने जीवन में। सभी जीवों से प्रेम करें, इस धरा व प्रकृति पर सभी जीवों का बराबर का हक़ है, उन्हें भी सुकून से जीने दे। सभी से निस्वार्थ प्रेम व स्नेह बनाये रखे, किसी के भी प्रति मन में बैर ना पाले। सदैव ही अपने कर्म व बोल से खुशिया बांटते चलो।

—————

यह कविता (अपनी अंजुरी में भर-भर।) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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प्रकृति नियंता।

Kmsraj51 की कलम से…..

Prakrti Niyanta | प्रकृति नियंता।

प्रकृति नियंता जग जीवों को,
प्राण वायु जीवन धन देता।
लेता नहीं किसी से कुछ भी,
दूषित वायु स्वयं पी लेता।

नदी – झील – झरना – वन – उपवन,
इनके कोमल अंग हैं प्यारे।
इनसे सृजन जलद का होता,
हारते प्यास धरा – जल – ढारे।

धरा – धाम के आभूषण ये,
‘मंगल’ मोद सदा भरते हैं।
समता के पोशाक हैं सारे,
भौतिक ताप सदा हरते हैं।

नीरव जननी में नभ – आंगन,
उद गण ज्योति जलाते रहते।
हरित गैस के कुप्रभाव से,
छिद्र ओजोन घटाते रहते।

शब्दार्थ: उद – उत्कर्ष, प्रकाश,

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — प्रकृति सभी तरह के जीवों को अपनी गॉड में पलटा है, सदैव ही सभी को प्राण वायु जीवन धन देता। प्रकृति कभी भी कुछ लेता नहीं किसी से कुछ भी, दूषित वायु स्वयं पी लेता। नदी-झील, झरना, वन-उपवन ये इनके कोमल अंग हैं प्यारे। इनसे ही सृजन जल का होता है सभी की प्यास बुझती है। धरा के आभूषण ये सदैव ही ऊर्जा प्रकृति में भरते है, सभी जीवों के लिए। मानव ने जो आधुनिकता के नाम पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर तापमान गर्म बना दिया है उसे भी प्रकृति काफी हद तक कम करती हैं। प्रकृति जननी है, सदैव ही प्रकाश व ऊर्जा से सभी जीवों का पोषण करती है। हरित गैस के कुप्रभाव से और छिद्र ओजोन घटाते रहते। इस प्रकृति का हम सबको ख्याल रखना है, तभी वर्तमान और आने वाली पीढ़िया रह पाएंगी इस धरा पर अच्छे से खुशहाल।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

 

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”~KMSRAj51

 

 

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नाचती बसंती।

Kmsraj51 की कलम से…..

Dancing Basanti | नाचती बसंती।

चानी के फूल खिले, चांदनी मंगन,
सुधियों के दीप जले राहों में,
नाचती बसंती रही बाहों में।

रुनुन – झुनुन भनक उठी पायलिया पांव,
महमहायि रजनी गन्धा रजनी के गांव।

चंचल चित्त चहक उठा चाहों में,
नाचती बसन्ति रही बाहों में।

छुवन चाहे अरुणायी अधर को हिलोरे,
खग कुल के कलरव में नाच उठी भोर।

प्रीति पगे द्रम – दल के छाहों में,
नाचती बसन्ति रही बाहों में।

अलसाये नयनों से सुषमा निहार,
भक्त जुटे नवरात्रि माता के द्वार।

‘मंगल’ कुहांस घिरे राहों में,
नाचती बसन्ति रही बाहों में।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — जब प्रकृति खुशनुमा होती है तो इंसानी मन भी प्रसन्न होती है। अपने चारों तरफ सबकुछ अच्छा – अच्छा लगता है। जब भी नवरात्री आती है भक्तों का उमंग उत्साह देखने लायक होता है, जैसे अभी सावन में शिव भक्तों का उमंग उत्साह देखने लायक देखने लायक है। प्रकृति की हरियाली हर एक मन को मोह लेता है और एक अलग ही सुखमय शांति की अनुभूति कराता है प्रकृति।

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योग दिवस – 21 जून

Kmsraj51 की कलम से…..

Yog Divas June 21 | योग दिवस – 21 जून

आज 21 जून के अंक
अखिल संस्कृति के मनस – प्रवाह।
योग का यह सुंदर उद्देश्य,
जगाया जन चेतन मन चाह।

प्रेरणा का पावन उद्गार,
योग से होते सभी निरोग।
यही सम्यक संत विचार,
विश्व महिमा मंडित उद्योग।

पिलाते कटुता कूट स्नेह,
पढ़ाते मानवता का पाठ।
यही सम मिश्र अहिंसा सत्य,
काछते सब सेवा का ठाट।

राग – रंग संगम ‘मंगल’ भाव,
सुझा देते सबको यह राह।
योग का यह सुंदर उद्देश्य,
जगाया जन चेतन मन चाह।

♦ सुख मंगल सिंह जी – अवध निवासी ♦

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— Conclusion —

  • “सुख मंगल सिंह जी“ ने, बहुत ही सरल शब्दों में सुंदर तरीके से इस कविता में समझाने की कोशिश की है — हर रोज़ सुबह के समय योग करने के फायदे अनमोल है – यह हमारी पहली सांस को पुन: चक्रित करता है। योग का अभ्यास करने से शरीर किक-स्टार्ट होता है। ह्रदय रोग से बचाव करता है योग। दिमाग सदैव ही रहता है एक्टिव। बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता। योग के द्वारा सांसों को साध कर परमानन्द की अनुभूति किया जा सकता है। तन और मन को निरोग रखने के लिए प्रतिदिन योग करे।

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यह कविता (योग दिवस – 21 जून) “सुख मंगल सिंह जी” की रचना है। KMSRAJ51.COM — के पाठकों के लिए। आपकी कवितायें, व्यंग्य / लेख सरल शब्दो में दिल की गहराइयों तक उतर कर जीवन बदलने वाली होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है आपकी कविताओं और लेख से जनमानस का कल्याण होगा। आपकी कविताओं और लेख से आने वाली पीढ़ी के दिलो दिमाग में हिंदी साहित्य के प्रति प्रेम बना रहेगा। आपकी लेखन क्रिया यूं ही चलती रहे, बाबा विश्वनाथ की कृपा से।

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